दिल की दर्द-ए-मुहब्बत
दिल की दर्द-ए-मुहब्बत

दिल की दर्द-ए-मुहब्बत

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दिल की दर्द-ए-मुहब्बत कहूं तो किस से कहूं

क्या है हमारी ख्याल-ए-वहसत कहूं तो किस से कहूं

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नीला दीखता है पानी, गहराई उतना है नहीं दरिया का

यही हालात जेहन का, ये बिसात कहूं तो किस से कहूं

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लम्बी कहानी का छोटा सा एक हिस्सा हूँ किस से कहूं

कुछ आरज़ी इश्क़-ए-खिताब कहूं तो किस से कहूं

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निस्बत-ए-ख़ास से किया हुआ वादा और हसीन गुफ्तगू

ना-मुक़म्मल ये अपनी नदामत कहूं तो किस से कहूं

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राख्स-ए-क़ायनात में उसके जुल्फों का क्या है लागत

देखते ही देखते हुए क़यामत कहूं तो किस से कहूं

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जब से हुआ दीदार साक़ी-ए-मैखाना के जान-ए-जां

बरसा है किस कदर इनायत कहूं तो किस से कहूं

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आक़ा तेरी हुक्म अगर हो इस खिदमत गार ‘अनंत’ को

तो तेरी फ़ुक़दान में यह हक़ीक़त कहूं तो किस से कहूं

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शायर: स्वामी ध्यान अनंता

 

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