Chhand jeth ki garmi

जेठ की गर्मी | Chhand jeth ki garmi

जेठ की गर्मी

( Jeth ki garmi )

मनहरण घनाक्षरी

 

 

चिलचिलाती धूप में,
अंगारे बरस रहे।
जेठ की दुपहरी में,
बाहर ना जाइये।

 

गर्मी से बेहाल सब,
सूरज उगले आग।
तप रही धरा सारी,
खुद को बचाइये।

 

त्राहि-त्राहि मच रही,
प्रचंड गर्मी की मार।
नींबू पानी शरबत,
सबको पिलाइये।

 

ठंडी ठंडी छांव मिले,
चैन आ जाए मन को।
गर्मी से राहत मिले,
बचिये बचाइये।

 

मत निकलो धूप में,
भीषण गर्मी जेठ की।
प्यासे को पानी जरूर,
शरबत पिलाइये।

 ?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

जीते जी मर जाना | Poem jeete jee mar jana

Similar Posts

  • कृष्ण लला | मत्त गयंद सवैया

    कृष्ण लला कृष्ण लला अवतार लिए चॅंहु ओर बजे दिन रैन बधाई। सोहर गाय रहीं ब्रज नार सुहासित नंद जसोमति माई। अंबर से अवनी तक आज सभी नर नार रहे मुसकाई। खेल रचा बिधना चुपचाप निहार रहे क्षण मंगलदाई।। केशव बेटिन को दुख कष्ट निवार धरा पर लाज बचाओ घूम रहे चॅंहु ओर दुशासन चीर…

  • समांं महका दो आज | Chhand

    समांं महका दो आज (  मनहरण घनाक्षरी छंद )   गीतों का सजाओ साज समां महका दो आज झड़ी बरसाओ ऐसी धूम होनी चाहिए   खूब गाओ छंद गीत मुक्त कंठ नव गीत रस बरसे प्रेम का भाव होना चाहिए   शौर्य पर लिखो गीत योद्धा जंग जाए जीत हिम्मत हौसला मिले ओज होना चाहिए…

  • कुंठायें जीवन का अवसान | Kuntha par chhand

    कुंठायें जीवन का अवसान ( Kunthaye jeevan ka avsan )      चिंता चिता समान है, कुंठायें हैं अवसान। जीवन को आनंद से, जरा भर लीजिए।   सब को खुशी बांटिये, नेह मोती अनमोल। घुटन भरे कुंठाएं, थोड़ा प्रेम कीजिए।   हर्ष मौज आनंद की, गर चाहो बरसात। ईर्ष्या द्वेष लोभ मद, जरा त्याग दीजिए।…

  • भीनी भीनी चांदनी | Chhand bhini bhini chandni

    भीनी भीनी चांदनी ( Bhini bhini chandni ) विधा मनहरण घनाक्षरी     उज्जवल उज्जवल, भीनी भीनी मद्धम सी। दूधिया सी भीगो रही, दिव्य भीनी चांदनी।   धवल आभा बरस, सुधा रस बांट रही। आनंद का अहसास, देती भीनी चांदनी।   चांद यूं छलका रहा, अमृत रस भंडार। हर्ष खुशी मोद करे, दुलार भीनी चांदनी‌।…

  • जग से निराला लगे,

    जग से निराला लगे रूप घनाक्षरीमनमीत-8,8,8,8चरणांत -21 जग से निराला लगे,सबसे ही प्यारा लगे,छेड़े जब प्रेम धुन,वह राग मनमीत । मुख आभा लगे ऐसी,पूनम के चाॅ॑द जैसी,मुख शोभित लालिमा,ज्यों रजनी चाॅ॑दप्रीत । दीप उजियार करे,घर की है शोभा बढ़े,दमक रहे जुगनू,ऐसे लगे नैन जीत । अजब सी लीला देखो,प्रेम रस जरा चखो,कहे फिर सारा जग,है…

  • चितवन | Chitwan

    चितवन ( Chitwan )  मनहरण घनाक्षरी चंचल मनमोहक, चितवन मन मोहे। बांसुरी कन्हैया तोरी, तान छेड़े मन में। मोर मुकुट माधव, गले वैजयंती माला। केशव मुस्कान प्यारी, मन लागे लगन में। राधा के मोहन प्यारे, हर जाए चितवन। छवि घनश्याम कान्हा, बसी मोरे तन में। गोपियों के गिरधारी, गिरधर बनवारी। मधुबन बज रही, मुरलिया वन…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *