लालच बुरी बलाय
लालच बुरी बलाय

लालच बुरी बलाय

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सदैव हलाल की कमाई खाएं,
किसी के आगे हाथ न फैलाएं।
ऊपर वाला जिस हाल में रखें-
ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिताएं,
आवश्यकता से अधिक न चादर फैलाएं;
बस अपना काम ईमानदारी से करते जाएं।
बरकत और अल्ल्लाह की रहमत-
खुद चलकर आपके द्वार आए,
फिर काहे को हाय हाय?
सब जानते है-
एक पाई भी साथ न जाए?
सब्र करने वाला ही खुदा को भाए।
मेहनत ईमानदारी की कमाई से-
दाल रोटी जो चल जाए,
वहीं बड़ी बात है भाय;
खुदा को भी यही सुहाय।
आखिरत उसकी बन जाए,
जो सदैव नेक अमाल करते जाएं।

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नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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