कुत्ता काटे का टीका
पूरे विश्व में कोरोना संक्रमण जारी है, लेकिन खुशी की बात यह है कि भारत कोरोना वैक्सीन बनाने में सफल हो गया है। अब भारत में कोरोना संक्रमण नियंत्रण में है। लोगों के टीके लगाए जा रहे हैं। कोविड-19 का पालन करते हुए जनजीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। सभी विद्यालयों को पुनः खोलने व बच्चों के शिक्षण कार्य को करवाने की समय सारणी विभाग द्वारा जारी की जा चुकी है।
रोज की तरह मैं अपने विद्यालय के खुलने के निर्धारित समय से 30 मिनट पहले विद्यालय पहुँचा। बच्चों की उपस्थिति कम देखकर मैं गांव में बच्चों के अभिभावकों से संपर्क करने चला गया।
अभिभावकों से बच्चों के बारे में जानकारी प्राप्त कर, वापस विद्यालय लौटते समय मेरी मुलाकात कक्षा 6 में पढ़ने वाले छात्र जतिन से हुई। वह बस्ता लेकर विद्यालय जा रहा था। सभी बच्चों से भावनात्मक लगाव रखने के कारण मैं जतिन से पूछ बैठा-
“ठीक हो, जतिन? पढ़ाई वगैरह भी कर रहे हो घर पर या कोरोना की वजह से सब कुछ भूल गए हो?”
“मैं ठीक नहीं हूँ सर?”
“क्यों, क्या हुआ,जतिन?”
“सर, कल एक कुत्ते ने मेरी टांग में काट लिया।”
“टांग में? कब, कहाँ?”
“सर, कल मैं अपने घर के पास वाली मिठाई की दुकान पर खड़ा था। अचानक एक कुत्ता आया और उसने मेरी टांग में काट लिया।”
“किस टांग में काटा? ज्यादा तो नहीं काट लिया?”
जतिन ने दाईं टांग की तरफ इशारा करके बताया- “सर यहां काटा है कुत्ते ने।”
जब मैंनें उसकी दायीं टांग को देखा तो मैं चक्कर में पड़ गया। जतिन को कुत्ते ने काफी गहरा काटा था। खून के धब्बे उसकी पेंट पर काफी दूर तक जम गए थे। मैंने उससे एक साथ कई सारे सवाल पूछ डालें- “डॉक्टर को दिखाया? दवाई ली? कुत्ते काटने का इंजेक्शन लगवाया? ज्यादा दर्द तो नहीं है?”
जतिन ने बताया कि आज सुबह उसके पापा उसे पड़ोस के सियाली गांव की एक मजार पर लेकर गए थे जिसे “कुत्ते काटे की मजार” के नाम से जाना जाता था। अंधविश्वासी लोग डॉक्टर के पास जाने की बजाय इस मजार के चक्कर मरीज को कटवाकर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।
उनका विश्वास है कि इससे बिना डॉक्टर को दिखाएं, बिना दवा खाए मरीज ठीक हो जाता है। इन अनपढ़ और अंधविश्वासी लोगों को यह नहीं पता कि मजार पर दुआ मांगने व चक्कर काटने के कारण बहुत से मरीजों की मृत्यु हो चुकी है। मजार पर भी साफ-साफ लिख दिया गया है कि यहां मरीज के हक में सिर्फ दुआ पढ़ी जाती है। इस बात की कोई गारंटी नहीं दी जाती कि वह 100% ठीक हो जायेगा, स्वस्थ हो जाएगा।
बच्चे ने यह भी बताया कि उसको डॉक्टर के पास कोई लेकर नहीं गया, ना ही उसको पैर में दर्द होने के बावजूद दवा दिलवाई गई। मम्मी पापा बोल रहे हैं कि कुत्ते ने ज्यादा नहीं काटा है। वह ऐसे ही ठीक हो जाएगा। जबकि उसकी टांग में बहुत दर्द है और तकलीफ के कारण वह रात भर ठीक से सो भी नहीं पाया। यह बोलते हुए उसकी आंखें नम हो गई और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
जतिन की यह दुर्दशा मुझे अंदर तक झकझोर गई। मैंने उससे पूछा-
“इस समय तुम्हारे घर पर कोई है? अपने घर जाओ और मम्मी या पापा में से जो भी घर पर हो, उनको बुलाकर लाओ। मुझे उनसे बात करनी है।”
जतिन- “पापा काम पर गए हैं और मम्मी खेत पर गई है। घर पर कोई भी नहीं है। बड़ा भाई भी पापा के साथ काम पर गया है।”
यह सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि माँ बाप अपने बच्चों के प्रति इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं? अचानक मुझे वह दृश्य याद आ गया, जब मेरे पड़ोस में रहने वाले शंकर नाम के बच्चे को एक कुत्ते ने काट लिया था। तब उन्होंने भी शंकर को लेकर मजार के चक्कर कटवाए थे।
फिर भी कुत्ते का जहर बच्चे पर चढ़ गया था और कुत्ते के काटने के तीन माह बाद, शंकर कुत्ते की तरह ही भौक-भौक कर दर्दनाक मौत मरा था। यह सोचकर मेरी रूह कांप गई। मैंनें बच्चे को डॉक्टर को दिखाने और उसको कुत्ता काटने का टीका लगवाने का संकल्प लिया।
मैं नहीं चाहता था कि मेरी एक छोटी सी लापरवाही किसी की जान पर बन जाए। कहने को तो मैं उसके मां-बाप से बोलकर अपना पल्ला झाड़ सकता था परंतु मेरी अंतरात्मा ने मुझसे कहा कि इन लापरवाह माता-पिता पर यह काम छोड़ना उचित नहीं।
जतिन को लेकर मैं स्कूल पहुँचा। वहाँ मैंनें सामुदायिक चिकित्सा केंद्र हसनपुर में अपने परिचित डॉक्टर साहब को कॉल की। उन्होंने बताया कि कुत्ते काटने का इंजेक्शन दोपहर 12:00 तक लगता है। बच्चे के साथ, बच्चे का आधार कार्ड याद से लेकर आना है। आप जल्दी आ जाना। अगर इंजेक्शन खत्म हो गए तो आपको दूसरे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर भेजना पड़ सकता है।
मैंनें समय देखा तो सुबह के 11:00 बज रहे थे। विद्यालय से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की दूरी लगभग 10 किलोमीटर थी। जल्दी से मैंनें जतिन से उसका आधार कार्ड घर से मंगवाया। उसको समय से लेकर स्वास्थ्य केंद्र पहुँचा, उसका पंजीकरण करवाया, कोरोना की जांच करवाई।
फिर इसके बाद उसको ‘कुत्ता काटने का पहला टीका’ दोनों कंधों में लगवाया। डॉक्टर साहब ने बताया कि अभी जतिन को दो टीके और लगने हैं। उन्होंने पंजीकरण फार्म पर दोनों टीकों की तारीख लिखकर देते हुए बताया कि इस फॉर्म को संभाल कर रखना और इसी फॉर्म को अगले दो टीके लगवाने के लिए साथ लेकर आना है। इसको खो मत देना। मैंने वह फॉर्म अपनी पर्स की जेब में रख लिया क्योंकि अगले दोनों टीके मुझे ही जतिन को लगवाने थे। इसके बाद मैंनें जतिन से पूछा-
“बेटा कुछ खाया?”
जतिन ने बताया कि उसने कल दोपहर से कुछ भी नहीं खाया है। मम्मी दोपहर में जब खेत से वापस आयेंगी, तब खाने को मिलेगा। उसको बहुत जोर से भूख लग रही है। मैं बच्चे को लेकर रेस्टोरेंट पर पहुँचा, उसको खाना खिलाया। यह कार्य करके मुझे बहुत संतुष्टि मिल रही थी।
मैं यह सोचकर बहुत खुश था कि मैं किसी के काम तो आया। मैंनें ईश्वर का धन्यवाद अदा किया क्योंकि इस नेक व महत्वपूर्ण काम के लिए उसने मुझे चुना था। इसके बाद हम दोनों विद्यालय वापिस आ गए। 3 दिन बाद जतिन को मैंने दूसरा टीका भी लगवाया।
अब अंतिम टीका बाकी था जोकि दो दिन बाद लगना था। तीसरे टीके का दिन, उस दिन पड़ा.. जब मुझे आवश्यक कार्य से अपने गृह जनपद अमरोहा से बाहर जाना था। मैंने सोचा कि दो टीके तो मैंनें लगवा दिए हैं। अब अंतिम टीके के लिए बच्चे के अभिभावक से बोल देता हूँ ताकि वे उसको समय से टीका लगवा दें। यह सोचकर मैं बच्चे के मम्मी पापा से मिलने उनके घर के लिए निकल पड़ा। गांव में जाते हुए रास्ते में ही जतिन के पिताजी डॉक्टर की दुकान पर मिल गए। मैंने उनको देखते ही कहा-
“मैं अभी आपके पास ही आ रहा था। जतिन को 2 दिन बाद मतलब परसो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, हसनपुर में तीसरा टीका लगना है। दो टीके तो मैंनें लगवा दिए हैं। एक टीका लगना बाकी है। मुझे कल आवश्यक कार्य से गृह जनपद अमरोहा से बाहर जाना है। एक टीका आप लगवा देना। मैं तीसरा टीका भी खुद लगवा देता, लेकिन मजबूर हूँ। क्योंकि बाहर जाना पड़ रहा है। तीन दिन बाद वापिस आऊंगा।”
“जतिन को क्या हुआ?” उन्होंने पूछा।
मैं (आश्चर्य से)- “क्या आपको कुछ नहीं पता। आपके बच्चे को कुत्ते ने काट लिया था।”
“तो, क्या हुआ? हम सिहाली में जतिन को मजार के चक्कर कटवाकर ले आए थे। वह ठीक हो जाएगा। क्या जरूरत है टीके लगवाने की? आप तो बेकार में परेशान हो रहे हो मास्टर साहब।”
“आप डॉक्टर के यहाँ क्यों आये हो? क्या हुआ तुम्हे?”
“कुछ नहीं बुखार आ गया था, उसी की दवा लेने आया हूँ।”
“बुखार की? आप भी वहीं मजार पर जाकर चक्कर काट आते, आपकी बीमारी/मर्ज ठीक हो जाता। डॉक्टर के क्यों आये?”
जतिन के पापा चुप हो गए और बात काटते हुए बोले- “मास्टर साहब, तुमने जतिन के दो टीके लगवा दिए हैं। वहीं काफी है। और टीका लगवाने की अब जरूरत नहीं है। उसको कुछ न होने का। एक काम करो… आप ही तीसरा टीका लगवा आओ। आपको परसों ही तो जाना है। तुम कल जतिन को टीका लगवा आओ। या फिर जब बाहर से वापस आ जाओ, तब तीसरा टीका लगवा देना।”
“वह बच्चा तुम्हारा कुछ नहीं लगता? अगर मुझे जरुरी काम ना होता तो यह अंतिम टीका भी मैं लगवा देता। एक बात बताओ, आखिर तुम किसके लिए कमा रहे हो? ईश्वर ना करें कि बच्चे को कुछ हो जाए। एक बात आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि तीनों टीके समय पर व निश्चित तारीखों पर लगाए जाने बेहद जरूरी हैं। एक भी टीका छूटना हानिकारक हो सकता है।”
जतिन के पापा पर मुझे गुस्सा होते देख आसपास के लोग भी आ गए और मामला जानकर वे भी जतिन के पिता को समझाने लगे। लोगों के समझाने पर वे सज्जन कुछ विनम्र हुए और बोले
“चलो देखता हूँ। मैं जतिन को तीसरा टीका लगवा लाऊंगा।”
मैंने उनको सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, हसनपुर की पंजीकरण स्लिप देते हुए कहा-
“इस पेपर को खो मत देना। इसी को देखकर डॉक्टर साहब तीसरा टीका लगाएंगे। अगर यह पर्चा खो गया तो दिक्कत हो जायेगी। फिर से जतिन की कोरोना जांच करवानी पड़ेगी। जतिन ने वह जगह देखी है, जहाँ टीके लगते हैं। आपको कोई परेशानी नहीं होगी। बस आने-जाने में ही थोड़ा समय लगेगा।”
जतिन के पापा द्वारा टीके लगवाने का पूर्ण आश्वासन मिलने के बाद, मैं वापस स्कूल जा रहा था। अभी स्कूल के मुख्य द्वार पर पहुँचा भी नहीं था कि अचानक पीछे से साइकिल पर जतिन के पापा तेजी से मुझे आवाज देते हुए चले आ रहे थे। मैंने पूछा-
“अब क्या हुआ?”
उन्होंने कहा- “मैं जतिन को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, हसनपुर में टीका लगवाकर नहीं ला सकता।”
“अब एकदम से ऐसा क्या हो गया? सब लोगों के सामने तुम तो मान गए थे। इतनी जल्दी बदल गए। तुम्हें समझाने का भी कोई फायदा ना हुआ।”
“बात यह नहीं है कि मैं टीके लगवाना नहीं चाहता। बात यह है कि जतिन की मम्मी ने मुझे साफ-साफ बोल दिया है कि अब कोई टीका नहीं लगेगा। दो टीके लग गए हैं। वही काफी हैं। अगर घर का कोई भी सदस्य टीका लगवाने गया तो मैं उसकी टांगें तोड़ दूंगी। चुपचाप अपने काम पर जाओ। मेरे बड़े लड़के को भी उसने साफ-साफ टीका लगवाने के लिए मना कर दिया हैं। मैं क्या कर सकता हूँ अब?”
“तुम अपनी पत्नी से इतना ज्यादा डरते हो? तुम चुपचाप भी तो टीका लगवाकर अस्पताल से वापस आ सकते थे। तुमको जब अपनी पत्नी की आदत, व्यवहार के बारे में सब पता था, तो तुमने उसे बताया क्यों?”
“तुम्हें नहीं पता मास्टर साहब, अगर उसको चुपचाप टीका लगवाकर लाने का पता लग गया तो वह मुझे जान से मार देगी। तुम मुझे माफ कर दो। मैं टीका लगवाकर नहीं ला सकता। यह पकड़ो अपनी पर्ची।”
पंजीकरण पर्ची देकर वह तुरंत निकल गया। आसपास के लोगों ने भी यह दृश्य अपनी आंखों से देखा और बताया कि यह आदमी दब्बू किस्म का है। इसकी पत्नी छोटी-छोटी बात पर इसे और बच्चों को बड़ी बेरहमी से मारती है। मैं सोच में पड़ गया कि एक मां अपने बच्चों की दुश्मन कैसे हो सकती है?
अभी तो पिता को बड़ी मुश्किल से समझाकर टीका लगवाने के लिए मनाया था, अब पत्नी को भी… नहीं… नहीं… ये समझाने का काम मुझसे नहीं होगा। कुछ इंतजाम करता हूँ।
मैं बच्चों के मां-बाप का रवैया देखकर बहुत हैरान और परेशान था। बहुत सोच-विचार करके अंत में मैंनें खुद ही तीसरा टीका लगवाने का फैसला लिया। तीसरे व अंतिम टीके की निश्चित तिथि पर, अपने बाहर के आवश्यक कार्य को… किसी अन्य तिथि के लिए छोड़कर मैं जतिन को अपने साथ लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, हसनपुर के लिए निकल पड़ा।
निष्कर्ष:- आज के समय में भी ऐसे बहुत से इलाके व गांव है, जहाँ पर अंधविश्वास एवं पुरानी रूढ़िवादी परंपराएं जोरों पर हैं। जतिन की मम्मी-पापा का उदाहरण भी इससे अछूता नहीं है। बच्चों को अगर ठीक से शिक्षा दी जाए तो यह शिक्षा उनके अंधविश्वास को दूर करने का कार्य करेगी।
बच्चों में तर्कक्षमता, कल्पनाशीलता व सही गलत में भेद करने की क्षमता पैदा हो सकेगी। हमारी भावी पीढ़ी एक अच्छी पीढ़ी बन सकेगी, अच्छे नागरिकों का निर्माण करे सकेगी जो अंधविश्वासों से कोसों दूर होगी।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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