जरअ मत ! 

Ja-Ra-Mat Bhojpuri Kavita -जरअ मत !

जरअ मत ! 

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(भोजपुरी भाषा में)
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ना त राख हो जइब,
कोयला नियर खाक हो जइब।
बाॅडी मास ( Body, Mass ) सब हो जाई हवा,
एकर नइखे कवनो दवा।
इ प्रकृति के नियम बा-
जे जरी ऊ साफ होई,
जरला पर राख होई।
हवा उड़िया ले जाई,
अस्तित्व तोहार मिटाई।
त कवना भाव पड़ी?
एसे देखके नन जरी!
रऊरो कुछो करीं,
तबे बात बनी।
कंपीटिशन होई तगड़ा,
त बढ़ी गुणवत्ता;
तोहार हमार सबका।
भुलाई के दुश्मनी,
मुस्काई द तनी ?
तब देख#!
जग केतना सुंदर बा,
जरला में कुछ ना धइल बा;
सब मनवा के मइल बा।
रगड़ के झाड़ द !
निकल जाई,
इहे खुशिहाली ले आई।
जिंदगी तोहरो बदल जाई,
मिले भाई त जरूर गले लगाईं।
बात हम का कहनी, समझ आइल?
खोपड़िया में कुछ अमाइल?
बुझाइल त ठीक बा,
ना त# राख धइल बा?

?

नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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मकर संक्रांति ( हाइकु )

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