मन
मन
बहुत शक्तिशाली है
व्यापक है
उसका साम्राज्य
उसको
चुनौती देने वाला
कोई नहीं है
अतः भलाई है
प्रकृति के नियम के
साथ चलने में ही
सार नहीं
विपरीत दिशा में कोई
मन में कालुष्य न आये
कर्म काट कर
इतना हिम बनकर
चले कि खुद के
संगति वह जो नीति सिखाये
वैराट्य प्रकट हो
वाणी में वैर-भाव
न उगने पाये
राग- द्वेष से दूर
हो जायें और
ध्रुवतारा -सी चमक
लिए सारे जगत में
चमक सही से
आत्मा का “प्रदीप “ पायें ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)







