Kavita nahane lagi
Kavita nahane lagi

नहाने लगी

( Nahane lagi )

दोपहर  ओहदे  पे  जो  आने लगी ।
धूप भी अपने तेवर दिखाने लगी ।।

 

एक भोंरें को छू के चमेली खिली ।
दूसरी  अपनी  पेंगे बड़ाने लगी ।।

 

छू के चन्दा की किरणें कुमुदनी हसीं ।
और  अमिसार  में जगमगाने लगी ।।

 

रात  रानी  से  टकरा  के ठंडी हवा ।
गन्ध उसकी लिये डगमगाने लगी ।।

 

चांद ऊपर से निगरानी करने लगा ।
चांदनी  झील  में  जो  नहाने लगी ।।

 

जाम साकी ने धोके से जो चख लिया ।
देखा  सबने  की  मैं गुनगुनाने लगी ।।

 

✍?

 

लेखक : : डॉ.कौशल किशोर श्रीवास्तव

171 नोनिया करबल, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)

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