Bacchon ke Results

खूब हुई नंबरों की बरसात

इस बार खूब हुई नंबरों की बरसात। बरसात ऐसी हुई कि सैकड़ो वर्षों का रिकॉर्ड टूट गया। जिनको बुद्धू समझा जाता था वह भी सीना तान टापरो की लिस्ट में शामिल हो गया है। उसे खुद भी विश्वास नहीं हो रहा है कि ऐसा अचम्भा कैसे हो गया? उसके मां-बाप भी भूल कर कुप्पा हो गए हैं अपने इस लाल की सफलता को देखकर। अम्मा तो कहती है देखा तू कहत रहा कि नालायक है कुछउ नाही पड़ता है फर्स्ट आइ बा ।

जो बच्चे परीक्षा छोड़ दिए थे वह पछता रहे हैं। यदि परीक्षा ना छोड़े होते तो हो सकता है हम भी टॉपर की लिस्ट में खड़े दिखाई देते। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि यह अचम्भा हुआ कैसे?

सब बच्चे बेहाल हो गए। गुरु जी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी जम कर नंबरों की बरसात कर दिया। जेका कुछउ नाही आवत रहा वह भी फर्स्ट क्लास पास हो गया। प्रबंधक जी का आदेश जो था कि कोई भी विद्यार्थी फेल नहीं होंना चाहिए। इससे विद्यालय की रेपोटेशन खराब होता है।

यही कारण है कि विद्यालय की रिपोटेशन (साख ) बचाने के चक्कर में बच्चों की बल्ले बल्ले हो गई। कई लोग कहते सुने गए के हम कल्याण जी के जमाने के पढ़े हुए हैं जिसमें बच्चों का रिजल्ट 50% से नीचे आ चुका था। वही योगी बाबा के राज्य में बच्चों का रिजल्ट सत् प्रतिशत हो गया है।

जैसे बरसात को देखकर किसान खुश हो जाता है उसी प्रकार से इस बार गुरुजनों के नंबरों की बौछार से बच्चे चहक उठे हैं। जो विद्यालय दुकान में परिवर्तित हो गए हैं उन्होंने ज्यादा ही बच्चों पर रहम दिल हुए हैं। यही कारण है कि उनके यहां रिजल्ट सत प्रतिशत रहा है।

नंबरों की बौछार करने में तो एग्जामनरो एवं विद्यालयों की होड़ मच गई है। कौन कितना ज्यादा अपने यहां बच्चों को पास करवा कर अपनी साख बढ़ा रहा है यह प्रमुख मुद्दा बना रहा। जितनी नंबरों की बौछार होगी अभिभावकों की झोली भी उतनी खाली करने का मौका मिलेगा। यही कारण है कि विद्यालयों ने नंबरों की बौछार करने का महा अभियान चला रखा था जो उनका अभियान सफल रहा।

सामाजिक चिंतक परेशान है कि आखिर यह बच्चे करेंगे क्या? कहीं बेरोजगारों की एक नई टीम तो नहीं तैयार हो रही है। उनकी चिंता भी समझने लायक है। जिस देश में डोम बनने के लिए एम ए, बी ए, बीटेक किए हुए छात्रों की लाइन लगी हो उसमें इस प्रकार से नंबरों की बौछार करके बेरोजगारों की टीम खड़ी करना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है।

इससे छात्रों का भविष्य बनेगा या बिगड़ेगा या फिर मात्र बच्चों एवं अभिभावकों के साथ एक छलावा के तहत किया जा रहा है कुछ कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि अधिकांश बच्चें एवं अभिभावक उसी विद्यालय में एडमिशन लेते हैं जो नंबरों की बौछार करने में अपनी झोली खोल देते हैं।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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