खुदगर्जी | Khudgarzi

खुदगर्जी

( Khudgarzi )

 

चाहते हो मोल कामयाबी का
तो करो कुछ ,कि और भी हों आपसे
बनकर तो देखो रहनुमा तुम
करोगे राज दिलों में सभी के तुम

जीत कर भी हार जाते हैं वो
करते हैं गिराकर जो जीत हासिल
या छोड़कर साथी को अपने
वे हारे हुए हि हैं हर दौड़ में जीतकर भी

खुदगर्जी की थामकर बैसाखी
ऊँचाई अधिक नही मिलती
होता है मुश्किल फिर संभलना
गिर गये यदि तुम कभी

दुआएं भि बन जाती हैं सहारा
रात के बियावानी मे
तारों का मोल भी कम नही होता
जहाँ खरगोश भी शेर नज़र आते हैं

रहें हाथों में हाथ अपने
हो जाते हैं हल हर मशले
सहयोगी दीप भि नज़र आता है सूरज
फर्क नही इससे कि कौन पहले

मोहन तिवारी

( मुंबई )

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