हवा रुक जायेगी
हवा रुक जायेगी
गर ख़ुदा रहमत करे तो हर बला रुक जायेगी
जल उठेंगे बुझते दीपक यह हवा रुक जायेगी
इसलिए हाकिम के आगे रख दिये सारे सबूत
जुर्म साबित हो न पाये तो सज़ा रुक जायेगी
साथ तेरे हैं अगर माँ की दुआएं ख़ौफ़ क्या
तेज़ तूफाँ में भी कश्ती नाख़ुदा रुक जायेगी
बेवफ़ाई से तेरी परदे हटा दूँ मैं अगर
सारी दुनिया ही यहाँ तेरे सिवा रुक जायेगी
उसके ज़ुल्मों पर भी मैंने ख़ामुशी तोड़ी नहीं
होके मेरे ग़म से क्या वो आशना रुक जायेगी
कैसे में उम्मीद कर लूँ उसकी फ़ितरत जानकर
कर के तौबा वो जफ़ा से बेवफ़ा रुक जायेगी
छेड़ दे साग़र ग़ज़ल में अपनी सारी सिसकियाँ
सुन के शायद तेरे दिल की वो सदा रुक जायेगी

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003
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