Kavita umar

उम्र | Kavita umra

उम्र

( Umra )

 

जो हंसते मुस्काते रहते मोती प्यार के लुटाते रहते
उनकी उम्र जवां रहती है सबको गले लगाते रहते

 

बचपन जवानी बुढ़ापा जिंदगी के है पड़ाव हमारे
खट्टे मीठे आते सदा जीवन में उतार-चढ़ाव प्यारे

 

उम्र झलकती चेहरे से ढलती उम्र जाती पहचानी
चिंता से बेकार हो जाती हंसती खिलती जवानी

 

चंचल मन में लेती हिलोरे उमंगे उर उठती भारी
उम्र की मोहताज नहीं कुंठाये मिट जाती सारी

 

दया क्षमा प्रेम दिलों में बड़प्पन भी उनको मिलता
खड़ा खजूर खूब बड़ा जग में छाया नहीं दे सकता

 

उम्र नहीं है मापदंड जीवन के अनुभव सच्चे
आंधी तूफानों को सह ढह जाते घरोंदे कच्चे

 

ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती जाए समझदारी भा जाती है
ठोकरें खाकर दुनिया में अकल भारी आ जाती है

   ?

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

बसंत | मनहरण घनाक्षरी | Basant ritu par chhand

Similar Posts

  • कविता कभी हँसाती कभी रुलाती | Kavita Kabhi Hasati

    कविता  ( Kavita )   कविता कभी हँसाती है, कविता कभी रुलाती है, सामाजिक कुरीतियों पर कविता प्रहार कराती है! कविता संवेदना लाती है, कविता वेदना दिखाती है, समाज को जागरूक करके कविता चेतना दर्शाती है। कविता प्रेम बरसाती है, कविता समर्पण जगाती है, प्रतिशोध की ज्वाला जला कविता अगन भड़काती है। कविता आत्ममंथन है,…

  • शहीद फौजी का बेटा | Kavita shahid Fauji ka Beta

    शहीद फौजी का बेटा ( Shahid fauji ka beta )    मैंरे पापा घर कब आएंगे माॅं, इतना मुझको बता दो माँ। रोज़ाना मैं पूछता हूॅं तुझको, क्यों नही मुझको बताती माँ।। होली पर भी नही आए पापा, मैंरे पिचकारी नही लाए पापा। अब तो आनें वाली है दिवाली, क्या नही आएंगे इस दिवाली।। मेंरे…

  • मन की पीड़ा | Kavita Man ki Peeda

    मन की पीड़ा ( Man ki Peeda ) मन की पीड़ा मन हि जाने और न कोई समझ सका है भीतर ही भीतर दम घुटता है कहने को तो हर कोई सगा है अपने हि बने हैं विषधारी सारे लहू गरल संग घूम रहा है कच्ची मिट्टी के हुए हैं रिश्ते सारे मतलब की धुन…

  • बचपन आंगन में खेला | Kavita bachpan aangan mein khela

    बचपन आंगन में खेला ( Bachpan aangan mein khela )   नन्हे नन्हे पाँवों से जब,बचपन आँगन में खेला। मेरे घर फिर से लगता है,गुड्डे गुड़ियों का मेला।। खाली शीशी और ढक्कन में, पकवान भी खूब सजें डिब्बों पीपों में लकड़ी संग, रोज ढोल भी खूब बजें खिड़की के पीछे जा जाकर, टेर लगाना छिप…

  • विरह | Virah ke geet

    विरह ( Virah )   वो अपनी दुनिया में मगन है, भूल के मेरा प्यार। मैं अब भी उलझी हूँ उसमें, भूल के जग संसार।   याद नही शायद मैं उसको,ऋतु बदला हर बार। विरह वेदना में लिपटी मैं, प्रीत गयी मैं हार।   मैं राघव की सिया बनी ना, जिसकी प्रीत सहाय। मैं कान्हा…

  • याद आता है

    याद आता है   सर्दी की गुनगुनी धूप में वो तेरा पार्क में बैठ तेरा अपनी आँखों से मुझे अनिमेष तकना और मेरा हाथ थामना याद आता है……   तुम्हारा मेरी हथेलियों में अपना हाथ थमा देना अपनी उंगलियों को मेरी उंगलियों में उलझा देना और फ़िर धीरे धीरे अपनी उंगलियों से मेरी हथेली पर…

One Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *