माँ की उलाहने

माँ की उलाहने

माँ की उलाहने

बिटिया जब छोटी थी
मॉं के लिए रोती धी,
पल भर न बिसारती थी
माँ – माँ रटती रह जाती थी।

थोड़ी सी जब आहट पाये
चहुओर नजरे दौड़ाये,
नयन मिले जब माँ से
दोंनो हृदय पुलकित हो जाये।

अब तो बिटिया हुई सयानी
आधुनिकता की चढ़ी रवानी,
नये तेवर में रहती है अति बुद्धिमानी अपने को,
माँ को बुद्धॣ कहती है।

मचलती थी जिस पुचकार से पालना में
वही शब्द भाव अब बिटिया के नाक चढ़े,
माँ केवल माँ होती है न कि छल-प्रपंची
जो नये-नये शब्दों के जाल गढ़े।

माँ अपने पथ पर अग्रसर
बिटिया तु न समझ पाती है,
माँ वही कुम्हारन है जो
जीवन की संयोजती थाती है।

बिटिया तेरी क्या अभिलाषा
माँ सब भाव समझती है,
जिस भाव में है तु बहनेवाली
माँ उसकी घाव अभी तक भरती है।

यही सोचकर घबराती है माँ
तेरे संग न कुछ अनहोनी हो जाये,
आधुनिकता के चकाचौंध में
बिटिया तु गुमनाम न हो जाये।

ऐसा दुर्दिन देखकर माँ
जीवन भर निज को कोसेगी
पालन में कहां कमी बिटिया के
अपने आप से पूछेगी।

माँ की उलाहनों की परिभाषा
बिटिया एक दिन समझ तो आयेगी,
परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है,
जिस दिन तुम माँ बन जायेगी।

लेखक: त्रिवेणी कुशवाहा “त्रिवेणी”
खड्डा – कुशीनगर

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