विध्वंस | शैलेन्द्र शांत

विध्वंस

आदमी का फटे चाहे आसमान का
कलेजा
विध्वंस ही होता है

अपमान बहुत
दोहन भरपूर
उपेक्षा अति
वादे अनवरत झूठे
अहर्निश लूट
होती है भारी टूट-फूट
कहीं, तब फटता है कलेजा

टूट जाता है जब धैर्य
प्रकृति का
चाहे आदमी का

विध्वंस ही होता है

( Destruction was published in the reputed magazine: The Hans. )

Destruction

Whether it’s the heart of a man
Or the sky that tears apart
Destruction is inevitable

Immense humiliation
Excessive exploitation
Utmost neglection
Endless false promises
Unceasing plunder—
A heavy rupture occurs somewhere
And then the heart bursts

When patience shatters
Be it nature or man’s
Destruction is inevitable.

अनुवादक: दीपक वोहरा

(जनवादी लेखक संघ हरियाणा)

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