ढाट कवि कागा
हुक्मरान
जवान रोज़गार की तलाश में भटक रहे है,
इंसान अरमान की आश में भटक रहे हैं।
जीवन में जीना घुट कर इज़्ज़त आबरू नहीं,
किसान क़िस्मत की तलाश में लटक रहे हैं।
ग़रीब अपनी गै़रत की हिफ़ाज़त ख़ात़िर करते कोशिश,
रोज़ी की तलाश में मायूस मटक रहे हैं।
महंगाई की मार से परेशान मज़दूर धंधा नदार्द,
पगार की तलाश में ख़ूब खटक रहे है।
नफ़रत की नगरी के राजा का बेरहम चेहरा,
दिल थाम तलाश में सिर पटक रहे हैं।
तरस नहीं आता सितमगर को ज़रा भी कागा,
राहत की तलाश में ग़म गटक रहे हैं।
विश्व योग दिवस
इक्कीस जून विश्व योग दिवस हैं,
तपिश भून रही योग दिवस हैं।
करो योग बनो निरोग सांगो-पांग,
अनुलोम-विलोम प्राणायाम योगा दिवस हैं।
अष्टांग योग की महिमा निर्मल निराली,
अष्ट कमल आराधना योग दिवस हैं।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि तीन मुद्रा,
कर नाम स्मर्ण योग दिवस हैं।
पद्म आसन पर बेठ धर ध्यान,
गूढ़ ज्ञान जान योग दिवस हैं।
विश्व गुरु बन विश्व में कागा,
कर शुद्ध आत्मा योग दिवस हैं।
झूठ झांसा
झूठ का भांडा फूटने वाला है,
पाप का हांडा फूटने वाला है।
सच्च की हार नहीं होती कभी,
स़ब्र का बांध टूटने वाला है।
दरबान दग़ा बाज़ दलाल से दोस्ती,
मालिक का माल लूटने वाला है।
हर पग पर ठग ठहरे लुटेरे,
रहबर बना रहज़न रूठने वाला है।
दुकान सज़ा रखी अंदर माल नहीं,
आनन-फानन में उठने वाला है।
चापलूस चुग़ल का दौर चलता कागा,
ग़रीब का गला घौंटने वाला है।
ग़रीब
ग़रीब का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में,
मिस्कीन का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
नंगे भूखे प्यासे करते ख़ून पसीने की मेहनत,
बेबस का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
पेट पीठ से चिपका पसलियां आती साफ़ नज़र,
बेसहारा का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
ग़रीबी में होता गुज़ार बड़ी मुश्किल से मजबूर,
ग़मगीन का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
बदन पर मेले कुचेले फटे पहन रखे चीत्थड़े,
बिलखे का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
नेतिक पतन हो चुका करता नहीं कोई सहायता,
माज़ूर का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
सिर ढकने का आशियाना नहीं खुला आकाश सहारा,
ख़ानाबदोश का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
बिलबिला रहे बच्चे भूखे जूठन नहीं मिलता कागा,
मोहताज का कोई धणी धोरी नहीं दुनिया में।
प्रेरणा
ध्यान भटक गया तो पढ़ नहीं पाओगे,
ज्ञान अटक गया तो बढ़ नहीं पाओगे।
आगे बढ़ना है तो पढ़ मन लगाये,
कर नाम रोशन परिवार का मन लगाये।
जाहिल जीवन में बिना पूंछ का जानवर,
पालतू फ़ालतू आवारा बेकार बिगड़ेल जंगली जानवर।
समाज में होती नहीं कोई इज़्ज़त आबरू,
पीठ पीछे बुराई नफरत से देखते रूबरू।
अगर चाहें अपना भविष्य उज्जवल उन्नति तरक़्क़ी,
छोड़ सारे प्रपंच कर पढ़ाई मिलेगी तरक्की।
कागा की मान बांध मन में गांठ,
जीवन होगा ख़ुश बांध मन में गांठ।
समाज सेवा
समाज को राजनीति के तराजू में नहीं तोला,
आवाज़ को राजनीति के तराजू में नहीं तोला।
जाति के उधेड़बुन में रहकर नौटंकी नहीं की,
हमराज़ को राजनीति के तराजू में नहीं तोला।
अंध-भगत बन अंध-विश्वास नहीं किया कभी,
ऐतराज़ को राजनीति के तराजू में नहीं तोला।
आंख मूंद भरोसा किया अपने जान धोखा मिला,
अंदाज़ से राजनीति के तराजू में नहीं तोला।
फि़रक़ा परस्ती से दूर रहकर क़ौम को तरजीह़,
नाराज़ से राजनीति के तराजू में नहीं तोला।
दोनों पलड़े रखे बराबर ऊंचा नीचा नहीं कागा,
परवाज़ से राजनीति के तराजू में नहीं तोला।
ख़ोफ़
ख़ोफ़ के साये में जी रहा इंसान,
रंजो-ग़म के घूंट पी रहा इंसान।
झूठ फ़रेब का चक्र चलता बनावट वाला,
भूत प्रेत दलदल में जी रहा इंसान।
धर्म मज़हब के मकड़ जाल में उलझ,
पाप पुण्य चुंगल में जी रहा इंसान।
कोई जशन मनाता कोई मातम अंदाज़ अलग,
स्वर्ग नर्क दंगल में जी रहा इंसान।
अंध-विश्वास की देते दुहाई अंध-भक्त ,
धर्म-कर्म मंगल में जी रहा इंसान।
टोना टोटका के बहाने करते कुकर्म कागा ,
पथ भृष्ट पल में जी रहा इंसान।
देश भक्त
कौन देश भक्त कौन देश द्रोही,
कौन देश प्रेमी कौन देश विद्रोही।
देश भक्ति गीत गाते हर गली ,
वंदे मातृम जय हिंद हर गली।
तिरंगा थाम हाथों में गूंजा गगन,
आंखों में चमक दमक मन मगन।
मुख़बर बन गये सिर मौर रहबर,
चंद सिक्कों में बिक बने रहबर।
बेज़मीर बन गये ज़मीर बेच वज़ीर,
कल तक कंगाल आज बने अमीर।
संस्कार सभ्यता का नामो निशान नहीं,
निर्गुण को गुण का एह़सान नहीं।
कागा तराजू़ बदल गया पलड़ों वाला,
ताला भी बदल गया चाबी वाला।
मानव
कुत्ता कुटम्ब का बेरी जन्म-जात से,
मानव मानव का बेरी जात-पात से।
कुत्तिया प्रसव में गटक लेती अपनी संतान,
भूख से बिल-बिला खाती अपनी संतान।
एक गली का कुत्ता दूसरी का दुश्मन,
लहुलुहान कर देता लपक कर जानी दुश्मन।
पालतू कुत्ता होता अपने मालिक का वफ़ादार,
पूंछ हिला कर अदा करता शुक्रिया वफ़ादार।
फ़ालतू हर घर का बिना बुलाया मेहमान,
चोखट पर रहता चाक चौबंद बन दरबान।
स्वजाति मानव करता द्वीष ईर्ष्या उन्नति देख,
अपनों की बुराई बेईमान ईष्यालू उन्नति देख।
मानव करता भेद भाव ऊंच नीच नफ़रत,
दानव बन करता छूआ-छूत नादान नफ़रत।
घ्रणा घमंड घट में बाहर उजला पवित्र,
नियत में खोट मेला मन चित्त चरित्र।
छल कपट कर झपट लेता ह़क़ हड़प,
भूख मिटती नहीं मन तन रहता तड़प।
कागा कलह कलेश करता चित्त नहीं चैन,
जेसे प्यासी रहती समुंदर जल में मीन।
बहुरूपिये
जहां देखें वहां बहुरूपिये बेठे है,
चेहरे पर मुखोटा बहुरूपिये बेठे है।
चाल ढाल ढंग रंग चंगा नहीं,
चरित्र पवित्र नहीं बहुरूपिये बेटे है।
मुख पर बोल मीठा अंदर खोट,
दोगले दग़ा बाज़ बहुरूपिये बेठे है।
चमक दमक चिकनी चुपड़ी दिल दीमक,
चाटते चुप चाप बहुरूपिये बेठे है।
खटमल बन ख़ून चूसते ख़ुशी से,
देते दर्द ग़ज़ब बहुरूपिये बेठे है।
आस्तीन के सांप बन डसते कागा,
ज़हरीले फ़ुर्तीले जा़लिम बहुरूपिये बेठे है।
सत्ता संगठन
सत्ता संगठन में ताल-मेल ज़रूरी,
सरकार संगठन में मेल-जोल ज़रूरी।
अहंकार ने रावण का किया नाश,
कुमति ने कंस का किया नाश।
हठ धर्म के वशी भूत कोरव,
केकेई को पुत्र मोह का गोर्व।
द्रौपदी का चीर हरण हंसी पर,
गोपियां मोहित कृषण की बंशी पर।
महा भारत का युद्ध दिन अठारह,
गीता का अध्याय रचा गया अठारह।
कागा राजनीति के रंग रूप अनेक,
साम दाम दण्ड भेद मुख्य विवेक।
बराबरी
सामना नहीं कर सकते करते पीठ पीछे बुराई
बराबरी नहीं कर सकते करते पीठ पीछे बुराई।
ओक़ात नहीं जज़्बात नहीं जलन होती बलन होती,
अच्छाई नहीं कर सकते करते पीठ पीछे बुराई।
नीयत नीति नेक नहीं मदी खोट मन में ,
भलाई नहीं कर सकते करते पीठ पीछे बुराई।
ईर्ष्या द्वीष की आग जलती रहती तन में,
सच्चाई नहीं कर सकते करते पीठ पीछे बुराई।
बदले की भावना दिल में सांगो-पांग भरपूर,
रहनुमाई नहीं कर सकते करते पीठ पीछे बुराई।
मौक़े की तलाश में रहते देते धोखा कागा,
दबंगई नहीं कर सकते करते पीठ पीछे बुराई।
पर्दाफा़श
झूठ पकड़ा जायेगा आख़िर होगा पर्दाफा़श,
सच्च सामने आयेगा आख़िर होगा पर्दाफा़श।
ढोल में पोल बजता सुंदर सुहाना,
चमड़ा फट जायेगा आख़िर होगा पर्दाफा़श,
पीतल पर परत सोने की चढ़ी,
रोग़न उतर जायेगा आख़िर होगा पर्दाफा़श।
दिन में नज़र आते चेहरे धुंधले,
चश्मा हट जायेगा आख़िर होगा पर्दाफा़श।
बादल ढक लेते सूरज जाता छुप,
कोहरा हट जायेगा आख़िर होगा पर्दाफा़श।
कमल खिल जाता कीचड़ में कागा,
गंद हट जायेगा आख़िर होगा पर्दाफा़श।
मतदान
मतदान कर महंगाई के नाम पर,
मतदान कर बेरोज़गारी के नाम पर।
झूठ छल कपट ढौंग पाखंड छोड़,
मतदान कर शिक्षा के नाम पर।
नित्य नये मुद्दे खोखले साबित होते,
मतदान कर चिकित्सा के नाम पर।
जाति धर्म-कर्म भाई भतीजा-वाद,
मतदान कर स्वास्थ्य के नाम पर।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब भाई,
मतदान कर रोज़गार के नाम पर।
राष्ट्र भक्त बन अंध भक्त नहीं,
मतदान कर राष्ट्र के नाम पर।
जो़र ज़ुल्म सित्म ज़बरदस्ती शोर शरारत,
मतदान कर शांति के नाम पर।
नैतिक पतन नहीं हो कर जतन,
मतदान कर स्वाभिमान के नाम पर।
तिरंगा झंडा फहराये नीले गगन पर,
मतदान कर संविधान के नाम पर।
व्यक्ति विशेष का गुणगान नहीं कागा,
मतदान कर विकास के नाम पर।
विमान ह़ादस़ा
बेरी बुरा मत सोच बुरा होगा तेरा बरवक़्त,
बेरी बुरा मत कर बुरा होगा तेरा बरवक़्त।
मारने वाले से बचाने वाला निक्ट खड़ा है,
चमत्कार को नमस्कार बचाने वाला बहुत बड़ा है।
आफ़्त आने पर उड़ जाते चीत्थड़े चकना-चूर,
मुस़ीबत का पहाड़ टूट जाता परखच्चे चकना-चूर।
चलती चक्की में पीसे जाते अनाज के दाने,
कील का सहारा मिल जाये बच जाते दाने।
अहमदाबाद की विमान दुर्घटना में साबित बचा विश्वास,
कुदरत का करिश्मा एकल जीवित बचा आत्म विश्वास।
कागा मृतकों को भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता,
शोक संतिप्त परिजन को हार्दिक सांत्वना अर्पित करता।
अलविदा
तेरी विदाई देखी नहीं जा सकती,
तेरी जुदाई देखी नहीं जा सकती।
बच्चपन बीता संग हमारे जवानी तक,
तेरी रुसवाई देखी नहीं जा सकती।
ख़ून एहसास का रिश्ता अ़जीबो ग़रीब,
तेरी रुलाई देखी नहीं जा सकती।
हुए शिकार ह़ादस़े के क़ुदरती क़हर,
तेरी तबाही देखी नहीं जा सकती।
दिल दहलाने वाली वारदात इतफ़ाक़ केसा,
तेरी तन्हाई देखी नहीं जा सकती।
फ़िराक़ में फफक रोते ज़ार-ज़ार,
तेरी कसाई देखी नहीं जा सकती।
याद आती होता दिल नाशाद कागा,
तेरी हरजाई देखी नहीं जा सकती।
बग़ावत
धूंआं उठ रहा शायद चिंगारी सुलग रही है,
धूंआं उठ रहा शायद आग सुलग रही है।
बग़ावत की आग भभक रही शोला बन कर,
धूंआं उठ रहा शायद निवाला निगल रही है।
अदावत की आग धधक रही ज्वाला बन कर,
धूंआं उठ रहा शायद प्याला उगल रही है।
शरारत की आग भड़क रही अमनो अमान में,
धूंआं उठ रहा शायद बर्फ़ पिघल रही है।
ह़िमाकत की हवा चली आंधी त़ूफ़ान बन कर,
धूंआं उठ रहा शायद उथल पुथल रही है।
अ़क़ीदत की लहर चली इबादत घरों में उजाला,
धूंआं उठ रहा शायद दिल मचल रही है।
नफ़रत का नादान ज़हरीला इंसान चमक रहा कागा,
धूंआं उठ रहा शायद स़ूरत बदल रही है।
देश भक्त
देश भक्त बन अंध-भक्त नहीं,
राम भक्त बन अंध-भक्त नहीं।
अन्न खाता जल पीता देश का,
सच्चा भक्त बन अंध-भक्त नहीं।
गुप्त-चर बन करता ग़द्दार ग़द्दारी,
नेक भक्त बन अंध-भक्त नहीं।
हनुमान ने सीना चीर दिखाय राम,
परम भक्त बन अंध-भक्त नहीं।
रावण रख बेठा अपने अंतर मन,
पावन भक्त बन अंध-भक्त नहीं।
भाई भरत लक्ष्मण शत्रुघन सीखा कागा,
भाव भक्त बन अंध-भक्त नहीं।
अंध-भगत
आस्था अंध-विश्वास में रात दिन का फ़र्क़,
आस्था आत्म-विश्वास में दिन रात का फ़र्क़।
विज्ञान के दौर में करते वहम पर विश्वास,
अज्ञान के दौर में करते अहम पर विश्वास।
पत्थर में प्राण फूंक देते मंत्र उचारण से,
पार्थव में नहीं आती सांसें मंत्र उचारण से।
झाड़ा झपटा भोपा ढोंग पाखंड करते झूठ झमेला,
करते टोना टोटका यंत्र मंत्र तंत्र झूठ झमेला।
भोले भाले अटके लटके भटके का करते शोषण,
चुग़ल चाटुकार चापलूस कंजूस मनह़ूस़ का करते पोषण।
गुण अवगुण का ज्ञान नहीं करते मन मानी,
मुंह बोल मीठा अंदर काला करते आना कानी।
कागा,मत़लब तक करते तलवे चाटने का काम,
ग़र्ज़ मिटी गुर्राते करते पैर काटने का काम।
राजनीति
छल कपट की राजनीति चल रही है,
छीन झपट की राजनीति चल रही है।
समय चक्र बदल रहा तेज़ गति से,
लुच्चा लफंगा की राजनीति चल रही है।
मुक्ति दिलाई जान क़ुर्बान कर मौन है,
जासूस चापलूस की राजनीति चल रही है।
ग़ुलाम बन करते थे झुक कर सलगम,
दलाल दोगलों की राजनीति चल रही है।
आजा़दी की जंग में भाग नहीं लिया,
चुग़ल चाटुकार की राजनीति चल रही है।
सूली का फंदा चूमा शोक़ से कागा,
घ्रणा घमंड की राजनीति चल रही है।
अजूबा
एक हल्का सा झटका लगा तिलमिला गये,
एक मामूली सी खरोंच आई बिलबिला गये।
स़दियों से ज़ुल्म सित्म बर्दाशत किये बेशुमार,
शदीद ज़ख़्मों से छलनी जिस्म बेह़द बेशुमार।
दर किनार कर रखा था मुआशरे में,
हम किनार नहीं हो सके मुआशरे में।
बड़ा शोर था शऊर का बज़्म में,
बड़ा नाज़ नख़रा नहीं मिला नज़्म में।
नशा उतर गया धन दोलत सरमाया का,
ख़ुमार ख़ाक हो गया शहोरत सरमाया का।
ग़रीब ज़रूर है मगर ग़ज़ब के ग़ैरतमंद,
रूखी सूखी बासी खाते ग़ज़ब के ग़ैरतमंद।
कागा ह़क़ हड़पा नहीं किसी ज़रूरतमंद का,
चोट देकर दिल नहीं दुखाया ज़रूरतमंद का।
दुख-सुख
आंधी त़ूफ़ान आना चाहिये जीवन में,
बारिश बाढ़ आना चाहिये जीवन में।
कौन अपना कौन पराया पता चले,
आफ़्त मुसीबत आना चाहिये जीवन में।
दुनिया में हर बंदा मत़लबी यार,
उतार चढ़ाव आना चाहिये जीवन में।
ख़ुद ग़र्ज़ी करते चुग़ली चापलूसी चाटुकारी,
इज़्ज़त ज़िल्त आना चाहिये जीवन में।
उंगली पकड़ सिखाया चलना हर क़दम,
ठोकर चोट आना चाहिये जीवन में।
मरना जीना क़ुदरत का क़ानून पुख़्ता,
एह़सास इशारा आना चाहिये जीवन में।
मरघट तक साथ निभाते लोग कागा,
मौत मार आना चाहिये जीवन में।
सौलह श्रृंगार
सनातन संस्कृति में सौलह श्रृंगार सुन्दरता का प्रतीक,
विवाहित महिलाओं में सौलह श्रृंगार पवित्रता का प्रतीक।
ललाट पर लाल बिंदी मांग टीका चुटकी सिंदूर,
होंठों पर हंसी ख़ुशी महके मुस्कान मांग सिंदूर।
आंखों में काजल नाक में नथ लटके बाली,
गले में नव लखा हार कानों में बाली।
भुजा पर बंधा बाजूबंद कंगन चूड़ियां हाथों में,
पांवों में बाजे पायल छम छम संग बिछुआ।
चम चम चमके चूनरी तारों जड़ी पट घूंघट,
सिर ढक सुंदरी सिमट गई चेहरा घट घूंघट।
कागा बिना सौलह श्रृंगार सनातन संस्कृति सूनी-सूनी,
पाश्चात्य संस्कृति का बोल-बाला संस्कृति सभ्यता सूनी।
आपरेशन सिंदूर
हम भारतीय सैना को सलाम करते है,
हम भारतीय सैना को प्रणाम करते है।
गर्व है जल थल वायू सैना पर,
हम हर सिपाही को सलाम करते हैं।
पहलगाम के आतंकी कहां चले हुए ग़ायब,
हम उन यात्रियों को सलाम करते हैं।
धरती निगल गई आसमान खा गया उनको,
हम सोफिया कुरेशी को सलाम करते है।
गुनाहगारों का अता पता नहीं आज तक,
हम व्योमिका सिंह को सलाम करते है।
सिंदूर लूटा सुहागनों का एक पल में,
हम उन वीरांगनाओं को सलाम करते है।
आपरेशन सिंदूर का एलान नो ठिकाने नेस्तनाबूद,
हम जांबाज़ बेटियों को सलाम करते है।
तीनों सैना प्रमुख बधाई के पात्र कागा,
हम आला अफसरों को सलाम करते है।
धर्म-कर्म
धर्म में ऊंच नीच वो धंधा है,
धर्म में छूआ छूत वो धंधा है।
ईश्वर ने मानव बनाये भेजा जग में,
धर्म में भेद भाव वो धंधा है।
मानव बन नहीं सके दानव बन बेठे,
धर्म में अगड़ा पिछड़ा वो धंधा है।
ईश्वर को बांट दिया अलग नामों से,
धर्म में मन मुटाव वो धंधा है।
प्रकृति पुरुष पांच तत्व से बनाया पुतला,
धर्म में धोखा दग़ा वो धंधा है।
रक्त रंग लाल हर मानव में समान,
धर्म में घाल मेल वो धंधा है।
स्त्री पुरूष दो जाति तीसरा रूप किन्नर,
धर्म में अंध विश्वास वो धंधा है।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई पूजा बंदगी भिन्न,
धर्म में घ्रणा नफ़रत वो धंधा है।
जल थल वायू अग्न गगन का पिंजरा,
धर्म में छेड़ छाड़ वो धंधा है।
तीन गुण रजो संतों तमो आत्मा कागा,
धर्म में झूठ झांसा वो धंधा है।
दिखावट
हमने अच्छे दिन देखे है ज़िंदगी में,
हमने बुरे दिन देखे है ज़िंदगी में।
ग़रीब देखें क़रीब से ग़ैरत महंगा ज़ेवर,
हमने अमीर लोग देखे है ज़िंदगी में।
सादा लिबास बदन पर सिर ढका हुआ,
क़ीमती कपड़े पहने देखे है ज़िंदगी में।
अर्ध-नग्न अंग बोल चाल ताल मेल,
सुरा सुन्दरी शाहिंग देखे है ज़िंदगी में।
धन दौलत का ग़ुरुर एशो अ़शरत अंदाज़,
शराब कबाब शबाब देखे है ज़िंदगी में।
झुग्गी झोपड़ी झुर्रियां मास़ूम चेहरे पर कागा,
चमक दमक धमक देखे है ज़िंदगी में।
जवान
जय जवान खड़े सीना तान सीमा पर,
जय जवान आन बान शान सीमा पर।
जल सेना थल सेना वायु सेना जांबाज़,
नागरिक सोये गहरी नींद जवान सीमा पर।
गर्मी सर्दी आंधी त़ूफ़ान बर्फ़ बारी बारिश,
जोशो ख़्रोश होश बुलंद तैयनात सीमा पर।
गोला बारूद तोप मिसाईल ड्रोन के ज़खी़रे,
जान क़ुर्बान को तैयार ख़बरदार सीमा पर।
परिंदा पर नहीं मारे चौकसी चाक चौबंद,
वत़न पर मर मिटते निगाहबान सीमा पर।
ग़द्दारों की गंदी नज़र करते मुख़बरी कागा,
मुकमल करते अरमान जवान श्रीमान सीमा प
फ़ेस़ला
आनन-फानन नहीं लेना फ़ेस़ला फ़ज़िहत होगी,
तुरंत -फुर्त नहीं लेना फ़ेस़ला फ़ज़िहत होगी ।
जोश में होश खोना बचकानी बेतुकी बातें,
आंखें मूंद नहीं लेना फ़ेस़ला फ़ज़िहत होगी।
नक़ल में अक़ल ज़रूरी शक्ल बिगाड़ देगी,
बिना सोच नहीं लेना फ़ेस़ला फ़ज़िहत होगी।
करना नहीं भरोसा किसी भांड भगोडे़ पर,
बिना विचार नहीं लेना फ़ेस़ला फ़ज़िहत होगी।
नाकाम करते कोशिश जान के दुश्मन हरदम,
बिना स़बूत नहीं लेना फ़ेस़ला फ़ज़िहत होगी।
गुरूर में ग़मो गुस्सा नहीं करना कागा,
घमंड में नहीं लेना फ़ेस़ला फ़ज़िहत होगी।
वादे-इरादे
तेरे वादे सारे झूठे निकले यार,
तेरे इरादे सारे झूठे निकले यार।
भरोसा नहीं रहा यक़ीन नहीं रहा,
तेरे इक़रार सारे झूठे निकले यार।
सरसब्ज़ बाग़ दिखाये तुमने हरे भरे,
गुल गुलज़ार सारे झूठे निकले यार।
साज़ों सामान असबाब रोनक़ रुतब्बा रसूख़,
सजावट बज़ार सारे झूठे निकले यार।
सपने दिखाये माला-माल बनने के,
ख़ुशी ख़ुमार सारे झूठे निकले यार।
आंखें तरस रहीं ग़रीबों की गमगीन,
बातें बेशुमार सारे झूठे निकले यार।
साख मटिया-मेट हो गई कागा,
दावे हज़ार सारे झूठे निकले यार।
न्याय की पुकार
सुन मेरी सरकार न्याय की पुकार,
कान खोल सरकार न्याय की दरकार।
चाल बदल गई चेहरा चरित्र बदला,
वायु मंडल बदला गया बदल संसार।
खान पान वेष-भूषा स़ूरत बदली,
जल वायु बदली गया बदल संस्कार।
रिश्ते नाते सगे संबंधी साथी बदले,
सोच समझ बदली गया बदल व्यवहार।
अपने बदल बन गये पराये अनजान,
इज़्ज़त आबरू बदली गया बदल प्यार।
रक्त संचार का रूप रंग बदला,
लाज ह़य्या बदली गया बदल दुलार।
बोल चाल ताल मेल बदला कागा,
सहन शक्ति बदली गया बदल विचार।
सोया समाज
नींद कब टूटेगी सोये हुए समाज की,
सुस्ती कब टूटेगी सोये हुए समाज की।
नींद में सोया पड़ा समाज सालों से,
करवट तक नहीं बदल रहा सालों से।
खटिया पर बिस्तर को दीमक लग चुकी,
खटमल की भर मार दीमक लग चुकी।
खांसी खर्राटे फर्राटे करते औंघ में विघन,
जगाने वाला लगता बुरा सहन नहीं विघन।
खड़े बीच चौराहे ललकार रहे लफंगे लुच्चे,
लूट रहे लुटेरे घर सामान बचे खुच्चे।
जगाने वाले थक गए झपट झंझोड़ कर,
जागे नहीं आलसी छोड़ चले झंझोड़ कर।
कागा फ़िक्र ज़िक्र करने का क्या फ़ायदा,
जो जानते नहीं कोई क़द्र क़ानून क़ायदा।
अलगाव
तीन युग बीत गये चोथा चल रहा है,
सत्य त्रेता द्वापुर गये कलि चल रहा है।
सतो रजो तमो गुण बीत गये शून्य शेष,
प्रेम भाव निष्ठा नहीं छल कपट चल रहा है।
मानव बन गया दानव मति हो गई भ्रष्ट,
नारी की आबरू नहीं कुकर्म चल रहा है।
माता पिता का सम्मान नहीं होता सदेव अपमान,
वृद्धाश्रम में करते भर्ती खेल चल रहा है।
भाई बहिन से बोल चाल नहीं मन मुटाव,
साला साली से नाता मेल हो रहा है।
धर्म जाति का झगड़ा करते आपस में द्वंद,
अगड़े पिछड़े का अंतर झंझट चल रहा है।
ऊंच नीच छूआ छूत भेद भाव नफ़रत कागा,
अलगाव ज़हर घोल धर्म धंधा चल रहा है।
बाज़मीर
बग़लगीर बनने से बेहत्तर है बाज़मीर बन,
बेज़मीर बनने से बेहत्तर है बाज़मीर बन।
कमज़ोर कायर बन करते चुग़ली चापलूसी जासूसी,
तुक्का लगाने से बेहत्तर है तीर बन।
पराई छाया में बेठ शेर बनते हो,
पीड़ा पीर से बेहत्तर है वीर बन।
पीठ पीछे करते हो बुराई रूबरू ख़ुशामद,
ग़ुलाम बनने से बेहत्तर है आलमगीर बन।
जूठन खुरचन खाये करते एंठन देते डकारें,
दलाली करने से बेहत्तर है गम्भीर बन।
उतरन पहने बदन पर पराई घमंड करता,
बेह़य्या बनने से बेहत्तर है वज़ीर बन।
द्वीष ईर्ष्या करते जाल बुनते सदा कागा,
ईर्ष्यालू बनने से बेहत्तर है अमीर बन।
बदनियत
क्यों आती पेट में मरोड़ें बिना कुछ बिगाड़े,
क्यों होती दिल में जलन बिना कुछ बिगाड़े।
ईर्ष्या होती हरदम देख पराई उन्नति तरक़्क़ी को,
क्यों नहीं होती हज़्म ऊंचाई बिना कुछ बिगाड़े।
जोड़ तोड़ में लगे रहते बुरा करने पराया,
क्यों नहीं आती शर्म हय्या बिना कुछ बिगाड़े।
गिला शिकवा करते चुग़ली चापलूस मंडली में बेठ,
क्यों नहीं आती सुख शांति बिना कुछ बिगाड़े।
सांठ गांठ कर बेच देते अपना ज़मीर सस्ता,
क्यों नहीं आती नींद बेचैन बन बिना कुछ बिगाड़े।
बे-नस्ल बे-बुनियाद को अस़ल नापसंद कागा,
क्यों नहीं बराबरी करते बदमाश बिना कुछ बिगाड़े।
मनभेद
भाग्य-शाली हूं मत-भेद रहे मनभेद नहीं,
प्रभाव-शाली हूं मन-मुटाव रहे मनभेद नहीं।
नियत नीति पवित्र रखी चित्त चित्र चरित्र नेक,
खुल्लम-खुल्ला बेबाकी से बात रखी मनभेद नहीं।
बेवजह राजनीति का शिकार हुआ क़दम दर क़दम,
फिसल कर गिरा सम्भल कर उठा मनभेद नहीं।
मह़फ़ल में बेगाना बना अपनों के बीच अकेला,
अपमान का घूंट पिया चुप-चाप मनमेद नहीं।
प्याला नहीं मिला पानी पीने का तड़पे प्यासे,
औक से पीना पड़ा चुल्लु भर मनभेद नहीं।
जनता की दरिया दिली ने किया कमाल कागा,
शून्य से शिखर तक बुलंद बनाया मनभेद नहीं।
वफ़ादार
पालतू पशू होते मालिक के बेह़द वफ़ादार,
पालतू पक्षी होते मालिक के बेह़द वफ़ादार
इंसान का मालिक इंसान ऊंच नीच पद,
ग़ुलाम इंसान होते मालिक के बेह़द वफ़ादार।
खूंटे में बंधी ज़ंजीर बाड़े में कैद,
चारे के मेह़ताज मालिक के बेह़द वफ़ादार।
पिंजरे में बंद चुगते चुग्गा दाना पानी,
बीठीं अगल बग़ल मालिक के बेह़द वफ़ादार।
इंसान दरबान से राजा महाराजा तक दास,
संत्री मंत्री स़ाह़िब मालिक के बेह़द वफ़ादार।
कुत्ता अपना पूंछ हिला देता संकेत कागा,
इंसान चापलूस बन मालिक के बेह़द वफ़ादार।
प्रेम-विवाह
प्रेमी संग भाग कर नहीं करना प्रेम विवाह,
लोफ़र संग भाग कर नहीं करना प्रेम विवाह।
चढ़ती जवानी का जोश जुनुन कर देता पागल,
ऊंच नीच जात पात नहीं करना प्रेम विवाह।
प्रेम की आग जला देती रिश्ते नाते बंधन,
जाकर कोर्ट कचहरी में नहीं करना प्रेम विवाह।
प्रैम विवाह नहीं होता सफल अंत लड़ाई झगड़ा,
आती तलाक़ की नोबत नहीं करना प्रेम विवाह।
बच्चपन बीता मां बाप के साथ लाड़ कोड़,,
पहचान से कर मना नहीं करना प्रेम विवाह।
मां बाप जीते जी मर जाते देख कुकर्म,
परिजन की बिना सहमति नहीं करना प्रेम विवाह।
प्राचीन परम्परा चली आई मां बाप का फ़र्ज़,
कुल को कलंक लग नहीं करना प्रेम विवाह।
आज कल की युवा पीढ़ी पतन पर कागा,
मां बाप आशीर्वाद बिना नहीं करना प्रेम विवाह।
चुग़ल-ख़ोर
धरातल पर जनाधार नहीं वो उड़ते आकाश में,
आश्याना नहीं अपना ठोर ठिकाना उड़ते आकाश में।
गिद्ध झुंड के साथ तलाश करते कंकाल की,
टूट पड़ते मृत पशु पर उड़ते आकाश में।
सिद्ध दृष्टि तेज़ तीखी देख लेते दूर तलक,
नोच लेते कंकाल हड्डी मांस ऊड़ते आकाश में।
आज कल का इंसान गिद्ध झुंड बनाये घूमता,
बिना किसी पंख परवाज़ ऊंचा उड़ते आकाश में।
चेहरा चरित्र पवित्र नहीं गिरगिट जैसे बदले रंग,
बन जाता बेईमान बग़ल गीर उड़ते आकाश में।
बेतुकी बेहूदी करता बातें बकवास बक बक कागा ,
चापलूस चाटुकार चुग़ल चमचा गिरी उड़ते आकाश में।
कमान
सत्ता की चाबी क़द्दावर हाथों में होनी चाहिये,
सत्ता की कमान क़द्दावर हाथों में होनी चाहिये।
हंसी मज़ाक़ मामूली समझ रखा है राजनीति को,
सत्ता की डोर मज़बूत हाथों में होनी चाहिये।
सरपंच प्रधान प्रमुख विधायक सांसद बनने की तमना,
सत्ता की सेज प्रबल हाथों में होनी चाहिये।
लोक तंत्र में सिर गिने जाते चुनाव वास्ते,
सत्ता की गिनती दबंग हाथों में होनी चाहिये।
बाहुबली धन दोलत के दम पर चयन होते,
सत्ता की लग़ाम ख़ुदार हाथों में होनी चाहिये।
कमज़ोर कायर का क्या भरोसा ख़ुद लाचार कागा,
सत्ता की गद्दी गब्बर हाथों में होनी चाहिये।
पुरूष प्रधान
होड़ मची है दूसरों को नीचा दिखाने की,
होड़ मची है ख़ुद को ऊंचा दिखाने की।
कम्मियां खोज निकलते हर क़िस्म की चुन कर,
होड़ मची है दूसरों को कायर दिखाने की।
अपनी पीठ ख़ुद थपाते तीस मार ख़ान बनना,
होड़ मची है ख़ुद को वीर दिखाने की।
पंच सरपंच बनने की करते हाथा थोड़ी ह़ुज़ूर,
होड़ मची है दूसरों को पराया दिखाने की।
चुना जाता कोई पंच सरपंच अड़ोस पड़ोस का,
होड़ मची है ख़ुद को सरपंच दिखाने की।
प्रधान बन जाती पत्नि पति को कमान कागा,
होड़ मची है पति को प्रधान दिखाने की।
शूरवीर राजपूत
राजपूत रजवाड़ा रण-भूमि चोली दामन का साथ,
राजपूत अखाड़ा वीर-भूमि चोली दामन का साथ।
छत्रपति छत्री राजा बन छाया दी प्रजा को,
राजपूत मज़बूत कर्म-भूमि चोली दामन का साथ।
सिर कटे धड़ लड़े रण भूमि रक्त रंजित,
राजपूत सपूत जन्म-भूमि चोली दामन का साथ।
घास की रोटी खाई मगर मांस नहीं खाया,
प्रताप राजपूत धर्म-भूमि चोली दामन का साथ।
क़िलाबंदी गढ ऊंचे मह़ल झरोके शाही ठाठ बाट,
रानियां अदभूत जोहर चूमि चोली दामन का साथ।
राणा सांगा प्रथ्वीराज चौहान वीर गति प्राप्त कागा,
भूपत भभूत मातृ-भूमि चोली दामन का साथ।
ज़िंदगी
ऊंचा आसमान में अकेला उड़ना पड़ता है,
जंगे मैदान में अकेला लड़ना पड़ता है।
ज़िंदगी की लड़ाई बड़ी मुश्किल ह़ोस़़ला चाहिये,
कंटीली राह में अकेला बढ़ना पड़ता है।
मंज़िंल मक़स़द पाना हदफ़ हमारा एक उस़ूल,
शिखिर छूने को अकेला चढ़ना पड़ता है।
चढ़ना है तो झुक कर धीमे चल,
तारीख़ लिखने को अकेला पढ़ना पड़ता है।
जब बहार आती है ग़ुंचे फूल जाते ,
नये कौंपल वास्ते अकेला झड़ना पड़ता है।
ज़ेवर जी़नत जिस्म की कुंदन क़ीमती कागा,
हीरा बन होती अकेला मढ़ना पड़ता है।
अकेला
इंसान आया अकेला जग में जाना अकेला,
इंसान आया मेला जग में जाना अकेला।
बच्चपन बीता खेल कूद में हंसते रोते,
बंद मुठ्ठी आया जग में जाना अकेला।
नंगा मल मूत्र रक्त से लथ पथ,
गंदा रोता आया जग में जाना अकेला।
नो माह ऊंधा लटका रहा गर्भ में,
नाल बंधा आया जग में जाना अकेला।
मां का दूध पिया स्तन से गाढ़ा,
भूखा प्यासा आया जग में जाना अकेला।
माता पितः से रिश्ता नाता प्रेम का,
अनजान बन आया जग में जाना अकेला।
जाति धर्म की घुट्टी पिलाई मीठी कड़वी,
मानव बन आया जग में जाना अकेला।
दो ग़ज़ कफ़न कमाया ख़ाली हाथ कागा,
नेक बन आया जग में जाना अकेला।
बदलाव
वो चाल चेहरा चरित्र नहीं रहा,
वो चित्त चित्र पवित्र नहीं रहा।
मुखोटा पहन लिया चेहरे पर अजीब,
वो मीत प्रीत मित्र नहीं रहा।
सू़रत सीरत मूर्त मुस्कान मधुर वचन,
वो बोल ढंग स्तर नहीं रहा।
रंग रूप संग उमंग चाह राह,
वो नर्म कोमल अंतर नहीं रहा।
कस्तूरी की गंध छुप नहीं सकती,
वो ख़ुशबू ख़ुमार इत्र नहीं रहा।
तन ओढ़ रखी काली कंबली कागा,
वो मख़मली रेश्मी वस्त्र नहीं रहा।
पद मद
पद के मद में मर्यादा तोड़ मत देना,
क़द के मद में गरिमा तोड़ मत देना।
वक़्त बदलते देर नहीं लगती समय बड़ा बलवान,
बल के मद में भुजा मरोड़ मत देना।
माया काया छाया का कोई भरोसा नहीं यारो,
धन के मद में मुंह मोड़ मत देना।
उगते सूरज को करते सलाम डूबते को नहीं,
सत्ता के मद में रिश्ते छोड़ मत देना।
ओछे आदमी की नीच ह़रकत सोच सड़ी गली,
चमक के मद में पराये जोड़ मत देना।
आकाश में छाये बादल गर्ज रहा गाज कागा,
बारिश के मद में मटकी फोड़ मत देना।
पत्थर
मैं हूं नींव का पत्थर मामूली नहीं,
मैं हूं मील का पत्थर मामूली नहीं।
मंदिर मस्जिद चर्च गुरू द्वारा के नीचे,
मैं हूं अन-घड़ पत्थर मामूली नहीं।
मैं मीनार गुंबद कंगूरे में तराशा जाता,
स़ह़न आंगन का चमकदार पत्थर मामूली नहीं।
मुझे तोड़ मरोड़ छीनी हथोड़े से फोड़ते,
बनाते भगवान का रूप पत्थर मामूली नहीं।
दूरी का अंदाज़ लगाने का बनाया निशान,
नाम रखा अजूबा मील पत्थर मामूली नहीं।
श्रद्धालू पूजारी करते पूजा सिर झुकाये मेरी,
मैं अकेला मुक़दस काबा पत्थर मामूली नहीं।
लाल पीला संग-मर्मर सफ़ेद काला कागा,
हीरा अ़क़ीक़ नीलम कोहिनूर पत्थर मामूली नहीं
पोल पट्टी
पोल पट्टी खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम,
झोल पट्टी खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
मूल निवासी का दावा पक्का पुख़्ता बेह़द मज़बूत,
खोज बीन खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
अस़ल नस़्ल का पिटारा दबा कर रखा था,
छान बीन खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
अतीत में झांक कर देखा प्राचीन खंडहर खोद,
नीचे ज़मीन खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
मोहन जो दड़ो हड़प्पा सिली गुड़ी प्रमाण पुराने,
कंकाल जीन खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
संस्कृति सभ्यता के जीते जागते अवशेष बोल उठे,
द्रविङ दीन खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
डीएनए की जांच में हुआ ख़ुलास़ा कौन मूल,
लिया छीन खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
धणी चोरी ध्वस्त हो गये आक्रांत क़ाबिज़ कागा,
हुए हीश खुली सिट्टी बिट्टी हो गई गुम।
वक़्त का तकाज़ा
आज ह़ाशिये पर है कल हौंगे सुरख़ियों में,
आज सितारे गर्दिश में कल होंगे सुरख़ियों में।
वक़्त बड़ा बादशाह बदल देता तख़तो ताज अंदाज़,
आज है दर-किनार कल हौंगे सुरख़ियों में।
हम-किनार होकर बन जायेगे मुल्क के मालिक,
वक़्त का चक्र चलता कल होंगे सुरख़ियों में।
कल तक थे क़ुत़ब के बारे आसमान में,
दोबारा होगा त़लू तारा कल हौंगे सुरख़ियों में।
गहरी साज़िश के ज़रिये कर दिया ग़रूब ग़ायब,
ज़ाहिर होंगे ज़रूर जाब कल हौंगे सुरख़ियों में,
ग़ुरूर नहीं कर मग़रूर शोख़ी शेख़ी सित्म कागा,
वक़्त का तक़ाज़ा मंंज़ूर कल हौंगे सुरख़ियों में।
जीवन काल
जीवन में किसी का दिल दुखाया नहीं,
प्रेम से बीता जीवन दिल दुखाया नहीं।
बच्चपन जवानी पच्चपन की उम्र गुज़री शांत,
बाड़ा बोल अप-शब्द दिल दुखाया नहीं।
नौंक झौंक छल कपट झपट नहीं कभी,
रखा सदेव मधुर व्वहार दिल दुखाया नहीं।
शिक्षक नरसिंग स्टाफ़ लिपिक पदों पर कार्यरत,
नेक नियत ईमानदार छवि दिल दुखाया नहीं।
समाज सेवा क्षेत्र में निष्काम काम किया,
बिना किसी लाग लपेट दिल दुखाया नहीं।
आठ चुनाव लड़के चार जीते चार हारे,
मनोबल नहीं कभी हारे दिल दुखाया नहीं।
ईर्ष्यालू लोगों ने बेबुनियाद झूठे लांछन लगा ये,
दाग़ नहीं दामन पर दिल दुखाया नहीं।
धर्म-पत्नि प्रधान ख़ुद बने विधायक कागा,
ज़ुल्म सित्म ज़रा नहीं दिल दुखाया नहीं।
रोया था
पिता छोड़ चले फूट फूट कर रोया था,
मां छोड़ चली फूट फूट कर रोया था।
संसार क्षण भंगुर आवा-गमन रस्मो-रिवाज अटल,
भैय्या छोड़ चले फूट फूट कर रोया था।
जीवन जीना मरना शादी ब्याह खु़शी ग़मी नियति,
दादी छोड़ चली फूट फूट कर रोया था।
आंखें मेरी गवाह सब कुछ मंज़िर देखा सूबरू,
चाच छोड़ चले फूट फूट कर रोया था,
भूआ बहिनें छोड़ चली प्रकृति का नियम निराला,
ताऊ छोड़ चला फूट फूट कर रोया था।
बेटे बेटियों की शादियां की धाम धूम से,
बेटियों की विदाई फूट फूट कर रोया था।
परिवार में प्रेम की गंगा कल कल करती,
दोहिता छोड़ चला फूट फूट कर रोया था।
जन्म भूमि छोड़ चले संगे समंधी रोते रहे,
जब आई याद फूट फूट कर रोया था।
कागा परिवार में किलकारी मां बाप बड़े ख़ुश,
जन्म पर अनजान झूठ मूठ कर रोया था।
अंध-भगत
आंखें खोल निरख दुनिया अंध-भगत नहीं बन,
आंखें खोल निरख दुनिया मंद-भगत नहीं बन।
यह दुनिया रंग-बरंगी देख इंद्र-धनुषी रंग,
देख परख जान पहचान अंध भगत नहीं बन।
बगुला हंस दोनों रंग उजला भोजन भक्षण अलग,
भाव भंगिमा दोनों भिन्न अंध भगत नहीं बन।
कस्तूरी कोयला दोनों काले तास़ीर में फ़र्क़ जुदा,
गंध कालिख रहती संग अंध भगत नहीं बन।
फिटकड़ी मिश्री की डली एक रंग रूप समान,
स्वाद चख कर परख अंध भगत नहीं बन।
स़ूरत मूर्त एक सरीखी काली कोयल कागा,
मधुर कड़वा बोल वचन अंध भगत नहीं बन

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा
पूर्व विधायक
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