मैं सोचता रहा

मैं सोचता रहा

मैं सोचता रहा

मैं सोचता रहा उसे जिस पल ग़ज़ल हुई
फिर सर से पांव तक ये मुसलसल ग़ज़ल हुई

कुछ तो नशा भी चाहिए था काटने को जीस्त
और ऐक दिन मेरे लिए बोतल ग़ज़ल हुई

भड़की है आग बन के जिगर में कहीं,कहीं
दिलबर के गोरे पांव की पायल ग़ज़ल हुई

हफ़्तों कलम उठा न रक़म हो सका ख़ुतूत
पड़सों किसी का ख़्वाब दिखा कल ग़ज़ल हुई

हमने रखा ख़याल रिवायत का प्यार से
कहने लगा अरूज़ भी अव्वल ग़ज़ल हुई

वो इक ग़ज़ल थी और ‘असद’ हम थे वो रदीफ़
जिसके बग़ैर भी वो मुकम्मल ग़ज़ल हुई

असद अकबराबादी 

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