मस्त मद में बसन्त-सन्त है सखी
मस्त मद में बसन्त-सन्त है सखी
आ रहा बसंत बसंतपुर से सखी,
मन मस्त जोशीले कसक में सखी,
पुराने गमगीन पत्तों का यूँ गिरना!
नये सुकून की खुशली है सखी।
मधुर मधुर हवा मंद-मंद ठण्डक,
गुलाबी मौसम, बॉंधती गण्डक,
लुभावन दिन और शीतल रात सखी,
नये सुकून की उल्लास है सखी ।
होली सी रंग-बिरंगी रंगीन फिजाएं,
तन तो कभी मन को कॅपाती हवाएँ,
रोम-रोम में अजीब सिहरन है सखी ,
नये सुकुन की उमंग है सखी।
सब सराबोर अजीज मुहब्बत में ,
बसंती फरवरी के संग सोहबत में ,
मस्त मद में बसंत- संत है सखी ,
नये सुकुन की आनन्द है सखी।
पीली सरसो की मनमोहक दृश्य,
आम की बऊर अब हुई सदृश,
गूँजती बागान सी दिल में है हल्ला सखी,
नये सुकुन की दिव्यानन्द है सखी |
प्रतिभा पाण्डेय “प्रति”
चेन्नई
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