Glaani

ग्लानि | Glaani

ग्लानि

( Glaani ) 

 

दूरी मे बढ़ न जाए और दूरी
करें प्रयास खत्म करने का
होगा कल का वक्त और ही
करें कोशिश आज को बदलने का

बढ़ने न दो जख्म को बातों से
यादों को नासूर न होने दो कभी
उठे न दीवार की गिर ही न पाए
कुछ जगह जोड़ की भी रहे कभी

संभव है न हों गलत आप भी
संभव है न हो गलत वह भी
गैर बातें भी होती हैं दरार की वजह
संभव है हो किसी बात का वहम भी

सूखे पेड़ भी हो जाते हैं हरे भरे
सुखी जड़ों में हरियाली नही आती
निकल भी आए सूरज भोर मे तो
कुहासों मे उसकी लाली नही आती

सोचिए जरा देखकर भी कभी
किसे क्या मिला है अपनों से अलग हो
सिसकता है सम्मान भी हृदय का
ग्लानि तो होती ही है जब ऐसा वक्त हो

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

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