जरूरत-मन्द

जरूरत-मन्द -hindi poetry || jaroorat mand

जरूरत-मन्द

 

–>नकली के सम्मुख, असली फीका पड़ जाता है ||

 

1.नकली जेवर की चमक मे, असली सोना फीका पड गया |

नकली नगीनों की चमक मे, असली हीरा फीका पड गया |

दिखावटी लोगो की चमक मे, असली इंसान फीका पड गया |

मतलबी दोस्तों की धमक मे, सच्चा दोस्त फीका पड गया |

 

–>नकली के सम्मुख, असली फीका पड़ जाता है ||

 

2.लालची लोगो की भीड देख, जरूरत मन्द पीछे हट गया |

उसे तो शर्म आ गई खुद पर, पर लालची भीड मे डट गया |

मिले सब मन मुताबिक इस पर, बात बढाई बिगाड दी |

लोगों के दिल मे खुदगर्जों की, छबि बिल्कुल उजाड दी |

 

–>नकली के सम्मुख, असली फीका पड़ जाता है ||

 

3.सच मे है जरूरत जिसको, उसको ही दुतकार मिले |

अपना आत्म सम्मान बचाये, उसको ही फटकार मिले |

ढ़ोंगी लोभी मौज मनाते हैं, सच्चे दर-दर ठोकर खाते हैं |

एक बार ललकार मिले, वहां दुबारा कभी नहीं जाते हैं |

 

–>नकली के सम्मुख, असली फीका पड़ जाता है ||

 

4.परेशान होती खुद्दारी और, उसे सताया जाता है |

कई बार समझ कर भी, क्यों उसे भगाया जाता है |

उसकी किस्मत के संग उसको, लोग सताया करते हैं |

मदद से कोसों दूर हैं फिर भी, मजाक उडाया करते हैं |

 

–>नकली के सम्मुख, असली फीका पड़ जाता है ||

 

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लेखक:  सुदीश भारतवासी

Email: sudeesh.soni@gmail.com

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