कविताएँ

  • बारिश में सीता | Kavita Baarish me Sita

    बारिश में सीता ( Baarish me Sita ) हो गई शुरू झड़ी बरसात की। दुखिया कौन है आज,सीता सी? पति चरण छाया से कोसों दूर। हो रही है व्थथा से चूर-चूर। हितैषी नहीं है,सब बेगाना। कैसे, दूर संदेश पहुँचाना ? ऋतु ने भी दुश्मनी मोल ले ली। हो गई शुरू झड़ी बरसात की। महलों की…

  • बिनकहे | Kavita Binkahe

    बिनकहे ( Binkahe ) रहते हों इंसान जहाँ वो मकान खंडहर नहीं होते रहते हों जहाँ फकत इंसान वो महल भी खंडहर से कम नहीं होते बुलावा हो फर्ज अदायगी का ही तो वहाँ भीड़ ही जमा होती है आते हैं बनकर मेहमान लोग उनमे दिली चाहत कहाँ होती है शादी का बंधन भी तो…

  • हाथरस की भीड़ में

    हाथरस की भीड़ में हाथरस की भीड़, में शून्य हुआ जीवन रस अंधविश्वासी बनकर बाबा के दरबार में मैं तो नत मस्तक करने गई थी। अपनों के पास पहुंचने से पहले मैं बाबा धाम पहुंच चुकी थी। सुलझाने कुछ समस्या उलझन में सांसे फस गई थी अंधविश्वासी बनकर मैं तो बाबा के दरबार में गई…

  • दी गर्दन नाप | Di Gardan Naap

    दी गर्दन नाप ( Di Gardan Naap ) चार चवन्नी क्या मिली, रहा न कुछ भी भान। मति में आकर घुस गए, लोभ मोह अभिमान।। तन मन धन करता रहा, जिस घर सदा निसार। ना जानें फिर क्यों उठी, उस आँगन दीवार।। नहीं लगाया झाड़ भी, जिसने कोई यार। किस मुँह से फिर हो गया,…

  • आनंद के पल | Kavita Anand ke Pal

    आनंद के पल ( Anand ke Pal ) जीवन की खुशीयों का मोल समझो। अपने परायें के सपनों को समझो। प्यार मोहब्बत की दुनिया को समझो। और समय की पुकार को समझो।। मन के भावों को समझते नही। आत्म की कभी भी सुनते नही। दुनिया की चमक को देखते हो। पर स्वयं को स्वयं में…

  • विनती करो स्वीकार माँ | वंदना

    विनती करो स्वीकार माँ हे शारदे ,वंदन नमन विनती करो , स्वीकार माँ । शुचिता सदा ,उर में भरो प्रज्ञा सुफल , शृंगार माँ ।। श्वेतांबरा ,कर मति विमल अंतर बहे ,धारा तरल । दे लक्ष्य अब ,पावन सकल भर शक्ति रस ,हर भव गरल ।। हो स्नेह की ,भाषा नयन उर में भरो ,संस्कार…

  • आम | Aam

    आम ( Aam ) आम सब फलों का राजा मीठा रसीला फलों का राजा जून में लग जाता जोरदार खट्टा मीठा फलों का राजा नाम दाम रंग रूप अनेक स्वाद सुंदर फलों का राजा दशहरी हापूज़ तोता पुरी ताज़ा लंगड़ा केस़र फलों का राजा मिश्री से मीठा मधुर ज़ायक़ा कच्चा पक्का फलों का राजा कच्चे…

  • धरती की व्यथा | Kavita Dharti ki Vyatha

    धरती की व्यथा ( Dharti ki Vyatha ) मैं खुश थी जब धरती न कहला कर सूरज कहलाती थी तुममें समा तुम्हारी तरह स्थिर रह कर गुरुग्रह जैसे अनेक ग्रहों को अपने इर्द गिर्द घुमाती थी पर जबसे तुमने मुझे पृथक अस्तित्व में लाने का प्रण किया तभी से एक नित नया अहसास दिया ।…

  • मैं हैरान हूं | Main Hairan Hoon

    मैं हैरान हूं ( Main Hairan Hoon ) मैं हैरान हूं, आखिर क्यों लोग? मौत का जिम्मेदार, बाबा को नहीं मान रहे , क्यों लोग मात्र , सेवादार और आयोजकों को, दोषी ठहरा रहे हैं। आखिर कौन सा डर , बाबा को दोषी मानने से , रोक रहा है । कहीं बाबा श्राप न देदे…

  • गाँव बिखर गया | Kavita Gaon Bikhar Gaya

    गाँव बिखर गया ( Gaon Bikhar Gaya ) जिंदगी का अब कोई भरोसा नही। कब आ जाये बुला हमें पता नही। इसलिए हँसते खेलते जी रहा हूँ। और जाने की प्रतिक्षा कर रहा हूँ।। जो लोग लक्ष्य के लिए जीते है। उनकी जिंदगी जिंदा दिल होती है। और जो लोग हकीकत से भागते है। जिंदगी…