एक डॉक्टर ऐसा भी

एक डॉक्टर ऐसा भी

डॉक्टर को भगवान का दर्जा यूं ही नहीं दिया जाता। इस पृथ्वी पर एक वही है जो इंसान को मौत के मुंह से बचाकर उसको जीवनदान देता है। यह और बात है कि आज के समय में डॉक्टरीपेशा सिर्फ रुपए कमाने का धंधा बन गया है, व्यवसाय बन गया है।

लोग लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करके डॉक्टर बनते हैं और फिर डॉक्टर बनकर महंगी फीस रखते हैं, खुद के मेडिकल स्टोर खोल कर जल्द से जल्द अमीर बनने की चाहत रखते हैं। उन्हें गरीबों की कोई चिंता नहीं होती। उन्हें सिर्फ रुपयों की चिंता होती है। उनकी बला से कोई जिए या मरे…उन्हें फर्क नहीं पड़ता। ज्यादातर डॉक्टरों ने इंसानियत का गला घोंट दिया है।

ऐसे डॉक्टरों के विपरीत शहर में एक डॉक्टर और भी थे। उनको सब डॉक्टर खान कहकर पुकारते थे। डॉक्टर खान गरीबों के सच्चे हमदर्द और अल्लाह के नेक बन्दे थे। एमबीबीएस करने के बाद डॉक्टर खान ने किराए पर एक कमरा लेकर उसमें अपना क्लीनिक खोला था।

उन्होंने मरीजों को देखने की अपनी फीस निशुल्क रखी ताकि कोई भी मरीज रुपयों के अभाव में अपना इलाज कराने से वंचित न रहे। वे मरीजों से सिर्फ दवा के रुपए लेते थे। उनका कोई मेडिकल स्टोर न था। दवा वे खुद देते थे।

उनकी दवा बहुत सस्ती होती थी। मरीज को बेहद मामूली रकम खर्च करने पर आराम हो जाता था, वह स्वस्थ हो जाता था। बावजूद इसके उनके पास ऐसे मरीज ज्यादा आते थे, जिनके पास दवा खरीदने तक के रुपए नहीं होते थे। दयालु प्रवृत्ति के डॉक्टर खान इन मरीजों का इलाज फ्री में करते थे। बदले में गरीब मरीज उनको ढ़ेरो दुआएं देकर चला जाता था। डॉक्टर खान ने रुपए से ज्यादा लोगों की दुआएं कमाई।

डॉक्टर खान ने कभी रुपए कमाने की ना सोची। वे पहले की तरह किराए के मकान में अपनी मरीजों की सेवा करते रहे। उनका जीवन गरीब मरीजों को समर्पित था। जबकि उनके साथ वाले डॉक्टरों ने अपना खुद का आलीशान घर, आलीशान क्लीनिक बना लिया था और क्लीनिक से अटेच खुद का क्लिनिक खोल लिया था। जब भी वे डॉक्टर डॉ खान से टकराते तो उनकी मजाक उड़ाते हुए कहते-

“खान साहब, अब भी समय है। आपके बच्चे जवान हो रहे हैं। उनके लिए तो कुछ सोचो। मुसीबत में रुपया ही तो काम आता है। आप जैसे काबिल डॉक्टर को इस तरह किराए के मकान में क्लीनिक चलाते हुए देखकर दुख होता है। हमारे साथ आ जाओ। हमारे साथ काम करो। हम तुम्हें अच्छी मोटी रकम देंगे।”

उनकी बातें सुनकर डॉक्टर खान मुस्कुरा कर कहते-

“अल्लाह के करम से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ आसानी से हो जाता है। मेरे लिए यही पर्याप्त है। मैं अपने मरीजों में खुश हूँ। लाखों करोड़ों की दुआएं के आगे कागज के टुकड़ों/नोटों की कोई वैल्यू नहीं है। जहां तक अपने बच्चों की बात है, मुझे खुशी है कि मेरे बच्चे किसी गलत संगत, ऐब में नहीं है और अच्छे से अपनी पढ़ाई कर रहे हैं।

मेरे बच्चों को भी मेरी तरह ज्यादा रुपए की चाह नहीं है। वैसे भी मरने के बाद ऊपर कुछ साथ नहीं जाता। मैं वह दौलत इकट्ठा कर रहा हूँ जो जीते जी यहाँ…और मरने के बाद ऊपर काम आती है।”

व्यवसायी डॉक्टर उनकी दो टूक बातें सुनकर उनका मजाक उड़ाते। उनको पागल कहते और चले जाते। इस तरह 30 साल बीत गए। डॉक्टर साहब की उम्र अब 60 वर्ष के लगभग हो गई थी।

डॉक्टर खान के क्लीनिक के पास ही रामकुंवर एडवोकेट रहते थे। कई दिनों से उनकी तबीयत नासाज़ चल रही थी। पूरे शरीर में दर्द, बुखार के लक्षण महसूस हो रहे थे। जब भी वकील साहब को तकलीफ होती तो वे डॉक्टर खान के पास जाना पसंद करते। उनकी दवा से उन्हें जल्द ही राहत मिल जाती थी। आज भी दिक्कत महसूस करने पर वे डॉक्टर साहब के पास पहुंचे।

डॉक्टर खान हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति थे। रामकुंवर को वे अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे, लेकिन उस दिन डॉक्टर खान का चेहरा उतरा हुआ था। वे देखने से ही बहुत तकलीफ में लग रहे थे। रामकुंवर ने डॉक्टर साहब की ऐसी हालत पहले कभी नहीं देखी थी।

“डॉक्टर साहब, आज आपका चेहरा उतरा हुआ लग रहा है। आप मुझे बहुत परेशान से दिख रहे हो। सब ठीक तो है?” वकील साहब ने डॉक्टर खान से सवाल किया।

बस रामकुंवर जी का इतना कहना ही था कि डॉक्टर साहब फूट-फूट कर रोने लगे। रामकुंवर ने उनको चुप कराने की, शांत करने की कोशिश की तो वे रामकुंवर के गले लग गए और काफी देर तक गले लगकर रोते रहे। जब उनका मन कुछ हल्का हुआ तो उन्होंने कहा-

“बेटा रामकुंवर, मैं पिछले तीन दिन से बहुत परेशान हूँ। खुद को असहाय और कमजोर महसूस कर रहा हूँ। कोई रास्ता, कोई राह नजर नहीं आ रही। मैं क्या करूं?” दुःखी मन से डॉक्टर साहब बोले।

“क्या हुआ? मुझे शुरुआत से बताओ। शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूं।” वकील साहब बोले।

“बेटा, तुझे तो पता ही है कि मेरा इकलौता बेटा जुनैद विदेश(अमेरिका) में नौकरी करता है। अभी साल भर पहले ही उसकी शादी शमीम एडवोकेट की बेटी शबनम से हुई थी।”

“हाँ, मुझे अच्छी तरह याद है। मैं जुनैद की शादी में शरीक हुआ था।” वकील साहब बोले।

“बेटा, शमीम एडवोकेट की लड़की शबनम अपने पिता की तरह बहुत तेज तर्रार है। उसने मेरे बेटे का जीना हराम कर रखा है। बिना गाली-गलौज के वह बात नहीं करती। बोलने में अमर्यादित भाषा, अपशब्दों का प्रयोग करती है। शमीम एडवोकेट ने मेरे साथ धोखा किया।

जब शमीम को मेरे बेटे का पता चला कि मेरा बेटा काबिल है, अच्छी पोस्ट पर है और विदेश में नौकरी करता है तो उसने सोचा कि डॉक्टर खान जैसे सीधे सच्चे आदमी को अपनी बातों में फंसाकर अपनी बेटी शबनम का निकाह करवा देता हूँ।

उससे मुझे अच्छा दान दहेज देने और स्वयं का क्लीनिक खुलवाने का वादा करके, मेरे रिश्तेदारों से दबाव बनाकर अपनी बेटी का निकाह मेरे बेटे से करवा लिया। दहेज के नाम पर उसने एक पैसा नहीं दिया। अपना कोई वायदा न निभाया। मैं भी पागल था जो उसके बहकावे में आ गया। मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी।

उस समय सोचने समझने की शक्ति खत्म हो गई थी। मुझे यही लगा कि वकील साहब एक अच्छे इंसान हैं। लेकिन वे और उनकी बेटी ऐसी निकलेगी ये कतई उम्मीद न थी। शमीम ने अपनी बेटी शबनम को… बेटे जुनैद और पूरे परिवार को काबू में करने और कहना न मानने पर फसाने की धमकी दे रखी है।

एक बात और… शमीम ने हमसे अपनी बेटी की मानसिक बीमारी छुपाई। इस अजीब तरह की मानसिक बीमारी में व्यक्ति बात करते करते, अचानक गाली-गलौज पर उतर आता है, हिंसक बन जाता है। उसको दौरे पड़ने लगते हैं। हमने शबनम का काफी इलाज करवाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इस समय शबनम बेटे जुनैद के साथ पिछले 3 महीने से अमेरिका में ही है। वहीं उसका इलाज़ चल रहा है।”

आगे बताते हुए डॉक्टर साहब ने कहा-

“बेटा, अमेरिका में दो दिन पहले शबनम ने मेरे बेटे पर हिंसा करने, उसको जान से मारने के झूठे आरोप लगवाकर जेल में बंद करवा दिया है। वहाँ का कानून हमारे यहाँ के कानून से बिल्कुल अलग है। अमेरिका में तुरंत कार्रवाई हो जाती है, फिर वकील के माध्यम से अपनी बात रखी जाती है।

जबकि हमारे भारत में जब तक आरोप सिद्ध ना हो जाए, आरोपित व्यक्ति जेल नहीं जा सकता। मेरा बेटा जुनैद पिछले तीन दिन से अमेरिका की जेल में बंद है। मुझे यह भी नहीं पता कि उस बदतमीज लड़की ने मेरे बेटे को किन-किन धाराओं में जेल में बंद करवाया है।

पिछले दो दिनों से मेरा बेटे जुनैद से कोई बात या संपर्क नहीं हो पा रहा है। मैं क्या करूं? मेरे पास इतने रुपए भी नहीं कि मैं अमेरिका जा सकूं, अपने बेटे की खैर खबर ले सकूं, वहाँ वकील करके बेटे को जेल से छुड़वा सकूँ। खुद को मैं असहाय और लाचार महसूस कर रहा हूँ। परिवार में सबकी रातों की नींद, भूख-प्यास सब उड़ गई है। इतने बुरे दिनों की कभी कल्पना नहीं की थी।

अपने बेटे के लिए मैं कुछ कर भी नहीं पा रहा हूँ। आज लगता है कि काश मैंने भी सेवा के साथ कुछ रुपये कमाये होते। इस तरह मैं खुद को असहाय महसूस तो नहीं करता।” यह कहकर डॉक्टर खान फिर से भावुक हो गए और उनकी आंखों से अश्रु धारा बहने लगी।

“आप परेशान मत होइए। खुद को ठीक कीजिए। समस्या का कोई ना कोई हल जरूर निकलेगा। आप जैसे भले इंसान के साथ ईश्वर इतना बुरा सलूक नहीं कर सकते। आपने हमेशा दीन दुखियों की मदद की है। उनकी दुआओं के असर से सब ठीक होगा। मैं भी ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि जुनैद सकुशल हो, जल्द ही जेल से बाहर आ जाये।” रामकुंवर ने डॉक्टर साहब को सांत्वना देकर चुप कराते हुए कहा।

इसके साथ ही रामकुंवर ने अमेरिका में रह रहे अपने एक परिचित से जुनैद के बारे में जानकारी लेने और जुनैद की स्थिति का पता लगाने का प्रयास किया।

तभी डॉक्टर खान के पास अमेरिका से कॉल आयी। कॉल पर उनका बेटा जुनैद था। उसने फोन पर बताया कि उसके सहकर्मियों ने उसकी जमानत देकर उसकी जेल से बाहर निकलने में मदद की है। अब वह शबनम द्वारा मुकदमें की शिकायतों का निस्तारण करके हमेशा हमेशा के लिए अपने देश भारत वापस लौट आएगा और अपने देश में नौकरी करेगा।

बेटे जुनैद से बात करने के बाद डॉक्टर खान के चेहरे पर उदासियों के बादल छठ गए। उन्होंने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया और साथ ही साथ रामकुंवर का भी धन्यवाद अदा किया। अब उनके चेहरे पर बेटे की खैरियत पाकर सकूँ के भाव नजर आ रहे थे।

इस घटना के 6 माह बाद, अचानक एक दिन रामकुंवर को पता चला कि डॉक्टर खान नहीं रहे। उनका हार्ट अटैक की वजह से इंतकाल हो गया। आसपास के लोगों ने बताया कि डॉक्टर खान काफी समय से बहुत परेशान चल रहे थे। अपने क्लीनिक पर भी कम ही बैठते थे। उनकी परेशानी का कारण शमीम एडवोकेट थे।

उन्होंने डॉक्टर खान पर और जुनैद पर बहुत सी धाराओं में बेटी शबनम को दहेज हेतु प्रताड़ित करने, हिंसा करने के विभिन्न मुकदमे दर्ज करवा रखे थे। इसका कारण यह था कि अमेरिका से वापस आकर जुनैद ने शबनम से परेशान होकर तलाक दे दिया था। अब आए दिन कोर्ट- कचहरी के चक्कर काट-काटकर झूठे मुकदमों से परेशान होकर…व ज्यादा सोचने की वजह से उनको अटैक पड़ गया।

शहर ने एक अच्छे डॉक्टर व अल्लाह के नेक बन्दे को खो दिया था। जिस डॉक्टर ने इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए सदा दीन दुखियों की सेवा की, अपना जीवन उनको समर्पित कर दिया… उसके साथ ही ईश्वर ने इतना गंदा मजाक किया। ऐसा क्यों होता है कि झूठे, बेईमान, मक्कार लोगों की कहीं सुनवाई नहीं होती, उनको सजा नहीं मिलती। उनको कोई कुछ नहीं कहता।

यहॉं तक कि ईश्वर भी उन्हें, उनके कर्मों की सजा देने से डरते हैं… जबकि सारी दिक्कतें, सारी कठिनाइयाँ, सारी परीक्षाएं सिर्फ अच्छे लोगों के हिस्से में आती हैं। ईश्वर को भी अपने बन्दों पर बिल्कुल भी तरस नहीं आता। डॉक्टर खान का उदाहरण भी इससे अछूता नहीं था।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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