चंद्रवार का गृहकार्य

Kavita Chandrawar | चंद्रवार का गृहकार्य

चंद्रवार का गृहकार्य

( एक विलोमपदी )

 

टेक
धन लोलुप भेड़ियों के झुंड में
प्रजातंत्र,
अकेली भेड़ सा घिर गया है।
आदर्शवाद की टेक पर,
चलते – चलते,
कटे पेड़ सा गिर गया है।
मुट्ठी भर सत्पुरुष लजा- लजा कर
सिर धुन रहे हैं,
और अनगिनत कापुरुष राजा,
नित नया जाल बुन रहे हैं।
ये आदि हैं, अनादि हैं, गद्दार हैं,
इन्हें कपट सुहाता है,
एक अंदर जाता है
तो,
बाहर एक और नया टपक जाता है।
इससे पहले कि, ये कोई नई कसक दें,
कसक उठती है कसम से
इनका टेंटुआ मसक दें।।

कवि : सी पी वर्मा

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