Khudgarzi

खुदगर्जी | Khudgarzi

खुदगर्जी

( Khudgarzi )

 

चाहते हो मोल कामयाबी का
तो करो कुछ ,कि और भी हों आपसे
बनकर तो देखो रहनुमा तुम
करोगे राज दिलों में सभी के तुम

जीत कर भी हार जाते हैं वो
करते हैं गिराकर जो जीत हासिल
या छोड़कर साथी को अपने
वे हारे हुए हि हैं हर दौड़ में जीतकर भी

खुदगर्जी की थामकर बैसाखी
ऊँचाई अधिक नही मिलती
होता है मुश्किल फिर संभलना
गिर गये यदि तुम कभी

दुआएं भि बन जाती हैं सहारा
रात के बियावानी मे
तारों का मोल भी कम नही होता
जहाँ खरगोश भी शेर नज़र आते हैं

रहें हाथों में हाथ अपने
हो जाते हैं हल हर मशले
सहयोगी दीप भि नज़र आता है सूरज
फर्क नही इससे कि कौन पहले

मोहन तिवारी

( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

सभी के लिए | Sabhi ke Liye

Similar Posts

  • बहाना | Kavita Bahana

    बहाना ( Bahana ) पूजा बिन नहाए के, स्वीकार करो नाथ, पानी नहीं आए है, हम धोए पाॅव हाॅथ, पूजा खाए पिए की, स्वीकार करो नाथ, लो वीपी के मरीज हम, चकराए हमरा माथ, पूजा कीर्तन भजन की, स्वीकार करो नाथ, हम अकेले रहते हैं, कोई न हमरे साथ, पूजा मेरे भंडारे की, स्वीकार करो…

  • डॉक्टर सुमन धर्मवीर जी की कविताएँ | Dr. Suman Dharamvir Poetry

    नया दौर (नवगीत) नया दौर आयेगा सभ्य दौर कहलायेगा, नहीं किसी से रोका जायेगा। समता, स्वतंत्रता , शिष्टता सिखायेगा, जाहिलता और फूहड़ता भगायेगा। नारी को शोषिता होने से बचायेगा। नारी को “मान सम्मान” दिलायेगा। हां हां नया दौर आयेगा सभ्य दौर कहलायेगा, नहीं किसी से रोका जायेगा। 2 मानवता,बंधुता , प्रेम भाव, भाईचारा सिखायेगा, मारधाड़…

  • बाल अपराध | Kavita bal apradh

    बाल अपराध ( Bal apradh )   क्या लिखूं मैं उस मासूमियत के लिए , जिसे सुन हाथों से कलम छूट जाती है। हृदय मेरा सहम जाता है। उनकी चीखें गूंज रही मेरे इन कानों में क्योंकि हर बच्चे के अश्रु ये कहते हैं यूं ही नहीं होता कोई बच्चा बाल अपराध का शिकार, कुछ…

  • बेटे का फर्ज | Poem bete ka farz

    बेटे का फर्ज ( Bete ka farz )   मां-बाप तीर्थ समान श्रद्धा से सेवा पूरी कीजिए पाल पोसकर योग्य बनाया दुख ना कभी दीजिए   बुढ़ापे की लाठी बन बेटे का फर्ज निभा लेना आशीषों से झोली भर पुण्य जरा कमा लेना   श्रवणकुमार सुकुमार पुत्र लेकर अंधे मां-बाप चारों धाम तीर्थ कराया सह…

  • Kavita | अपना बचपन

    अपना बचपन ( Apna Bachpan )   बेटी का मुख देख सजल लोचन हो आए, रंग बिरंगा बचपन नयनों में तिर जाए । भोर सुहानी मां की डांट से आंखे मलती, शाम सुहानी पिता के स्नेह से है ढलती। सोते जागते नयनों में स्वप्निल सपने थे, भाई बहन दादा दादी संग सब अपने थे। फ्राक…

  • हम पंछी उन्मुक्त गगन के | Hum Panchi Unmukt Gagan ke

    हम पंछी उन्मुक्त गगन के ( Hum Panchi Unmukt Gagan ke ) धूप की पीली चादर को, हरी है कर दें, तोड़ के चाॅद सितारे, धरती में जड़ दें, सब रंग चुरा कर तितली के, सारे जहाॅ को रंगीन कर दें, हम पंछी उन्मुक्त गगन के, उड़ें उड़ान बिना पंखों के, अपने काल्पनिक विचारों को,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *