जाने क्यों इतराते हैं लोग…?

जाने क्यों इतराते हैं लोग…?

खुद को समझदार समझकर जाने क्यों इतराते हैं लोग,
प्रश्नों के जाल में आकर खुद ब खुद फँस जाते हैं लोग।

सच की परछाई से डरकर नज़रें क्यों चुराते हैं लोग,
झूठ के सहारे दुनिया में मेले क्यों सजाते हैं लोग।

रिश्तों की सौदागरी में दिल का वज़न भुला बैठे,
फ़ायदे की ख़ातिर हरपल रंग बदलते जाते हैं लोग।

धूप में चलने का साहस जिसको भी नहीं होता,
छाँव के किनारों पर सपनों का महल उठाते हैं लोग।

वक़्त की करवट पे अक्सर अपना चेहरा खो देते,
हर मंज़िल पर साथ बदलकर दूरी बढ़ाते हैं लोग।

खुद को दरिया कहते हैं पर सागर तक नहीं जाते,
छोटी-सी लहर में आकर क्यों बहक-बहक जाते हैं लोग।

आईनों से सीख न पाए सच का बोझ उठाना वो,
झूठी ताऱीफ़ों के शोर में फिर भी मुस्कराते हैं लोग।

हम तो चुप ही रहते हैं, सोचते हैं क्या होगा,
अपना दिल खाली करके फिर क्यों पछताते हैं लोग।

“मधुर” सच्चाई का रस्ता जब-जब कोई दिखलाता है,
पत्थर बनकर राह में उसके क्यों दीवार बन जाते हैं लोग।

सुन्दर लाल डडसेना”मधुर”
ग्राम-बाराडोली(बालसमुंद),पो.-पाटसेन्द्री
तह.-सरायपाली,जिला-महासमुंद(छ. ग.) पिन- 493558
मोब.- 8103535652

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