हम उस देश के वासी हैं

देश आखिर है क्या बला?

देश आखिर है क्या बला?

कुछ जाहिलों के लिए जमीन का टुकड़ा
कुछ गोबर गणेशों के लिए उनके आका
कुछ सिरफिरों के लिए उसमें बसे लोग
कुछ घाघ लोगों के लिए बिजनेस का अड्डा
जिन्होंने खोद दिया गरीबों के लिए खड्डा

आका घाघ लोगों से मिलकर –
जाहिल और गोबर गणेशों को रोज घास चराता है
टीवी पर हर वक्त पीपली लाइव दिखाता है
अमिताभ की पोट्टी तक सूंघवाता है
घंटा बजवा कर करोना भगवाता है

मैं जाहिल न गोबर गणेश न घाघ
कैसे सिल लूँ मुँह बताए आप

लोग ही देश है
और देश ही है लोग
देश गर होता एक का़ग़ज़ का टुकड़ा
अब तक दीमके चट कर गईं होती
वैसे आदमियों की शक्ल में दीमक कम नहीं
पर कुछ सिरफिरे हर बार इसे बचा लेते हैं
लेकिन हर बार भगत सिंह पैदा नहीं होते

दीपक वोहरा

(जनवादी लेखक संघ हरियाणा)

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