चंद्रवार का गृहकार्य

Kavita Chandrawar | चंद्रवार का गृहकार्य

चंद्रवार का गृहकार्य

( एक विलोमपदी )

 

टेक
धन लोलुप भेड़ियों के झुंड में
प्रजातंत्र,
अकेली भेड़ सा घिर गया है।
आदर्शवाद की टेक पर,
चलते – चलते,
कटे पेड़ सा गिर गया है।
मुट्ठी भर सत्पुरुष लजा- लजा कर
सिर धुन रहे हैं,
और अनगिनत कापुरुष राजा,
नित नया जाल बुन रहे हैं।
ये आदि हैं, अनादि हैं, गद्दार हैं,
इन्हें कपट सुहाता है,
एक अंदर जाता है
तो,
बाहर एक और नया टपक जाता है।
इससे पहले कि, ये कोई नई कसक दें,
कसक उठती है कसम से
इनका टेंटुआ मसक दें।।

कवि : सी पी वर्मा

यह भी पढ़ें :-

Geet | रंग गालो पे कत्थई लगाना

Similar Posts

  • रिमझिम बूंदों की बहार | Rimjhim Boondon ki Bahar

    रिमझिम बूंदों की बहार ( Rimjhim boondon ki bahar ) रिमझिम बूँदों की बहार आई, हरियाली चहुॅओर देखो छाई। श्रृंगार करने को आतुर धरित्री, रीति नवल अभ्यास देखो लाई। मिट्टी से सोंधी महक उठ रही, मलय सौरभ से मस्त हो रही। न भास्कर न रजनी आते गगन में, बस सावन की रिमझिम बरस रही। तन…

  • मतलबी | Kavita Matlabi

    मतलबी ( Matlabi ) मतलबी म+तलबी मत+लबी मतल+बी म त ल बी । म=मैं त=तुम ल=लगन बी=बीतना अर्थात मेरा या तुम्हारा किसी लगन में बीत जाना खरच हो जाना क्या ग़लत है किसी का मतलबी हो जाना।। डॉ. जगदीप शर्मा राही नरवाणा, हरियाणा। यह भी पढ़ें :- गुरु ज्ञान की ज्योत | Guru Gyan ki…

  • मैं सैनिक हूँ | Sainik par kavita

    मैं सैनिक हूँ  ( Main sainik hoon )    मैं हूॅं भारतीय  सेना का वीर, आग हवा कांटे चाहें हो नीर। सर्दी गर्मी चाहे वर्षा चले घोर, रखता सदा रायफल सिर मोर।।   चाहें हो जाऍं सुबह से शाम, करता नही कभी में आराम। घुसनें न दूं दुश्मन अपनी और, हो जाऍं  रात  चाहे फिर …

  • यूं ना मुस्कुराया करो | Yun na Muskuraya Karo

    यूं ना मुस्कुराया करो ( Yun na muskuraya karo )    हमसे मिलकर तुम यूं ना मुस्कुराया करो। मुस्कानों के मोती यूं हम पर लुटाया करो। हंसता हुआ चेहरा मन को मोहित कर जाता। हंसी की फुलझड़ियां सबको दिखाया करो। लबों की ये मुस्कान क्या गजब ढहाती है। दिल तक दस्तक देती झंकार सुनाया करो।…

  • मेघा | Kavita

    मेघा ( Megha )   बरस रे टूट कर मेघा, हृदय की गाद बह जाए। सूक्ष्म से जो दरारे है, गाद बह साफ हो जाए। बरस इतना तपन तन मन का मेरे शान्त हो जाए, नये रंग रुप यौवन सब निखर कर सामने आए।   दिलों पे जम गयी है गर्द जो, उसको बहा देना।…

  • चक्र जो सत्य है

    चक्र जो सत्य है कुछ भी अंतिम नहीं होता,न स्पर्श , न प्रकृति और न कविता ,बस दृष्टिकोण बदल जाता हैक्योंकि, चक्र जीवन , पवन , गुरुत्वाकर्षण काअनवरत सहयात्री बन धरा को थामे ,खड़ा है पंच तंत्र के केंद्र पर तन्हा,पूछताक्या मजहब पेड़ , पानी, धरा, पवन , आकाश का ,लिखा है किसी ने बस…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *