Ghazal jhooth gharon par kaabij tha
Ghazal jhooth gharon par kaabij tha

झूठ घरों पर काबिज़ था

( Jhooth gharon par kaabij tha )

 

 

झूठ घरों पर काबिज़ था

करना यूँ नाजाइज़ था

 

साथ न दे वो मुश्किल में

रब अपना तो हाफ़िज़ था

 

झूठ फ़रेबी था दिल से

समझा जिसको वाइज़ था

 

चाहे  वो जो काम ग़लत

मंजूर न वो हरगिज़ था

 

मुझसे जलने  लोग लगे

यार हुआ जब रामिज़ था

 

पहली उल्फ़त है आज़म

सुर्ख़ उसी का आरिज़ था

शायर: आज़म नैय्यर

(सहारनपुर )

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