Kam Din Hue

बहुत कम दिन हुए यारों | Kam Din Hue

बहुत कम दिन हुए यारों

( Bahut kam din hue yaron ) 

 

अभी उनको भुलाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों
मुहब्बत आजमाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों।

जरा सी है ख़लिश बाकी ज़रा बाकी निशां उनके
उन्हें दिल से हटाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों।

परिंदा सीख लेगा जल्द ही उड़ना ज़रा ठहरो
अभी तो पंख पाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों।

नहीं वो जानता है दर्द ख़्वाबों के बिखरने का
उसे सपने सजाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों।

लगेगा वक्त कुछ हो जाएगा वो क़ैद का आदी
कफ़स को घर बनाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों।

लिखा उसने जो खत मजमून उसका याद है हमको
हमें वो खत जलाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों।

भरेगा जख़्म मरहम वक्त का इस पर लगाना है
नयन को चोट खाए दिन बहुत कम दिन हुए यारों।

 

सीमा पाण्डेय ‘नयन’
देवरिया  ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

लापता कर गया | Ghazal Shayari

Similar Posts

  • इश्क़ को एहसान के जैसे जताया मत करो

    इश्क़ को एहसान के जैसे जताया मत करो इश्क़ को एहसान के जैसे जताया मत करोइस कदर जाने की जल्दी है तो आया मत करो। जानते हम अहमियत अपनी तुम्हारे सामनेतो ये किस्से बेक़रारी के सुनाया मत करो। मुस्कुराने पे बहुत दिलकश लगा करते हो तुममहफिलों में बेवजह तब मुस्कुराया मत करो। एक दूजे के…

  • फूल तितली सनम हुए बे-रंग

    फूल तितली सनम हुए बे-रंग क़ाफ़िया – ए स्वर की ‌बंदिश रदीफ़ – बे-रंग वज़्न – 2122 1212 22 फूल तितली सनम हुए बे-रंग इंद्रधनुषी छटा दिखे बे-रंग तेरी खुशबू जो ज़िंदगी से गई रात-दिन मेरे हो गए बे-रंग ये मुहब्बत सज़ा बनी है आज दौर-ए-हिज़्राँ लगे मुझे बे-रंग याद जब तेरी आती है मुझको…

  • माँ क़रीब है यहाँ | Maa Kareeb hai Yahan

    माँ क़रीब है यहाँ ( Maa kareeb hai yahan )    न कोई मेरे माँ क़रीब है यहाँ सभी इस नगर में रकीब है यहाँ किसी पर यहाँ तो यकीन हो न हो न माँ से ही अच्छा हबीब है यहाँ सभी माँ अधूरे वफ़ा मुहब्बत से ऐसा कौन जो खुशनसीब है यहाँ ख़ुदा से…

  • अच्छा लगा | Acha Laga

    अच्छा लगा ( Acha laga )    अजनबी बनकर गुज़रने का हुनर अच्छा लगा इस रवय्ये ने दुखाया दिल, मगर अच्छा लगा दोस्तों को है मुहब्बत मुस्कराहट से मेरी दुश्मनों को मैं हमेशा चश्म तर अच्छा लगा जितने भी आसान रस्ते थे न माफ़िक आ सके ज़िंदगी में मुश्किलों वाला सफ़र अच्छा लगा तुम भी…

  • ग़म-ए-इ़श्क़ | Gham-e-Ishq

    ग़म-ए-इ़श्क़ ( Gham-e-Ishq ) पहले पत्थर सा कलेजे को बनाया होगा।तब कहीं उसने ग़म-ए-इ़श्क़ छुपाया होगा। ख़ूब कोहराम हर इक सम्त मचाया होगा।जब ह़सीं रुख़ से नक़ाब उसने हटाया होगा। याद जब मेरी उसे भूल से आयी होगी।आबे-चश्म-उसने बहुत देर बहाया होगा। सांस तारों की भी थम सी गई होगी वल्लाह।चांदनी शब में वो जिस…

  • सितम का वार है | Sitam ka Vaar Hai

    सितम का वार है ( Sitam ka Vaar Hai ) उसकी जानिब ही सितम का वार हैआदमी जो वक़्त से लाचार है जिसको रब की नेमतों से प्यार हैवो ख़िजाँ में भी गुल-ओ-गुलज़ार है जिसके दम से हैं बहारें हर तरफ़अब उसी की सिम्त हर तलवार है लुट रही सोने की चिड़िया जा ब जाआज…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *