Jhoot ki Daud

झूठ की दौड़ | Jhoot ki Daud

झूठ की दौड़

( Jhoot ki daud ) 

 

झूठ के मुरब्बों में
मिठास तो बहुत होती है
किंतु,देर सबेर हाजमा बिगड़ ही जाता है
झालर मे रोशनी,और
कागजी फूलों की महक जैसे….

हमाम मे तो नंगे होते हैं सभी
बाहर मगर निकलते कहां हैं
दाल मे नमक बराबर ही हो तो अच्छा
शक्कर बराबर झूठ कहां चलता है…

पहुंच सकें ,दौड़ उतनी ही अच्छी
अंधी दौड़ मे पैर सलामत नही रहते
उपहास का पात्र
व्यक्ति स्वयं से ही बनता है…

समय तो निकल ही जाता है
कम या ज्यादा मे
ईमान बेचकर खरीदी गई चीज
अधिक फायदेमंद नही होती…..

नजरों से गिर जाने पर
नजरें मिला पाना मुश्किल होता है
जो चलते नही संभलकर
उनका संभल पाना मुश्किल हो जाता है….

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

https://thesahitya.com/badlav/

Similar Posts

  • चाय की चुस्की | Chai ki Chuski

    चाय की चुस्की  ( Chai ki Chuski ) Love mindfulness on cup of tea   तेरी एक चुस्की पर मैं सदा कुर्बान जाती हूँ अदरक , लौंग, इलायची,दालचीनी हो न हो चीनी कैसी भी, मगर दूध बिल्कुल कम हो तो वारी वारी जाती हूँ कुछ साथ हो न हो अकेले में ‘ तू’ मुझको ज्यादा…

  • मेरे हिस्से का प्रेम

    मेरे हिस्से का प्रेम मैं तुम सेदूर हूँधूप और छाँव की तरहपुष्प और सुगंध की तरहधरा और नील गगन की तरहदिवस और निशा की तरहजनवरी और दिसम्बर की तरहसाथ-साथ होते हुए भीबहुत दूर- बहुत दूर परन्तुप्रति दिन मिलता हूँतुम सेतुम्हारी नयी कविता के रूप मेंनये शब्दों के रूप में जीवन मेंकभी कोई सुयोग बना..तोमैं तुम…

  • स्वतंत्रता

    स्वतंत्रता   नभ धरातल रसातल में ढूंढ़ता। कहां हो मेरी प्रिये  स्वतंत्रता।। सृष्टि से पहले भी सृष्टि रही होगी, तभी तो ये बात सारी कहीं होगी, क्रम के आगे नया क्रम फिर आता है, दास्तां की डोर बांध जाता है।। सालती अन्तस अनिर्वचनीयता।।                        …

  • वतन पर कविता | Poem on homeland in Hindi

    हँसता हुआ प्यारा ये वतन देख रहा हूँ ( Hansta hua pyara ye watan dekh raha hoon )     हँसता हुआ प्यारा ये वतन देख रहा हूँ ! खुशबू से मुअत्तर ये चमन देख रहा हूँ !!   इस बागवाँ ने ऐसा कुछ कमाल किया है हर दश्त में मैं खिलते सुमन देख रहा…

  • सिंदूर

    सिंदूर   वक्त की चकाचौंधी इतनी भी मंजूर न कर। तेरा सिंदूर हूं तूं सर मुझे दूर न कर।।   दीखता चुटकियों में हूं मगर विशाल हूं मै, हर एक रंग समेटे हुये पर लाल हूं मै।, तेरा श्रृंगार हूं तूं कांच जैसे चूर न कर।।तेरा सिंदूर ०   नीले गगन मे सूर्य की चमक…

  • प्रथम पूजनीय आराध्य गजानंद | Gajanand par kavita

    प्रथम पूजनीय आराध्य गजानंद ( Pratham poojaneeyai aradhya gajanand )      प्रथम पूजनीय प्यारे आराध्य गजानन्द, मनोकामना पूरी करतें हमारे ‌गजानन्द। कष्ट विनायक रिद्धि-सिद्धि फलदायक, झुकाकर शीश हम करते है अभिनंदन।।   गणपत गणेश गणनायक एवं गजराज, भोग में चढ़ाते आपके मोदक महाराज। शीश पर तुम्हारे स्वर्ण का मुकुट चमके, ज्ञान के भंडार लंबोदर…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *