महाकुंभ
ग़ज़ल ( महाकुंभ विशेष)
आस्था की है लगी डुबकी सदा देखा
भक्ति के नव रंग में सबको रँगा देखा
कुंभ मेला को इलाहाबाद के पथ पर
संत नागा साधुओं से नित भरा देखा
भीड़ का उमड़ा हुजूम जयघोष हैं करते
धूल से घुटने पावों तक को सना देखा
सूर्य तक उठता नदी जल अंजली में यों
आचमन में हाथ सब ऊपर भला देखा
सांस्कृतिक अवदान का है कुंभ का उत्सव
मुक्ति की डुबकियों में मन घुला देखा








