माटी के गणेश | Mati Ke Ganesh

माटी के गणेश

( Mati Ke Ganesh )

मत फैलाना प्रदूषण तुम
पी ओ पी के विचारों का
लेकर आना अपने घर पर
सिर्फ माटी के ही गणेश ।।

माटी ही जग में सुंदर हैं,
माटी की ही जब ये काया
माटी में निर्मित होता अन्न ,
माटी से बना संसार सारा ।।

माटी से साकारत्मक विचार ,
माटी मिले हमें स्त्रोत अपार
माटी ही करे जग का कल्याण
इस माटी में छुपी अपार खान ।।

माटी से सुंदर बनती हैं मूर्तियां,
सूक्ष्म रूप में सुंदर बनाना तुम
प्रदूषण से संसार बचना तुम
घर में ही माटी की मूर्ति बनाना तुम ।।

माटी के गणेश निर्मित करके
गमले में एक पौधा लगाना तुम,
सुंदर चौक पुराना प्रभु जी का
श्री गणेश को भादो झूला झूलना तुम।।

आशी प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका)
ग्वालियर – मध्य प्रदेश

यह भी पढ़ें :-

पानी पूरी | Kavita Pani Puri

Similar Posts

  • करवा चौथ | Hindi poem On karwa chauth

    करवा चौथ ( Hindi poem On karwa chauth )   चाँद का कर लूं सनम दीदार मैं प्यार से जो बंधा करवा चौथ है   उसकी चूड़ी उसकी देखो बिंदिया  मुस्कुराती  सूरत करवा चौथ है   हो गया दीदार अपनें चाँद का प्यार का आया वो करवा चौथ है   सज गयी है चाँद की …

  • आप ही बदल गए | Aap hi Bada Gaye

    आप ही बदल गए ( Aap hi Bada Gaye ) हम अपने जंजालो में और फंसते चले गए, उन्हे लगा यारों, हम बदल गए । करके नजदीकी, ये दूर तलक भरम गए, कुण्ठा के मस्तक पर ,दाग नया दे गए। खुशी की अपील नहीं मुस्कुराहट मॉगे, आपाधापी की जिन्दगी से अनगिन आप गए। ऐसा नहीं…

  • डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम | Kavita Dr. A.P.J. Abdul Kalam

    डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ( Dr. A.P.J. Abdul Kalam ) तुझे महकता फूल कहूँ या, तुझे  अनंत  आकाश कहूँ। पूर्व राष्ट्रपति  मिसाइल मैन, या तुझे मैं  हिंदुस्तान  कहूँ। कलम में इतनी  शक्ति नहीं, मैं कैसे तेरा गुणगान करूँ? हे!   कर्मयोगी,   शिक्षाविद, किन शब्दों में  बयान करूँ। युवा पीढ़ी की शक्ति थे तुम, जाति – पाँत से  परे थे तुम।…

  • पद्मजा | Padmaja

    पद्मजा ( Padmaja )   पद्मजा श्री चरणों में, स्वर्णिम प्रज्ञा भोर घट पट नवल धवल, मृदुल मधुर विचार प्रवाह । स्नेहिल व्यवहार तरंगिनी, सकारात्मकता ओज अथाह । स्वच्छ स्वस्थ अंतर काय, कदम चाल मंगलता ओर । पद्मजा श्री चरणों में, स्वर्णिम प्रज्ञा भोर ।। जीवन पथ प्रति क्षण , अनुभूत अनंत अनुराग । दिग्दर्शन…

  • युद्ध के दौरान कविता | Yuddh ke Dauran Kavita

    युद्ध के दौरान कविता ( Yuddh ke Dauran Kavita )   रात के प्रवाह में बहते हुए अक्सर अचेत-सा होता हूं छूना चाहता हूं — दूर तैरती विश्व-शांती की वही पुरानी नाव-देह . अंधेरे और उजाले का छोर पाटती तमाम निर्पेक्षताओं के बावजूद यह रात भी / एक राजनैतिक षड़यंत्र लगती है मुझे . जहां…

  • अतीत आज और कल | Aaj aur Kal

    अतीत आज और कल ( Ateet aaj aur kal )    अतीत आज और कल, बंदे संभल संभल कर चल। परिवर्तन कुदरत का नियम, जन मन रहती हलचल। कितना सुंदर अतीत हमारा, संस्कारों की बहे धारा। शौर्य स्वाभिमान पराक्रम, गौरवशाली है देश हमारा। बदल गया परिवेश आज, बदल गई है जीवनधारा। धीर धर्म दया सब…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *