Ghazal Bhoolna Hoga

भूलना होगा | Ghazal Bhoolna Hoga

भूलना होगा

( Bhoolna hoga ) 

 

हमें ये लग रहा है की उसे अब भूलना होगा
मनाया है बहुत इस बार लेकिन रूठना होगा।

बहुत मसऱूफ़ है वो आजकल सब महफ़िलें छोड़ी
मगर रहता कहां है आज उससे पूछना होगा।

हमारी चाहतों ने कर दिया मग़रूर उस बुत को
बना है वो ख़ुदा कहता उसे अब पूजना होगा।

लगाता जा रहा है जख़्म वो हर बार किश्तों में
शिफ़ा जिससे मिले मरहम वही अब ढूढ़ना होगा।

समंदर सी है उसकी शख़्सियत सौ राज़ गहरे हैं
पता कुछ भी लगाना है अगर तो डूबना होगा

नहीं आसान है इतना भुलाना दुश्मने जां को
भुलाने के लिए सौ बार पहले टूटना होगा।

इशारों ही इशारों में नज़र कुछ कह गई उसकी
बड़ी मुश्किल पहेली थी नयन को बूझना होगा।

 

सीमा पाण्डेय ‘नयन’
देवरिया  ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

https://thesahitya.com/sawan-shayari/

Similar Posts

  • बिगाड़ देती है | Ghazal Bigaad Deti Hai

    बिगाड़ देती है ( Bigaad Deti Hai ) बड़े बड़ों को ये चाहत बिगाड़ देती है ये होशमंदो को दौलत बिगाड़ देती है बढ़ावा दो न शरारत को तुम तो बच्चों की कि उनको बेजा हिमाक़त बिगाड़ देती है तुम्हारे दीद की हसरत हमेशा ही रहती हमें ये वस्ल की आदत बिगाड़ देती है गुज़रता…

  • एक नगमा प्यार का | Poem Ek Nagma Pyar ka

    एक नगमा प्यार का ( Ek nagma pyar ka )    आ गए तो रस्म़ महफ़िल की निभाते जाइए एक नग़मा प्यार का सबको सुनाते जाइए। कौन है क्या कह रहा अब फ़िक्र इसकी छोड़िए मुस्कुराकर दिल रक़ीबों का जलाते जाइए। दो जहां को छोड़ दें हम आपकी ख़ातिर सनम है फ़क़त ये शर्त की…

  • सौगात सावन में | Saugaat Sawan Mein

    सौगात सावन में ( Saugaat Sawan Mein ) तुम्हारी चाहतें हमको मिली सौगात सावन में । जताकर प्यार को अब हम करें शुरुआत सावन में ।१ बढ़ाना है नहीं तुझसे मुझे अब राबता कोई सतायेगा मुझे फिर से तू हर इक रात सावन में ।। २ झुकाकर क्यों नयन बैठे हमें अब लूटने वाले। सुना…

  • उनकी चाहत में | Unki Chahat Mein

    उनकी चाहत में ( Unki Chahat Mein ) इश्क़ में जब से वो कबीर हुएउनकी चाहत में हम सग़ीर हुए कोई तुम सा नहीं है जाने जाँइश्क़ में तुम तो यूँ नज़ीर हुए उठ के ताज़ीम अब वो करते हैंजिनकी नज़रों में हम हक़ीर हुए तिश्नगी मेरी बुझ न पाई कभीचाहे कितने ही आब गीर…

  • वो घूंघट पट खोल रहा है

    वो घूंघट पट खोल रहा है वो घूंघट पट खोल रहा हैतन-मन मेरा डोल रहा है आजा,आजा,आजा,आजामन का पंछी बोल रहा है अपने नग़मों से वो मेरेकानों में रस घोल रहा है पाप समझता था जो इसकोवो भी अब कम तोल रहा है मेरे घर की बर्बादी मेंअपनों का भी रोल रहा है लगते हैं…

  • तीर बरसाता है पर नायक नहीं है

    तीर बरसाता है पर नायक नहीं है तीर बरसाता है पर नायक नहीं हैशायरी करता है संहारक नहीं है अनकहे अध्याय इंसा क्या पढ़ेगाज़िंदगी जीता है संचालक नहीं है वेदना ही वेदना है शायरी मेंवृक्ष यह भी कोई फलदायक नहीं है वो जो दौलत के लिए रिश्ते ही छोड़ेआदमी तो है मगर लायक़ नहीं है…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *