Dr. Priyanka Sonkar Poetry

प्रियंका सोनकर की पांच रचनाएं | Dr. Priyanka Sonkar Poetry

01.
क्रांति
——–
तुम जिस सभ्यता को संस्कृति कहते हो
यही शोषण का कारखाना है
तुम कहते हो इसे ही तो बचाना है
मैं कहती हूं मुझे इसे ध्वस्त करना है
शोषण का श भी नहीं चाहिए इस धरती पर मुझे
जब जब शोषण के मुहाने पर
सभ्यता की बुनियाद
संस्कृति का परचम लहराती है
मैं अपने आपको शिकंजो में कैद पाती हूं
उसकी मूंछें मुझे और घनी लगती है
उसका भार किसी चट्टान की तरह मेरे सीने पर पड़ी हुई है
मेरे अंदर लावा दहक रहा है
उसके फूटने के इंतजार में
कबसे खड़ी हूं
मेरे हाथों में चूड़ियों की जगह हंसुआ है
जिससे मैं क्रांति करूंगी

02.
तालीम
——–
मेरा बेटा कितना भोला है
बजाता है बासुंरी
लकड़ी नुमा यह छोटा सा
तनिक लंबा
वाद्य यन्त्र,
उसके छिद्र पर
नन्हीं नन्ही उंगलियां जब फिरती हैं
मां की आंखों में ममता उमड़ आती है
तभी बेटे की आंखें मां की आंखों से दो चार होती हैं
बांसुरी छोड़ वह भाग आता है
और तुरंत मां के पेट पर चढ़ कर
तबला बजाने लगता है
मां का पेट और कमर अब तबला नुमा हो चुके हैं
इस तरह मेरा भोला बेटा संगीत में तालीम लेता है

03.
हे बुद्ध
——-
बुद्ध ये दुनिया तुमसे निकल आई है बहुत आगे
जमीन खरीद कर चांद पर उसने
अपने रहने का ढूंढ लिया है ठिकाना
खूबसूरत धरती को
बुलडोजर से तहस नहस करने वाले लोग
चला रहे हैं अस्मिताओं पर भी
बुलडोजर
ऐसे लोग जा रहे हैं चांद पर
वो चलाएंगे वहां भी बुलडोजर
हे बुद्ध
इनको करुणा दो
शांति दो
संतुष्टि दो,
इस धरती को
पूरी दुनिया को
आज फिर
तुम्हारी जरूरत है
बुलडोजर की नहीं।

04.
नदी और बाढ़
——–
नदी में बाढ़ का आना
उसकी आंखो में चमक आना था
इस बार बूढी दादी को
छोटी छोटी
मछलियां याद आई
साथ याद आया
उसे अपना बचपन
गवना से पहले
जब एक बार उसके गांव में बाढ़ आईं थीं
सखी सहेली मिलकर,
दुपट्टा हाथ में लिए
दौड़ लगाई थी सबने एक साथ
एक – एक बित्ते के हाथों ने, पकड़ा दुपट्टे के चारों कोनों को ,
पानी में डुबोया,
और मछलियों के जाल में फंस जाने को उत्साहित ही थीं
ये मछलियां मछलियां नहीं थीं
साथ थीं, उमंग थीं,याराना थीं
अल्हड़ पन की ।
अब न नदी है
न बाढ़ है
उसके गांव में;
नदियों का सूखना
दादी की आंखो की चमक का विलुप्त हो जाना था
जैसे नदियां धीरे धीरे विलुप्ति के मुहाने पर खड़ी रो रही हैं ।

05.
प्रेम पर पहरा
——-
प्रेम पर हजार पहरे होने के बाद भी
उसने चुना प्रेमी होना
पता था उसे जाति के बाहर शादी करने पर
सजा क्या होगी उसकी
देखा था उसने
कई पीढ़ियों तक
कितनी ही ऐसी घटनाएं
जहां
परम्पराओं की नोक पर
गाड़ दी गई थी उसकी बुआ की लाश
और जला दिए गए थे उसके अरमानों को भी
भरी पंचायत में गांव वालों ने
सुनाया जब फैसला
कि घोर पाप किया है इसने
प्रेम करके,
जबकि ये वो लोग थे
जो पूजते थे राधा और कृष्ण को रोज
कुछ को संगीत में लीन हो जाते भी देखा
प्रेम से भरे गीतों पर
बार बार मुग्ध हो जाया करते थे हरदम ,
ये वो लोग थे
जिनकी मूंछे ऊंची थी पहाड़ों से भी
खबर तो थी सभ्यता के अंत होने की
लेकिन इनकी मूंछ के पीछे की शान का अंत
खबर नहीं बने किसी अखबारों के कभी
वहां के बच्चे बच्चे और महिलाएं भी न जान पाए थे
कि इस सभ्यता का अंत कब होगा।

 

डॉ.प्रियंका सोनकर
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी।

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