एक मुहिम चलाऐं
एक मुहिम चलाऐं

# एक मुहिम चलाऐं 

 

एक मुहिम चलाऐं सबको अपना मीत बनाने की।

सब मिलकर शुरुआत करेंगे ऐसी रीत चलाने की।।

 

बदले वाली भावना सब को,

मन से दूर भगानी है।

प्रेम बढ़े जिसे आपस में,

ऐसी अलख जगानी है।।

चाहत मेरी है प्रेम जगाने वाला गीत सुनाने की।

एक मुहिम चलाऐं सबको अपना मीत बनाने की।।

 

बैर द्वेष भूलाकर सारे,

मित्रता करनी सबसे।

मिलकर रहने की करनी है,

हमको शुरआत अब से।।

शुभ घड़ी आई है अब ये हार और जीत भूलाने की।

एक मुहिम चलाऐं सबको अपना मीत बनाने की।।

 

जब सब अपने बन जाएंगे,

गैर नजर नहीं आएगा।

प्रेम दिलों में भरा रहेगा,

बैर नजर नहीं आएगा।।

आज जरूरत आन पड़ी याद अतीत दिलाने की।

एक मुहिम चलाऐं सबको अपना मीत बनाने की।।

 

हम सब आपस मे युहीं,

युगों से लड़ते आऐं है।

नफरत की अग्नि में देखो,

कितने लोग खपाऐं है।।

दुश्मन को भी सखा समझकर सबसे प्रीत लगाने की।

एक मुहिम चलाऐं सबको अपना मीत बनाने की।।

 

ऐसी मुहिम चलाने की,

शुरुआत अभी से करता हूं।

बन जाओ तुम हिस्सा इसका,

अर्ज़ सभी से करता हूं।।

“विश्वबंधु” नहीं जरूरत कोई संगीत बजाने की।

एक मुहिम चलाऐं सबको अपना मीत बनाने की।।

🍀

                                           

कवि: राजेश पुनिया  ‘विश्वबंधु’

 

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