चुलबुली तेरी एक झलक

( Chulbuli teri ek jhalak )

 

चुल्बुली  तेरी एक झलक के लिए बेकरार रहता हूं
जिस्म मैं अपने शहर और दिल तेरे पास रखता हूँ

न जाने क्या रिश्ता पनपता जा रहा है हम दोनो में
तू मेरी है चुल्बुली मैं तेरा हूँ ऐसी अब आस रखता हूँ

तेरे शहर से मेरे शहर संगम की दूरी ज्यादा तो नही
दोनो  शहर  के  बीच बस दो चार बाईपास रखता हूँ

ये दिलो का मिलना नजरों का झुकना यूँ नही होता
तू दूर है ये पता नही,मैं तो नजरों के पास रखता हूँ

कभी  चल  के  आऊंगा तेरे दर पर मुलाकात करने
तू भी उसी बेसब्री से मिलेगी ऐसा विश्वास रखता हूँ

ऐसे  हंस  कर  मिलती  हो  दिल मेरा खिलखिला जाता
तुम्हारी मुस्कान और प्यारा से चेहरा अपने पास रखता हूं

चुल्बुली तेरी एक झलक पाने के लिए बेकरार रहता हूँ
जिस्म  मैं  अपने  शहर  और दिल तेरे पास रखता हूँ

❣️

कवि : अंकुल त्रिपाठी निराला
(प्रयागराज )

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