Diwali kavita in Hindi

दीपावली पर कविता | Diwali Kavita in Hindi

दीपावली पर कविता

( Diwali par kavita )

( 2 )

आने वाला एक त्योहार,
दिया जले उसमें दो चार।
कुछ थे रंग बिरंगे वाले,
कुछ थे कच्ची मिट्टी वाले।

कुछ में घी और कुछ में धागे।
बच्चे भी थे रात को जागे,

दीपावली के जगमग रात में ।
खुशियों का संचार है,
एक दूसरे को सब गले लगाते।
सभी में उमड़ा प्यार है,
*********

This image has an empty alt attribute; its file name is imageedit_1_8291546771-931x1024.jpg
असदुल्ला

उच्च प्राथमिक विद्यालय बनकसही

( 1 )

जुगनू सा जले दीप तो समझो दिवाली है
 
मन में जगे जब प्रीति तो समझो दिवाली है
 
दुश्मन हो या हो गैर
 
बैर ना किसी से हो,
 
रोशन हो मन में प्यार का
 
जीवन में खुशी हो,
 
जीवन बने संगीत तो समझो दिवाली है।
 
मन में जगे जब प्रीति तो समझो दिवाली है
 
 
हिल हिल के कहे दीप का
 
लहराता हुआ लौ
 
बिन जले कैसा जीवन
 
सिखलाता रहा वो
 
प्रेम का हो जीत तो समझो दिवाली है।
 
मन में जगे जब प्रीति तो समझो दिवाली है
 
 
तेल और बाती सा
 
रिश्ता हमारा हो,
 
हम एक दूसरे का
 
दु:ख में सहारा हो,
 
हो अपनेपन का रीति तो समझो दिवाली है।
 
मन में जगे जब प्रीति तो समझो दिवाली है
 
 
प्यार के प्रकाश में हम
 
खुशियों को सजाएं
 
जाति पाति का हम
 
आडम्बर मिटाएं,
 
फिर बढ़े मन में मीत तो समझो दिवाली है।
 
मन में जगे जब प्रीति तो समझो दिवाली है
 
 
टिमटिमाते झालरों से
 
हम चकमकाए न
 
फोड़ फोड़ कर पटाखे
 
डर भय बनाएं ना,
 
संग नाचे गाएं गीत तो समझो दिवाली है।
 
मन में जगे जब प्रीति तो समझो दिवाली है
 
 
देश के मिट्टी से बना
 
वह दीप का दीया
 
जल जल कर है बताता
 
जीवन है तपस्या,
 
जीवन बनें नवनीत तो समझो दिवाली है।
 
 
 
रचनाकार -रामबृक्ष बहादुरपुरी
( अम्बेडकरनगर )
 

यह भी पढ़ें :-

प्रिय आ जाना | Prem par kavita

Similar Posts

  • राम हे राम | Ram Hey Ram

    राम हे राम मेरे राम राम हे राम मेरे राम तुम आओ म्हारे घर में मेरे भाग खुल जाए तुम आओ म्हारे दिल में मेरा जीवन सफल हो जाए राम हे राम मेरे राम मैं डुबा हूं इस जीवन में मुझे तो तारो राम औरों को तारा मुझे भी निकालो मेरे राम राम हे राम…

  • ईंट की दीवारें | Kavita Eent ki Deewaren

    ईंट की दीवारें ( Eent ki Deewaren ) जब तक है जीवन जगत में वक्त का दौर तो चलता रहेगा बंटी है रात और दिन में जिंदगी ये चक्र तो यूँ ही चलता रहेगा मिलेंगे रेत के टीले हर जगह कहीं पर्वतों का झुंड होगा होगी कहीं कहीं खाईं गहरी कहीं खौलता कुआं होगा कट…

  • नशा | Nasha

    नशा ( Nasha )  नशा मुक्ति दिवस पर एक कविता   अच्छों अच्छों को नशा कितना बिगाड़ देता हैl बसी बसाई गृहस्ती को मिनटों में उजाड़ देता हैl बच्चे का निवाला छीन बोतल में उड़ा देता हैl दूरव्यसन के आदि को हिंसक बना देता हैl बिकने लगता है मकान सड़क पर ला देता हैl आदि…

  • दुख के राह हजार हैं

    दुख के राह हजार हैं दुख के राह हजार हैं सुख की कोई राह नहीं क्यों अन्तर में पलता है विकट वेदना चाह नहीं। कुमुद निशा में लेटी है चंचलता बस खेती है सारे द्रुम विश्वास टिके हैं मन में क्यों वैराग्य नहीं। दूर दृष्टि में छोड़ गये हैं बन्धन सारे तोड़ गये हैं कितना…

  • भाग्य | Poem on Bhagya

    भाग्य ( Bhagya )   भाग्य निखर जाये हमारा जब तकदीरे मुस्काती। ग्रह आकर साथ देते, खुशियों की घड़ी आती। सेवा स्नेह संस्कार हृदय में विनय भाव पलता है। सद्भावो की धारा में, पुष्प भाग्य खिलता है। पुष्प भाग्य खिलता है किस्मत के तारे चमकते, सुखों का लगता अंबार। अनुराग दिलों में पलता, जीवन में…

  • पद्मजा | Padmaja

    पद्मजा ( Padmaja )   पद्मजा श्री चरणों में, स्वर्णिम प्रज्ञा भोर घट पट नवल धवल, मृदुल मधुर विचार प्रवाह । स्नेहिल व्यवहार तरंगिनी, सकारात्मकता ओज अथाह । स्वच्छ स्वस्थ अंतर काय, कदम चाल मंगलता ओर । पद्मजा श्री चरणों में, स्वर्णिम प्रज्ञा भोर ।। जीवन पथ प्रति क्षण , अनुभूत अनंत अनुराग । दिग्दर्शन…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *