जैसा मैं चाहती थी वैसा वो कर रहा है

जैसा मैं चाहती थी वैसा वो कर रहा है

जैसा मैं चाहती थी वैसा वो कर रहा है
दिल को मगर न जाने क्या फिर अखर रहा है।

उसकी वो सर्द महरी पत्थर के जैसा लहज़ा
अब ये बता रहा है सब कुछ बिखर रहा है।

जो है खुशी मयस्सर उसमें नहीं बशर खुश
जो ख़्वाहिशात बाकी बस उनपे मर रहा है।

कुछ तो कमी है हममें टिकते नहीं मरासिम
अपना वुजूद यारों हरदम सिफ़र रहा है।

ग़र चुप रही यक़ीनन नुकसान मेरा होगा
सच बोलने से लेकिन ये दिल भी डर रहा है।

गैरों के जैसे पूछा कैसे हो हाल क्या है
सब हादसों से जबकी वो बाख़बर रहा है।

आदत बुरी हमारी ग़म में भी मुसकुराते
खुशबाश होके रोना उसका हुनर रहा है।

अहद -ए- वफ़ा पे उसके मुझको बहुत यकीं था
दिक्कत की आजकल वो उनसे मुकर रहा है।

वो सामने है लेकिन वो शख़्स वो नहीं है
इसको कबूल करना दुश्वार तर रहा है।

सीमा पाण्डेय ‘नयन’
देवरिया  ( उत्तर प्रदेश )

सर्द मेहरी – उदासीनता
मयस्सर – हासिल
बशर – इंसान
मरासिम -रिश्ते संबंध
सिफ़र – शून्य नगण्य
बाख़बर – वाक़िफ जिसको पता हो
दुश्वार तर – मुश्किल

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