जस्टिस फॉर गुलनाज

जस्टिस फॉर गुलनाज

जस्टिस फॉर गुलनाज

******

#justice_for_Gulnaz
चाहे सरकारें बदलती रहें
राज जंगलवाली ही रहे
ऐसे में हम कहें तो क्या कहें?
जब प्रशासन ही अपना चेहरा उजागर करे!
कौन जीये/मरे
फर्क जरा नहीं पड़े
सिस्टम हैं सड़े
आम आदमी है डरे
अपराधी मजे ले
अफसर चलें सियासी चाल
सरकारों की रखें भरपूर ख्याल
होते मालामाल
ठोकते अपराधियों संग ताल
है कोई मां का लाल
जो इनका बांका करे बाल
तो हो जाए अपन बिहार
खुशहाल और मालामाल।

 

?

नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

यह भी पढ़ें : 

पछतावा

Similar Posts

  • फूलों सी कोमल नारी | Poem nari

    फूलों सी कोमल नारी ( Phoolon se komal nari ) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की विशेष प्रस्तुति     सोनू!फूलों सी मासूम हो फूलों में सिक्त शबनम की बूंदे हो देखूँ तुम्हें जी भरके भी जी भरता नहीं बस तेरी तस्वीरों को ही देखता रहता हूँ     पूरी कायनात जैसी हो तुम तुम्हें देख खुदा…

  • मोहन तिवारी की कविताएं | Mohan Tiwari Poetry

    आप अकेले नहीं यूँ तो, कल एक अनुमान ही है केवलनिर्भर है आज के दौर की बुनियाद परमाना आज सा अनमोल कुछ नहीं यहाँआज की नींव पर ही आज और कल है अतीत में ही छिपी प्रेरणा है कल कीकिंतु, वर्तमान में अनुसरण जरूरी हैराह तो बनानी होती है स्वयं को हीबढ़ता नहीं वो जिसमें…

  • आओ चलें मिलकर चलें | Kavita aao chalen milkar chalen

    आओ चलें मिलकर चलें ( Aao chalen milkar chalen )   कहां जा रहा है अकेला छोड़  अपनों  का झमेला जीवन  है  अपनों  मेला, हम  छोड़ इसको क्यों चले आओ चलें मिलकर चलें।   सीखो नन्ही चींटियों से उनके श्रम व पंक्तियों से चार दिनों की  यात्रा  में हम अपनों से क्यों लड़े आओ चलें…

  • इस बार दिवाली में | Is Baar Diwali Mein

    इस बार दिवाली में ( Is Baar Diwali Mein ) चौखट पर रख आना एक दिया इस बार दिवाली मेंप्राण निछावर कर दिए जिसने देश की रखवाली में तम ने है किया बसेरा दिन रात घनघोर काली मेंचौखट पर रख आना एक दिया इस बार दिवाली में बिंदी छूटा कंगन टूटा सुना सुना जीवन है…

  • वक़्त | Kavita waqt

    वक़्त ( Waqt )   जब से छाया गुनाहों की पड़ने लगी । रूह मेरी ही मुझसे झगड़ने लगी ।।   तेज आंधी से जंगल जब हिलने लगे । सूखे पेड़ों की दम तब उखड़ने लगी ।।   मन के बीरान जंगल डराने लगे । गर्म बालू सी तबीयत बिगड़ने लगी ।।   वक़्त के…

  • अधर | Muktak adhar

    अधर ( Muktak adhar  ) ( मात्रा भार 16-16 )   अधरों पर जब मुरली बाजे मोर मुकुट पीतांबर साजे राधा कृष्ण प्रेम दीवानी घट घट वासी हृदय बिराजे   अधरों पर मुस्कान ले आती कविता मंचों पर छा जाती भाव भरी बहती गंगा है साहित्य सरिता सबको भाती     कवि : रमाकांत सोनी नवलगढ़ जिला…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *