जनता जनार्दन

जनता जनार्दन | Kavita Janta Janardan

जनता जनार्दन

( Janta Janardan )

भोली भाली जनता भटक रही इधर उधर
सीधी सादी जनता अटक रही इधर उधर

बहुरुपिए बहका रहे बार-बार भेष बदल
जाति जाल मे खटक रही इधर उधर

नये इरादे नये वादे झूठे झांसों में
झमूरे मदारी में मटक रही इधर उधर

नोटंकी होती ग़रीबी हटाने की हर बार
पांच सालों में गटक रही इधर उधर

धर्म नाम पर धंधा करते चंदा लेकर
अंध भक्ति में अटक रही इधर उधर

धणी धोरी नहीं आहत राहत में ‘कागा
झोला हाथ में झटक रही इधर उधर

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा

पूर्व विधायक

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