मेरी डायरी से
मनुष्य जब जीवन के उत्तरार्ध में होता है तो जिंदगी के अनुभवों को किसी सुपात्र व्यक्ति को सौंपना चाहता है। सोचता है जिंदगी में जो कुछ हम नहीं रह कर सके उसे आने वाली पीढ़ियों को सौंप दूं । जिससे ज्ञान की धारा सतत बहती रहे । जितने भी बड़े बुढो से मिलता हूं एक ही दर्द होता है कैसे जिंदगी के अनुभवों को संजोकर रखा जा सके। कौन है जो मेरे हृदय में धधक रहे दर्द को अनुभव कर सकता है।
क्या-क्या ख्वाब थे हमारे ? कितने अरमानों से युवा पीढ़ी को पाला लेकिन जब उन्हें हिंसा , नशे में चूर चूर देखता हूं तो सिर शर्म से झुक जाता है। क्या इन्हीं निराश हताश चिंतातुर नशेड़ियों पर अनुभव उड़े लू। क्या यह सभांल पाएंगे । जो स्वयं को ही नहीं संभाल पा रहा है वह दूसरे को क्या संभालेगा ?
श्री हर्षवर्धन कुलश्रेष्ठ जी से मिलने पर ऐसा लगता है कि यह सामान्य से कपड़ों में ढकी मूर्ति इतनी बड़ी महान आत्मा होगी। प्रथम दिन तो स्वामी जी लोगों को उनके द्वारा सम्मान दिलाया और उन्हें कुछ बोलने का मौका नहीं मिला । मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा। जिनका मन ही रम गया हो उनको कपड़े रंगने की क्या आवश्यकता है ?
पग पग पर मोती बिखरे हैं, उन्हें ढूंढने की दृष्टि तुम खोजो। मोती से मोती जा मिला जब, मोती सम जीवन आधार हो गया।।
सागर की लहरें तो लहरें हैं, तुम इन पर इतना मत इठलाओ। हृदय की गहराइयों में खोजो, मोती सम ज्ञान जीवन में अपनाओं।।
अपना अपना सब कोई कहे, अपना मानो तो धोखा देते हैं। अपनों में तुम मत खो जाना,
एक अपना तो केवल श्याम सलोना है।।
सांवर देह,आंखें सलोनी,
बाल घुंघराले गाल है लाल। कानों में कुंडल ,गले में माला, ऐसे सोहै जैसे चांदनी रात हो।।
वर्षो मुलाकाते होती रही परंतु कभी ज्यादा बातचीत किये बिना समझ नहीं पाया सागर की लहरों में तैरते पक्षियों के झुंड में मोती नहीं मिलते। उसके लिए तो गहराई में उतर कर खोजना होगा।।
जिससे मिलने पर जीवन की, वासंती कलियां खिल जाए ।हतास निराश मुर्झाया चेहरा भी, मधुमासी सुगंधें बिखेरने लगें।। हर्षित होते सब अंग अंग,
ऐसे हर्ष जी को पावन प्रणाम करू। ।।
दुनिया की चकाचौंध में ,
ये आंखें क्यों खो जाते हैं।
यह गलती उनकी नहीं यारों ,
यह तो उम्र का तकाजा है।।
जाने कितने जमाने में ,
लोग मिला करते हैं ।।
कुछ ऐसे भी होते हैं,
जो यादें छोड़ जाते हैं।।
उन यादों के साए में ,
जिंदगी घुट घुट कर गुजरती है। उनकी यादों की माला को,
हृदय बसा नित्य दर्शन पाऊं।
प्रेम को छलावा एवं धोखा कहते, फिर भी लोग प्रेम पास में बंध जातें ।
ना चाहते हुए भी चाहत बनती,
यह दिलों दिलों की बात है यारों।।
जो कुछ सुंदर शुभ है दिखता, प्रेम बिना ना खिल पाती हैं ।
चाहे सूर कबीर हो या रविदास, सब प्रेमी बन दीवाना घूमे।।
संसार के प्रेम की चोट जब ,
हृदय शूल बन जाती है ।
प्रभु भक्ति के रस में डूबा,
प्रभु चरणों में प्रीत लगातीं हैं।।
गुलाबों के सुगंधों में खोकर, कांटों को हम भूल जाते हैं ।जीवन में फूल भी है कांटे भी, कांटों से बचकर जीवन खिला जाना है।।
दुनिया में धोखे धूर्त भी है तो, सत्पुरुष भी छिपे हुए ।
इन धोखेबाजों से बचकरके ,
प्रभु चरणों में प्रीत लगानी है।।
यह दुनिया बड़ी मोहिनी है,
जगत को मोहित करती है। सबको मोह पास में बांधकर,
प्रभु चरणों से दूर ले जाती है।।
मेरी डायरी से : भाग -२
कुछ चीज ऐसी होती है जिसे नहीं करना चाहते हुए भी व्यक्ति को करना पड़ता है। यह करने की प्रक्रिया अंत में उसे एक न एक दिन तनाव और अवसाद का रूप ले लेती है।
आज हम एक ऐसे ही विषम समय में जी रहे हैं जहां लोग अपने आकांक्षाओं के पूर्ति करने हेतु हमें हर क्षण मार रहे हैं चाहे वह मां पिताजी हो या अन्य संबंधी मित्र सभी की कोई न कोई चाहते हैं ,इच्छाएं हैं, आकांक्षाएं हैं, जिनके बीच में हमारा जीवन कुचलता जा रहा है। क्यों लोग नहीं समझते कि हमारे भी जीवन में कुछ अरमान होंगे कुछ लालसाय होंगे। अपनी बातों को थोप देने से समस्या के समाधान की जगह बढ़ती ही जा रही है।
आज का बच्चा दबावों के बीच डरा सहमा सा जिंदगी गुजार रहा है। भयभीत जीवन के बीच गुजरता बचपन हताशा निराशा से घिर गया है। बचपन की अठखेलियां, कूदना, फूदकना ना जाने कहां भूल गया है। आज के मानवता के पुजारियों की यह एक अहम जिम्मेदारी है कि वह बचपन को बचाने का प्रयास करें।
बच्चों के बचपन न छीने। उन्हें बच्चा बने रहने दे । नहीं तो एक दिन ऐसा समय आएगा कि बच्चे जन्म से ही बूढ़े जैसे पैदा होने लगेंगे । तब एक ऐसी पीढ़ी का जन्म होगा जो 100 साल पहले की बातों को प्रमुखता देगी।
कुछ सुझाव बचपन बचाने के संबंध में —
१- बच्चों को अपनी बातों को कहने का मौका दें ।उनके हमदर्द बने ।आत्मीय संबंधों को और प्रगाढ़ बनाएं।
२- बच्चों की रुचियां को समझने का प्रयास करें । उन्हें उनकी रुचियां को बढ़ाने में मददगार बने । रुचियां व्यक्तित्व विकास का एक प्रमुख हिस्सा है।
३- रोज सायंकाल कुछ छड़ उनके साथ जरूर बिताए । मात्र होमवर्क ही ना देखते रहे बल्कि उनके दर्द हसरतों को समझने का प्रयास करें।
४- मानव शिशु का निर्माण एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण है बच्चों को समझना ही आपके जीवन का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। बच्चों को पढ़े कि किस सरलता के साथ वो अपने जीवन के सौभाग्य को खिलाते हैं।
५- अपनी अतृप्त हसरतों को उन पर ना लादें । वे जिंदगी में जिस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं आप उसमें एक सहयोगी की भूमिका मात्र अदा करें । शेष उन पर छोड़ दें।
६- बच्चों की दिनचर्या संगति कैसे मित्रों के साथ है कड़ी लेकिन प्रेमिल दृष्टि रखें।
७- बहुत कढ़ाई एवं बिल्कुल ढीलापन दोनों अतिया को छोड़कर कोशिश करें कि कैसे उनमें स्वयं की विवेक शक्ति एवं सूझबूझ जगे।
८- उन्हें बताएं कि इस उम्र की थोड़ी सी गलफत पूरे जीवन को दुखमय बना सकती है और छोटे-मोटी बातों की सावधानी आदमी को महान बनाने में सहायक हो सकती है।
९- बच्चों को बताएं कि जिस प्रकार नवजात पौधों को अच्छी खाद पानी तो चाहिए ही उसके लिए आवश्यक है अच्छे बीज की। उसी प्रकार मनुष्य के बचपन के अच्छे संस्कार, अच्छी आदतें ,अच्छी संगत , यह सब अच्छे बीज की तरह मनुष्य के भावी जीवन विशेष कर युवा अवस्था में अच्छे खुशबूदार फूल खिलने में कारणीभूत होते हैं।
१०- सौंदर्य की गहराई चमड़ी तक सीमित नहीं अपितु यह मन और आत्मा को स्पर्श करने वाली वस्तु है।
सद्गुणों का श्रृंगार करो,
दुखियारों के आंसू पोछो।
प्रभु चरणों में प्रीत लगाकर, जीवन का सिंगार करो।।
मेरी डायरी से भाग – ३
कभी-कभी व्यक्ति जो करना चाहता है वह कर नहीं पाता है। जो कहना चाहता है कह नहीं पाता है। गाना चाहता है गा नहीं पाता है। अर्थात वह जो करना चाहता है कर नहीं पाता।
जिसके कारण उसका व्यक्तित्व कुत्सित हो जाता है। यह कुंठा एक दिन दमा का रूप धारण करती है। आज दबाव की प्रवृत्ति समाज में बढ़ती जा रही है। सभी एक दूसरे का गला काटने को उदिव्त है। कोई किसी को नहीं चाहता। दिखावे के लिए हंसते हैं लोग एवं दिखाए के लिए दो बूंद आंसू टपका देते हैं ।
इस दुनिया में जो हम जीते हैं फेस मास्क लगाकर जीते हैं । हम अपने आप को ईमानदार सिद्ध करने के लिए झूठ बोलते चले जाते हैं । एक झूठी आदतें एक न एक दिन हमें सत्य लगने लगती हैं । तब हम यह भी भूल जाते हैं कि क्या सही है क्या ग़लत । बस करते जाते हैं । इससे जैसे जीवन का आनंद ही खोता जा रहा है।
हताश निराश जीवन से आप क्या आशा रख सकते हैं ?देश का भविष्य निर्माण करने वालों की आज यही मुख्य समस्या है जिसका समाधान खोजना ही होगा ? यह ख़ोज ही हमें कुछ नया अच्छा करने के प्रति प्रेरणा प्रदान करेगी । जिसके जीवन का ना कोई उद्देश्य हो ना लक्ष्य ही हो भला यह जीवन भी कोई जीवन है। ऐसी जिंदगी से भला क्या आशा की जा सकती है।
आज दमा मधुमेह रोग बढ़ता जा रहा है । आज 70% युवा दमा की चपेट में है । बदलती जीवन शैली आचार व्यवहार ही दमा रोग बढ़ने का मुख्य कारण साबित हो रहा है । लाखों रुपए दवाओं में खर्च करने की अपेक्षा यदि लोगों के दुख दर्द में प्रेम संबंध बनाने में लगाया जा सके तो इस महामारी से छुटकारा पाया जा सकता है।
मानव ही क्या पशु पक्षी पेड़ पौधे सभी प्रेम के भूखे हैं। प्रेम के दो बोल जो व्यक्ति को सुकून दे देती है उसे कौड़ियों से नहीं तौला जा सकता है । आज ऐसे ही प्रतिभाशाली योद्धाओं की जरूरत है जो समाज को नई दिशा प्रेरणा प्रदान कर सके। यह कार्य मात्र करने से नहीं करके दिखाने से होंगा ।
एक दूसरे की विचारधारा , भावनाओं को समझने का प्रयास करें कोई ऐसी बात ना बोले कि दूसरे को दुख हो एक दूसरे को सामंजस्य बिठाकर आगे बढ़े। सदा मंद मंद मुस्कान चेहरे पर बनाए रखें।
परिवारों के भी सामंजस्य बनाकर रखें। बच्चों की सबसे अच्छी पुस्तक बुजुर्गों को माने। जो ज्ञान , अनुभव हमारे बड़े-बूढ़े सहज रूप में लूटाते रहते हैं उसे तो लाखों रुपए खर्च करने के उपरांत भी नहीं पाया जा सकता है। प्रोत्साहन तो एक औषधि है जिस दिल को छूता है वही खिल उठता है।
मेरी डायरी से : भाग -४
प्रभु की कृपा कहें या उनके चरणों का प्रसाद समय-समय दिव्य विभूतियों का सानिध्य प्राप्त कराते रहते हैं । ऐसे ही महान विभूति डॉक्टर वेदपाल जी का सानिध्य पिछले 15 दिनों से प्राप्त होता रहा है। गुरु चरणों के प्रति प्यार समर्पण ही उनके जीवन का अंग बन गया है।
यदि उनको कुछ अलग से बताने का प्रयास करते हैं तो कहते हैं कि अब हमारी ना कुछ जानने एवं न किसी से मिलने की जिज्ञासा होती है । अब तो एक राह गुरुदेव ने दिखा दी बस अब उस पर चलते चले जाना है । आज परिवार टूटता जा रहा है । व्यक्ति व्यक्ति को देखकर भयभीत हैं ।कोई किसी पर विश्वास नहीं कर रहा है । सबका जीवन निराशा से घिरता जा रहा है ।
उन निराशाओं के बीच आशा का संचार करना ही हमारा एकमात्र उद्देश्य है। वे कहते हैं आप परिवार की गोष्टी लो, बच्चों को श्रेष्ठ कहानियां सुनाओ , किस्से सुनाओ। उन्हें सद्विचार की प्रेरणा दो । यदि तुम एक भी परिवार को जोड़ सके तो अपने जीवन को परम सौभाग्यशाली समझो ।
परिवार निर्माण हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए । पहले व्यक्ति का निर्माण करो । एक-एक व्यक्ति को इतना प्रेम दो कि वह आपका सबसे परमहितैषी मानने लगे । जीवन का निर्माण करो , प्रभु प्रेम का प्रसाद बांटों । दुनिया में घृणा द्वेष की जगह प्रेम करुणा का प्रसाद बाटो, जिससे एक बार मिलो उसे अपना बना कर ही छोड़ो।
उनकी सिखावानों को याद करके आंखें प्रेम से छलछला जाती हैं । कैसा अलौकिक है उनका प्यार। 70 वर्ष के होने के बाद भी दूसरों से सेवा लेने का भाव जैसे मिट सा गया हो । सेवा को मत लो । सेवा लेने के लिए नहीं आप देने के लिए पैदा हुए हो। आप लोगों के साथ प्रेम का संचार करो । बांटो बांटो प्रेम बांटो ,दया बांटो । संसार को प्रेम से पूर्ण कर दो । लोगों के आंसुओं को पोछ सको जगत जननी से यही प्रार्थना करो ।सबके दुखों को हरने वाली वह आपके दुखों को क्यों नहीं हरेगी।
आज आदमी प्रेम की कीमत नहीं समझता है । प्रेम के दो बोल दुखों के अंबार मिटा डालने में पानी का कार्य करते हैं । जलता हृदय शांति की अनुभूति से परिपूर्ण हो जाता है । कैसी है यह प्रेमानुभूति जहां पर पड़ती है वही जलमग्न कर देती है।
इसी प्रकार से सायं काल जब स्वामी विश्वमित्रानंद से मिलने गए तो उन्होंने बताया -” देखो आदमी जो है वह बाहर की चीजों को ज्यादा तवज्जो देता है। अभी आप ही यदि अमेरिका, ब्रिटेन से चले जाओ और जब लौटोगे तो आपका मान सम्मान बढ़ जाएगा । यह मीडिया ही है जो चाहे जिसे जहां से जहां तक पहुंचा दे।
मीडिया का सहारा मिले एवं व्यक्ति के अंदर भी कुछ हो तो उसे उन्नत करने में समय नहीं लगता ।व्यक्ति को कभी निराश नहीं होना चाहिए जो भी हो रहा है उसे देखते हुए आगे के लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहना चाहिए। समीक्षा करें कहां गलती हुई। आगे के शिविरों में उसमें सुधार करते हुए आगे के लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाना चाहिए। भगवत कृपा पर विश्वास करो , जो कुछ करती है वही करती है।
मेरी डायरी से : भाग – ५
पूर्णिमा की रात ढल चुकी हैं गगन मंडल की स्वच्छ लालिमा चारों ओर प्रकृति का मन मोह ले रहे हैं जैसे मुंह लिया हो कुछ कहना चाहते हैं परंतु शब्द नहीं है कि क्या कहा जाए बस नहर जा रहे हैं एक दूसरे को ना कोई बातचीत ना हलचल शांति जैसे हृदय किस वंदन को भी बंद कर देना चाहती हो ।
पक्षी का कलर भंवरे के गूंजर भी जैसे दलों को मिलने में बाधा पहुंचा रहे इसीलिए तो कहा गया प्रेम परमात्मा पर बिना प्रेम का पुत्र किले हम परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकते हैं जहां प्रेम है वही प्रभु का निवास है।
दो दिलों का स्वच्छ निर्मल प्रेम ही परमात्मा अनुभूति का सहज माध्यम है इसीलिए विभिन्न प्रति की रचना की गई है कि हम उनमें उसे परम सट्टा का अनुभव कर आधुनिक युग में हृदय का तनाव गुस्सा क्रोध बढ़ती जा रही है करण की तरह तो हमें कहीं न कहीं दिलों का आहट होना ।
प्रेम की प्यास की तृप्ति ना हो पाना है पाएंगे स्वार्थ के बंसी भूत होकर हम कभी यह नहीं सोच पाते हैं कि हमारी छोटी सी गलती के कारण कितने दिनों पर चोट पहुंचती है लेकिन जब हम उन्हें चोटों के शिकार बनते हैं तो तिलमिला से जाते हैं।
मेरे परिचित एक बहन है। जब खुश होती है तो जैसे दुनिया की सारी खुशियों को बटोर लेना चाहती हों । कभी गाती हैं इतनी तेज की होशो हवास भी खो देती हैं। हर छण मुस्कान बिखेरते हुए भी दुखों का अंबार हृदय में संजोए हुए हैं । एक ऐसा दर्द जिसे दो दिल ही समझ सकता है। शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। जिसके कारण वह मानसिक आघात सर दर्द , पेट दर्द के साथ ही सारे शरीर में अकड़न सी आ गई है ।।
कभी दर्द से ऐसे कराहती हैं कि दिल पसीज जाता है । वह स्वयं स्वीकार भी करती हैं कि मुझे कोई बीमारी नहीं है फिर भी बीमार हूं । पूछने लगे पर उसने पर बताया कि -” भाई जी मैं शहर के अनेकों स्पेशलिस्ट डॉक्टर को दिखा चुकी हूं। बस टैबलेट पकड़ा देते हैं । मम्मी पापा झाड़ फूंक को भी करवा रहे हैं।
परंतु किसी ने मेरे से जानने का प्रयास नहीं किया की हालत मेरी क्यों हुई। जितनी दवा की मर्ज बढ़ता गया। मेरे अरमानों पर पानी फेरने वालों कभी मेरे दिल से पूछा होता कि मुझे क्या दर्द हैं?
ऐसी न जाने कितनी युवा पीढ़ी दर्द से कराह रही है । जब यह दर्द सहनशक्ति के बाहर हो जाता है तो वही आत्महत्या करने को मजबूर करती है । नहीं तो लोग साथी की हत्या ही कर डालते हैं। ऐसी घटना प्रयाग में ही एक युवक के द्वारा गोली मार के प्रेमिका की हत्या कर दी गई।
ऐसी घटनाओं को देख सुनकर भी यदि हम कुंभकरण की नींद सोते रह गए तो क्या करेगी युवा पीढ़ी यह बहुत जल्द सामने आ जाएगा। अमेरिका ब्रिटेन जैसे समृद्धशाली देशों में आत्महत्या जैसी महामारी के रूप में फैलती जा रही है । बीमारियों को दूर करने के लिए नित नई-नई दवाई खोजी जा रही है ।
नित्य जवानी बनी रहे जैसी दवावों से बाजार पट सी गई है । परंतु जवानी तब टिकेगी जब युवानी भी हो । हम एक दूसरे को समझ सके । उनके दुख दर्द में सहभागी बने । सबसे प्रेम से मिले । कोई ऐसी बात ना करें जिससे दूसरों को चोट पहुंचे। अपनी बातों को ही ना कहते रहे दूसरों को भी सुनने का प्रयास करें।
मेरे प्यारे युवा दोस्तों ! जिस बीमारी को तुम शरीर में अनुभव करते हो, हों शारीरिक है नहीं । ना जाने कितने लोगों ने तुम्हें आहत किया होगा। तुम्हारे दिल को दुखाया होगा। तुम्हें दुत्कारा होगा। हो सकता है तुम्हारे गरीबों के कारण तुम्हें फटकार मिले हो, तुम आगे ना बढ़ पा रहे हो , परंतु आत्म सम्मान कभी ना गंवाना । भूमि पर सोना , सूखी रोटी खाना, परंतु लाचारी जीवन में कभी मत लाना ।
जब दुनिया से निराश हो जाओ तो शांत हो जाना । हृदय में प्रभु को पुकारना । देखोगे कि प्रभु तुम्हारा सत्कार करने तुम्हारे आंसू पोछने के लिए तुम्हें निहार रहे हैं । प्रभु की वात्सल्यता को भूलकर तुम कहां भटक रहे हो । भैया प्रभु भक्ति, शक्ति, प्रेम का संबंध लेकर आगे बढ़ो दुनिया तुम्हारे चरणों में होगी। जब एक स्त्री डॉक्टर के साथ शादी करतीं हैं तो वह भी डॉक्टरनी कहलाती है । तो तुम महाशक्ति के साथ जुड़कर क्यों रोते चिल्लाते हो । मेरे प्यारे उठो हिम्मत करो कर लो दुनिया मुठ्ठी में।
तुम न घबराओ ,
न आंसू बहाओं ।
कोई हो ना हो,
परंतु मैं तुम्हारा हूं।।
तुम्हें प्रेम के गीत,
हंस हंस के सुनाऊंगा ।
तुम्हारे मोतियों के आंसू,
अपने आंचल से पोछूगा।।
बहुत भटक चुके,
अब भटकने न दूंगा ।
निज स्नेह से भर ,
तुम्हें आंखों में बसा लूंगा।।
फूलों की सुगंध बनकर,
तेरे जीवन को महकाऊंगा।दीपक की बाती बन,
तेरे ह्रदय दीप को जलाऊंगा।। तुम ना घबराओ ना …..
प्रभु के इस अनुशासन को हृदय में धारण कर हम सदा आगे बढ़ते जाएं।
मेरी डायरी से: भाग – ६
आज अनुभव करते हैं कि हमारे बहुत से कार्य स्पष्ट रणनीति नहीं बनी होने के कारण असफल हो जाते हैं । साथ ही जो कार्य हमें करना था उसे भुलाकर हम छोटे-मोटे खिलौनों से खेलने लग जाते हैं।
जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को भूलकर भटकनो में अटकना ही जीवन नहीं है । हमारे पास जीवन के प्रति स्पष्ट रणनीति होनी ही चाहिए । तभी हम सफल हो सकते हैं । नहीं तो बस भटकते ही रहे ।
कभी कुछ होने वाला नहीं है। हम दूसरों को खूब उपदेश देते फिरते हैं कि तुम ऐसा करो, वैसा करो परंतु उसे स्वयं जीवन में नहीं ढाल पाते हैं । दूसरों को सिखाने का मात्र एक ही तरीका है उसे स्वयं अपने जीवन में ढाले । बोले कम सुनें ज्यादा।।
यदि हम इन बातों को अपने जीवन में ढाल लेते हैं तो हम एक सफल इंसान बन सकते हैं। इन बातों को सफलता का मूल मंत्र मान लेना चाहिए।
मेरी डायरी से : भाग – ७
जिंदगी की नांव मनुष्य को कहां ले जाए कुछ कहा नहीं जा सकता । कभी-कभी मनुष्य सोचता कुछ है और उसके जीवन में होता कुछ है। उसे हम परिस्थिति या भाग्य कुछ भी कह सकते हैं । यदि हमारी सोची प्रत्येक बात पूर्ण होने लगे तो व्यक्ति के अंदर अक्रियाशीलता आ जाती है ।
कभी-कभी जब हम किसी वस्तु की चाहत करते हैं यदि वह हमें नहीं मिलती है तो दुख होते हैं । हम कभी यह नहीं सोचते कि प्रत्येक सुंदर वस्तु मेरे लिए ही नहीं है। फूलों की सुंदरता पेड़ों पर ही अच्छी लगती हैं । यह जरूरी नहीं कि उसे हम तोड़े ही । हम उसके सौन्दर्य को दूर से निहार कर भी आनंद ले सकते हैं ।
संपूर्ण प्रकृति आनंद से परिपूर्ण है । बस यह है कि हमें आनंद लेने की कला आनी चाहिए। आनंद के लिए यह जरूरी नहीं कि हम पहाड़ों पर जाएं । नदियों के किनारे जाएं ।
आनंद तो हमारे प्रत्येक स्वास में झलकनी चाहिए । मेरा चलना, उठना, बैठना, बोलना सभी आनंदमय हो । हम चले तो मदमस्त हाथी की तरह जो संसार को भूल आपने आनंद में चला जा रहा है । आनंद तो हम बच्चों के साथ लिया जा सकता है जो कि उनकी प्रत्येक मुस्कान से आनंद झलकती हैं।
जिनकी हर पुल्कन हर श्वास में आनंद ही आनंद झलकता हो । ऐसे बच्चों के साथ खेलते हुए अपने को भूल जाए । सब कुछ उन्हीं में डूबा दे। सामान्य मानव सुख दुख के थपेड़ों में जीता है।
यदि उसे कहीं से कुछ मिल गया तो खुशी से झूम जाता है। यदि किसी ने उसे नाराज कर दिया तो जैसे उसके ऊपर पहाड़ ही टूट गया हो । परंतु महापुरुष सदा सुख दुख से परे आनंद की दुनिया में मस्त रहते हैं।
ना उन्हें सुख में ज्यादा मग्न रहते हैं ना दुख में ज़्यादा हाय तौबा मचाते है । जो जीवन चल रहा है उसे वह बहुत सहज रूप में लेते हैं। अतः हमें जीवन को सहज रूप में लेकर हर छण प्रसन्न रहने का प्रयास करना चाहिए।
गुरुवार ने जिसे जीवन रज से सींचा ,
ऐसा प्यार शांति कुंज धाम हैं भैया ।
गुरुवर की प्राण चेतना,
यहां कण कण में समाई हुईं हैं।
उसी प्राण चेतना का प्रसाद पाकर ,
साधक धन्य समझते हैं।
मां की ममता की छाव यहां,
हर पल लुटाई जाती है।
जो लूट सके तो लूट ले बंदे,
ना लूट सका तो पछतायेगा। ।
किन शब्दों में गांऊ मैं ,
गुरुवर के जीवन की गाथाएं।
जो सृष्टि के चराचर में हुआ समाहित ,
ऐसे सूरज को किन शब्दों में बांधू। ।
मेरी डायरी से : भाग – ८
आज श्रीमती सुनीता दीदी ने प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रेम सदा देते रहने का नाम है। प्रेम तो वह है जो सदा देता है ।प्रेम में कोई चाहत नहीं होती । प्रेम में कोई सौदा नहीं होता। इच्छा आकांक्षा रहित होता है। प्रेमी तो दाता होता है । वह तो अपने इष्ट आराध्य प्रेमिका को सर्वश्व सौंप देता है । अब कोई चाहत नहीं रह गई ।
दीदी ने कहा -” बेटा ! क्या तुम ऐसा प्रेम कर पाओगे ! तो मैं जो चीज( साथी )अच्छी लगती हो जरूरी नहीं कि तुम्हारे लिए ही बनी हो। तुम उसके शरीर से क्यों प्रेम करते हो ? चमड़ी में क्या रखा है ? उसकी आत्मा से प्रेम करो ? बेटा यदि फूल खिला हुआ है तो तुम क्यों तोड़ लेना चाहते हो ?
यदि तुम किसी को चाहते हो प्रेम करते हो तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है ?प्रेम तो परमात्मा का दूसरा रूप है ! पहले हम बच्चों से प्रेम करते हैं फिर किसी स्त्री से , यही प्रेम प्रगाढ़ होकर एक दिन हम परमात्मा से प्रेम करने लगते हैं। यह एक शुभ लक्षण है कि तुम्हारे अंदर प्रेम फूटा । तुम इसे शाश्वत बनाए रखो । परंतु अभी तुम इस योग्य नहीं हो कि तुम उसे पा सको। चुंबक बनो , अपनी योग्यता में निखार लाओ ।
सोचो! किन कारणों से जो चीज हम चाहते हैं वह हमारी क्या कमजोरी मजबूरियां हैं जिसके कारण हमें नहीं मिल पा रहे हैं ? तुम अपनी शक्ति को पहचानो । जब हम कोई श्रेष्ठ कर्म करते हैं तो इंद्रियां हमें विचलित करती हैं । तुम इन इंद्रियों के गुलाम मत बनो ।
विचार करो आज जो चीज तुमसे दूर भागती हैं हो सकता है चार-पांच वर्षों में तुम्हारे पास आ जाएं । अपनी जड़ों को मजबूत करो । जिस प्रकार से पेड़ ऊपर की ओर लहराता रहता है परंतु उतनी ही नीचे उसकी जड़े जाती है । यदि जीवन की जड़े मजबूत नहीं होगी तो तुम भी उन पेड़ों की तरह जो सामान्य आंधी के झोंके से उखाड़ कर फेंक दिए जाते हैं । उसी प्रकार से फेंक दिए जाओगे।
इसलिए बेटा मैं तो यही कहूंगी कि तू अपना संपूर्ण ज्ञान अपने करियर में लगाओ।। तुममें अनेकों अच्छे गुण है । तुम उस ऊर्जा को सृजनात्मक कार्यों में लगाओ । कुछ ऐसा कार्य करो कि लोग तुम्हारा नाम याद रखें। लोग आते हैं चले जाते हैं बस व्यक्ति के श्रेष्ठ कर्म ही याद आते हैं ।
अंत में दीदी ने कहा-” तुम जिसे चाहते हो उसके सदा अच्छाई के लिए प्रार्थना करो। उसकी हर उन्नति को अपनी उन्नति समझो। उसके आत्मा से प्रस्फुटित आनंद से प्रेम करो । क्या तुम ऐसा प्रेम कर सकते हो? आज का तुम्हारा प्रेम प्रेम नहीं एक वासना हैं। इंद्री का आकर्षण है । जो किसी भी तरह से उसे पा लेना चाहता है । तुम्हें अभी कुछ नहीं सूझ रहा है । बस वही आकर्षणों में मोहित हुए हों ।
यह लेनदेन का प्रेम प्रेम नहीं एक व्यापार है ।समझो बेटा। ।” आगे दीदी ने कैंसर रोगियों के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि सोचो उनके बारे में जो की दवा नहीं कर सकते हैं। जो सक्षम हैं मैं उनकी बात नहीं कह रही हूं ।लेकिन जो असहाय हैं गरीब हैं वे तो मात्र नाम सुनते ही उनका जीवन समाप्त हो जाता है ।
क्या हम उनके लिए कुछ नहीं कर सकते । अभी तो तुम्हारी उम्र ही कितनी है बेटा ! अभी तो जीवन का बसंत खिल रहा है । अभी तो तुम बहुत कुछ कर सकते हो। जाओ तुम्हें जब कोई तकलीफ परेशानी हो मेरी याद आए फिर आ जाना।
दीदी से की गई चर्चाओं को जब अभय भाई से कहा तो अभय ने कहा कि आज प्रेम भी वेश्या की तरह हो गया है जो कि सौदा करती है । हम कुछ छण उसके साथ बिताएं पैसे दिए चलते बने। प्रेम का पुष्प तो जीवंत है । जो साथ-साथ चलने का नाम है। परंतु तुम्हारे लिए प्रेम त्याग का नाम है। सर्वस्व प्रेमी के लिए त्याग का नाम ही प्रेम है। प्रेमी जिस बाद में खुश हो उसके लिए सर्वस्व त्याग देना ही प्रेम है।
आज मैं सोचने लगा कि दीदी ने जैसा कहा कि क्या तुम ऐसा प्रेम कर सकते हो ? मैं इसी उधेड़ बुन में फंसा रहा। क्या मैं कर सकता हूं ऐसा अलौकिक प्रेम। जिसमें मेरी प्रेमी प्रेमिका से कुछ भी नहीं चाहिए सिर्फ दाता ही दाता का भाव रहे । चाहत का भाव मिट जाए ।
वास्तव में प्रेम को परिभाषित नहीं किया जा सकता है । प्रेम तो एक प्रवाहित नदी की तरह है जो हर क्षण बह रहा है । इस तरह हमारा जीवन भी जिसमें ऐसे प्रेम पुष्प खिलाए जो हर क्षण खिलखिलाते रहे, मुस्कुराते रहें।
मेरी डायरी से : भाग – ९
हमारे कक्षा के साथी अभय ने कहा कि व्यक्ति जब अकेला होता है तो वह जीवन के नए आयाम के बारे में सोचता हैं । सामान्य रूप से व्यक्ति किन्हीं न किन्हीं उलझावों में फंसा रहता है। परंतु जब वह अकेला होता है तो सोचता है — जीवन क्या है? हमने जीवन में क्या क्या किया? एक तरह का आत्म विश्लेषण करता है ।
अकेला रहना भी एक कला है । जो इस कला को सीख लेता है वह कहीं भी रह सकता है। महान आत्माओं एवं सामान्य व्यक्ति में यही अंतर होते हैं कि सामान्य मनुष्य अकेले से घबराता है डरता है जबकि महापुरुष अकेले वीरान में कुछ नया चीज खोजते हैं ।
जीवन के रहस्य व्यक्ति को अकेले में अंतर मन होकर ही पाई जा सकती हैं ।यदि हमें जीवन में उन्नति करनी है तो हमें इस कला का विकास करना पड़ेगा । हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सोमवार को मौन व्रत रखते थे । जिससे वह अपने जीवन के बारे में चिंतन कर सके। मौन को वे जीवन का एक अंग मानते थे ।
वैज्ञानिक हो , कवि हो , कलाकार हो, आध्यात्मिक पुरुष सभी को मौन में अकेले में अनवरत साधना करते हुए वह कलाकार की तूलिका हो सकती हैं । या कवि की कलम, या वैज्ञानिक की खोज, सभी कार्य एकांत मांगते हैं । सृजनात्मक का विकास भी एकांत एवं मौन के अभ्यास से ही पाई जा सकती है। अतः हमें जीवन में विकास व उन्नति के शिखर पर पहुंचाने हेतु एकांत एवं मौन का अभ्यास करना चाहिए।
कैसे करें अभ्यास?
१- इसके लिए आप कभी-कभी नदियों के किनारे जाकर बहाव को निहारें , अनुभव करें कि क्या मेरा जीवन इन नदियों की तरह नहीं बहा जा रहा है । आत्म विश्लेषण करें । जीवन चलने का नाम है । हमें नदियों जैसे बनना चाहिए । ऐसा अनुभव करें।
२- अकेले कमरे में शांति चित् बैठ जाएं । लेटना चाहे तो लेट जाएं या आराम कुर्सी पर ही बैठे रहे । आने वाले स्वास् पर ध्यान दें कि जो श्वास सतत चल रहीं हैं बिना रुके यदि कुछ क्षण रुक जाए तो जीवन समाप्त हो जाएगा । क्या हमने कभी उनके बारे में सोचा है ? कल्पना करें कि एक व्यक्ति मृत्यु सैया पर लेटा हुआ है । उसकी पत्नी बच्चे सभी घेरे हुए हैं । डॉक्टरों की टीम उसे बचाने में लगी है । क्या जिस धन दौलत के लिए अपने जीवन को खत्म किया उसे कुछ क्षण के लिए नहीं बचा सकते? कल्पना करें कि हमारे जीवन में धन दौलत की ज्यादा कीमत है या जीवन के स्वांस की।
३- जब हम किसी चीज को चाहते हैं नहीं मिलती है तो थक जाते हैं हम संसार से टूट जाते हैं, निराश हो जाते हैं । हमें अच्छा बुरा कुछ भी नहीं सूझता है । उस समय हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है । शांत चित्त होकर आप इन प्रतिक्रियाओं को देखते रहे । उस समय कैसा लग रहा है? अनुभव करें चाहे तो आप उन्हें किसी डायरी में लिख भी सकते हैं।
इन अभ्यासों से आप देखेंगे कि आपके अंदर से आनंद का स्रोत उभर रहा है , जो हमें हर परिस्थित में समभाव से जीना सिखाता है।
मेरी डायरी से भाग -१०
शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आता है। हमारे शास्त्रों में शिक्षा से हीन व्यक्ति को पशु की संज्ञा दी गई है । क्या हमारे वर्तमान की शिक्षण प्रक्रिया व्यक्तित्व के विकास में सहायक है यह एक विचारणीय प्रश्न है? जब हम वर्तमान शिक्षा पद्धति पर नजर डालते हैं तो दूर-दूर तक नहीं कुछ सूझता है ।
आज देखे तो शिक्षा का व्यावसायीकरण हो चुका है। जिस प्रकार से वैश्य दुकान से वस्तुएं बेचता है और उसका मूल्य लेता है उसी प्रकार से शिक्षक ज्ञान बेचता है और उसका मूल्य लेता है ।
बच्चों से उनका कोई विशेष लगाव नहीं रह गया है। जो हमारी प्राचीन काल में गुरु शिष्य परंपरा थी गुरु का शिष्य के प्रति प्रेम छलकता था कि किस प्रकार से शिष्य का विकास हो वह उन्नति के शिखर पर हों । गुरु ही बच्चों के मां पिता भी होते थे जो मां जैसी ममता की छाव देते थे । तो पिता जैसा स्नेह भी ।
गुरु शिष्य दोनों आनंद पूर्ण रहते थे । परंतु आज की शिक्षा वेश्या की शिक्षा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ।।वेश्या भी वैश्य का विकृत रूप है। जो कि अपने ग्राहकों को खुश कर पैसे लेती है फिर उसका उससे कोई लगाव नहीं रह जाता है। उसी प्रकार की हमारी वर्तमान की शिक्षा पद्धति हो गई है।
कुछ अध्यापक बंधु शिकायत करते हैं कि बच्चे हमारी बातें नहीं मानते। उन्हें कहता हूं कि आखिर क्यों माने आपकी बात? आखिर आपने उन्हें दिया ही क्या है ? क्या आपने कभी बच्चों से प्रेम से यह कहा कि आप लोगों को जो हमसे कभी भी पूछ सकते हैं ।
आपने जो कुछ अलग से पढ़ाया ट्यूशन के रूप में उसकी फीस भी वसूली। क्या कभी आप बच्चों के घर उनके अभिभावक से मिलने गए? क्या आप उनको फिक्र करते हैं ? बच्चा क्या कर रहा है उसे कोई विषय नहीं आता है तो क्यों ?
जब बच्चों को लगेगा कि आप उससे प्रेम करते हैं तो क्यों नहीं मानेगा । बच्चे तो प्रेम के अवतार होते ही हैं । जब उन्हें लगता ही नहीं है तो वह मानने से आपकी बात रहे । वह तो सोचते हैं गुरुजी यदि मुझे अलग से पढ़ाते हैं तो उसकी भी फीस लेते हैं तो मानने से रहे।
बच्चों एवं शिक्षकों के बीच की दूरियां मिटाने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं —
१- बच्चों में अपनत्व का भाव पैदा करें।
२- साप्ताहिक या मासिक उनके घर जाकर उनके शिक्षा के बारे में अभिभावकों से विचार विमर्श करें । जिस क्षेत्र में बच्चा कमजोर हो प्रेम से उसे दिशा निर्देशित करें।
३- कक्षा में बच्चों को ट्यूशन न पढ़ाए ।ट्यूशन पढ़ाने वाला अध्यापक एक तरह से बच्चों का गद्दार होता है । यदि वह मन से क्लास में पढ़ा दे तो ट्यूशन की क्या जरूरत है?
४- बच्चा क्या चाहता है इस बात को जानने का प्रयास करें न कि आप अपनी बात ही ऊपर रखें।( अधिकांश में क्या होता हैं कि अध्यापक अपनी बातों के आगे बच्चों की सुनते ही नहीं कि बच्चा क्या चाहते हो उसकी क्या इच्छा है )
५- बच्चों की रुचियां को जान उसको उभारने का प्रयास करें ।
६- यदि बच्चा किसी विषय में कमजोर है तो उसे समझें कि बच्चा क्यों उन विषयों में कमजोर है । उन परिस्थितियों पर ध्यान दे ना कि बच्चों को डांटे, धमकाएं।
( जैसे बच्चों के माता-पिता रोज लड़ते झगड़ते रहते हों , या बच्चा बहुत गुस्सैल हो, एवं रोज बिना भोजन किये स्कूल आ जाता हो या रास्ते में लड़का झगड़ता हो आदि कारण भी बच्चों में विषय को समझने में परेशानी होती है। )
७- योगाभ्यास के माध्यम से–
देखा गया है कि जो बच्चे बहुत ही दब्बू प्रकृति के होते हैं किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करते ऐसे बच्चों को सिंहासन, महामृत्युंजय जाप, योग निद्रा आदि के अभ्यासों के माध्यम से उनके भय को भगाया जा सकता है।
बच्चों में नियमित रूप से सूर्य नमस्कार , नाड़ी शोधन प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम, ध्यान आदि के माध्यम से उनके व्यक्तित्व में परिवर्तन किया जा सकते हैं । योग अपने आप में संपूर्ण जीवन प्रक्रिया है हमें आज उसे समझना होगा।
मेरी डायरी से : भाग -११
आज अमृतलाल गुरु जी ने कहा कि अध्यात्म के मार्ग से जब तुम्हें दुत्कार मिले , तुम्हें सभी से घृणा मिले , जिसे तुम प्रेम करोगे तुमसे दूर भागे तो सोचो कि तुम अध्यात्म के मार्ग में आगे बढ़ रहे हो। जब लोग तुम्हारी वाहवाही करें तो तुम समझो मार्ग में बाधाएं हैं । जबकि भौतिक जीवन में इसका उल्टा होता है।
तुम्हारा यह शुभ लक्षण है कि तुम किसी को चाहते हो और वह तुम्हें नहीं चाहता । इससे तुम अपने को प्रखर बना सकते हो। दुनिया में जितने भी महान आत्माएं हुईं हैं जब उन्हें दुनिया में प्रेम से निराशा हुई तो उन्होंने जीवन उद्देश्य के बारे में सोचें कि क्या हम इन्हीं के लिए जन्म लिए है ? या हमारे जीवन का उद्देश्य और है? हम अपने अमूल्य जीवन संपदा को किस तरह से अब तक गंवाता आ रहा हूं।
आगे सर ने कहा कि इसमें ऐसी कोई बात नहीं है। प्रेम पुष्प तो खिलते रहते हैं परंतु किसी के लिए मधुमासी बसंत बन जाती है और किसी के लिए कांटों का ताज । और तुम्हें यदि कांटों का ताज मिला है तो अपनी मुमताज को पाने हेतु प्रचंड पुरुषार्थ करो कि दुनिया तुम्हारे पीछे-पीछे चली आए । तुम किसी के पीछे-पीछे मत भागो।
हे बालक ! चुंबक बानो चुंबक! जिससे तुम दुनिया को खींच लो। आज लोग प्रेम को नहीं समझ पाते हैं । प्रेम की व्याख्या नहीं की जा सकतीं हैं।प्रेम जो शाश्वत सनातन है । ईश्वर का प्रतिरूप है । उसकी हम क्या व्याख्या कर सकते हैं ? तुम इसके पीछे क्यों परेशान हो कि तुम किसी से प्रेम करते हो वह तुम्हें नहीं चाहता। इसमें चाहने ना चाहने की कोई बात ही क्या? तुम कैसे नाप सकते हो इसे ? हो सकता है साथी उसे प्रदर्शित न करता हो और मन ही मन चाहता हो।
जब मैंने कहा कि क्या किसी की चाहत को नहीं बदला जा सकता?
तो सर ने कहा-” क्यों तुम किसी को गुलाम बनाना चाहते हो? क्या इतना पर्याप्त नहीं है प्रेम करते रहो उसके लिए सदा उसकी भलाई की बात सोचो। प्रेम से जब भगवान भक्त के वश में हो जाते हैं यह तो मानवी प्रेम है । अपने प्रेम को तुम और प्रगाढ़ बनाओं । डूबों गहरे तभी मोती मिलेंगे। मोती समुद्र में तैरा नहीं करते । यह तो गहरे डूबकी लगाने से ही मिल सकता है।
तुम अपनी ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाओं । बालक तुम जो चाहोगे वह मिलेंगे। तुम क्या नहीं कर सकते । जो तुममें गुण है वह कहां सभी में है। सभी मनुष्य किसी न किसी विशेष उद्देश्यों के लिए ही आता है। तुम अपने उद्देश्यों को समझो और जीवन पथ पर आगे बढ़ते जाओ। सफलताएं तुम्हारा इंतजार कर रही हैं । क्या तुम बच्चों से प्रेम करते हो बच्चे नहीं करते हैं? संसार को प्रेम मय कर दो ।
तुमसे कोई एक नहीं प्रेम करता तुम समस्त संसार मैं प्रेम लुटा दो । चहु ओर प्रेम की बरसात करो । कोई लूट सके तो लूट ले। जाओ हंसो खेलो आनंद मनाओ। ज्यादा सोच विचार मत करो। अनुभव करो कि गुरु जी हमारे लिए इससे भी अच्छा कुछ चाहते हैं । जिससे तुम्हें दूर कर रहे हो ।
किसी भी घटना के कई कारण होते हैं। हमें उन कारणों के बारे में सोचना चाहिए। गुरुजी करता है अच्छा ही करता है। हमें गुरु पर पूर्ण श्रद्धा विश्वास के साथ कि गुरुजी हम तुम्हारे हवाले सब छोड़ दिया अब तुम्हीं राह बताओ गुरुवर ।
एक बात समझो जब व्यक्ति का संसार में कोई नहीं होता उस समय भगवान या गुरु होता है जो उसकी सदा रक्षा करता है। सब कुछ गुरु पर छोड़ उन्मुक्त पंछी की तरह विचरण करना चाहिएं ।।
अमृतसर को देखकर यह लगता है कि वह सच्चे पद्दर्शक गुरु हैं। जिसे हम अपने जीवन की हर बात को उनसे कह सकते हैं । जिसका वें उचित मार्गदर्शन करते हैं । आज के युग में ऐसे गुरु बहुत कम मिलते हैं जिससे अपने हृदय पट खोल सके। अपने को खाली कर सके ।
जब व्यक्ति खाली होगा तभी उसमें कुछ भरा जा सकता है । जो स्वयं भरा हुआ है उसमें क्या भरा जा सकता है । ऐसे आदर्श गुरु के चरणों में मैं शत-शत प्रणाम करता हूं।
मेरी डायरी से : भाग -१२
जीवन से व्यक्ति जब निराश या हताश होता है तो ऐसे छणों में वह एक ऐसे साथी को चाहता है जो उसका दुख दर्द सुन उसकी निराशा से उभरने के मार्ग बताएं। ऐसे क्षणों में जब व्यक्ति को कोई साथी नहीं मिल पाता तो उसे कुंठाए घेरने लगती हैं । जो अंततः बहुत घातक होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में अकेला-अकेला रहता है।
उसे जैसे आदमी काटते हो । ऐसा अनुभव करता है कि मुझे कोई प्रेम नहीं करता मुझे कोई नहीं चाहता। जीवन सफर में हम अकेले रह गया हूं। तब मुझसे घृणा करते हैं। यह भाव ही व्यक्ति की कुंठा बन जाती है। अंततः आत्महत्या का कारण होती है।
आए दिन आज आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। हम जितने सभ्य होते जा रहे हैं समस्याएं उतनी ही बिकराल रूप धारण कर रही हैं। अब इसे आधुनिक सभ्यता की महामारी की संज्ञा दे सकते हैं । अभी कुछ दिनों पहले जापान जैसे समृद्ध देश में 23000 व्यक्तियों के सामूहिक आत्महत्या की खबर छपी थी।
अब व्यक्ति को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि समृद्धि ही सुख का कारण नहीं है। सुख तो व्यक्ति के अंतःकरण की बात है । एक फुटपाथ पर सोने वाला व्यक्ति सुखी हो सकता है यदि वह अपने जीवन से संतुष्ट है। जबकि एक महलों में रहने वाला व्यक्ति निराशा दुखी हो सकता है यदि उसे आत्म संतुष्टि नहीं है तो।
सुख की परिमाप हम किस आधार पर करें यह एक विचारणीय प्रश्न है? क्या धन, दौलत ,मोटर गाड़ी , बंगले जेवरातों से भरा पूरा परिवार सुखी अनुभव करता है । इस बात पर एक अमेरिकी संस्थान का विश्लेषण देखे तो गलत होगा। सर्वेक्षण में पाया गया है की समृद्धि के शिखर पर बैठा मानव दुखित है । जबकि अभाव में जीवन बिताता एक फुटपाथ पर का व्यक्ति अपने को ज्यादा संतुष्ट महसूस करता है।
भारतीय संस्कृति में संतोषी व्यक्ति को परम सुखी बताया गया है । संतोषी व्यक्ति निठल्ले नहीं होता बल्कि वह अपने कर्तव्य पथ पर चलते हुए कर्म को प्रभु चरणों में अर्पित कर देता है । मानव जीवन में कर्म आवश्यक है । बिना कर्म किए मनुष्य नहीं रह सकता तो क्यों न वह श्रेष्ठ कर्म करें।
ऐसा व्यक्ति पूर्ण कर्मठता लगन के साथ कर्म करता है । परंतु उन में आसक्त नहीं होता है । कर्मों के प्रति आसक्ति का यह भाव ही दुखो का मूल कारण है।
अतः समृद्धि के शिखर पर बैठी पश्चिमी सभ्यता को भारतीयों से यह सीखना चाहिए की मात्र ऐश्वर्य के साधन ही सुख के कारण नहीं है । बल्कि उनमें गीता के अनाशक्ति कर्म को अपनाना होगा तभी जीवन में सुख की अनुभूति हो सकती है।
मेरी डायरी से : भाग -१३
मानव जीवन के दो पहलू हैं- एक भौतिक, दूसरा आध्यात्मिक। भौतिक रूप से मानवीय बुद्धि कार्य करती है। आज का युग बौद्धिक रूप से समृद्ध का काल कहा जा सकता है । जिसमें व्यक्ति प्रत्येक कार्य को इससे हमें क्या लाभ मिलेगा इस प्रकार की कामना के बंसी भूत होकर किया करता है ।
ऐसे व्यक्ति को कर्म की नहीं पहले फल की चिंता सताती है । कर्तव्य गौर हो जाते हैं। यही कारण है कि आज कोई भी सरकारी कार्य ठीक प्रकार से संचालित नहीं हो पा रहे हैं । लूटखोरी , घूसखोरी की प्रवृत्ति ने देश का सत्यानाश करके रख दिया है । आज कम ही ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो कि अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहते हो।
काम चोरी की प्रवृत्ति देश के प्रति गद्दारी है । यह तो हुई सरकारी तबके की । सामान्य जन में भी आज काम चोरी की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । जिससे देश की स्थिति बद से बद्तर होती जा रही है । यदि इसका सार्थक समाधान नहीं खोजा गया तो अन्य देशों की अपेक्षा हम गर्त में धकेल दिए जाएंगे।
यदि देखा जाए तो इसका समाधान अध्यात्म में मिलेगा। जो की भावनाओं संवेदनाओं का विज्ञान है । भावनाशील व्यक्ति सभी में इस प्रभु की छवि निहारता है। इसमें बुद्धि नहीं चल सकती है ।
लेकिन एक संतुलित व्यक्तित्व विकास हेतु हमें भौतिक एवं भावनात्मक रूप से परिष्कृत जीवन शैली की आवश्यकता है। जिसमें ना तो बौद्धिक रूप से इतना प्रखर हो कि किसी दुखियारे के दुख को देख उसका ह्रदय ही सूख जाए और ना भावनाओं में इतना बह ही जाए कि सही गलत का ध्यान ही ना रहे।
मेरी डायरी से : भाग -१४
जीवन में फक्कड़पन को बहुत से व्यक्ति की कमजोरी समझते हैं। तुरंत देखा गया है की फक्कड़पन अंतःकरण से उपजी संवेदना होती है जो किसी पीड़ित आत्मा को देखकर कराह उठती है एवं जब तक उसकी सेवा द्वारा दुख दूर नहीं करते उन्हें चैन नहीं पड़ता ।
यह सत्य है कि ऐसे व्यक्तियों के पास अपना कुछ भी नहीं होता है । उसे जो कुछ मिलता है अपने लिए थोड़ा निकाल पूर्ण रूप से लौटाकर खाली हो जाता है। ऐसे लोगों को कल क्या होगा इसकी कोई विशेष चिंता नहीं होती है। इन फक्कड़ मसीहों में निराला जी का नाम प्रमुख है ।
जिन्होंने अपना कोई घर नहीं बनाया। प्रकृति ही जिनका ठाव थी। एक घटना है कि एक बार कई दिनों से भूखे निराला जी प्रयाग की गलियों में जा रहे थे । सोचा पुस्तक की रॉयल्टी लेते चलता हूं। जिससे कुछ दिनों तक भूख मिट सके। उन्हें 124 रुपए रॉयल्टी को मिले।
उसे लेकर रिश्ते से महादेवा वर्मा के घर की ओर जाने लगे तो कोई बूढी मां आवाज देती है । आवाज को सुन रिक्शा मोड़ देते हैं। बूढी मां गिड़गिड़ाने लगती है। उसके दुख को सुन पूरे पैसे निराला जी उसे देकर खाली हाथ महादेवी के घर जाते हैं । रिक्शे का किराया श्रीमती वर्मा चुकाती है। ऐसे होते हैं फक्कड़ मसीहा।
मेरी डायरी से : भाग -१५
कहते हैं प्रेम से पत्थर भी पिघल जाया करते हैं। प्रेम तो वह सक्ती है जिससे समस्त चराचर जगत को वश में किया जा सकता है। क्या पशु, क्या पक्षी ,सारा जग बस प्रेम का दीवाना है ।
प्रेम की मस्ती जब चढ़ती है उसे संसार के सारे वैभव फ़ीके मालूम पड़ने लगते हैं । मीरा के प्रेम के आगे गिरधर गोपाल को भी नाचना पड़ा । यह प्रेम भाव ही है जो भगवान भक्त के बस में हो जाया करते हैं।
आज सायं काल मजदूर भाइयों के घर गया। बच्चों के साथ भोजन किया । सभी बच्चों को एक साथ बैठाकर भोजन कराते वक्त असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी। प्रेम की ऐसी वर्षा हो रही थी उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता । मनुष्य कोई भी हो सभी प्रेम के भूखे हैं।
उन्हें हम छोटा समझ कर दूर कर देते हैं परंतु कभी हमने उनके दुख दर्द को जानने का प्रयास नहीं किया । यह भी हमारे अपने ही अंग अवयव हैं ।
उनकी भी कुछ आकांक्षा होगी । जिसकी वह चाहत करते होंगे। यह भी समाज से जुड़ने के आकांक्षी हैं। लेकिन सदा से हमारे अंदर की जाति पाति की भावना ने हमें दूर किए हुए हैं ।
सोच जिस बच्चे को जन्म से ही ऐसे माहौल में पाला गया होगा उसके जीवन का विकास किस प्रकार हो सकता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है ।
मेरी डायरी से : भाग – १६
एक सेठ जी थे । उनके चंद्रसेन नाम का एकलौता बेटा था। सेठ जी का जीवन सादगीपूर्ण था। गरीबों हेतु वे लंगर चलाते थें । जिससे हजारों असहायों के छुदा की पूर्ति हुआ करती थी। कभी-कभी बेटे को भी साथ ले जाया करते थे और उसे दान धर्म की बात बता अपने को धर्मात्मा सिद्ध करने का प्रयास करते।
उसी शहर में संजीव नाम के फक्कड़ पत्रकार रहता था। बड़े बाल, संजीला चेहरा ,गठीला बदन, आंखों में उसके तेज चमकता था। वह जिससे भी मिलता अपना बना लेता ।
लेखन से जो कुछ पैसे मिलते वह उसे उसी दिन बच्चों की पार्टी मना कर खर्च कर देता था। उसी के पास सेठ जी का लड़का पढ़ने जाया करता था । धीरे-धीरे गाड़ी आत्मीयता होने लगी । लड़का संजीव का प्रमुख प्रशंसक बन गया। अक्सर अपने पिता से अपने गुरु जी की चर्चाएं किया करता।
एक दिन संजीव के पास खाने को कुछ नहीं था तो वह देखा कि कुछ मैले फटे कपड़ों में लाइन में लोग लगे हैं। वह भी लग गया। सेठ जी ने मजदूरों के साथ संजीदा जवान को लाइन में लगे देखा परंतु बोले कुछ नहीं ।
इस तरह से कई दिनों तक वह लाइन में भोजन प्राप्त कर संतुष्ट होता रहा। एक दिन लड़के ने हाथ पकड़ लिया कि गुरु जी आपको आज मेरे घर चलना है । तो वह सफेद कुर्ता धोती पहन कर तैयार होकर लड़के के घर गया ।
। सेठ जी ने लाइन में लगे लड़के को देखकर बोले -” मैंने कहीं आपको देखा है “
‘देखे होंगे ‘- संजीव ने कहा और वह नास्ता करने लगा ।
सेठ जी विशेष आभार जता कर बताना चाह रहें थे कि मैं बहुत बड़ा दानदाता हूं। संजीव ने कहा -” देखो सेठ जी ! आप समझते हैं कि आप बहुत बड़े दानी हो । यह पैसा जो तुम दान कर रहे हो ना यह उन करोड़ों असहयों के रक्त को चूस कर पैदा किया है ।
तुम्हें तो उन मजदूरों पर गर्व करना चाहिए जिन्होंने तुम्हारे भोजन को खाकर तुम्हारे कष्टों को ही कम किया है। तुम लाखों की मिलावट कर कुछ दान कर बहुत बड़े दानी बनते हो । याद रखना इससे किसी के कर्म नहीं कट जाते। कुछ कम जरूर हो जातें हैं। तुम्हें तो अपने कर्मों को भोगना ही पड़ेगा । “
इतना कहकर संजीव हाथ धोकर चला जाता है।
आज सेठ जी की तरह हजारों व्यापारी असहयों के रक्त चूस कर थाट से रहते हैं । अपने को कुछ दान पुण्य कर बड़े धर्मात्मा कहलाते हैं। ऐसे ही बड़े-बड़े मठों को में पैसे देकर निठल्ले साधुओं की फौज तैयार करते हैं।
जिनका समाज में कोई योगदान नहीं होता। हमें आज जन जागृति लाकर ऐसे सेठों एवं धर्मात्माओं की अपेक्षा करनी चाहिए । जिससे वह अपनी शक्ति को श्रेष्ठ कार्यों में नियोजित कर सकें।
मेरी डायरी से : भाग -१७
मानव जीवन के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है जीवन एक ऐसी दुधारी तलवार की तरह है जो हमेशा जग रहना सिखाती है सजकता ही जीवन जीने का विज्ञान है सजक रूप में किया गया प्रत्येक कार्य पूर्ण होता है ।
भोजन करते हुए यदि सजग नहीं है तो भोजन अधिक खा जाएंगे आज व्यक्त तनाव चिंता है तो ज्यादा खा जाता है जिससे अपच कभी गैस के साथ ही साथ उसके विचारों में भी प्रदूषण आ जाता है रास्ते चलते यदि सजग नहीं है तो ठोकर रख सकती है ।
आज दुर्घटना के प्रमुख कर्म में एक यह भी है कि जब व्यक्ति को तनाव की स्थिति में रोड पर करता है तो वह अपने विचारों में डूबा रहता है जिससे दुर्घटना घट जाती है।
इसी प्रकार जीवन के प्रत्येक पहलू पर विचार किया जा सकता है फिर विद्यार्थी सजग रूप से अध्ययन ना करें तो असफल हो सकता है आज लोगों की भूलने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है इसके लिए यह जरूरी है कि वह जो भी कार्य करें पूर्ण मन स्थिति के साथ सजकता पूर्ण वर्क करें जीवन में सफलता सजाता पूर्वक कार्य करने पर ही मिल सकती है ।
योग विज्ञान हमें कर कर से जुड़ना सीखना है जीव जंतु क्या कंकर पत्थरों से भी हम जोड़ने का प्रयास करें तो फल चले आ सकती है अतः जीवन में उन्नति हेतु प्रतिकर को सजकता पूर्वक करें यही ऋषियों की प्रेरणा है।
मेरी डायरी से : भाग- १८
आज प्रातः डॉक्टर साहब से मिलने पर जब वे उन्हें कविताएं दिखाई तो बोल अच्छी हैं परंतु गद्य टाइप की है थोड़ा गेलाओ मैं तुम्हें लिखना सिखा दूंगा डॉक्टर साहब का शासनकाल का हृदय में प्रसन्नता हुआ कि मेरा प्रयास सफल हुआ इसमें मेरा कुछ नहीं सब गुरुवार की प्रेरणा है वह चाहे जिसे जो कर ले हम तो बस उन्हें पत्तों का कह रही हूं।
उसके बाद बच्चों से मिलने गया बच्चे देख आनंद मग्न हो गए जब एक मजदूर को पढ़ने के लिए कहा तो बोल पड़ेगा तो भोजन कैसे करेगा परिस्थित की मार आदमी को क्या-क्या नहीं कर देती मनुष्य और कुछ नहीं बस पर स्थित का पुतला है परंतु इसके अपवाद भी हैं विकेट गरीबी में पहले लोग भी उन्नत के उच्च शिखर पर पहुंचे हैं ।
व्यक्तित्व प्रतिकूलता में ही निकलता है जब तक व्यक्ति के पास किसी चीज की कमी नहीं रहेगी तो क्या काम करेगा समझ में सामंजस होना बहुत ही आवश्यक है ।
एक और व्यक्ति के पास इतनी संपत्ति सुविधा है किवह का का खा खा कर मार रहा है वहीं दूसरी ओर लोगों को सूखी रोटी भी नहीं मिल रही है इसके लिए अमीरों के हृदय में घोड़ा का भाव जगाना होगा कि आज उनके पास जो कुछ भी है उनमें समाज की भी हिस्सेदारी है हमें किसी के अधिकार हक को हड़पने का कोई अधिकार नहीं है ऐसा भाव ही हमें सदा जीवन उच्च विचार की ओर अग्रसर करती है।
अगले क्रम में राम अवतार के घर नाश्ते पर गया जहां उनकी मम्मी ने बताया कि रास्ते में कहीं उतरना मत कोई कुछ भी खाना मत प्रेम से रहना सामान को ठीक से उपाय करना कहीं कुछ छूट न जाए जैसे ही दाएं दे दे सतत बह रहा है जीवन में व्यक्ति को संसार के सारे धन वैभव मिलने के बाद भी यदि उसे मां का प्यार ना मिले तो जीवन अधूरा ही रह जाएगा परंतु आज भौतिकता ने मां पुत्र के रिश्ते में भी दरार पड़ गई है ।
जिस व्यक्ति चिंता तनाव से ग्रसित हो गया है पूर्व में जब संयुक्त परिवार था दादा-दादी से भरा पूरा परिवार रहता था तो घर के बुजुर्ग समस्याओं को जीवन के अनुभवों से हल्का कर दिया करते थे आज परिवार टूट रहे हैं जिससे नितनेट नहीं समस्याएं पैदा हो रही हैं।
आगे एक माताजी के पेट में इतना दर्द हुआ कि वह लेट गई तो उनके पुत्र ने कंधे पर उठाकर पुणे हॉस्पिटल ले गया ऐसा होता है मां पुत्र प्रेम का प्रेम मां का आंचल कभी धूमिल नहीं होता या तो पुत्र है जो अनेकों दुर्भावनाएं पर लेटा है हमें हम रिश्तो की दीवारों को मजबूत करने होंगे इससे परिवार संस्था की गर्मी में बनी रह सके।
साइन कल गुर्जर डॉ मनीषा दीदी से मिला है और जीवन के बारे में बात करने लगे तो दीदी भाव बाइबल हो गई लगा जैसे सर इसमें आज ही उड़ेल देगी दीदी आज घंटे तक बैठी रह गई जबकि वह 1 मिनट भी अधिक नहीं रुकती थी जब मैं ने कहा दीदी चलना है आपको देर हो रहे थे दीदी बोल मैं तेरे ही बारे में सोच रही होगी क्योंकि कैसा होगा आगे बोली भैया हम क्या कर सकते कभी-कभी हमारी चाहते कहां पूरी होती है ।
ऐसे समय में क्या करना चाहिए ना कि सब कुछ उन्हें पर छोड़कर बस जो गुजर रहा है उसका अनुभव करना चाहिए कभी-कभी ऐसा होता है नारे जिन बातों को हम सोचते हैंवह हमारे अतः मन में बैठ जाती है जो उचित समय पर अपने आप हो जाती है तब हम सोचते हैं क्या रे यही तो हम चाहते थे यह अचानक कैसे हो गया आगे दीदी ने बताया कि तुम भैया से क्यों नहीं मिलते हुए मां की बातें जान लेते हैं ।
तेरे यह जो विचार आ रहे हैं यही आने लगे ना पहले तो नहीं आते थे ना हो सकता है ना भैया तू यही लेखन कार्य में लग जा लेखनी के माध्यम से हम समाज को नहीं दिशा दे सकते हैं गुरुवार के जीवन भर क्या किया लेखन ही तो लेखांकर उनके जीवन का एक अंग है मनुष्य के साथ क्या जाता है बस उसके अच्छे व्यवहार आचरण उसने समाज के लिए क्या दिया और सब यहीं छूट जाता है।
उन्होंने कहा कि कभी-कभी क्या होता है कि ना भैया हम एक दूसरे को चाहते हैं परम संकोच बस का नहीं पाते हो सकता है उसके मन में अच्छे विचारों परंतु कर ना पा रही है खैर कोई बात नहीं जो प्रभु चाहेंगे वह वैसा कर देंगे तू ज्यादा सोच विचार मत कर।
आज जब हम जीवन के बारे में सोचते हैं तो ऐसा लगता है कि प्रेम विश भी है और तो अमृत भी है वह हमारे ऊपर है कि उसे हम विश्व बनाते हैं या अमृत आज जितने भी महापुरुष हुए हैं वे सभी ट्रेन से फर्स्कृत लोग ही हुए हैं उन्होंने उसमें सकारात्मक बनाए रखें और उन्नत के शिखर पर पहुंच गए ।
जब व्यक्ति समाज देशकर से तिरस्कृत होता है तो उसकी अंतर शक्ति स्वाभिमान जगाता है और सोचता है कि आज भले ही तुझे हम नहीं पास सके परंतु मैं प्रबल पुरुषार्थ करूंगा और एक दिन वह सब पाऊंगा जो मैं चाहता हूं मैं आज से किसी के पीछे नहीं भागूंगा ना धन के ना पद के मैं ऐसा चुंबक बनेगा कि एक न एक दिन सारी चीज मेरे सामने आने लगेगी।
मैं ऐसा बट वृक्ष बनेगा कि सभी प्राणी उसमें सांस ले सके मैं अपने को निखारूंगा हर कार्य के प्रति सजग रहूंगा और तब तक चैन से नहीं बैठूंगा जब तक तुझे पानी के योग ना हो जाऊं मेरा तुझको सत सत प्रणाम है जिंदगी।
मेरी डायरी से : भाग -१७
मानव जीवन के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है। जीवन एक ऐसी दुधारी तलवार की तरह है जो हमेशा सजग रहना सिखाती है। सजगता ही जीवन जीने का विज्ञान है। सजग रूप में किया गया प्रत्येक कार्य पूर्ण होता है। भोजन करते हुए यदि सजग नहीं है तो भोजन अधिक खा जाएंगे ।
यदि व्यक्ति तनाव चिंता ग्रस्त है तो ज्यादा खा जाता है । जिससे अपच गैस के साथ ही साथ उसके विचारों में भी प्रदूषण आ जाता हैं । रास्ते चलते यदि सजग नहीं है तो ठोकर लग सकती हैं । आज दुर्घटना के प्रमुख कारणो में एक यह भी है कि जब व्यक्ति को तनाव की स्थिति में रोड पर चलता है तो वह अपने विचारों में डूबा रहता है जिससे दुर्घटना घट जाती है।
इसी प्रकार जीवन के प्रत्येक पहलू पर विचार किया जा सकता है । फिर विद्यार्थी सजग रूप से अध्ययन ना करें तो असफल हो सकता है । आज लोगों की भूलने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । इसके लिए यह जरूरी है कि वह जो भी कार्य करें पूर्ण मनोयोग के साथ सजगता पूर्वक करें ।
जीवन में सफलता सजगता पूर्वक कार्य करने पर ही मिल सकती है । योग विज्ञान हमें कण कण से जुड़ना सीखाता है । जीव जंतु क्या कंकर पत्थरों से भी हम जोड़ने का प्रयास करें तो हलचले आ सकती है । अतः जीवन में उन्नति हेतु प्रत्येक कार्य को सजगता पूर्वक करें यही ऋषियों की प्रेरणा है।
मेरी डायरी से : भाग- १८
आज प्रातः डॉक्टर साहब से मिलने पर जब उन्हें कविताएं दिखाई तो बोले अच्छी हैं परंतु गद्य टाइप की है । थोड़ा गेय लाओ । मैं तुम्हें लिखना सिखा दूंगा । डॉक्टर साहब का आश्वासन पाकर हृदय में प्रसन्नता हुआ कि मेरा प्रयास सफल हुआ। इसमें मेरा कुछ नहीं सब गुरुवर की प्रेरणा है ।वह चाहे जिससे जो करा ले । हम तो बस उन्हीं पथो का राही हूं।
उसके बाद बच्चों से मिलने गया। बच्चे देखकर आनंद मग्न हो गए । जब एक मजदूर को पढ़ने के लिए कहा तो बोले -” पढ़ेगा तो भोजन कैसे करेगा? परिस्थित की मार आदमी को क्या-क्या नहीं करा देती हैं।।मनुष्य और कुछ नहीं बस परिस्थितियों का पुतला है । परंतु इसके अपवाद भी हैं ।
विकट गरीबी में पले लोग भी उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंचे हैं । व्यक्तित्व प्रतिकूलता में ही निखरता है । जब तक व्यक्ति के पास किसी चीज की कमी नहीं रहेगी तो क्या काम करेगा? समाज में सामंजस्य होना बहुत ही आवश्यक है । एक ओर व्यक्ति के पास इतनी संपत्ति सुविधा है कि वह खा खा कर मर रहा है ।
वहीं दूसरी ओर लोगों को सूखी रोटी भी नहीं मिल रही है। इसके लिए अमीरों के हृदय में करुणा का भाव जगाना होगा कि आज उनके पास जो कुछ भी है उनमें समाज की भी हिस्सेदारी है । हमें किसी के हक को हड़पने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा भाव ही हमें सादा जीवन उच्च विचार की ओर अग्रसर करती है।
अगले क्रम में राम अवतार के घर नाश्ते पर गया। जहां उनकी मम्मी ने बताया कि रास्ते में कहीं उतरना मत । कही कुछ भी खाना मत। प्रेम से रहना । सामान को ठीक से पैक करना। कहीं कुछ छूट न जाए । जैसे हिदायते दी।
चाची की बात सुनकर मां की याद आने लगी कि पुत्र कितना भी बड़ा हो जाए मां के लिए लाडला ही है ।
मां की ममता की शीतल छांव में संसार सुखी एवं आनंद से भर सकता है। आनंद हम वस्तुओं में खोजते हैं परंतु कभी यह नहीं सोचती आनंद तो मां के आंचल में सतत बह रहा है।
जीवन में व्यक्ति को संसार के सारे धन वैभव मिलने के बाद भी यदि उसे मां का प्यार ना मिले तो जीवन अधूरा ही रह जाएगा। परंतु आज भौतिकता ने मां पुत्र के रिश्ते में भी दरार पड़ गई है।
जिससे व्यक्ति चिंता तनाव से ग्रसित हो गया है । पूर्व में जब संयुक्त परिवार था । दादा-दादी से भरा पूरा परिवार रहता था तो घर के बुजुर्ग समस्याओं को जीवन के अनुभवों से हल्का कर दिया करते थे । आज परिवार टूट रहे हैं । जिससे नित्य नई समस्याएं पैदा हो रही हैं।
आगे एक माताजी के पेट में इतना दर्द हुआ कि वह लेट गई। तो उनके पुत्र ने कंधे पर उठाकर उन्हें हॉस्पिटल ले गया। ऐसा होता है मां पुत्र का प्रेम । मां का आंचल कभी धूमिल नहीं होता। यह तो पुत्र है जो अनेकों दुर्भावनाएं पाल लेता है । हमें रिश्तो की दीवारों को मजबूत करने होंगे ।
जिससे परिवार संस्था की गरिमा बनी रह सके। सायं काल जब डॉ मनीषा दीदी से मिला और जीवन के बारे में बात करने लगे तो दीदी भाव विभोर हो गई । लगा जैसे सारा स्नेह आज ही उड़ेल देगी। दीदी आज घंटों तक बैठी रह गईं जबकि वह 1 मिनट भी अधिक नहीं रुकती थी ।
जब मैं ने कहा दीदी चलना है आपको देर हो रही है। तो दीदी बोली -” मैं तेरे ही बारे में सोच रहीं हूं कि कैसा होगा।
आगे बोली -” भैया हम क्या कर सकतें हैं। कभी-कभी हमारी चाहते कहां पूरी होती है ।
ऐसे समय में क्या करना चाहिए ना कि सब कुछ उन्हें परमात्मा पर छोड़कर बस जो गुजर रहा है उसका अनुभव करना चाहिए। कभी-कभी ऐसा होता है ना रे जिन बातों को हम सोचते हैं वह हमारे अतः मन में बैठ जाती है। जो उचित समय पर आने पर अपने आप हो जाती है । तब हम सोचते हैं कि यही तो हम चाहते थे । यह अचानक कैसे हो गया?
आगे दीदी ने बताया कि तुम भैया से क्यों नहीं मिलते । वह मन की बातें जान लेते हैं । तेरे यह जो विचार आ रहे हैं ,यही आने लगे ना ,पहले तो नहीं आते थे ना । हो सकता है ना भैया तू यही लेखन कार्य में लग जा। लेखनी के माध्यम से हम समाज को नई दिशा दे सकते हैं । गुरुवर ने जीवन भर क्या किया? लेखन ही तो। लेखन कार्य उनके जीवन का एक अंग है । मनुष्य के साथ क्या जाता है बस उसके अच्छे व्यवहार, आचरण एवं उसने समाज के लिए क्या दिया और सब यहीं छूट जाता है।
उन्होंने कहा कि-” कभी-कभी क्या होता है कि ना भैया हम एक दूसरे को चाहते हैं परंतु संकोच बस कह नहीं पाते । हो सकता है उसके मन में अच्छे विचार हों परंतु कह ना पा रही हों । खैर कोई बात नहीं जो प्रभु चाहेंगे वह वैसा कर देंगे । तू ज्यादा सोच विचार मत कर।
आज जब हम जीवन के बारे में सोचते हैं तो ऐसा लगता है कि प्रेम विष भी है और तो अमृत भी है । वह हमारे ऊपर है कि उसे हम विष बनाते हैं या अमृत। आज तक जितने भी महापुरुष हुए हैं वे सभी प्रेम से तिरस्कृत लोग ही हुए हैं । उन्होंने उसमें सकारात्मक बनाए रखें और उन्नत के शिखर पर पहुंच गए।
जब व्यक्ति समाज देश-काल से तिरस्कृत होता है तो उसकी अंतर शक्ति स्वाभिमान जागता है। और सोचता है कि आज भले ही तुझे हम नहीं पा सके परंतु मैं प्रबल पुरुषार्थ करूंगा और एक दिन वह सब पाऊंगा जो मैं चाहता हूं । मैं आज से किसी के पीछे नहीं भागूंगा ।
ना धन के , ना पद के। मैं ऐसा चुंबक बनूंगा कि एक न एक दिन सारी चीज मेरे सामने आने लगेगी । मैं ऐसा बट वृक्ष बनेगा कि सभी प्राणी उसमें सांस ले सके। मैं अपने को निखारूंगा। हर कार्य के प्रति सजग रहूंगा। और तब तक चैन से नहीं बैठूंगा जब तक तुझे पानी के योग्य ना हो जाऊं । मेरा तुझको सत सत प्रणाम ऐ जिंदगी।
मेरी डायरी से : भाग –१९
आज प्रातः रामदेव जी के आश्रम गया । आश्रम आधुनिक भव्यताओं से परिपूर्ण था ।कुछ ही वर्षों में इतनी अधिक उन्नति इसे लक्ष्य के प्रति समर्पण, प्रभु कृपा कह सकते हैं। बिना परिश्रम लगन के हम जीवन में उन्नति नहीं कर सकतें । लोग कहते हैं कि बाबा को मीडिया ने उछाला है परंतु जब आपके अंदर स्वयं का व्यक्तित्व, आत्मविश्वास, आत्म शक्ति नहीं होगा तो क्या कर सकते हैं?
बाबा के घर-घर में योग पहुंचने की सराहना कर रहे थे कि भारतीय विद्या को इसी बहाने लोग जाने तो । जिस प्रकार से पूज्य गुरुवर ने पाखंड को तोड़ते हुए गायत्री मंत्र के रूप में लोगों की घटती आस्था विश्वास का पोषण किया जन-जन के लिए सुलभ बनाया । उसी प्रकार बाबा ने योग को सरलीकृत करके वर्तमान युग की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए पुनरुत्थान किया।
आज का व्यक्ति स्वयं उत्पन्न की समस्याओं के कारण अनेकों बीमारियों का शिकार बना हुआ है । किसी को एक तरफ खाने को भोजन नहीं मिल पा रहा है तो कोई खा खा कर मर रहा है। एक तरफ अनाज की बोरियां सड़ रही हैं दूसरी तरफ सूखी रोटी भी लोगों को नहीं मिल पा रही है।
हर एक युग की अलग-अलग समस्याएं हुआ करती हैं । उन समस्याओं को दूर करने के लिए ही युगानुकूल किसी न किसी महापुरुष का जन्म होता है। बाबा का जन्म भी उसी की एक कड़ी है।
हम लोग नर्सरी में टहल रहे थे। कुछ बहने भाई भोजन कर रहे थे । उधर से गुजरते वक्त उन्होंने कहा-” भैया भोजन कर लो “
मैंने भोजन तो नहीं किया परंतु हृदय में उन लोगों के प्रति प्रेम भाव उमड़ पड़ा । एक तरफ लोग भाई-भाई को गला काटने को तैयार है। दूसरी ओर हमारे यह बंधु बांधव है जो एक अजनबी को गले लगाने को तड़प रहे हैं ।
हम सदैव से ही यह जानने का प्रयास नहीं किया कि वे भी हमारी तरह ही है । प्रेम की भूख सबको तड़पाती है । चाहे वह मानव हो या अन्य जीव। संसार को आज धन के अंबार की जगह प्रेम, करुणा, दया एवं आत्मीयता से भरा ह्रदय चाहिए। जो हर एक पीड़ित आत्मा को गले लगा सके ।
हमारे साथ गए भाई जीवन दान देना चाहते थे । उनको जब जानने का प्रयास किया तो पता चला कि वह समाज के घृणा द्वेष से मार खाए हुए हैं । इतना कमाया दिन रात एक किए फिर भी मन में कहीं भी शांति नहीं दिखाई पड़ती। जिस पर हमने विश्वास किया उसी ने हमें धोखा दिया । सबको अपने स्वार्थ की चिंता है । कोई मेरे को सुनता नहीं । सत्य है अपनों का दंश लोगों को अंदर ही अंदर घुलाया जा रहा है।
मेरी डायरी से : भाग – २०
आज प्रातः गौशाला में भैया के कह रहे थे गुरुदेव ने 21वीं सदी नारी सदी की जो घोषणा की थी उसके स्वरूप को स्पष्ट देखा जा सकता है । विश्वविद्यालय की भागीदारी से लगता है की उज्जवल भविष्य की संभावना साकार होकर रहेगी ।
नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था –” तुम हमें एक आदर्श मां दो मै तुम्हें एक नया राष्ट्र दूंगा । सत्य है विश्व के भविष्य का निर्माण एक आदर्श मां ही कर सकती है। मां हीं वह टकसाल है जो बच्चों को संत सुधारक सहीद बना सकती है । जब-जब देश में कौशल्या जीजाबाई जैसी माताएं होंगी तो राम ,शिवाजी देशभक्ति की गौरव गाथाएं गाते रहेंगे।
जिन घरों में छोटे बड़े एक दूसरे का सम्मान करते हैं । सास बहू , पिता पुत्र के बीच मित्रवत व्यवहार होता है तो बच्चे भी उसी प्रकार की क्रियाएं करेंगे। पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि -” बड़े जो कुछ बच्चों को सिखलाते हैं बड़े उन पर स्वयं अमल करें तो यह संसार स्वर्ग बन जाए ।”
हमें बच्चों को बातों से नहीं आचरण से सिखाना चाहिए। हम कहते हैं बच्चे बिगड़ गए? परंतु यह नहीं सोचते बच्चे बिगड़े कैसे? वे वही करेंगे जो हम करेंगे । छोटे-छोटे बच्चे तो देख-देख कर सीखते हैं । अतः यदि बड़े अपने आचरण को सुधार ले तो बच्चे स्वयं सुधर जाएंगे।
जिस समाज के माता-पिता गुरु दुश्चरित्र होंगे उसकी कल्पना की जा सकती है कि वहां के बच्चे कैसे होंगे? देखा जाता है लोगों में संयम तो होता नहीं और सोचते हैं बच्चे सुधर जाए ।
आज जहां देखो वहीं अभिभावकों की दुषष्चरित्रता की घटनाएं सुनाई देती हैं।
स्वास्थ्य प्रबंधन के दीक्षित जी बाबूजी ने कहा कि -” आधुनिक युग के आयुर्वेद के एमडी हमें डॉक्टर नहीं मानते हैं। हम उन्हें डॉक्टर नहीं मानते । कारण कि आयुर्वेद कागज कलम की चीज नहीं अनुभव सिद्ध है । जो अनुभव से नहीं सीख सकता ।जो हर छण औषधियों के बारे में उसके गुण, कर्म ,स्वभाव की व्यावहारिक जानकारी ना हो। आयुर्वेद की गुणवत्ता धीरे-धीरे इसी कारण से कम होती जा रही है।
इसके बाद आज मजदूर के बच्चों का एडमिशन कराने गया तो अध्यापिका महोदय ने कहा-” यह बच्चे वास्तव में अच्छे हैं ।देखो ना पहले जो बच्चे घूमते थे आज कैसे पढ़ रहे हैं। बस इन्हें दिशा देने की आवश्यकता है। सत्य है लोग छोटो को सदा छोटा ही समझते रहते हैं।
कभी इस बात का ध्यान नहीं रखते हैं कि वे भी हमारे अंग अवयव हैं।उनका प्यार अपनापन हमें उन जैसा बनकर ही पा सकते हैं । कभी उन्हें गले तो लगाओ फिर आपको समझ आएगा की प्रेम होता क्या है?
मेरी डायरी से : भाग -२१
आज प्रातः थोड़ा आलस के कारण उठ नहीं पाया। जीवन में बहुत कुछ करना शेष है उसमें कारण आलस्य प्रमाद है । हम जिस भी कार्य को सोचते हैं कल कर लेंगे वह कल कभी आता ही नहीं । जीवन का एक पल कितना उपयोगी है यह वही जान सकता है जिसके जीवन की घड़ियां खत्म होने को हो। हम कई बार सोचते हैं चलो इसे कल कर लेंगे परंतु वह कल कभी आता नहीं ।
आज एक लेख में चर्चा थी कि जितनी भी महान हस्तियां है वह अधिकांशत पागलों जैसी हरकतें करने लगते थे । जिनमें अब्राहम लिंकन , फ्रैंकलिन रूजवेल्ट जैसे लोगों के थे। वैज्ञानिकों ने यह खोज कर बताया कि मनुष्य के अंदर की कोई इच्छा की पूर्ति जब नहीं हो पाती तो उस ऊर्जा का रूपांतरण व्यक्ति को महान बनाती है । दिल की चोट खाए लोग ही अधिकांश अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर जाते हैं।
दोपहर में हम स्वर्गाश्रम परमार्थ आश्रम गए । झूले पर आटे की गोली देते समय मछलियां फुदक कर ले लेती थी । उनका तैरना मन में रोमांस पैदा करता है । काश हम भी यदि मछली होते तो इसी तरह तैरा करते । सबको मोहकर आंखों के तारे बनते। आश्रम में अधिकांश विदेशी पर्यटक आए हुए थे ।
यह उनके अंदर जिज्ञासा ही है कि उन्हें यहां तक खींच लाई ।भारतीय संस्कृति सभ्यता एवं यहां की पुरातन प्राकृतिक वातावरण लोगों को सहज लुभाता है।
शिवानंद आश्रम में बहुत से बंदर थे परंतु एक भी बंदर ने किसी भी प्रकार से नुकसान पहुंचाने का प्रयास नहीं किया। परंतु मनुष्य को क्या कहा जाए वह तो बिना किसी छेड़खानी के ही परेशान करता है । अकेले ही झोले को लटकाए ही चला आ रहा था परंतु कोई भी बंदर ची चा नहीं किए।
आज मैं किरण बेदी जी का साक्षात्कार पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने उल्लेख किया है कि पढ़ने से पहले मेरा सवाल होता था कि क्या यह मेरा निर्माण करेगा? क्या यह पढ़ने से मुझे प्रेरणा देगा? मुझे सिखाएगा मेरे अंदर इससे कोई विकास होगा ? यदि नहीं तो वह मेरे पाठन योग्य नहीं है ।
जो व्यक्ति हत्या करने को दृढ़ हो। ऐसा कोई नहीं है जो हालात की वजह से ऐसा करने को बाध्य हुआ हो। जिसे मारने में आनंद आता हो वही अपराधी है । आतंकवादियों को भी वे अपराधी मानती हैं । जेल के 99% लोग मात्र दोषी हैं। अपराधी तो एक प्रतिशत हैं।
एक पत्र का उल्लेख करते हुए कहती हैं-” एक बारहवीं कक्षा की बच्ची के माता-पिता उसका ब्याह करना चाहते हैं परंतु अभी वह और पढ़ना चाहती है । उसमें चैनलो , पंचायतों के साथ शिक्षकों को दोषी ठहराती है ।क्या उपयोग है हमारे शिक्षकों का यदि वे इन बालिकाओं के माता-पिता से बात करके उनको ऐसा करने से हतोत्साहित ना कर सके।
ओशो का एक लेख था जिसमें कर्ण छेदना , खतना की चर्चा थी। यहूदी लोग जो कि बच्चों के जन्म के 14 दिन बाद खतना किया करते हैं ।
सर्वाधिक बुद्धिशील पाए गए हैं। कार्ल मार्क्स , सिग्मंड फ्रायड , अल्बर्ट आइंस्टीन तीनों यहूदी थें। जननेन्द्रिय का खतना करने से वहां की ऊर्जा सीधे मस्तिष्क पर चोट करती है । छोटे बच्चों को वह जो चोट है सदा के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है । उसकी जीवन धारा बदल जाती है।
एक्यूपंचर प्रणाली में भी कुछ विशिष्ट बिंदुओं पर सूई चुभोकर हम ऊर्जा का रूपांतरण करते हैं। सत श्री अकाल का अर्थ है सच वही है जहां काल मर गया जहां अकाल कालातीत आ गई ।
आज दिनभर इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि लाडनू से फॉर्म भरे या नहीं। मुख्य समस्या धन की थी परंतु सर ने दे दिया कि ले जाओ। आज के भौतिकवादी युग में धन भी जीवन का प्रमुख हिस्सा बन चुका है।
परंतु धन ही पूज्य नहीं है इसे हमें समझना होगा । दुनिया के प्रमुख हिस्सों में धन की मार काट चल रही है। पाप बढ़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया जैसे युग में मनुष्य मनुष्य को नहीं पहचान रहा है।
मेरी डायरी से: भाग – २२
आज प्रातः संध्या के समय सूर्य को अर्घ्य देते वक्त जैसे लग रहा था सूर्य देव के दिव्या प्राण प्रवाह से संपूर्ण जीवन आलोकित हो गया है । अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा से सिर सहज ही नमन हो गया कि उनकी कितनी कृपा है जो नित्य कर्मों से प्रभु स्मरण के को स्थान दिया।
जिस प्रकार शरीर की भूख भोजन से मिलती है उसी प्रकार आत्मा के भूख प्रभु स्मरण से ही मिट सकते हैं। जब हम कभी संध्या पूजन नहीं करते तो लगता है कि जीवन में कुछ कमी रह गई है।
सरदार वल्लभभाई पटेल जूनियर हाई स्कूल में अध्यापन करते हुए जब प्रमाण पत्र बनवा रहे थे लग रहा था मैं अध्यापन नहीं करता तो प्रमाण पत्र कैसा? भविष्य में हम जरूर इस ऋण से मुक्त होने का प्रयास करेंगे ।
जप साधना ध्यान से धीरे-धीरे जब मन में निर्मलता आती जाती है तो हमारी सहज में प्रवृत्ति सत्यपथ की ओर बहने लगती है। आज संपूर्ण मानवता को घृणा द्वेष आतंक से मुक्त करना है तो हमें योग की शरण लेनी ही पड़ेगी। सबके अंदर प्रेम करुणा दया क्षमा का भाव जगे किसी के प्रति किसी को द्वेष ना हो यही योग की शिक्षा है।
पुनः मंदिर गए जहां पर स्वामी जी को प्रणाम करने के पश्चात मां काली के मंदिर में ध्यान करने लगा। जहां पर शीशे में अपने आत्म स्वरूप के छवि को निहारत हुए जैसे समाधिस्थ हो गया । घंटे-दो पश्चात जब उठे तो मां की कृपा को हृदय से नमन किया ।
सोचता हूं इन मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे की जीवन में क्या आवश्यकता है? आज एक बहस छिड़ी हुई है कि लोग लाखों रुपए इनको बनाने में खर्च कर देते हैं । यह पैसा को चिकित्सा शिक्षा के मध्य में खर्च किया जाता तो देश की कितनी उन्नति होती।
पुनः सोचता हूं जिस देश में शिक्षा चिकित्सा की उन्नत के शिखर पर बैठे हैं क्या वहां कोई समस्या नहीं है ? देखा जाए तो ऐसे देश में नित्य समस्याओं के अंबार लगते जाते हैं परंतु समाधान कहीं नहीं दिखता।
ऐसी स्थिति में 21वीं सदी के युग निर्माता आचार्य श्री कहते हैं -“दुनिया के समस्त समस्याओं का कारण आस्था संकट है ।आज आस्थाओं के टूटने के कारण किसी को किसी के प्रति विश्वास मिट रहा है । समस्त मानवता को इन विभीषिका से उबालने के लिए आस्था को पुन स्थापित करना होगा । यह लोगों की श्रद्धा विश्वास ही रहा है कि पत्थर से भी लोगों ने भगवान के दर्शन किए हैं। “
आज स्वर्गीय श्री सीताराम सिंह जी की पुण्यतिथि के उपलक्ष में जयंती मनाई जा रही थी। पुनः बचपन के वह छण याद आने लगे जब हम यहां पढ़ते थे। जीवन के सौंदर्य का निखार तभी आ सकता है जब बीज सही जगह डाला गया हो । बच्चे अंत्याक्षरी की प्रतियोगिता खेल रहे हैं । जहां लोग फिल्मी गीतों में डूबे हुए हैं ।
वहीं दोहे सवैया के माध्यम से कृष्ण सुदामा प्रेम, गोपी कृष्ण, राधा कृष्ण प्रभु की वंदना में सारा प्रांगण मशगूल था। मैं सोचता हूं प्रतियोगिता को एक स्वस्थ तरीके से ही खेलना चाहिए। प्रेम भाव बना रहना चाहिए । जीत हार तो होती ही रहती है । खेल को खेल ही समझना चाहिए।
श्री पन्नालाल जी अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि हमें आज भी वह दिन याद है जब हम सब अवैतनिक रूप से पढ़ाया करते थे ।हमारे कई साथी छोड़कर चले गए कि क्या रखा है शिक्षा में । परंतु हो सकता है उन्हें आज ऊंचे वेतन मिल रहे हैं परंतु सुकून संतुष्टि नहीं प्राप्त कर सकते ।
यह विद्यालय पांच लोगों के पांच पांच रुपए के सहयोग से चला करता था। पूज्य गुरुदेव ने भी संगठन में रहकर कार्य करने को प्रमुखता से लिया है । आज जो कुछ अच्छा दिखता है उसमें कितने लोगों का त्याग तप लगा है यह नहीं सोचते।
पूर्व प्रधानाचार्य श्री वंश बहादुर सिंह मंच पर आने पर केवल आंसू ही छलक गया। कुछ शब्द नहीं निकल सके। कभी-कभी कुछ ना कहते हुए भी हम बहुत कुछ कह जातें हैं। अंतःकरण की वाणी सीधे हृदय को भेदती है।
मुख्य अतिथि ने कहा कि मैं सीताराम सिंह के बारे में कहूं कि वह बहुत ही अच्छे थे तो मुझे ऐसा मुझे शोभा नहीं देता । जो स्वयं शोभायमान हो उसकी शोभा की क्या प्रशंसा की जा सकती है ?
बहनों के अनुशासन पूर्वक बैठे हुए जब पूर्व में विद्यालय परिसर मात्र 25 30 बहने आतीं थी। आज इतनी संख्या में देखकर सुखानुभूति का अनुभव किया। जिस देश की माताएं बहने शिक्षित होते हैं तो पूरे समाज शिक्षित होता है ।
आज वह दिन आ गया है जिसमें नारियों को स्वयं आगे आकर अपने हक को लेना होगा। एक प्रोफेसर की कहानी में उन्होंने बताया कि वे एवं उनकी पत्नी दोनों प्रोफेसर है। दो बच्चे हैं दोनों अमेरिका में इंजीनियर है । लाखों की तनख्वाह है फिर भी जीवन में कोई संतुष्टि नहीं है ।
प्रोफेसर साहब अमेरिका जाना चाहतें हैं परंतु अपने बच्चों को नहीं बुला सकते हैं। उनके लिए भारत अब कोई रहने लायक देश नहीं रहा है। वे प्रोफ़ेसर जहां पर पले बड़े आज वही देश उनके रहने लायक जगह नहीं रही ।
दूसरी तरफ एक 12 साल का बच्चा है । फटी बनियान जांघिया पहन कर होटल में प्लेट धुल रहा है । 15 अगस्त का दिन है ।साथ में झंडा लिए जा रहा है।
होटल के सामने पहुंचने पर कैसे प्लेट धुले क्योंकि दोनों हाथ से ही प्लेट पर धुली जा सकती है । अतः पगड़ी बांध कर उसमें झंडा खोस देता है और गुनगुनाता है – सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्ता हमारा।
आज भारत जो कुछ भी है वह किसान मजदूर की वजह से है ना कि बड़े-बड़े इंजीनियर डॉक्टर की वजह से ।हमें यह समझना होगा कि हमें क्या बनना है?
मेरी डायरी से : भाग -२३
आज बड़े भाई ने क्रोध में कपड़े फाड़ कर फेंक दिए एवं एक मात्र बनियान पहन कर दीदी के घर चले गए । कहां जाता है यदि पति अग्नि बन जाता है तो पत्नी को पानी बन जाना चाहिए । अग्नि को जल ही बुझा सकती है। परंतु देखता हूं भाभी भी अग्नि बन गई । जिससे आग बढ़ते गए ।
पत्नी का धर्म है कि पति के साथ हर परिस्थित में साथ दे । पति भी ऐसा ही करें। परंतु आज इसका उल्टा हो रहा है । कोई भी झुकने को तैयार नहीं है। जिंदगी को गुजारने के लिए बहुत सोच विचार की आवश्यकता है । सिर्फ जिंदगी गुजारना ही नहीं बल्कि जीना है।
कुछ करके दिखाना भी है ।बच्चे जब बड़े होने लगे तो मां पिता अपने लिए ना सही बच्चों के भविष्य को देखते हुए लड़ाई झगड़े से बचने का प्रयास करना चाहिए । देखा गया है कि जिस परिवार में लड़ाई झगड़े होते रहते हैं उस परिवार के अधिकांश बच्चे बिगड़ जाते हैं एवं पढ़ाई लिखाई में भी पीछे हों जाते हैं।
रात में हूं बुआ जी से बात कर रहे थे भाभी भी पास में आकर बैठ गई । बचपन में हम सब साथ पढ़े बढ़े थे। परंतु भाई के कई वर्षों की शादी के बाद ज्यादा बात नहीं हो पाती थी । भाभी जी के विचार इतने उत्कृष्ट होंगे यह मैं कभी सोच भी नहीं पाया ।
कहते हैं जो व्यक्ति खुले विचारों का होता हैं ज्यादा पवित्र होता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी कहता है कि जो लोग किसी स्त्री या पुरुष से हंस कर बात नहीं कर सकते अंदर ही अंदर जलते रहते हैं ऐसे लोग ही एक दिन भयानक दुष्कर्म करने को आतुर होते हैं ।
ऐसे में महायोगी कृष्ण की याद आती है । कैसे होंगे कन्हैया जो की हजारों गोपियों के साथ रासलीला करने पर भी उनका ब्रह्मचर्य बंद नहीं होता था और सदैव महासमाधि की स्थिति में निवास किया करते हैं। यह गोपियों और कोई नहीं हमारे अंदर की अतिरिक्त कामवासना है जो अपनी रासलीला दिखाती है।
बुआ ने कहा कि जीवन में एक गुरु चरणों की सेवा आशीर्वाद ही है जो साथ जाएगा सारी माया यही रह जाएगी। प्रभु कामनी कंचन का मोह देकर मानव को उसमें फंसाए रखते हैं। हजारों में कोई बिरले ही होते हैं जो माया से बच पाते हैं । इतनी कम उम्र में प्रभु की भक्ति में लगना यह पूर्व जन्मों का संस्कार ही कहा जा सकता है।
सायं काल जब आ रहे थे प्रयाग गौरव परम पूज्य रमाशंकर शुक्ल से मुलाकात किया। उनके आशीर्वचन लिए ।उनकी थोड़ी मालिश की । पूज्य स्वामी जी ने कहा कि तुम्हारे जैसी सेवा और कोई नहीं कर सकता । मेरे जीवन की एक अभिलाषा है कि हनुमान जी के मंदिर पर कोई चाय बनाकर पिला सके ।
वह भी प्रातः 6 बजे। चाय में दूध की जगह नींबू की हो तो और भी अच्छी बात है। मैं कुछ नहीं बोला सोचता हूं सबके जीवन के कोई न कोई आस होती है । जिंदगी में उनकी इच्छा को जरूर पूरा करेंगे । प्रभु की इच्छा क्या है वही जाने। जिंदगी आज है पता नहीं कल रहे या ना रहे। जीवन में धन दौलत तो सभी कमाते हैं कोई मनुष्य बनकर दिखाएं।
अनुभव करता हूं मनुष्य की महानता के क्या कारण हैं ?
किसी को एवं किसी कार्य को छोटा न समझ कर समान व्यवहार ही वह सीढ़ी है जो व्यक्ति को महानता के उच्च शिखर पर पहुंचाती है । कोई ऊंचे पद से नहीं श्रेष्ठ कर्मों को करने से महान बनता है। आज तक जितने भी महापुरुष हुए हैं उनमें जो सत्य कर्म किए है वही याद किए जाते हैं और सभी भुला दिए जाते हैं।
भांजी शीला को सोमवार ४ दिसंबर अंक लड़के का जन्म हुआ। समयाभाव के कारण नहीं मिल पाया । शीला बहुत ही सुशील कम बोलने वाली गुड़िया है।। जो कुछ बोला जाता है सुनकर चुप रहती है ।
हमने उसे कभी पलट का जवाब देते नहीं सुना । बच्चों को हृदय से शुभकामनाएं देते हैं । सभी जच्चा बच्चा का सुखी हो यही कामना आशीर्वाद।
डॉक्टर श्रीवास्तव जी पूर्व में अध्यापन कार्य करते थे परंतु आज दवा खाना चलते हैं । साथ ही कुछ झाड़ फूंक भी करते हैं। उनके पास दवा खाने में दवा से ज्यादा झाड़ फूंक को करने आते हैं । सत्य है आज इसी का जमाना है ।चमत्कार को नमस्कार।
मेरी डायरी से : भाग -२४
सारे जहां से अच्छा,
हिंदुस्तान हमारा ।
हम बुलबुले …..
गुनगुनाते हुए वह चला जा रहा था । आज 15 अगस्त का दिन है ।भारत को स्वतंत्र हुए 56 वर्ष होने को है परंतु इसके लिए स्वतंत्रता कोई मायने नहीं रखता है । एक पुराने बनियान जांघिया पहने ,बाएं हाथ में झंडे को फहराते वह बढ़ रहा है ।
सामने उसे होटल दिखाई पड़ता है। दुकान के मालिक ने डांटते हुए कहा -” क्यों रे बाबू !ए क्या करने लगा जो इतनी देर कर दी ।जा देख कितने बर्तन इकट्ठे हो गए हैं। जल्दी से साफ कर दे ।”
रामू सर लटकाए बिना जवाब दिए आगे बढ़ गया । आज हमारे मां पिताजी भी जीवित होते तो क्या मैं इसी तरह से बर्तन धोते? नहीं नहीं बाबू अम्मा चाहे सूखी रोटी खाकर सो जाते परंतु मुझे ऐसे काम पर नहीं भेजते ।
विचारों के प्रवाह के मध्य वह बढ़ता जा रहा है। बर्तनों के ढेर के सामने खड़ा होकर वह सोचता है कैसे बर्तन धूलु । झंडे को जमीन पर नहीं रखूंगा। सोचता हुआ वह बनियान फाड़ कर पगड़ी बांधना है। उसमें झंडे को खोसता है । बर्तन धुलते हुए गुनगुनाने लगता है —
सारे जहां से अच्छा …..
मेरी डायरी से : भाग -२५
वर्षों की लगी प्यास आज देखते ही बुझ गए । उनको आंखों का नूर कहूं या दिलदार कहूं जब सब अपने ही हो। आज वर्षों के बिछड़े साथी दीक्षांत समारोह के अवसर पर पुनः मिल रहे थे । जैसे ही गेट पर पहुंचे साधना जी दिखाई दी। पुराने यादों के झोंके में दिल के तार झंकृत हो गए ।
मनुष्य के जीवन में न जाने कैसे-कैसे पड़ाव एवं मोड़ आते हैं कि वह चाह कर भी उसे व्यक्त नहीं कर पाता है । दिल की बातें दिल में ही रह जाती है । मैंने कभी किसी से चाहते हुए भी नहीं करतें हैं।सोचता हूं मेरा क्या है जिंदगी किसी तरह कट ही जाएगी परंतु उनके जीवन की चिंता सताती है। आखिर एक फकीर से क्या आशा की जा सकती है?
कौन से भौतिक सुख उन्हें दे पाऊंगा? सभी के मां पिता की इच्छा होती है कि उनकी पुत्री सुखी रहे । घर बार अच्छा हो । परंतु हमारे पास है ही क्या एकमात्र शिवाए इस दिल के।
आज दिल के दर्द को समझ ही कौन सकता है? हो सकता है मैं एक इंजीनियर, डॉक्टर ना हो परंतु एक मानव जरूर हूं जो हर दुखियारों के आंसू पोछ सके । मैं तुझे कुछ दे सकूं या ना दे सकूं परंतु प्रेम करुणा से छलछलाता हृदय जरूर दे सकता हूं । जिसकी छांव में जीवन की सुगंध खिल सकती है ।
अब तो जैसे लगता है तेरे बिन जीवन अधूरा ही रह जाएगा। मैं तुम्हें कितना चाहता हूं ! हे प्यारी उसके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है । जिसे शब्दों में बयां कर सकूं । उसे तो केवल अनुभव किया जा सकता है।
जीवन एक नदी के बहाव जैसा है । जहां स्थिरता नहीं सतत प्रवाह ही है । हम चाहे या ना चाहे फिर भी आगे बढ़ते ही जाना है । जब दिल का दर्द बढ़ जाता है तो वही कविता बनकर फूट पड़ती है । अपने दर्द को भुलाने के लिए तूलिका का सहारा लेता है जो कि शाकुन्तलम, रामायण आदि बनकर फूट पड़ते हैं ।
जिसकी छांव में हजारों लोग आराम पाते हैं । परंतु लेखक बिलखते बिलखते अपने प्राणों को गवा देता है। वाह रे कुदरत तेरी माया। कहीं धूप कहीं छाया।
अनुभव कहता है प्रेम ही जीवन का आनंद है । यह एक ऊर्जा है जो मनुष्य को दिव्य से दिव्यतम बनाने की सीढ़ी है । प्रेम जिंदगी का ऐसा सौंदर्य है जो हर छण खिलखिलाता रहता है ।
प्रेम में आग्रह नहीं होता, प्रेमी की इच्छा मे ही अपनी में ही अपनी इच्छा मिल जाती है । मैं मैं की जगह तू ही तू का भाव जगाती है। प्रेमी तब जगत के संपूर्ण प्राणियों में उसी दिलबर की छवि निहारता रहता है। प्रेम की प्रगाढ़ता की अवस्था में सृष्टि के पशु पक्षी कीट पतंग ही नहीं पेड़ पौधों में भी उसी प्रीतम की छवि निहारता रहता है।
कबीर दास जी का ढाई अक्षर का प्रेम यही मानव को मानव से प्रेम ,दया, करुणा ,ममता का भाव ही पैदा करना रहा है । पीड़ित मानवता को आज मां की ममता की आवश्यकता है , जो सबको एक समान समझ सके। मां कोढ़ी , दुश्चरित्र, लूले लंगड़े व्यक्ति को भी उतना ही प्रेम करती है , जितना स्वस्थ एवं कमाऊं पूत से ।
मां खुद कभी नहीं खाती जब तक बच्चों को नहीं मिला लेती । खुद गीले में सोती है परंतु बच्चों को सूखें में सुलाती है । खुद रुखा सुखा खाकर सो जाती है। परंतु बच्चों को कभी भूखा नहीं देख सकती है। बच्चे का कष्ट उसका कष्ट होता है । आज पीड़ित मनुष्य को ऐसी ही मां की ममता से भरा हुआ ह्रदय चाहिए, जो दुखियारों के आंसू पोंछ सके।
संसार को केवल मां की ममता ही बदल सकती है । अब ऐसी माता को क्या कहा जाए जो बच्चे को पैदा होने के पश्चात उसे अलग कर देना चाहते हैं। अपने सुख के लिए जिगर के टुकड़े किए बलि देना कौन सी बुद्धिमानी का कार्य है।
देखा जाता है आज जितनी मात्रा में सत्य , अहिंसा ,दया, करुणा, प्रेम की बात की जाती है उतनी ही मात्रा में झूठ फरेब हिंसा घृणा द्वेष समाज में फैल रहा है । मूल कारण देखने पर ज्ञात होता है कि हम केवल मुख से कहते ही रहते हैं उसे कभी जीवन में उतारने का प्रयास नहीं किया।
हमारी वाणी एवं क्रिया भिन्न होने से हम किसी के हृदय को नहीं परिवर्तित कर पाते । हमें ज्यादा बातूनी न बनकर अपने श्रेष्ठ आचरणों, क्रियाओं के माध्यम से सिखाने का प्रयास करना चाहिए । मेंढक की तरह टर्र टर्र बंद कर मां बनकर मानव की सेवा में संलग्न हो जाना चाहिए।
मेरी डायरी से : भाग – २६
प्रातः हॉस्टल में झाड़ू लगाते हुए ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे गुरुवर की चेतना स्वयं में समाहित हो गई हो । यह तीर्थ गुरुदेव के दिव्य प्राण प्रवाह से भरा हुआ है । यहां हम जिस भी भाव से जो कुछ भी पाने की इच्छा करते हैं पा जाते हैं। गुरु तो सतत बांट रहा है । अब वह हमारी पात्रता पर निर्भर करता है कि उसे हम कितनी मात्रा में ग्रहण कर पाते हैं।
जिसका हम सुधार करना चाहते हैं यदि हम उस स्तर से उतर कर कार्य नहीं करेंगे तो भाव नहीं बन पाएंगे । समाज में सदा से एक ऐसा वर्ग रहा है, जिसके जीवन में अपेक्षा, अभाव, जलालत घृणा ही जिंदगी का अंग बन गई है।
हम सोचते हैं ऐसे लोग समाज की धारा से जुड़े परंतु हम कुछ जूठे टुकड़े फेंक कर अपने को सौभाग्यशाली मान बैठते हैं । जिंदगी भर उन्हें तड़पा तड़पा कर मार डालें और अब समाज सेवा के नाम पर कुछ कौड़ियां लूटाकर धर्मात्मा बने बैठे हैं।
आज कुछ भाई कह रहे थे तुम यहां सेवा में लगे रहते हो परंतु यदि बाहर से लाख रुपए कमा कर दान कर दो तो तुम्हारी इज्जत बढ़ जाएगी । यहां कुछ भी करते रहो कुछ भी नहीं होने वाला। लेकिन हम इज्जत चाहते ही क्यों है ? यह मानवीय कमजोरी ही है कि एक आस लगाए रहती है कोई मुझे चाहे?
कोई मुझे इज्जत दे? सम्मान दे। ऐसी स्थिति में ही कहीं हम भटक जाते हैं । हम यदि नहीं संभल पाए तो निश्चित है नीचे गिरेंगे हीं।
” नैतिकता के नए आयाम” नामक पुस्तक में नैतिकता के विभिन्न पहलुओं पर आवाज उठाई गई है। स्त्री लेखिकाओं की सोच रही है कि पुरुष वर्ग के सदस्य यही चाहता रहा है स्त्री उसकी कठपुतली बनकर रहे।
आज जब स्त्री उससे मुक्ति का उपाय सोचती है तो उसे समाज से अपेक्षा तिरस्कार ही मिलता है। कोई पुरुष कभी नहीं चाहता है कि कोई स्त्री उससे आगे बढ़े। कामकाजी स्त्रियों की हालत तो और बेहतर हो गई है। दिन भर दफ्तर में काम करें और लौटने पर बच्चे पति भी चाहते हैं उसके लिए थाल सजाकर खड़ी मिले ।
आज स्त्री को स्त्री दो पाटों के बीच पिसकर रह गई है । जो स्त्री थोड़ा स्वतंत्र भी है वह पुरुष के भोग की वस्तु मात्र बनकर रह गई है । यह सच है कि समाज की सोच में बदलाव आ रहा है। परंतु जब उसकी इज्जत के रखवाले ही अस्मत के भूखे भेड़ियों की तरह निचोड़ तो क्या कहा जा सकता है? आज मनुष्य इतना हैवान बन गया है कि बाहर से ज्यादा घर में ही वह अभिशप्त होकर जीने को मजबूर है।
समय-समय पर यह परिवर्तन होते ही रहते हैं। हमें उन परिवर्तनों से ढलकर आगे के लिए रास्ता ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। आज स्त्री शिक्षा अधिकार की बातें जोर-शोर से चल रही है । 21वीं सदी के युग निर्माता आचार्य श्री ने 21वीं सदी नारी सदी का उद्घोष किया है।
गायत्री परिवार में बहनों ने आगे बढ़कर 21वीं सदी का संखनाद फूंकने को पूर्णतया तत्पर हैं ।उनकी लगन देखकर लगता है कि इक्कीसवीं सदी का स्वर्णिम सूर्योदय होने को है । आसमान के दिव्य रश्मिया संपूर्ण वातावरण को आलोकित कर रहे हैं । रात्रि की काली घटाएं छटने को है । आओ सूर्योदय की दिव्य बेला में इन परिवर्तनों को अनुभव करने का प्रयास करें ।
इस्लाम के बारे में गैर मुस्लिम भाइयों की गलतफहमियों के निवारण में डॉक्टर जाकिर नायक ने धर्म के विभिन्न रूढ़ियों के वैज्ञानिक व्याख्या की । इस्लाम में ब्याज के लेनदेन से क्यों मना करता है?
मुसलमान मांसाहारी भोजन क्यों करता है? पुरुष एक से अधिक पत्नी क्यों रखता है? इस्लाम यह क्यों इजाजत नहीं देता कि पत्नी भी एक से अधिक पति रखे। इस्लाम औरतों को पर्दे में रखकर उसका अपमान क्यों करता है? इस्लाम तलवार के बल पर आगे बढ़ा?
विभिन्न प्रश्नों पर यदि विचार किया जाए तो निष्कर्ष से निकलता है कि आज परिवर्तन का युग है । देश काल परिस्थित के अनुसार हमें बदलना होगा। पुरानी मान्यताओं के नए आयामों पर विचार करके उसे। पर आगे बढ़ाना ही हमारी सक्रियता है।
मानव जीवन में जितनी मात्रा में भोजन वस्त्र आवश्यक है उतनी मात्रा में उसे प्रेम की आवश्यकता है । पेट की भूख तो किसी न किसी तरह शांत हो जाती हैं परन्तु हृदय की भूख मात्र प्रेम से ही शांत हो सकती है ।
हम जीवन के अमूल्य छणों को गवा कर पैसे कमाते हैं परंतु कहीं ना कहीं यह लगता है काश हमें भी कोई चाहने वाला होता । विश्व के महान रचनाएं पागल प्रेमियों ने रचा है। संसार में जो कुछ भी सुंदर शुभ दिखता है वह कहीं न कहीं प्रेम की परिणति ही है ।
स्त्री पुरुष का दिखता सामान्य प्रेम में जब उपेक्षा तिरस्कार मिलता है वही प्रभु प्रेम की रसों में सराबोर हो जाता है । तुलसी की रामचरितमानस ,कबीर की साखी शबद , सूर के पद सभी प्रेम की अभिव्यक्ति ही हैं। पूज्यवर भी कहते हैं -” मैंने केवल जिंदगी में प्रेम ही प्रेम लुटाया।
यह इतना बड़ा जो शांतिकुंज दिख रहा है यह प्रेम का ही एक रूपक है ।” कभी-कभी सोचता हूं मैं कहां किसके पीछे पड़ गया परंतु यही वह ऊर्जा है जिससे हमें उपन्यासकार बनाया । उस प्रेमी को हम कैसे भूल सकते हैं । वह तो हमारे जीवन से ऐसे ही जुड़ी हुई है जैसे कृष्ण से राधिका, कान्हा ने प्रेम को नये आयाम दिए। उन्होंने प्रेम को प्रभु प्राप्ति का सहज मार्ग बताया।
मेरी डायरी से : भाग – २७
आज दीक्षांत समारोह है। प्रातः काल से ही चहल कदमी चल रही हैं । प्यारे काका कलाम को नजरे बिछाए इंतजार कर रहे हैं । जिस प्रकार से बाल प्रेम के कारण नेहरू जी का जन्मदिन बालकों को समर्पित है।
उसी प्रकार कलाम जी भी समर्पित हैं । बाल प्रेम होता ही ऐसा है जिसमें हम अपने आपके अस्तित्व को भुला देते हैं । एक सामान्य किसान घराने से सफर करते हुए राष्ट्रपति के उच्च पद की प्राप्ति एक महान उपलब्धि कहीं जा सकती हैं ।काका जी का स्वप्न है 2020 तक भारत को एक सशक्त समृद्ध विकसित भारत की कल्पना की है ।
जीवन में सफल होने के लिए स्वप्न देखना आवश्यक है । फिर उसमें संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ लग जाना चाहिए।
साथी भैया / बहन विशेष पोशाक पहने हुए जाते हैं तो सुरक्षा गार्ड रोक देते हैं। ऐसी बातों में कभी-कभी क्रोध आता है परंतु उनकी सेवा के प्रति ईमानदारी से हृदय भर गया । सभी के हृदय में खुशी आनंद झलक रही है । जो इस बात का सबूत है कि अभी वह क्षण नहीं गए जिससे जीवन की संवेदनाएं सूखी नहीं है।
मेरी डायरी से : भाग – २८
नदबई शक्तिपीठ के परिजनों के भावों को देखकर ह्रदय प्रसन्नता से भर गया । पूज्यवर का उद्देश्य रहा है कि शक्तिपीठ जन जागरण का केंद्र बने। इसमें प्रत्येक परिजन भैया बहनों एक सहयोगी बन कंधे से कंधे-से-कंधा मिलाकर चल सकें। लोगों में व्याप्त अनास्था को कम किया जा सके।
जहां बाल संस्कारशाला हो । जिसमें बच्चों की किलकारियां गूंजे । वहीं व्यायामशाला के माध्यम से शारीरिक क्षमता को भी विकसित किया जा सकें । सब कुछ होते हुए भी यदि लोगों की आस्थाएं न जुड़ सके तो सब बेकार समझना चाहिए।
गायत्री शक्तिपीठ के परिवाजक जी तो जैसे पूरे हनुमान जी हैं। उनकी फूर्ति देखने काबिल है। गुरु के प्रति ऐसा समर्पण प्रेम बहुत ही कम देखने को मिलता है । मीना दीदी को जैसे साक्षात मां ही हो । वह प्यार दुलार बरबस याद आ जाता है । यह 5 दिन में ऐसे लग रहे थे जैसे हम पांच बरस से एक दूसरे से परिचित हो ।
कभी एहसास नहीं हुई कि हम घर के बाहर हैं। सभी की यह इच्छा थी कि कुछ दिन और रुक जाए। परंतु समय की रफ्तार रुकने को कहां है वह तो चलती ही जा रही है । हम तो मात्र एक मुसाफिर हैं। कोई मिलेगा कोई बिछड़ेगा हम किस किससे मिलते रहेंगे।
मेरी डायरी से : भाग – २९
प्रातः यज्ञ के पश्चात अखंड ज्योति के दर्शन किए। पूज्य गुरुदेव के 24 वर्षों तक यहीं रहकर तपस्या संपन्न किए थें । हृदय में असीम शांति का अनुभव हो रहा था जैसे महाकाल का तप संपूर्ण ब्रह्मांड को आलोकित कर रहा हो । जन्मभूमि में दर्शन करने गए तो वहां सुरक्षा का गहन पहरा लगा हुआ था।
आतंकी छाया संपूर्ण परिषद में विद्यमान दिखाई दिया। आज संपूर्ण मानव जाति इस आतंकवाद के साए में जीने को अभिषप्त है। किसी को कोई समाधान नहीं सूझ रहा है । कहां जाएं क्या करें ऐसे में मुरली वाले की मुरली की धुन ही वह रास रचा सकती है इसमें सभी प्राणी शांति का अनुभव कर सकें।
एक विद्यालय में जब गए तो देखा कि मैडम सो रही है। बच्चे भी ऊंघ रहे हैं । जैसे किसी कूड़ेदान से लाकर पटक दिए गए हो । वर्तमान पीढ़ी की दुर्दशा देखकर ह्रदय करुणा से भर गया। जिम्मेदार कौन है ?
शिक्षा के नाम पर लूटने वाले शिक्षा विभाग या फिर जिसे जिम्मेदारी दी गई है। हम अपने बच्चों से कैसी आशाएं रख सकते हैं ?
दूसरे विद्यालय में अधिकांश बच्चे प्रातकाल चाय पीने के पश्चात शौच करने जाते पाए गए। जिससे पेट दर्द , चेहरे में झुर्रियां स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे।
मेरी डायरी से : भाग – ३०
आज जन्म भूमि आवल खेड़ा के दर्शन किए। जिन भी लोगों से मिला अधिकांश लोगों की इच्छा थी की बताएं गुरु जी के बारे में क्या जानना चाहते हैं ? जब-जब इस धरा पर किसी महापुरुष ने अवतार लिया उन्हें कौन पहचान सके? क्योंकि उनकी लीला तो सामान हीं रही ।
जिस ऋषि सत्ता सत्ता को नमन करने को पूरा विश्व लालाइत है उसी को लोग आज उपेक्षा की दृष्टि से वहां के लोग देखते हैं । गांव को देखने पर कहीं पर भी ऐसा आभास नहीं हो रहा था कि यह किसी महान व्यक्ति का गांव हों।कुछ लोगों की यह भी धारणा है कि कुछ भी हो जाए यहां के लोग नहीं बदल सकतें।
एक बूढ़े बाबा का कहना था जब मैं हिंदुओं को भी मंदिर के सामने अंडे वगैरह खाते देखता हूं तो हृदय पीड़ा से भर जाता है। और सोचता हूं सत्याग्रह कर दूं।
एक बाबूजी का कहना था गुरुजी को छपको मां का आशीर्वाद ही है कि वह इतने महान हुए। जो अपने से छोटे का सम्मान करता है। सेवा सुश्रुवा करता है वह एक दिन जरूर महानता के उच्च शिखर पर पहुंचता है । पूज्य गुरुदेव को किसी के दुख कष्ट को देखकर उनका हृदय पीड़ा से व्याकुल हो जाता था।
पूज्यवर के जीवन के अधिकांश साथियों का निधन हो चुका है । जो कुछ भी जानकारी है वह अधिकांश मान सम्मान पाने की ललक जैसी है।
महाविद्यालय में जब बहनों से अपेक्षा में सरकार से लिखने को बोला तो मैडम बोली -” आप लोग किसी पार्टी से जुड़े हुए लगते हैं । धार्मिक लोगों को राजनीति में नहीं आना चाहिए। बहनों से बात करने पर लगभग विद्यालय में कभी गायत्री यज्ञ जैसी बातों की चर्चा नहीं की जाती है।
सामान्य जीवन में जो क्रम अध्यापकों का होता है वही अपनाते हैं। अधिकांश बहनों की इच्छा है कि परम लक्ष्य की प्राप्ति हो।हमारे जीने का उद्देश्य क्या है?
आधुनिक टेक्नोलॉजी ज्ञान विज्ञान की बातों को भी कई बच्चे जानने की इच्छा रखते हैं? उनकी इच्छा है कि मैं अच्छा बनूं । अच्छे से अच्छा कार्य करु जिससे आगे बढ़कर देश समाज का नाम कर सकूं। अधिकांश बच्चों के विचार सकारात्मक थे। परिवार में आदर्श हों । सब मिलजुल कर रहे । घृणा द्वेष कलह ना हो।
मेरी डायरी से : भाग – ३१
आज आवल खेड़ा गांव में घूम कर लोगों के गुरुवर के भावों विचारों को जानने का प्रयास किया । सभी व्यक्तियों ने पूज्य गुरुदेव के जीवन को उज्जवल ही बताया । उनका जीवन तो सूर्य के समान तेजस्वी है। कोई उन पर कैसे टिप्पणी कर सकता है? मत्त जी हर समय दूसरों की सेवा में लगे रहते थे । किसी के दुःख क्लेश को देखकर वो द्रवित हो जाते थे।
आज एक घर में गए तो बहन जी बाजरे की रोटी बना रही थीं ।बरबस कहने लगी खा लो भैया तो बहन के प्यार को ठुकरा नहीं सका। सत्य है हमें जिसकी सेवा करनी है वैसा ही बनकर कर सकते हैं। उनके दुख दर्द में शरीक हुए बिना हम नहीं जान सकते कि उनको क्या आवश्यकता है ?
एक माताजी का घर गिर पड़ा था। बेटे बहु आगरा में अलग रहते थे । जिसको जन्म दिया आज वही छोड़कर जिगर का टुकड़ा अलग हो गया है। दुनिया में कोई किसी का नहीं है, सब स्वार्थी है । बेटे बेटी किस काम के जो बुढ़ापे में सहारा ना बन सके।
गुरुवर के सहपाठी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री मुंशी जैन सिंह के सुपुत्र डॉक्टर लाखन सिंह का दर्द है कि आचार्य जी ने हमारा उल्लेख कहीं नहीं किया है । हमारे पिताजी और हम साथ साथ आचार्य जी के साथ जेल गए थे।
एक बुढ़िया मां कहती है -” यदि गुरुजी कृपा करके हमारा घर बना दे तो बहुत उपकार होगा। उनका घर गिर चुका है। दूसरों के घर में गुजर बसर कर रही हैं । सत्य ही आदमी को गरीबी क्या-क्या नहीं करवाते?
एक भाई को शिकायत है कि गुरुजी दूर दूर खूब कर रहे हैं गांव वालों के लिए कुछ नहीं किया। कुछ गांव का भी ख्याल करना चाहिए।
एक मां की शिकायत थी -” एक भाई आकर हमारे यहां खाते पीते थे। जाते वक्त किराया भाड़ा भी लेकर गए। कह कर गए थे कि लौटा दूंगा फिर अभी तक दिखाई नहीं पड़े। जब कुछ भाइयों से यह पूछा गया कि बताइए यदि आपके बच्चे यदि आचार्य जी के बारे में पूछेंगे तो आप क्या जवाब देंगे?
तो दूसरा भाई बोला -” यह भी एक प्रश्न हो सकता है?” परंतु कुछ सार्थक उत्तर नहीं दे सके। छोटे-छोटे बच्चों में गुरुवर के बारे में जानने की जिज्ञासाएं दिखाई दिया परन्तु हम कभी उनको बताने का प्रयास करें तब ना ।
बच्चे तो प्रवचन के रूप में नहीं खेल-खेल में ही सीखना चाहते हैं। बच्चों को सीखने के लिए हमें बच्चा बनकर ही सीखाना पड़ेगा । कई बच्चों के आज जब नाखूनों को काटे तो बहुत खुश दिखाई दिए।
मेरी डायरी से : भाग -३२
गांव के एक भाई ने बताया कि पहले आंवलखेड़ा में सुरा सुंदरी दोनों की व्यवस्था थी, यहां के ठाकुर लोग दिन दिन भर जुआं ताश खेला करते थे। रात में मुजरा हुआ करता था। गुरुदेव की कृपा से ही सब बंद हो चुका है। आजादी के बाद तक यहां वेश्याएं रहती थी।
व्यावस्थापक महोदय मुझसे कुछ नाराज से दिखे । कारण उनसे बिना आज्ञा लिए हमने प्रोग्राम बनाया । गांव में भ्रमण किया। सत्य है अहम तो सभी के अंदर पाया जाता है । हम हो या आप संसार केवल मात्र प्रेम का भूखा हैं । संसार में जो कुछ भी शुभ व अच्छा दिखता है वह प्रेम हीं है ।
हम किसी को प्रेम से ही बदल सकते हैं। किसी को जबरदस्ती हम उसमें परिवर्तन नहीं ला सकते । आज आदर्श कहने की नहीं बनने की आवश्यकता है । देखा जा रहा है हमारे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में सम्मान पाने की ललक बढ़ती जा रही है । मैं वरिष्ठ हूं तो सभी मेरा सम्मान करें । कोई आखिर क्यों किसी का सम्मान करेगा । आप सम्मान के काबिल तो बनो सम्मान स्वयं मिलने लगेगा। सम्मान के योग्य बनो तो पहले।
युग निर्माण के बच्चों से आज प्रातः मुलाकात हुई । सभी बहुत ही उत्साहित दिखे लेकिन वही जबरदस्ती आदर्श ठोकने का दर्द यहां भी देखा । पूज्य गुरुदेव द्वारा स्थापित निर्माण विद्यालय 40 वर्ष होने के बाद भी उसी स्थिति में दिखाई पड़ रहा है।
संपूर्ण साधन होने के बाद भी एकमात्र प्रेम की कमी के कारण उसे भुना नहीं पा रहे है । बच्चे आते हैं आधे से ज्यादा छोड़कर भाग जाते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ३३
आज प्रातः उठा तो देखा कि युग निर्माण विद्यालय के आचार्य जी बच्चों को प्रेम पूर्वक उठा रहे हैं। जो भाई सोए हुए हैं उन्हें उनको मालिश करते हैं । जिससे शर्मा कर बच्चे स्वयं उठ बैठते हैं और कहते हैं -” क्या कर रहे हैं श्रीमान जी । मुझे क्यों शर्मिंदा करते हैं”
सत्य है जिसे जो कार्य हमें सिखाना है पहले उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए एवं करके दिखाने का प्रयास करना चाहिए।
जब वहां से चलते हैं तो एक भाई मुझे छोड़ने आते हैं। दूसरे भाई तब तक दौड़ते हुए आता है एवं कहता है -” श्रीमान जी आपका यहां सात रुपए गिरा हुआ पड़ा मिला था । उसे हम देने आए हैं और वह उसे लौटा देता है । हम लोग किसी का कुछ भी गिर पड़ा मिलता है तो उसे हम लौटने का प्रयास करते हैं। अपने पास नहीं रखते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ३४
आज प्रातः सोनिया विहार के उदय पब्लिक स्कूल में योग का कार्यक्रम था । माननीय प्रधानाचार्य विशेष रूप से बच्चों की मानसिकता को तैयार कर रहे थे कि बच्चे योग सीखें। सभी बच्चे पंक्ति बद्ध बैठे थे ।
संपूर्ण प्रांगण में अनुशासन ही अनुशासन दिखता था। हमारे क्लास में पहुंचने के पहले बच्चे पद्मासन लगाकर बैठने लगे थे। कक्षा के अध्यापक बंधु भी बहुत ही सुशील और सभ्य दिखाई दिए। जो कुछ हम कहते थे यदि बच्चे नहीं कर पाते थे तो वह स्वयं करने लगते लगती थी।
मेरी डायरी से भाग – ३५
वर्तमान समय में व्यक्ति हंसना भूल गया है जिसके कारण वह विभिन्न प्रकार के बीमारियों से ग्रसित होता जा रहा है। हंसने में आनंद है … हंसने में सौंदर्य है… हंसने में मजा है। लेकिन हम है कि मुंह लटकाए बैठे हैं।
आइए हम अपने ऊपर से अकारण हंसे । हसी ना आती हो तो कोशिश करके हंसे, ध्यान पूर्वक हंसे, हंसी को फैलाएं । एक मात्र हंसी ही ऐसा भाव है जिसका व्यक्तित्व और वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
हंसी मुस्कुराहट और गुदगुदाहट मां-बाप और बच्चों के बीच एक सेतु बनाने का कार्य करता है। जब मां-बाप और बच्चों को गुदगुदाते हैं तो वह हंसता हैं , मुस्कुराता है जवाब में मां-बाप भी मुस्कुराते हैं। इस तरह बच्चा मां-बाप को देखकर हंसी को सीखता है और उसके भावों को समझता है ।
आज के माहौल में जहां चारों तरफ से नकारात्मक भावों के कारण शरीर क्षीण हो रहा है , हंसी का सुदर्शन चक्र इन सभी भावों को काट एक सुरक्षा कवच निर्मित करता है।
इसके लिए रात्रि में सोने से पूर्व हंसी से लोटपोट हो जाएं । सिर्फ 10 मिनट करना है फिर सो जाएं। इसी प्रकार सुबह उठने के पश्चात भी सबसे पहले यह करें । अर्थात रात में सबसे अंतिम और सुबह सबसे सर्वप्रथम इसे करें।
रात्रि की हंसी नींद में सहायक होगी एवं प्रातः काल की हंसी पूरे दिन को एक नई दिशा देगी । जो भी कार्य हम सबसे पहले करते हैं वही भाव पूरे दिन छाए रहते हैं वहीं पूरे दिन को दिशा देता है।
मेरी डायरी से भाग – ३६
कहावत है कि जैसा खाए अन्न वैसा बने मन । यानी खान पान का असर दिल और दिमाग पर पड़ता है। यह न सिर्फ सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है बल्कि मांसाहार से होने वाले कई तरह की बीमारियों से बचाव भी होता है।
वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि शाकाहारी लोग लंबे समय तक न सिर्फ स्वस्थ रहते हैं बल्कि दीर्घायु भी होते हैं।
शाकाहारी भोजन में बहुतायत में रेशे पाए जाते हैं इसमें विटामिन तथा लवणों की मात्रा मांसाहारी की अपेक्षा काफी ज्यादा होती है ।
शाकाहार भोजन में पानी की मात्रा ज्यादा होती है इससे मोटापे की समस्या नहीं होती है। मांसाहार की तुलना में शाकाहारी भोजन में संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी कम पाई जाती है । इस कारण हृदय रोग का खतरा भी काफी घट जाता है। अनाज ,फली , फल और सब्जियों में रेशे और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं यह कैंसर जैसी घातक बीमारियों से बचाते हैं।
अमेरिका के शोधकर्ताओं के मुताबिक मांसाहार का असर व्यक्ति की मनोदशा पर भी पड़ता है । लोगों की हिंसक प्रवृत्तियों का सीधा संबंध उनके खान-पान से पाया गया है ।
शोध के अनुसार मांसाहार के नियमित सेवन से युवाओं में धैर्य की कमी, छोटी-छोटी बातों पर हिंसक हो जाते हैं और दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति पाई जाती है।
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह मांसाहार छोड़कर के शाकाहार का उपयोग करें और स्वस्थ रहे।
मेरी डायरी से : भाग – ३७
आज मैं एक विद्यालय में गया। यहां पर बच्चों को कुछ प्रश्नोत्तरी लिखने के लिए दिया। फिर बच्चों से उन प्रश्नोत्तरी के उत्तर लिखने के लिए कहा।प्रश्नोत्तरी है–
१- वर्तमान के लक्षण को प्राप्त करने के लिए आपने कब से विशेषता तैयारी शुरू की?
२- अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में क्या आप पूर्णत है? यदि हां तो आप क्या विशेष प्रयास कर रहे हैं?यदि नहीं तो क्यों?
३- क्या आप अपने को टॉप टेन की मेरिट में आने के योग्य समझते हैं ?यदि हां तो उसके लिए आप क्या विशेष प्रयास कर रहे हैं ?
४- क्या आप विद्यालय/ कोचिंग/ बाजारू श्योर सीरीज के नोट्स पर निर्भर है या फिर अपने नोट्स स्वयं बनाते हैं?
५- अपने नोट्स बनाने की कला को प्री/ मेन्स परीक्षा को ध्यान में रखते हुए बिंदुओं में बताएं । विज्ञान , गणित के सूत्रों को याद करने की क्या आपने कोई विशेष शैली ज्ञात की है ?यदि हां तो उसका उल्लेख करें?
६- क्या आप यह सोचते हैं कि यदि हम वर्तमान लक्ष्य का निर्णय पूर्व कक्षाओं में ही ले लिए होते तो और अच्छा कर सकते थे ?
७- क्या आप अपने को जड़हीन मानते हैं ?क्या आपको सफलता प्राप्त करने के लिए पूर्व कक्षाओं की पुस्तक पुनः पढ़नी पड़ती हैं ? यदि हां तो ऐसी स्थिति में आप अपने छोटी कक्षाओं के साथियों को क्या सुझाव देना चाहेंगे जिससे वह ऐसी स्थिति से पूर्व सचेत हो सके?
८- क्या आपका लक्ष्य इंटर हाई स्कूल में ही क्लियर हो गया था ?
९- आपका आईआईटी पीएमटी जैसे विषयों के प्रति क्या हाईस्कूल इंटर में निर्णय कर चुके थे या मां पिताजी के दबाव के कारण कोचिंग कर रहे हैं?
१०- आप अपने प्रथम प्रयास के प्रति कितने आस्वस्थ हैं ?क्या आप प्रथम प्रयास में ही टाप टेन में आ सकते हैं ?
११- परीक्षा पीरियड में यदि घर का दबाव ,दोस्तों का आना-जाना, प्रेमी प्रेमिका की याद सताने लगे तो आप मानसिक और भावनात्मक संतुलन कैसे बनाते हैं?
१२- क्या आप यह अनुभव करते हो कि प्रभु ने आपको किसी विशिष्ट कार्यों के लिए नियोजित करके जन्म दिया है? आपने कभी उस विशेष कार्य के प्रति क्या कभी सजग हुए?
१३- क्या आप यह अनुभव करते हैं कि जब हम डॉक्टर बन जाएंगे तो ऐसे श्रेष्ठ कार्य करेंगे जिससे मानव सुखी रह सके?
१४- एक अच्छे डॉक्टर के क्या गुण होने चाहिए ? क्या आप अपने अध्यापकों के व्यवहार एवं चरित्र से संतुष्ट है? यदि आप अध्यापक होते तो अपने बच्चों को किस तरह शिक्षित करते? लिखें ।
१५- आज के कंपटीशन के युग में जहां कुछ सीटों के लिए हजारों लाखों लोग परीक्षा में सम्मिलित होते हैं । ऐसे में आपको लाखों में एक चमकते सितारों के रूप में उभरना है तो आप अपने किन विशिष्ट गुण परीक्षा की तैयारी / उत्तर लिखने एवं साक्षात्कार को ध्यान में रखते हुए लिखें?
इस प्रकार से बच्चों को यदि प्रारंभ में मोटिवेट कर दिया जाए तो वे एक सफल विद्यार्थी के रूप में उभर सकते हैं। इससे एक तरफ बच्चों का समय बचता है दूसरी तरफ अभिभावकों के गाड़ी कमाई।
मेरी डायरी से : भाग – ३८
आज मैं एक मोटिवेशन क्लास में गया जहां पर जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए संक्षिप्त रूप में बताया गया ….
१- लक्ष्य लिखित हो।
२- लिखित लक्ष्य को 24 घंटे में चार बार जरूर देखें ।
३- लक्ष्य व्यवहारिक हो।
४- लक्ष्य हमारे सिद्धांत और नैतिक मूल्यों के खिलाफ ना हो।
५- लक्ष्य को प्राप्त करने का कारण हमें ज्ञात हो ?
६- लक्ष्य की समय सीमा निर्धारित हो ।
७- समय-समय पर लक्ष्य व उनकी प्रगति को सार्वजनिक करते रहें ।
८- एक लक्ष्य से दूसरे लक्ष्य में सामंजस्य निर्धारित करें।
९- छोटी-छोटी जीत का पूर्ण आनंद मनाए ।
१०- लक्ष्य को लघु खंडों में विभाजित करें।
११- लक्ष्य प्राप्ति में साथी की तलाश करें।
१२- समय-समय पर प्रगति का मूल्यांकन करते रहें ।
१३- जरूरत पड़ने पर प्रोफेशनल व्यक्तियों की मदद लेते रहे।
१४- अतिरिक्त प्रतिक्रिया ना करें।
१५- लक्ष्य की सफलता के प्रति आस्वस्थ रहें ,शंका न करें ।
१६- हम लक्ष्य को प्राथमिकता के आधार पर चुने।
१७- हर महीने अपनी प्रगति की रिपोर्ट बनाएं ।
१८- सफलता मंजिल नहीं बल्कि एक पड़ाव मात्र है।
१९- स्वयं पर विश्वास करें।
उसमें बताया गया कि यदि उपयुक्त बातों का ध्यान रखेंगे तो सफलता हमे सहज में ही मिलने लगेगी।
मेरी डायरी से : भाग – ३९
महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं बहुत ही शिक्षाप्रद हैं। बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा कि बालों के श्वेत हो जाने से कोई पूजनीय नहीं हो जाता वरन जो ज्ञान वृद्ध है और तदनुसार आचरण करते हैं उसी को पूज्य मानना चाहिए।
बुद्ध ने कहा है कि…
१- दूसरों के दोष ना निकालना।
२- अपवित्र भाषण ना करना।
३- लालच ना करना।
४- दूसरों से घृणा ना करना।
५- अज्ञान से बचाना।
बुद्ध के समकालीन महावीर स्वामी थे परंतु उन्होंने जो ज्ञान दिया उसको बहुत कम लोग ही अपना सके। क्योंकि वह बुद्ध के समान व्यावहारिक नहीं थे। साथ ही वह काल एवं परिस्थित के अनुरूप स्वयं को ढाल नहीं सके जबकि बौद्ध दर्शन सहज होने के कारण भारत ही नहीं पूरे विश्व में श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, चीन, जापान आदि में आज भी करोड़ों की संख्या में बौद्ध के अनुयाई पाए जाते हैं । उन्होंने आम्रपाली जैसी गणिका के घर जहां भिक्षा ग्रहण करना स्वीकार किया । वही अंगुलीमल जैसे डकैत का हृदय परिवर्तन भी कर दिए।
बुद्ध ने लगभग 45 वर्षों तक देश भर में भ्रमण करके जनता को सत्य धर्म के उपदेश दिए। उन्होंने समाज में व्याप्त धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड को दूर किया । लोगों को सहज और सरल मार्ग दिखाया । परंतु बुद्ध के अवसान के पश्चात उनके अनुयाइयों के मठों में सारे सुखोपभोग के साधन मौजूद होने के कारण व्याभिचार बढ़ने लगा। साथ ही जिस सनातन धर्म के विरोध में बौद्ध धर्म में पनपा था। जब आदि गुरु शंकराचार्य ने देखा की बौद्ध मठ मात्र सुखों भोग के केंद्र ही रह गए तो उन्होंने पुऐ सनातन संस्कृति की पताका फहराई और बौद्ध धर्म का भारत से धीरे-धीरे विलोप होने में देर नहीं लगी।
मेरी डायरी से : भाग – ४०
आज अखिल विश्व गायत्री परिवार शाखा मुरैना द्वारा आयोजित राष्ट्र जागृति दीप महायज्ञ के दूसरे दिन का प्रारंभ प्रातः 6:00 बजे से योग ध्यान के साथ प्रारंभ हुआ। कार्यक्रम के संचालक योगाचार्य धर्मचंद्र ने कहा कि योग जीवन जीने की कला है।
समाज में बढ़ते घृणा , द्वेष, नफरत आदि समस्याओं से योग द्वारा सहज में परिवर्तन लाया जा सकता है । योग भावनाओं में परिवर्तन लाता है। यदि हम नियमित रूप से गायत्री मंत्र जप , प्रज्ञा योग व्यायाम, अनुलोम विलोम प्राणायाम, आदि का अभ्यास करें तो हमारे अंदर सकारात्मक भाव की वृद्धि होने लगेगी। समाज में फैले जात-पात, उच्च नीच ,वर्ग भेद को भक्तियोग के माध्यम से ही दूर किया जा सकता है। क्योंकि भक्तों की कोई जात नहीं होती है —
हरि को भजे सो हरि का होई जाति पाति पूछे नहीं कोई।
कार्यक्रम के टोली नायक श्री राकेश प्रताप सिंह ने कहा कि समय-समय पर जब-जब धरती पर अनाचार ,दुराचार, भ्रष्टाचार दुष्प्रवित्रियां बढ़ने लगती हैं तो मानवता की रक्षा के लिए प्रभु प्रभु स्वयं धरती पर अवतार लेते हैं । वे जहां त्रेता युग में राम के रूप में आए तो वहीं द्वापर में कृष्ण के रूप में और वही अवतारी चेतना मानवता को प्रेम , करुणा , सेवा, संयम का संदेश देने के लिए आज पंडित श्रीराम शर्मा के रूप में जन्म ली है।
आज का राक्षस सूक्ष्म रूप से मनुष्य के मन में बैठकर उसके चिंतन चरित्र को नष्ट कर डाल रहा है। इसलिए विचार क्रांति अभियान की आवश्यकता है। यही कारण है कि आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा ने 3200 युग साहित्य का सृजन किया ।जिसका जो भी स्वाध्याय ,चिंतन, मनन करेगा वह बदलता हुआ चला जाएगा।
संस्कार का महत्व बताते हुए अशोक कुमार सिंह ने कहा कि संस्कारों के कारण मनुष्य द्विज बनता है। सामान्य माता-पिता सभी जीवो का जन्म होता है परन्तु मनुष्य की विशेषता उसके संस्कारों के कारण है।
मेरी डायरी से : भाग – ४१
शांतिकुंज की डॉ आशा साहू ने आज शांतिकुंज पंडाल में प्रवचन देते हुए कहा कि दवाओं के साथ नहीं योग के साथ जिए। डॉक्टर के पास हम सर दर्द , पेट दर्द आदि की दवा तो मिल सकती हैं परंतु क्या ऐसी कोई दवा बनी है जिससे हमारा इर्षा करना , द्वेष , घृणा नफरत से मुक्त हो सकते हैं।
उन्होंने आगे बताया कि राजतंत्र के साथ जब धर्म तंत्र जुड़ जाता है तो सोने में सुहागा बन जाता है। आज जो भी गायत्री परिवार के बारे में नहीं जानते फिर भी उनके बारे में इतनी श्रद्धा है कि वह भी विश्वास करते हैं यह व्यक्ति विश्वास के योग्य होगा ।
संत प्रकृति के लोग जब आते हैं तो वह कभी भी छूत अछूट की बातें उनके मन में नहीं आती है। ऐसी सत्ताएं सामान्य व्यक्ति को एकत्रित करके बदलाव की आंधी चलाते हैं । हमें विश्वास है कि गायत्री परिवार आगे बहुत बढ़ेगा एवं गुरुदेव के सपनों को साकार करके रहेगा।
शांतिकुंज में आज करोड़ों लोग जुड़कर अपने जीवन को धन्य बना रहे हैं।
मेरी डायरी से : भाग -४२
मध्य मार्ग जीवन का श्रेष्ठतम मार्ग है लोग या तो आती में चले जाते या कुछ नहीं करते हैं। लेकिन अति में जाना और कुछ नहीं करना तो सरल है परंतु मध्य में रहना अत्यधिक कठिन है। जो व्यक्ति मध्य में रहता है ना अति ना कम ऐसा जीवन ही योगमय जीवन है । जिसे सम्यक भाव से जीना कहा जाता है।
सम्यक पुरुष न किसी बात पर अत्यधिक खुश होता है ना ही अत्यधिक दुखी बल्कि उसके जीवन में सम्यकत्व का भाव होता है । वह मध्य में रहता है। अडिग ,स्थिर , अचल । यह प्रेम का मार्ग है। प्रेम भी अडिग होता है । अति आसक्ति तो मोह का रूप हो जाती है ।
मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह एक अति से हटकर दूसरे पर चला जाता है । उसे लगता है कि परिवर्तन हो रहा है परंतु वस्तुतः कोई परिवर्तन नहीं होता बल्कि एक व्यक्ति मात्र एक अति को छोड़ दूसरी अति में चला जाता है।
मेरी डायरी से : भाग – ४३
शरीयत कानून जैसा घातक है- मनुस्मृति आधारित वर्ण व्यवस्था । जिसके कारण हजारों वर्षों से करोड़ों लोगों को जानवरों से भी बदतर जीवन गुजारना पड़ा। वर्ण व्यवस्था के कारण ही भारतीय समाज में ऊच नीच के भेदभाव की ऐसी अभेद दीवार खड़ी कर दी गई कि मनुष्य का जीवन जानवरों से बदतर हो गया।
लोग एक दूसरे के छुए पानी नहीं पी सकते थे। यही नहीं जिस रास्ते पर मनुस्मृति रचयिता सवर्ण चल रहा हो उस पर उसके द्वारा बनाया अछूत रास्ते को बदलकर चलना पड़ता था।
वास्तव में इसकी जड़ में वर्ण व्यवस्था है । जब तक वेदों, उपनिषदो, गीता, रामचरितमानस जैसे ग्रन्थों में इसे बदल नहीं दिया जाता तब तक ऊच नीच की भावना समाप्त होना मुश्किल है ।
प्राचीन काल के सभी सवर्ण ऊंच नीच की मानसिक कुंठाओं से ग्रस्त थे जो कि आज भी किसी न किसी रूप में घटनाएं होती रहती हैं। जिसमें सवर्णो द्वारा निम्न जाति के लोगों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है।
मेरी डायरी से : भाग- ४४
जिंदगी का हर पहलू अद्भुत है। अनमोल है, प्रकृति की मादकता से परिपूर्ण है । अब अभागे हैं वे लोग जो हर क्षण जिंदगी के प्रति नकारात्मक बने रहते हैं। ऐसे लोगों का जीवन शिकवा शिकायतों से भरा होता है । या तो यह लोग भूतकाल की घटनाओं के प्रति सोच खुश होते रहते हैं या भविष्य की कल्पना में डूबे रहते हैं ।
क्या कहे भाग्य साथ नहीं देता? हमारे ग्रह नक्षत्र ही खराब हैं। हमारे जीवन में ही ऐसा क्यों होता रहता है ? ना जाने कितनी शिकायतों की लिस्ट उनके पास होती है।
अतः हम सभी संकल्प लें कि कभी शिकवा शिकायत में जिंदगी में नहीं करेंगे और प्रभु की बनाई इस दिव्य बगिया को सतत पुष्पित पल्लवित करते रहेंगे। ।
मेरी डायरी से : भाग – ४५
हम आर्य श्रेष्ठ हैं । हमने सदैव वेदों के ज्ञान को संपूर्ण विश्व में फैलाएं। वैदिक ज्ञान हमारे धरोहर है । वेदों में कहीं भी मियां मजार पीर मदार ताजिया आदि कब्रों की पूजा का विधान नहीं है। इनका पूजा करना महा पाप है। भाइयों !
जब से हमने वैदिक संध्या उपासना को भूलकर गाजी मियां की पूजा करना, ताजियों पर चढ़ावा चढ़ाना , कब्रो की पूजा करना, मस्जिदों पर लड़कों को लेकर फूंक डलवाने लगे तभी से आर्य श्रेष्ठ हम संतानों का अंधपतन हो गया।
भाइयों !बहनों ! गाजी कौन थे? जिनकी पूजा पूरे उत्तर प्रदेश में हो रही है ।
यह हमें समझना होगा । फूलपुर तहसील के सिकंदरा जो की मूल रूप से शिव कंदरा थी वहां पर गाजी मियां कैसे पूजित हुए, वहां पर गाजी मियां कभी आए भी थे या नहीं इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है । फिर भी हमारे मूड़ हिंदू भाइयों , डफालियों, मुजावारों के बहकावे में आकर अपना सिर पीट रहे हैं और अपनी बहू बेटियों को भी झाड़ फूंक के चक्कर में फंसाए हुए हैं। यह कितनी शर्म की बात है।
देवता 33 कोटि तजी पूजे शाह मदार ।
ऐसे हिंदू अधम को ,बार-बार धिक्कार। ।
भाइयों ! कितनी लज्जा की बात है ।जिन लोगों ने हिंदुओं को लूट मारकर कत्ल किया और जो गाय का मांस खाते थे , जिनका छुए पानी हिंदू जीते जी नहीं पीते, मर जाने पर उनकी कब्रों पर सर पटके उनको अपना देवता मान पूजा रेवड़ी उन मुर्दों पर चढ़ाकर खा जावे।
भाइयों ! गाजी मियां की सत्यता को हमें समझना होगा। गाजी महमूद गजनवी का भांजा था । उसने हिंदुओं को मुसलमान बनाया , मंदिर गिराए , जो मुसलमान ना बने उनको कैद किया । गाजी मियां के झंडे पर देखें तो बाल होते हैं। यह बाल क्या है? यह हिंदुओं की चोटी के बाल हैं ।
जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो बहराइच की लड़ाई सन 1034 ईस्वी में श्री महाराजा सुहेलदेव सिंह जी ने गाजी मियां को मार डाला था। गाजी मियां के मारे जाने के 317 वर्ष से पीछे 1351 ईस्वी में फिरोज तुगलक ने अपनी मां के कहने पर बहराइच में गाजी मियां की दरगाह बनवाया । जिस स्थान पर गाजी मियां की दरगाह है उसी स्थान पर अब से 590 वर्ष पूर्व हिंदुओं का पवित्र बलाक तीर्थ था।
इस स्थान पर ब्रह्मा ने पूर्व काल में एक वृहद यज्ञ किया था । वहीं पर पवित्र एक सूर्यकुंड था । सूर्य कुंड पर ज्येष्ठ मास में स्नान का बड़ा पवित्र मेला लगता था । लाखों हिंदू प्रतिवर्ष सूर्य कुंड पर स्नान और सूर्य भगवान की पूजा उपासना करने को इकट्ठा होते थे।
फिरोज तुगलक को गाजी मियां की लाश या कब्र का कुछ भी पता ना लग सका। कुछ मुसलमान के कहने पर की गाजी मियां की लाश को लोगों ने सूर्य कुंड में फेंक दिया था । उसने सूर्य कुंड को मिट्टी से पाटकर इस पर गाजी मियां की दरगाह बनवा दिया जो अभी मौजूद है।
सज्जनो, जिस स्थान पर दरगाह है ना तो उस स्थान पर गाजीमियां गाड़ें गए थे और ना ही उनकी लाश का कुछ ठीक-ठाक पता ही लग सका है। जो मेला बलाकतीर्थ और सूर्य कुंड पर सूर्य भगवान की पूजा उपासना का लगता था मुसलमानो ने उसे गाजी मियां की पूजा का रंग दे दिया। बौद्धों के प्रसिद्ध पुराने मंदिर का नाम कदम रसूल रख दिया गया। शंकर भगवान के त्रिशूल को मुसलमान गाजी मियां के शांग कहकर पुकारने लगे ।
इस प्रकार हिंदू मेले व तीर्थ स्थान को गाजी मियां की दरगाह और पूजा का रूप दे दिया । उनको मरे हजारों वर्ष हो गए । उनकी कब्र का भी कुछ पता नहीं है । कब्र में उनकी एक हड्डी भी बाकी ना होगी ।सत्य बात यह है कि मुजावर व डफाली ही यह करामात दिखाते हैं और हिंदुओं का पैसा ऐठते हैं। इतना ही नहीं गाजी मियां, पीर मदार की पूजा के बहाने अपना दीन धर्म सब गवाते जा रहे हैं।
भाइयों ! डफाली बाल लगा हुआ एक झंडा लिए रहते हैं जिसमें हिंदू लड़कों औरतें बीमारी आदि को झाड़ने फूकते और रवान आदि बजाकर गाजी मियां की तारीफ गाने लगते हैं।क्या आपको पता है कि यह बाल हमारे पूर्वज की सिखाओ की चोटियों के बाल हैं। जिनकी रक्षा के लिए शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह, महाराणा प्रताप जैसे वीर आर्य पुत्रों ने अपनी आहुति दे दी परंतु शिखा कटने नहीं दिया।
पूज्य गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ जी 15 मई 2017 को एक रैली में कहा था कि हर मजहब में राष्ट्रवादी होते हैं। अशफाक उल्ला ख़ां ,अब्दुल हमीद और डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम हमारे उदाहरण हैं। इन पर गर्व है पर गजनी , गोरी , खिलजी, बाबर और औरंगजेब से रिश्ता जोड़ने वालों के लिए समाज में जगह नहीं है। महाराजा सुहेल देव , लाखन पासी , झलकारी बाई आदि की देश में जिन महापुरुषों की उपेक्षा हुई है उनकी जीवनी को अगले सत्र में पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा ।
हमें पूजा करनी चाहिए महाराजा सुहेलदेव जैसे दिव्या महान पुरुषों का लेकिन हम गाजी मियां की पूजा कर रहे हैं यह कितनी शर्म की बात है। योगी जी ने कहा कि करीब हजार साल पहले उन्होंने सैयद सलार मसूद गाजी को कड़ी सिकस्त दी थी । इस युद्ध में आक्रांता के दो सैनिकों को छोड़ कोई नहीं बचा। अगले डेढ़ सौ साल तक कोई भी विदेशी आक्रांता देश पर हमले करने की हिम्मत नहीं कर सका ।
अब हम उनके योगदान को भूल तो नहीं ।केवल देश पर हमले ही नहीं हुए हम गुलाम भी हो गए । सुहेलदेव सामाजिक समरसता के भी प्रतीक थे ।उस समय की विषम सामाजिक व भौगोलिक स्थिति में विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ 27 राजाओं का सहयोग लेना इसका सबूत है।
भाइयों हमें इन डफलियों ओझाओ शोखाओ के बहकावे में नहीं आना चाहिए जो कि हिंदुओं को समझाते फिरते हैं गाजी मियां औलाद लड़का देते हैं। उनको पूजने से लड़के नहीं मरते। बड़ी बरकत होती है। प्रत्येक हिंदू को चाहिए कि गाजी मियां की पूजा भूल कर भी ना करें । अपने भगवान की पूजा प्रेम से करें तो एक गाजी मियां क्या हजारों गाजी मियां उसका बाल भी बांका नहीं कर सकते।
सांचे को माने नहीं ,झूठे जग पतियाए ,
तुलसी भेड़ी के धसन जग बहराइच जाए ।।
अतः हे श्रेष्ठ आर्य पुत्रों जागो। मियां मजार की पूजा त्याग वैदिक पद की ओर लौटो। अपना एवं अपने परिवार समाज को बचाओ। नहीं तो तुम्हारी संताने ही तुमको कभी माफ नहीं करेंगी।
मेरी डायरी से : भाग ४६
हमारे जीवन के दुखों का मूल कारण है आसक्ति । जब हम किसी वस्तु को अपना समझने लगते हैं उसको पाने की इच्छा पैदा होती है फिर लगता है कि वह केवल हमारी हो जिससे मोह ,आसक्ति पैदा होती है।
जितनी मात्रा में चाहत बढ़ती है वैसे ही सांसारिक मायाजाल अपना क्रियाकलाप शुरू कर देता है ।। पहले तो आसक्ति जगती है कि उसे वह बंधन नहीं लगता है।
अत मनुष्य को चाहिए वह संसार में कमलवत की तरह रहे। इसलिए साधक पुरुष को चाहिए कि वह निरंतर साधना रत रहे।
मेरी डायरी से : भाग – ४७
१- क्या कारण है कि हम अपनी सभ्यता एवं संस्कार संस्कृति को भूलाते हुए पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने को लालाइत हैं?
२- कॉन्वेंट एवं पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को क्या भारतीय संस्कृति से लगाव रहता है ? आज लोग क्यों किसी को जब धोती, कुर्ता ,पजामा पहने हुए देखते हैं तो उसे पिछड़ा हुआ समझते हैं?
३- क्या कारण है कि हमें 1 जनवरी का नव वर्ष याद रहता है लेकिन चैत्र मास का नया वर्ष नहीं?
४- सोचें अंग्रेजों ने ऐसा क्या जादू कर दिया था कि वह तो चले गए परंतु अंग्रेजियत का बीज हमारी नसों में पिरो दिया है जिसके दुष्परिणाम हमारे बच्चों को 99% अंग्रेजी सीखने में व्यतीत हो जाती है और उसके शिक्षा के सृजनशीलता खत्म हो जाती है?
५- क्या शिक्षा मात्र यही है कि हम सब एक भाषा से दूसरी भाषा बदलना सीख जाएं?
६- गांव में जहां रात सत प्रतिशत मां पिता अशिक्षित है ? क्या उनके अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाए गए बच्चे सफल हो सकते हैं?
७- कौन है वे लोग जो हमारी अस्मिता को ,गरिमा को मिटाना चाहते हैं ? कहीं वह हमारे मित्र बनकर हमारे साथ विश्वासघात तो नहीं कर रहे हैं?
८- क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि हम एक बार पुनः भारतीय संस्कृति की गरिमा को संपूर्ण विश्व में स्थापित कर दें ? क्या हम भारत मां को ऐसे ही रोती बिलखती छोड़ दें? सोचो क्या हमारी मां के आंसुओं की कोई कीमत नहीं?
९- हम अपने घर में गुलाम जैसा जीवन जीने को विवश हैं। कौन है वह लोग जो हमें अपने ही घरों में बंद रखना चाह रहे हैं? कहीं हमारे अंदर वह सांप तो नहीं बैठा है जो हमें डस रहा है?
१०-क्या कारण है कि जितने भी संत महात्मा पैदा हो रहे हैं उतनी ही विकृतियों समाज में फैलती जा रही है?
११- आपका साथी गलत संगत के कारण शराब एवं बीड़ी सिगरेट पीने लगा है । आप उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे–
१- मित्रता छोड़ देंगे
२-उसे सुधारने का मौका देंगे
३- स्वयं शराब पीना शुरू कर देंगे ।
४- उसको उसके भाग्य पर छोड़ देंगे ।
१२- परीक्षा के दिन आपका किसी से झगड़ा हो जाता है और वह आपको मार भी देता है आप क्या करेंगे?
१- आप भी उसे पीट देंगे।
२- चेतावनी देंगे परीक्षा के बाद बताएंगे ।
३-परीक्षा चाहे छूट जाए परंतु उसे बिना मारे नहीं रहेंगे।
४- भावनाओं पर संयम रखेंगे बातों को सह लेंगे ।
१३- आपकी मां अशिक्षित है और वह नहीं जानती कि आप क्या पढ़ रहे हैं तो क्या करेंगे?
१- धोखा देकर विद्यालय के बहाने मौज मस्ती करेंगे।
२- झूठे ही पढ़ने का बहाना करते हुए कॉमिक्स कहानी पढ़ते रहेंगे।
३- मन लगाकर पढ़ेंगे क्योंकि आपको लगेगा की मां को धोखा नहीं देना चाहिए?
यह प्रश्न हमारी डायरी में लिखा हुआ था जो सभी पाठकों के लिए अति उपयोगी है।
मेरी डायरी से : भाग – ४७
हमारी उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है तो अंधविश्वास है। मैं लिखता हूं अंधविश्वास के खिलाफ और लोग मुझे भगवान का विरोधी मान लेते हैं । इसका अर्थ क्या हुआ कि अंधविश्वास ही भगवान ईश्वर आदि है । एक शराबी पिता से ज्यादा घातक और अंधविश्वासी मां होती है क्योंकि शराबी पिता अपने बच्चों को कभी शराबी नहीं बनाना चाहता जबकि अंधविश्वासी मां अपने बच्चों का अंधविश्वासों से भर देती है ।
उनको मानसिक गुलाम बना देती हैं। कमांडो से भी ज्यादा खतरनाक ट्रेनिंग होती है अंधविश्वासी भक्तों की । बेरोजगारी सह लेंगे , दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे , जलील होते रहेंगे परंतु अंधभक्ति नहीं छोड़ेंगे । आज तक संसार में किसी तंत्र-मंत्र, देवी देवता , ईश्वर अल्लाह गाड आदि से किसी का कोई भला नहीं हुआ लेकिन धर्म की घुट्टी ऐसी धर्म गुरुओं ने लोगों के जीवन में भर दिया है कि उससे छुटकारा पाने के बारे में सोच नहीं सकते ।
गरीब आज और गरीब इसलिए होता जा रहा है कि वह अपनी गाड़ी कमाई को अंधविश्वासों में खर्च कर देता है। देश से गरीबी तब तक दूर नहीं हो सकती जब तक कि लोग अंधविश्वास एवं नशा से मुक्ति नहीं हो जाते ।
साथियों ! देखा गया है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा अंधविश्वासी होती हैं।
किसी भी मंदिर, मठ ,दरगाह मजार , प्रवचन आदि में महिलाएं ज्यादा दिखलाइए देती हैं।महिलाओं में बैठे अंधविश्वासों के कारण उनके बच्चे भी अंधविश्वासी बन जाते हैं । महिलाओं ने कभी यह नहीं सोचा कि किसी धर्मगुरु ने कभी किसी मंदिर की मुख्य पुजारी, मस्जिद की मौलाना या चर्च का पादरी बनने का अधिकार नहीं दिया?
लेकिन संविधान ने एक महिला को भी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति , राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक सब कुछ बन सकती है। जिस दिन से महिलाएं वेद, पुराण , गीता , बाइबल ,कुरान की जगह भारतीय सविधान पढ़ने एवं उसका प्रचार करने लगेंगी तो भारत को तरक्की करने से कोई नहीं रोक सकता है। संविधान के सिवाय दुनिया का कोई भी ऐसा ग्रंथ नहीं है जो लिखित में समानता शिक्षा के गारंटी देता हो।
किसी भी धर्म का उद्देश्य मनुष्य और भगवान के बीच संबंध स्थापित करना नहीं होता है बल्कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य मनुष्य के साथ संबंध स्थापित करना होना चाहिए जिससे उनके बीच समता एवं प्रेम भाईचारा स्थापित हो। अगर संसार का कोई भी धर्म इंसान इंसान के बीच समता , भाईचारा और प्रेम की भावना पैदा नहीं कर सकता है तो आप उसे धर्म कैसे कह सकते हैं ?
यह मात्र भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाने का षड्यंत्र हो सकता है। धर्म के नाम पर दुनिया में इतने लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया है जितना की दुर्भिक्ष से भी लोग नहीं मरे होंगे । इसका उदाहरण महाभारत जैसा महायुद्ध था जिसमें दो भाइयों के आपसी संघर्ष में लगभग 60 लाख लोगों को जान गंवानी पड़ी। एक प्रकार से पुरुष विहीन हो गया था समाज । फिर भी हम ऐसे युद्धों को धार्मिक युद्ध की संज्ञा देते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ४८
हमारी उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है तो अंधविश्वास है। मैं लिखता हूं अंधविश्वास के खिलाफ और लोग मुझे भगवान का विरोधी मान लेते हैं । इसका अर्थ क्या हुआ कि अंधविश्वास ही भगवान ईश्वर आदि है ।
एक शराबी पिता से ज्यादा घातक और अंधविश्वासी मां होती है क्योंकि शराबी पिता अपने बच्चों को कभी शराबी नहीं बनाना चाहता जबकि अंधविश्वासी मां अपने बच्चों का अंधविश्वासों से भर देती है । उनको मानसिक गुलाम बना देती हैं।
कमांडो से भी ज्यादा खतरनाक ट्रेनिंग होती है अंधविश्वासी भक्तों की । बेरोजगारी सह लेंगे , दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे , जलील होते रहेंगे परंतु अंधभक्ति नहीं छोड़ेंगे ।
आज तक संसार में किसी तंत्र-मंत्र, देवी देवता , ईश्वर अल्लाह गाड आदि से किसी का कोई भला नहीं हुआ लेकिन धर्म की घुट्टी ऐसी धर्म गुरुओं ने लोगों के जीवन में भर दिया है कि उससे छुटकारा पाने के बारे में सोच नहीं सकते ।
गरीब आज और गरीब इसलिए होता जा रहा है कि वह अपनी गाड़ी कमाई को अंधविश्वासों में खर्च कर देता है। देश से गरीबी तब तक दूर नहीं हो सकती जब तक कि लोग अंधविश्वास एवं नशा से मुक्ति नहीं हो जाते ।
साथियों ! देखा गया है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा अंधविश्वासी होती हैं। किसी भी मंदिर, मठ ,दरगाह मजार , प्रवचन आदि में महिलाएं ज्यादा दिखलाइए देती हैं।महिलाओं में बैठे अंधविश्वासों के कारण उनके बच्चे भी अंधविश्वासी बन जाते हैं ।
महिलाओं ने कभी यह नहीं सोचा कि किसी धर्मगुरु ने कभी किसी मंदिर की मुख्य पुजारी, मस्जिद की मौलाना या चर्च का पादरी बनने का अधिकार नहीं दिया? लेकिन संविधान ने एक महिला को भी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति , राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक सब कुछ बन सकती है।
जिस दिन से महिलाएं वेद, पुराण , गीता , बाइबल ,कुरान की जगह भारतीय सविधान पढ़ने एवं उसका प्रचार करने लगेंगी तो भारत को तरक्की करने से कोई नहीं रोक सकता है। संविधान के सिवाय दुनिया का कोई भी ऐसा ग्रंथ नहीं है जो लिखित में समानता शिक्षा के गारंटी देता हो।
किसी भी धर्म का उद्देश्य मनुष्य और भगवान के बीच संबंध स्थापित करना नहीं होता है बल्कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य मनुष्य के साथ संबंध स्थापित करना होना चाहिए जिससे उनके बीच समता एवं प्रेम भाईचारा स्थापित हो।
अगर संसार का कोई भी धर्म इंसान इंसान के बीच समता , भाईचारा और प्रेम की भावना पैदा नहीं कर सकता है तो आप उसे धर्म कैसे कह सकते हैं ? यह मात्र भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाने का षड्यंत्र हो सकता है।
धर्म के नाम पर दुनिया में इतने लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया है जितना की दुर्भिक्ष से भी लोग नहीं मरे होंगे । इसका उदाहरण महाभारत जैसा महायुद्ध था जिसमें दो भाइयों के आपसी संघर्ष में लगभग 60 लाख लोगों को जान गंवानी पड़ी। एक प्रकार से पुरुष विहीन हो गया था समाज । फिर भी हम ऐसे युद्धों को धार्मिक युद्ध की संज्ञा देते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ४९
संविधान एक ऐसा ग्रंथ है जो समाज में समानता समता भाईचारा ला सकता है। जिस दिन हम अपने बच्चों को धर्म ग्रंथो की जगह सविधान पढ़ाने लगेंगे उसी दिन से धार्मिक अंधविश्वास के जड़ टूटने लगेंगीं ।
संविधान समाज को एक सूत्र में बांधता है । लेकिन धर्म ग्रंथ बांटते हैं। एक धर्म को मानने वाला दूसरे को दुश्मन मानते हैं।किसी भी धर्म में कोई भी एकता भाईचारा नहीं है ।
सभी धर्म एक दूसरे से घृणा करते हैं और अपने को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। इसलिए कोई भी धार्मिक ग्रंथ सर्वाग्राही नहीं हो सकता केवल संविधान ही हैं जो सर्व ग्रही है ।इसलिए संविधान को पढ़ो एवं पढ़ाओ अंधविश्वास को भगाओ।
मेरी डायरी से : भाग – ५०
वर्तमान परिस्थित में चुप रहने का समय खत्म हो गया है । आखिर हम कब तक हाथ पैर हाथ धरे बैठे रहेंगे। भारत को अब अपनी चुप्पी को तोड़ने की आवश्यकता है। आतंकवाद भारत के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए गले की फांस बन चुका है। आतंकवाद रुपी सांप के फन को संपूर्ण रूप से कुचल देने की जरूरत है।
आखिर हम कब तक अपने देश के बेगुनाहों की जान को गवाते रहेंगे। पिछले सात – आठ दशको से पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादियों को अब मुंह तोड़ जवाब देने की आवश्यकता है। बहुत हो चुका है समझौता। शांति प्रस्ताव तो उसके लिए होता है जो शांति की भाषा समझता हो।
कुछ आतंकवादियो के कारण संपूर्ण कश्मीर घाटी नरक का द्वार बनकर रह गई है। जो कश्मीर कभी भारत का सौंदर्य कहलाता था कुछ आतंकवादियों ने उसे बर्बाद करके रख दिया है।
पहलगाम में घूमने वाले बेकसूर यात्री कि आखिर क्या गलती थी ? वह किसी को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचा रहे थे बल्कि केवल अपने देश की मिट्टी में घूम रहे थे। यह अमानवीय कृत्य तो है ही इससे भी ज्यादा अमानवीय कृत्य है कि धर्म को पूछ कर मौत के घाट उतार देना।
समाज के चिंतकों को इस विषय पर चिंतन करने की आवश्यकता है कि आखिर उनके मन में इतनी घृणा कौन भर दे रहा हैं? कहते हैं कि धर्म प्रेम, दया , करुणा , भाईचारा की शिक्षा देता है। फिर उसी धर्म की शिक्षा प्राप्त करने वाले के मन में दूसरे धर्म वाले के प्रति इतनी घृणा , नफरत कौन भर देता है कि वे लोग खूंखार भेड़िया से भी ज्यादा खूंखार बन जाते हैं?
जब तक हम इस नफरत की जड़ को समाप्त नहीं कर देंगे आतंकवाद जड़ से खत्म नहीं हो सकता हैं। आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए संस्थान को ही खत्म कर देना देना होगा जहां से इन आतंकवादियों को आतंकवाद फैलाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि आतंकवादियों को इस हमले की साजिश रचने वालों की कल्पना से भी बड़ी सजा मिलेगी उनके हृदय की पीड़ा को देखा जा सकता है।
आतंकवाद को हराने के लिए देश के सभी नागरिकों को एकजुट होना पड़ेगा। इसके लिए अपने देश में ही पल बढ़ रहे देशद्रोहियों को पहचानने की आवश्यकता है। बिना स्थानीय लोगों के सहयोग के ऐसी बड़ी घटना को अंजाम देना मुश्किल है। कहते हैं कि घर का भेदी लंका ढाएं।
बाहरी दुश्मनों से ज्यादा खतरनाक देश के दुश्मन होते हैं जिन्हें पहचानने की आवश्यकता है। वह कौन लोग हैं जो स्थानीय स्तर पर आतंकवादियों को साथ देते हैं फलने फूलने की जगह देते हैं।
मात्र कुछ आतंकवादियों को मार कर आतंकवाद से मुक्ति पाना असंभव है। इसके लिए भारत को कूटनीतिक रूप से आतंकवादियों को पनाह देने वालों से भी निपटना आवश्यक है।
मेरी डायरी से : भाग – ५१
आज अम्मा की चौथी पूरी तिथि थी जिनकी याद में एक कविता लिखी हैं —
न जाने क्यों
अबकी पुण्य तिथि में
अम्मा याद आईं,
मेरे पास कोई ऐसा भी नंबर होता,
जो उससे भी बात हो पाती ,
उस देश का पता होता,
जहां वो चली गई है,
तो जरूर उसे,
एक चिट्ठी लिखता,
उसे लिखता कि,
तेरे बिन यह जिंदगी,
बड़ी सूनी सूनी सी हो गई हैं मां ।
उसे लिखता कि ,
तेरे जाने के बाद
तेरी बहू भी,
तेरी तरह बिन भोजन किए,
कभी भूखे पेट नहीं जाने देती हैं।
बताता कि,
तेरे जाने के बाद,
एक प्यारी सी गुड़िया ने,
जन्म लिया है,
जो आपको बहुत याद करती हैं,
बाबू तो तेरी सूरत,
हर बूढ़ी मां में देखता है,
कही वह हमारी माई तो नहीं हैं।
जिंदगी में आज सब कुछ है,
बस तेरी सूरत नहीं दिखाई देती हैं मां।
मैं लिखता कि,
तेरे जाने के बाद,
छोटी दीदी की मांग सूनी हो गई,
रो रो कर,
उसके चेहरे का रंग उतर गया है।
उसे लिखता कि,
भैया, भाभी, बच्चे सब
बहुत याद करते हैं।
उसे लिखता कि,
जिस आशियाने को बनाने में,
तूने सारी जिंदगी लगा दी थी,
जिसका गृहप्रवेश देखें बिना,
तू चली गई,
वह विकास के नाम पर,
टूटने वाला है।
उसे लिखता कि,
जब से तू गई है,
कुछ कुछ सुधरने का,
प्रयास कर रहा हूं -मां!
जब जब भी जीवन में,
दुःख बढ़ जाता है,
तू ही याद आती है मां।
मेरी डायरी से : भाग – ५२
मनुष्य के जीवन में जब प्रेम के अंकुर प्रस्फुटित होते हैं तो सहज में ही कविता के रूप में व्यक्त होने लगते हैं।
कैसा है यह रूप सलोना,
श्वेत श्याम सा लगता है।
उषा काल की हिमगिरि जैसा, मधुर मुस्कान बिखेरता है।।
मंद पवन के झोंकों में,
जीवन सुगंध जब बिखरती है। प्रकृति में मधुमास छाया,
बसंती कलियां खिल आई हैं।।
नदियों का कल कल बहना ,
इन भंवरों के गुंजारों में ।
कोयल की कूक गूंजती ,
बसंत अठखेलिया खेलती हैं। ।
श्याम सलोना रूप ऐसा,
पवन के झोंके रुक जाए।
नदियों ने बहना भूलीं ,
मेघ गर्जना भूल गए। ।
क्या भूलूं क्या याद करूं,
किन शब्दों में दू तुझे बधाई। प्रकृति ही जब तेरा गान करें, पपीहा तो बस इंतजार करें। ।
मेरी डायरी से : भाग -५३
आज परिवार समाज के साथ ही संपूर्ण राष्ट्र विभिन्न प्रकार के लड़ाई झगड़ों में व्यस्त है। इस हिंसा के जड़ को आखिर कैसे खत्म किया जा सके? ऐसी स्थिति में है योग एक अमूल्य हथियार के रूप में संपूर्ण मानवता के लिए वरदान सिद्ध हो रहा है।
देखा गया है कि जो व्यक्ति आंतरिक रूप से परेशान होता है वह बाहर भी हिंसक व्यवहार करता है ।लड़ाई झगड़े दंगे फसाद वही व्यक्ति करते हैं जिनका हृदय अनेकानेक पीड़ा उनसे गुजरता है। जब व्यक्ति योग ध्यान का अभ्यास निरंतर करता है तो धीरे-धीरे उसका मन शांत होने लगता है जैसे जैसे उसका मन शांत होता है वह प्रेम से भर जाता है। वह सबके प्रति प्रेम का बर्ताव करता है।
योग में शशांक आसन ,साष्टांग प्रणाम ,भ्रामरी प्राणायाम ,ओंकार ध्वनि के साथ है ध्यान का अभ्यास किया जाए तो यह निश्चित है कि हम एक अहिंसक समाज की स्थापना कर सकते हैं। संपूर्ण विश्व में शांति केवल योग के माध्यम से आ सकती है।
संपूर्ण विश्व की मानवता के लिए योग भारत का दिया हुआ दिव्य वरदान है । भारतवर्ष के लिए यह गर्व का विषय है कि 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की मान्यता संयुक्त राष्ट्र ने प्रदान की जिसे हम 21 जून 2015 से मना रहे हैं ।जिसमें संयुक्त राष्ट्र के 195 देशों में से 192 देशों ने मान लिया।
योग विद्या प्राचीन काल से चली आ रही है हमारे वैदिक गुरुकुल में योग को अनिवार्य रूप से सिखाया जाता रहा है। अनौपचारिक रूप से खेलकूद की पुस्तकों में भी योगासन व प्राणायाम एवं अन्य संस्थाओं में सिखाया जाता है ।
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी के अथक प्रयासों का परिणाम है कि आज योग यूजीसी द्वारा मान्यता प्राप्त कर चुका है। इस वर्ष विशेष संयोग है कि यूजीसी नेट योग की परीक्षा भी 21 जून को ही संपन्न हो रही हैं।
वर्तमान समय में एलोपैथ दवाओं का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। यह दवाएं जहां एक बीमारी ठीक करती है तो वहीं दूसरी बीमारी पैदा भी कर देती हैं। नियमित रूप से यदि योग को जीवन का हिस्सा बना ले तो मधुमेह ,ह्रदय रोग ,गैस ,कब्ज ,एसिडिटी ,घुटने का दर्द ,अपच इतिहास बीमारियों से वह मुक्त हो सकता है।
ऐसी बीमारियों का कारण व्यक्ति की प्राणशक्ति की कमी से हो रही हैं। जैसे-जैसे प्राण शक्ति बढ़ती है बीमारियां सहज में दूर होने लगती हैं। आइए 21 जून योग दिवस के मौके पर हम संकल्प पर ले के नियमित रूप से हम योगाभ्यास करेंगे और स्वयं स्वस्थ होंगे अपने परिवार समाज एवं राष्ट्र को भी स्वस्थ बनाएंगे।
मेरी डायरी से : भाग – ५४
वर्तमान समय में जैसे-जैसे आधुनिकता बढ़ रही है उसी प्रकार से समाज में बिखराव भी पैदा हो रहा है। जो माता-पिता बच्चों को बहुत ही प्रेम से पाल पोसकर बड़ा किया वही बच्चे बड़े होने पर उनके लिए माता-पिता भार बन जाते हैं वर्तमान समय में बिखरते परिवार को जोड़ना कठिन होता जा रहा है।
जिनकी मां स्वयं,
वृद्धाश्रम की चौखट पर,
बेटे को याद करते हुए,
जीवन गुजार दिया था ।
देख रहीं थीं मां अपलक,
बेटे को दूर और दूर जाते,
मां को यू अकेले ही छोड़ते,
बेटे को थोड़ी दया नहीं आई।
आज उसके बेटे ने,
अपनी मां को बोला,
हैप्पी मदर्स डे तो,
अंजाने ही आंसू छलक पड़े।
उसे मां की याद आने लगी,
कैसे मां बिना उसे खिलाएं,
चारों कितना भी नखरे किए,
बिना उसे खिलाएं, कभी नहीं खाई थी।
मां को याद करते हुए,
एक संकल्प उसे उभरा,
वह वृद्धाश्रम पहुंचकर,
मां को वापस घर ले आया।
मां बेटे दोनों के आंसू,
मिलकर एक हो गए,
आज मां बहुत खुश थी
अपने परिवार में पुनः आकर।
अतः यह आवश्यक है कि हम संयुक्त परिवार की गरिमा को बनाए रखें।
मेरी डायरी से : भाग – ५५
वर्तमान समय में देखा जाए तो हिंदू समाज बिन पेंदी के लोटा की भांति हो गया है। जिसने जैसा चाहा उसे वही मोड़ दे रहा है। उसकी श्रद्धा जैसे किसी एक जगह स्थिर नहीं रहती है । वह कभी राम जी को मानता है , तो कभी कृष्ण को तो , कभी दरगाह मजार पर चादर भी चढ़ा आता है तो कभी यीशु दरबार में भी चक्कर लगा लेता है।
इस प्रकार से देखा जाए तो हिंदुओं को जहां हांक दिया जा रहा है वहीं भेड़ियों की भांति चल देते हैं। यही कारण है कि हिंदुओं के जहां देखो वहां नए-नए अवतार पैदा होने लगते हैं। इस समय पूरे भारत में हजारों की संख्या में कल्की अवतारी बाबाओ की संख्या बढ़ती जा रही है । जो अपने को भगवान का दसवां अवतार सिद्ध कर रहे हैं।
इसी प्रकार से सांई बाबा की मूर्ति हिंदू अपने मंदिरों में स्थापित कर चुका है । अधिकांश हिंदुओं को यह पता है कि साईं बाबा चांद मियां नाम का मुल्ला था जो की घोर हिंदू विरोधी था । लेकिन बिन पेंदी के लोटे को क्या कहा जाए? कई कई जगह तो अपने राम-कृष्ण ,हनुमान शिव जी की मूर्तियों से भी बड़ी साईं बाबा की मूर्ति स्थापित कर चुका है। यह केवल मात्र जनता से थोड़ी सी दो कौड़ी ज्यादा चढ़ावा के चक्कर में पुजारी करा रहे है।
आसपास कहीं पीपल का पेड़ दिख जाए तो वहां लंगोटी और घंटी बांधने वालों का तांता लग जाता है। मैंने कोई भी ऐसा पीपल का वृक्ष नहीं देखा जहां लोग लंगोटी और घंटी ना बांधे हो। इन कार्यों में औरतें कुछ ज्यादा सक्रिय रहती हैं। समाज में व्याप्त धार्मिक अंधविश्वास भी औरतों के ही कारण फल फूल रहा है।
अभी कुछ दिनों पूर्व मैं शाम को घर लौटा तो देखा कि वहां पर कुछ लोग झंडी आदि लेकर के खड़े हुए थे। जिसमें अधिकांश हिंदू थे। उस समय गर्मी अपनी प्रचंड रूप में थी। पता चला कि सभी गाजी मियां की बारात में बाराती बन करके जा रहे हैं।
आज से हजारों वर्षों पूर्व हिंदुओं के मन में व्याप्त यह अंधविश्वास है कि निकल ही नहीं रहा है। हिंदू संस्कृति में मुर्दों की पूजा का कोई उल्लेख नहीं है। हिंदुओं में कोई अपने पूर्वजों की मजार दरगाह बनाकर के पूजा नहीं करता है। लेकिन बिन पेंदी के लोटे को क्या कहा जा सकता है?
यह हिंदुओं कि श्रद्धा नहीं बल्कि मूर्खता है। जो व्यक्ति मर गया। जिसकी हड्डी पसली का भी पता नहीं वह क्या तुम्हारी सहायता करेगा? लेकिन क्या कहा जाए पीढ़ी दर पीढ़ी यह अंधविश्वास चला आ रहा है।
मैंने देखा है कि हमारे गांव में अधिकांश हिंदू मजार, दरगाह आदि की पूजा किया करते हैं? हिंदुओं में मुर्दों को प्रवाहित करने के बाद घर लौटने पर घर में घुसने नहीं दिया जाता बल्कि सारे कपड़े आदि उतरवा कर स्नान आदि करने के बाद ही लोग घर में प्रवेश करते हैं। लेकिन वही एक मुर्दे की पूजा करके लोग अपने को पवित्र कैसे मान ले रहे हैं ? ऐसे लोगों को चाहिए कि वह घर में प्रवेश स्नान आदि के बाद करें क्योंकि मुर्दे तो मुर्दे होते हैं।
इस प्रकार के अंधविश्वासों को जिंदा रखने में हिंदुओं की औरतों का बहुत बड़ा हाथ है। मैंने देखा है कि मजार, दरगाह आदि में पुरुष नाम मात्र के जाते हैं। अधिकांश औरते ही सिर फोड़ती, आव- बाव बकती दिखाई देती हैं।
इस समय गांव में ईसाई मिशनरियों का जाल भी बहुत तेजी से फैल रहा है। अधिकांश निम्न तपके के हिंदू स्वार्थवस ईसाइयों के चक्कर में फंसते जा रहे हैं। यह हिंदू ऊपर से देखने में हिंदू ही दिखते हैं लेकिन उनका संपूर्ण आंतरिक मनोभाव बदला हुआ रहता है।
यह लोग यीशु दरबार आदि में जाने के बाद उनके मन में इतनी घृणा भर दी जाती है कि वह अपने पूर्वजों को ही गाली देने लगते हैं। उनके लिए यीशु ही भगवान बन जाते हैं। इन लोगों को हम चाहे जितना समझाएं उन्हें कुछ समझ में नहीं आता है क्योंकि ऐसे दरबार में जाने के बाद उनका संपूर्ण मनोभाव बदल दिया जाता है। यदि अन्य धर्म से हिंदुओं को तुलना की जाए तो जैसा हिंदू बिन पेंदी का लोटा है अन्य धर्म में वैसा नहीं है।
हिंदुओं को चाहिए कि इस प्रकार के क्रियाकलाप से बचे । जिसने जो बताएं वहीं पर चल दिए। अपनी संस्कृति सभ्यता पर गर्व करना चाहिए। ऐसा ना हो कि जिसने जो बताया सबको सत्य मानने लगे।
मेरी डायरी से : भाग -५६
अंधविश्वासी व्यवहार की जड़े मानव सभ्यता के साथ प्राचीन काल से जुड़ी रही है। प्रायः प्रत्येक संस्कृति एवं देश में अंधविश्वासी व्यवहार की पोषक परंपराओं का पालन करते हैं ।कई समाजों में रस्म , रिवाज़ , परंपरा आदि के रूप में अतार्किक एवं अवैज्ञानिक अंधविश्वासी व्यवहार के क्रियाकलाप देखे जा सकते हैं।
अंधविश्वासों पर शोध अध्ययन देव संस्कृति विश्वविद्यालय के शोधार्थी मनस्वी श्रीवास्तव ने सन 2017 में किए गए अपने एक शोध विषय ‘ए स्टडी आफ साइको सोशल फेक्ट्स कंट्रीब्यूटिंग टू सुपरस्टीशियस बिहेवियर अर्थात अंधविश्वासी व्यवहार में मनो सामाजिक कारकों की भूमिका का अध्ययन किया।
शोधार्थी ने इस शोध अध्ययन में पाया के मनोसामाजिक कारकों का अंधविश्वासी व्यवहार में अंतर संबंध है । मानसिक स्तर पर व्यक्ति की धारणाएं, विश्वास, मान्यताएं आदि एवं सामाजिक परिवेश में प्रचलित अंधविश्वास की परंपराएं उसके व्यवहार एवं अन्य क्रियाकलापों को प्रभावित करते हैं । इससे यह स्पष्ट होता है कि अंधविश्वासी व्यवहार के पीछे अंधश्रद्धा , अज्ञान , विवेकशीलता की कमी, भ्रम ,वहम, भय अबौद्धिक परंपराएं, वैज्ञानिक चेतना का अभाव आदि मनो सामाजिक कारक मौजूद रहते हैं।
यह भी मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि तनावपूर्ण अवस्था में प्रायः व्यक्ति का आत्मविश्वास स्तर गिर जाता है । ऐसे में अपने आत्मविश्वास के अभाव में व्यक्ति अपने तनाव नियंत्रण के लिए ऐसे किसी भ्रमजन्य गतिविधियों को अपना लेता है जिसका मूलाधार अंधविश्वास होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अंधविश्वासी व्यवहार द्वारा स्वयं को पहले से ज्यादा आत्मविश्वास युक्त महसूस करने लगता है।
इस प्रकार का व्यवहार भूत प्रेत आदि ग्रस्त स्त्रियों में ज्यादा देखा गया है । वे जब मजार दरगाह आदि में जाती है या किसी ओझा सोखा तांत्रिक मौलाना आदि के द्वारा कुछ भभूत दे दिया जाता है तो वह अपने में हल्कापन महसूस करती हैं।
यह हल्कापन मन में यह विचार करने से हुआ कि मुझे भूत पकड़ लिया है मैं ठीक हो जाऊंगी। यह चिंतन उसे थोड़ी मानसिक शांति देता है। लेकिन समस्या जस की तश बनी रहती है । यही नहीं बल्कि उचित समाधान न करने से और बढ़ जाती है।
अंधविश्वासी परंपराओं में देखा गया है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं इससे ज्यादा ग्रस्त हैं। उसमें से शहरों की अपेक्षा ग्रामीण महिलाएं ज्यादा अंधविश्वासी होती हैं। इस अंधविश्वास की जड़ में अशिक्षा, अज्ञानता ज्यादा कारण है ।
जैसे जैसे समाज में महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है अंधविश्वास थोड़ा कम हुआ है। जिस अंधविश्वासों को पूर्वज मानते आ रहे उससे बच पाना मुश्किल है । महिलाओं में अंधविश्वास की प्रवृत्ति बच्चों को भी अंधविश्वासी बना देती है।
यदि बालक विद्यालय में वैज्ञानिक तत्वों का अध्ययन करके आता है परंतु समाज में फैले अंधविश्वास उसके वैज्ञानिक तथ्यों पर कालिक पोत देते हैं । उसे यह पढ़ाया जाता है कि सभी जीवों की अपनी अलग जाति होती है परंतु अंधविश्वासी परंपराओं में देखा है कि उसका उल्टा ही दिखाई पड़ता है।
जैसे हनुमान जी महाराज को बंदर के रूप में दिखाना, जामवंत, नल नील ,बाली सु्ग्रीव आदि को भी बंदर के रूप में दिखाना । लेकिन वह देखता है कि उनकी स्त्रियां तो मानव रूप में दिखाई देती हैं एक स्त्री से बंदर कैसे पैदा हो सकता है। घर , परिवार, समाज में तो उसे ऐसा दिखाई नहीं पड़ता कि किसी महिला को बंदर पैदा हुआ हो।
ऐसी ऊंट पटांग बातों को देखकर उसका सिर चकरा जाता है । दुर्गा का आठ हाथ दिखाई देना , गणेश जी का हाथी का सर दिखाई देना , ब्रह्मा जी के चारों तरफ सर होने जैसी बातें उसके गले नहीं उतरती । जब वह इन विषयों पर सवाल करना चाहता है तो वह देवता है कह कर उनका मुख बंद कर दिया जाता है ।
ऐसी स्थिति में उसकी सारी वैज्ञानिक तर्कशीलता समाप्त हो जाती है । वह भी धर्म और अंधविश्वास के आगे जैसा घर वाले कहते हैं वैसा ही करने को मजबूर हो जाता है।
मेरी डायरी से : भाग -५७
भूत प्रेत की समस्याओं से गांव में आज भी बहुत बड़ी मात्रा में लोग परेशान है ।आइए हम सब एक अन्य कथानक के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं —
“यह भूत बहुत बलवान है इसके लिए सवा मन आटा, बकरा, बकरी ,मुर्गा ,शराब आदि देना पड़ेगा। इसके दिए बिना भूत छोड़कर के नहीं जाएगा।”
एक ओझा ने जो कि अपनी बच्ची का भूत प्रेत उतरवाने आया था उससे कहा।
उसकी बच्ची सुनीता अक्सर बीमार रहती थी। सुनीता की अभी नई-नई शादी हुई थी। शादी को हुए 6 महीना ही बीते थे कि ससुराल में एक बार बेहोश हो गई। उसे परिवार में भूत प्रेत आदि बहुत मानते थे। यही कारण है कि सुनीता का किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज की अपेक्षा गांव के एक ओझा को दिखाया।
जहां पर ओझा ने बताया कि इसको ब्रह्म ने पकड़ लिया है बिना मुंडी लिए नहीं छोड़ेगा। इसको भागने के लिए जीव हत्या करनी पड़ेगी!”
सुनीता के ससुराल के लोग एक नंबर के अंधविश्वासी प्रकृति के थे। जिनकी पीढ़ी दर पीढ़ी अंधविश्वासों में गुजर गए थे। उसकी ससुराल में वार्षिक पूजा के नाम पर बकरा, बकरी ,मुर्गा आदि काटकर देवी देवता के नाम पर भोज चलता था।
अभी वह नई नवेली दुल्हन थी। इसलिए किसी प्रकार का प्रतिकार नहीं किया । उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था कि किसी जीव की हत्या की जाए,।
उसे थोड़ी राहत महसूस हुई। उसकी बेहोशी का कारण देखा जाए तो ऑक्सीजन का अभाव है। शादी के बाद जिस जगह उसे रखा गया था वह घर के पीछे का भाग था जो पूर्ण रूप से ढका हुआ था। उसमें किसी प्रकार की खिड़की वगैरा नहीं थी। अधिकांश समय उसे घर के अंदर ही रहना पड़ता था। उसका मन बहुत उलझन में रहता था।इसी उलझन में एक दिन वह बीमार हो गई और उसके घर परिवारों ने स्थित का सही से जायजा न लेकर के उसे ओझाओं के चक्कर में फंसा दिया।
भारतीय समाज में आज भी भूत प्रेत के चक्कर में हजारों स्त्रियों का धन और धर्म दोनों गवा रहे हैं। यह ओझा सोखा इतने मक्कार किस्म के लोग होते हैं की सबसे पहले बिना शराब पिए, बकरा बकरी मुर्गा को चढ़ाए इनका भूत भागता ही नहीं।
इतना चढ़ाने के बाद भी जब भूत प्रेत की नौटंकी नहीं खत्म होती तो अन्य बहाने बनाने लगते हैं। क्या करें हमने तो बहुत कोशिश की अपनी जान लगा दिया, लेकिन भूत इतना बलवान है, भाग नहीं रहा फिर कोई नया बहाना बनाते हैं अब निकारी करनी पड़ेगी ,किसी देवथान में जाकर के बैठाना पड़ेगा आदि आदि।
सच यह है कि इन ओझाओं सोखाओ में कोई ताकत नहीं होती है। यह सब मात्रा पीढ़ी दर पीढ़ी से चला आ रहा एक प्रकार का अंधविश्वास है।
कई कई स्त्रियों को तो भूत प्रेत कुछ नहीं पकड़ा रहता ,मात्र बहानेबाजी किया करती हैं या फिर अपने घर परिवार पति को परेशान करने के लिए नौटंकी करती हैं जो कि उनकी मानसिक समस्या है ।इसमें किसी भी भूत प्रेत आदि कि कोई बात नहीं होती।
दोस्तों! जीव को शरीर छोड़ने के बाद अन्यत्र भटकने की कोई व्यवस्था नहीं है ।क्योंकि जीव को अन्य जन्म लेने के लिए एक दिन से 12 दिन के भीतर यह सारी प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं । इस प्रकार भी किसी को दुख देना, कष्ट देना कैसे संभव हो सकता है? अर्थात भूत प्रेत आदि की कोई संभावना नहीं रह जाती है। जो लोग कहते हैं की एक्सीडेंट में मरे हुए की आत्मा भटकती है, भूत प्रेत बनकर उनकी आत्मा फिर जन्म लेती है, तो ऐसा कुछ नहीं होता है। व्यक्ति एक्सीडेंट में मरे या व्यक्ति व्याधि से मरे।आत्मा शरीर तभी छोड़ती है जब उसके योग्य शरीर नहीं रह जाती हैं।
अतः हमें सत्यता को समझना होगा ।स्त्रियों में भी प्राचीन काल में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि किसी को भूत प्रेत की समस्या रही हो ।इतिहास के प्रमाणों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि मुगलकाल के समय में जब कोई राजा ज्यादा लंपट हो जाता था तो लोग अपनी कन्याओं की अस्मिता की रक्षा के लिए उन्हें भूतोंन्माद का नाटक सिखा देते थे और उसके भीतर कोई भूत -प्रेत, दुष्ट आत्मा पिचास , राक्षस प्रवेश कर गया है इसका प्रचार भी किया जाता था जिससे लंपट राजा ऐसे कन्याओं को परेशान नहीं करता था।
भूत प्रेत की समस्या जिन स्त्रियों को है यह सब मानसिक व्याधियों हैं जिसका ठीक से उपचार किया जाए तो वह ठीक हो जाता है स्त्रियों को बुटादा की समस्या का कारण प्रेम का अभाव है यह भूत का नाटक करके अपने पति या परिवार का प्रेम पाना चाहते हैं माताजी ने स्त्री को भूत-प्रेरताद के समस्या हो उन्हें खूब प्रेम करें उसके दुख दर्द पीड़ा को समझने का प्रयास करें भूलकर भी किसी ओझा सोखा, मियां मजार ,दरगाह पर न जाए। उसका सही प्रकार से मानसिक उपचार करायें।
वर्तमान समय में देखा जाए तो हमारा पूरा समाज अंधविश्वासों में जगड़ा हुआ है। भोली भाली हिंदू समाज के बहू बेटियां इन ओझाई सोखाई मजार दरगाह आज की पूजा के चक्कर में अपना दीन धर्म सब गवा रहे हैं। देखा गया है कि अधिकांश हिंदू ओझा सोखा मजार आदि की पूजा किया करते हैं। कोई व्यक्ति मजार दरगाह पर ना भी जाना चाहे तो यह ओझा सोखा इतने दुष्ट होते हैं के उसे भी डर भय दिखाकर जाने के लिए मजबूर कर देते हैं।
पूर्व काल में गांव में शिक्षा का अभाव था। जिसके कारण गांव में जब कोई बीमार होता था तो लोग डॉक्टर के यहां जाने की अपेक्षा ऐसे ओझा गुनिया के पास जाया करते थे। आपने देखा होगा कि यह लोग ऊंट पटांग पूजा आदि करके लौंग को रोगी को खाने के लिए देते हैं। लौंग दर्द नाशक होता है।
यदि यदि सामान्य दर्द में भी लौंग को मुख में रख लिया जाए तो दांत दर्द , सिर दर्द चक्कर आने में हल्की सी राहत महसूस होगी। इसमें किसी देवी देवता का हाथ नहीं है कि उसने ठीक किया है। इसका दूसरा कारण व्यक्ति की मन:स्थित होती है। वह जैसी कल्पना करता है उसके साथ वैसा ही होने लगता है।
जिस व्यक्ति के मन में यह बैठ गया हो कि हमारी बीमारी भूत-प्रेत के पकड़ने के कारण हुई है और ओझाई कराएंगे तो ठीक हो जाएगा। तो उसके साथ वैसा ही होने लगता है। यह सब व्यक्ति के मन में बैठा हुआ विश्वास है जो उसे ठीक कर देता है। यह सारा का सारा खेल मन का है। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।
इसमें किसी भी प्रकार के ओझा सोखा या किसी दैवी शक्ति का कोई हाथ नहीं होता।
दूसरी बात है यह है कि भूत का संबंध किसी मरे हुए व्यक्ति से नहीं है। श्रीमद् भगवत गीता में कहा गया है–
“अहमात्मागुडाकेश सर्व भूताशय स्थित “( गीता- १०/२०)
अर्थात मैं सब भूतों (प्राणियों) के भीतर स्थित हूं।
यहां पर भूत का अर्थ जीवित सभी व्यक्तियों से लिया गया है ना कि मरे हुए मुर्दे से। संपूर्ण गीता, श्रीमद् भागवत ,वेद ,उपनिषद् आदि में कहीं भी भूत का अर्थ मृतक व्यक्ति से नहीं लिया गया है। अब हम कुछ और अर्थ देखते हैं जिससे समझ में आ जाए कि सत्य क्या है असत्य क्या है-
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठंति परमेश्वरम् । ( श्रीमद् भगवत गीता १३/२७)
अर्थात समान रूप से परमेश्वर सभी भूतों ( प्राणियों) में स्थित है।
ईश्वर सर्वभूतानां ह्रदयेशर्जुनतिष्ठति। ( श्रीमद् भगवत गीता १८/६१)
अर्थात अन्न से सभी भूत प्राणी उत्पन्न होते हैं और वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है।
उपर्युक्त श्लोक में भूत का अर्थ जीव- जगत ,पदार्थ जगत और पंच महाभूत (पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश) से लिया गया है।
उपर्युक्त सभी उदाहरणों में कहीं भी भूत का अर्थ मृतक से नहीं लिया गया है । फिर क्या कारण है कि लाखों करोड़ों की संख्या में लोग भूत प्रेत के चक्कर में अपना धन धर्म मान सम्मान सब गवा रहे हैं ।यह सब बहकावे की बातें हैं कि किसी ओझा सोखा दरगाह मजार आदि की पूजा से भूत प्रेत आदि ठीक होता है।
आज जहां देखो वही मजार दरगाह के साथ ही सड़क के किनारे कोई पीपल का वृक्ष हो तो वहां भी लोग लंगोट कलावा आदि बाध कर पूजना शुरू कर देते हैं। मूढ़ताबस लोग यह कभी नहीं जानने का प्रयास करते कि उनकी पूजा करने से कुछ होता भी है या नहीं। बस भीड़ देख नहीं की पूजा शुरू कर देते हैं ।
औरतें इसमें कुछ ज्यादा ही आगे होती हैं ।भूत भी उनको ही ज्यादा पकडते हैं। सत्य तो यह है कि भूत नाम की दुनिया में कोई कुछ नहीं होता है।जो मर गया वह क्या करेगा भूत बीते हुए समय को कहते हैं।
ऐसी स्थिति में समाज को जागृत करने की आवश्यकता है।हमें सत्य का साथ देना चाहिए ।यदि इसमें कोई सत्यता हो तो मानना चाहिए नहीं तो छोड़ देना चाहिए।
हजारों वर्षों के मान्यताएं सच है कि एक दिन में खत्म नहीं होगी लेकिन जैसे-जैसे समाज शिक्षित हो रहा है।इस प्रकार की मान्यताएं भी धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। इसके लिए आवश्यकता है कि विद्यालयों में बच्चों के समक्ष इस प्रकार की बातें समझाईं जाए और उन्हें बचपन से ही ऐसी मान्यताओं से दूर रखने के लिए प्रेरित किया जाए।
मेरी डायरी से : भाग – ५९
इलेक्ट्रॉनिक क्रांति के बढ़ने से संसार भर में कहा क्या चल रहा है इसकी खबर तो रखते हैं परंतु हमारा पड़ोसी किन हालातों में है इसकी कोई खबर नहीं रहती । इतना ही नहीं लोगों को तो अपने परिवार के सदस्य किन हालात से गुजर रहे है, कई को तो यह भी खबर नहीं रहती।
संसार को तो हमने मुट्ठी में कर लिया परन्तु अपनों के बीच बढ़ती दूरियों ने मनुष्य को निष्ठुर सा बना दिया है। गाँव पड़ोस में चाहें मरें या जिएं हमसे क्या मतलब।
पहले लोगों को कहीं एक्सीडेंट हो जाता था तो उसे अस्पताल में ले जाकर दवा की व्यवस्था करना हमारे मानवीय कर्तव्य समझा जाता था परंतु आज यदि कोई घायल हो जाए तो लोग सर्वप्रथम उसकी जेब चेक करते हैं कि उसमें कुछ है तो नहीं ? क्या यही हमारा विकास है?
क्या इसी विकास का सपना हमारे महापुरूषों ने देखा था ?यदि इसी का सपना देखा था तो नहीं चाहिए हमें ऐसा विकास जिसमें मनुष्य को मनुष्य न समझा जाता हो।
हम तो बीते जमाने में ही अच्छे थे। असली विकास तो तब होता जब हमारा जीवन और अधिक मानवीय हुआ होता। परंतु विकास के नाम पर हमने विनाश ज्यादा किया है। वह चाहे मानवीय संबंध हो या प्राकृतिक संपदा का अत्यधिक दोहन। हमें यह सोचना होगा कि विकास के नाम पर हम क्या कर रहे हैं। विकास कहीं विनाश में ना तब्दील हो इसलिए संभल जाएं।
मेरी डायरी से: भाग – ५८
वर्तमान समय में मैनेजमेंट के गुण सीखाने के लिए बड़े-बड़े इंस्टिट्यूट बन गए हैं । परंतु सबसे बड़ी इंस्टीट्यूट तो घर की मां है। जिससे यदि हम मैनेजमेंट के गुण को सीख सके तो जीवन सफल हो सकता है।
आधुनिक माताएं जहां कारपोरेट जगत में सफलता के परचम लहरा रही हैं वहीं परिवार का मैनेजमेंट भी बखूबी निभा रही हैं। एक कामकाजी मां को यदि ध्यान से उसकी दिनचर्या का अवलोकन करें तो हम समझ सकते हैं की मां स्वयं में एक चलती फिरती यूनिवर्सिटी ही है।
बच्चों को उठाना , उन्हें स्कूल जाने के लिए तैयार करना, पति के ऑफिस के टिफिन की तैयारी के साथ ही स्वयं को उसी के साथ आफिस जाने को तैयार करते रहना, दिनभर ऑफिस वर्क करके आने पर भी पति तो थकान का बहाना करके बिस्तर पकड़ लेता है, वही मां कितनी भी थकीं हुईं क्यों न हो फिर भी पति के लिए भोजन बनाना,बच्चों की फरमाइशें पूरी करती है। यह सब कार्य वह अपार धैर्य के साथ करती है । विपरीत परिस्थितियों में वह कभी भी विचलित नहीं होती।
तनाव में जहां सामान्य पुरुष आपा खो देता है । मां कभी भी नाराज नहीं होती । यही कारण है कि आत्महत्या करने में पुरुषों की अपेक्षा मां की संख्या शून्य हैं । पति की मृत्यु हो जाने पर भी किस प्रकार से बच्चों को सही मार्ग दिखाती है मां इस विषय पर प्रबंधन की एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है । किसी भी मां का जीवन एक सफल मैनेजमेंट गुरु के जीवन से किसी भी रूप में कम नहीं आंका जा सकता है।
यही कारण है कि मां को ईश्वर का साकार रूप माना जाता है। जिसको बचपन में मां का प्यार नहीं मिलता उसकी जिंदगी सूनी सूनी रह जाती है।समाज में फैली घृणा, द्वेष , नफरत की जड़ को मां की ममता भरी छांव में ही आनंद , शांति , प्रेम, करुणा से बदला जा सकता है।
आज स्त्री तो है लेकिन मां नहीं है। मां जिंदगी का वह अनोखा तोहफा है, जिसके नजदीक आने से सहज में शांति का सौंदर्य बरसने लगता है।
आधुनिकता की लहर में आज स्त्रियां अपने वजूद को भूलतीं जा रही हैं। आज माताओं के पास बच्चों के लिए प्रेम भरे दो शब्द कहने की भी फुर्सत नहीं है।
आज हम हम गांधी , शिवाजी, सुभाषचंद्र बोस, विवेकानंद जैसी संतानों की कल्पना तो करते हैं परंतु पुतलीबाई , जीजाबाई जैसी मां तो हो।
सड़े गले भेज बीज कैसे सुडौल वृक्ष की कल्पना की जा सकती है। वर्तमान समय में यदि युवा पीढ़ी का चारित्रिक पतन हो रहा है तो उसका मूल कारण हमारे माता-पिता एवं गुरुओं की कमी है। मां के गर्भ से ही जब बच्चों को घृणा, द्वेष , नफरत , ईर्ष्या का 20 पिलाया जा रहा हो तो कैसे श्रेष्ठ हम योग्य पीढ़ी के कल्पना की जा सकती है।
सीखने से जब पेड़ पौधे की प्रकृति बदली जा सकती है तो मनुष्य के क्यों नहीं बदल सकते आवश्यकता है अभिभावक अपनी गलती को समझें । बच्चों को कीमती खिलौने, मोटर गाड़ियों के साथ ही मां-बाप का प्यार भी चाहिए इसे ना भूले।
मेरी डायरी से : भाग – ६०
अजीब है मनुष्य की प्रकृति ।जो हमारे पास है उसका हमें आभास तक नहीं होता और वही चीज कुछ दिनों के लिए हमसे दूर हो जाए तो उसकी याद सताती हैं ।हम उसके लिए व्याकुल हो जाते हैं।
आज मैं मुरारी लाल शर्मा जी द्वारा लिखित ‘यादें’ पुस्तक पढ़ रहे थे। जिसे उन्होंने अपनी धर्मपत्नी की याद में लिखा है। इसमें उन्होंने पूरी ईमानदारी बरती है। वह लिखते हैं-” जब मुझे उसकी याद आती है तो उस समय मेरी स्थिति मेले में खोए उस छोटे बच्चों जैसी होती है जिसका रो-रो कर बुरा हाल है। उसे अपने चारों ओर सब दिखते हैं बस वह नहीं दिखता जिसकी तलाश में वह व्याकुल हुआ फिर रहा है।”
एक अन्य जगह वह लिखते हैं-” वह मेरे लिए एक ऐसी शून्य थी जो मेरे पीछे लगते ही मेरी ताकत को कई गुना बढ़ा देती थी। मेरे अलावा इस शून्य की कीमत को कोई और नहीं समझ सकता।”
सच में जब तक हम जीवनसाथी के साथ होते हैं तो उसकी कीमत का कभी आभास नहीं होता।
आज मोबाइल के जमाने में एक दूसरे की भावनाओं को हम उतना नहीं समझ पाते हैं जितना पत्र में लिखे शब्दों से समझा जाता रहा है। जिन बच्चों ने कभी पत्र ना लिखा हो उन्हें पत्रों की कीमत क्या होती है नहीं समझ सकते हैं।
उनकी पत्नी एक पत्र में उनके लिए लिखती हैं -“किसी बात पर भी आप बहुत जल्दी नाराज हो जाते हैं ऐसा मत किया करो। हो सकता है दूसरे की भी कोई मजबूरी हो । आप हमेशा प्रसन्न रहकर मेरे ऊपर मेंहरबानी किया करो ।
आप बहुत अच्छे हो बस गुस्सा मत किया करो।”
यह पत्र एक प्रकार से दो पवित्र आत्माओं का मिलन है।
मुरारी लाल जी अपनी पत्नी मालती जी के लिए लिखते हैं-
कल हमारे पास थे तुम , आज हमसे दूर हो ,
सच बताओ , ऐ सनम ! कब तक रहोगी दूर हमसे ।
मन तुम्हारी याद में, अब मन लगाकर जल रहा है ,
सेज कांटे बन गई है, कब झड़ेंगे पुष्प इससे।
एक जगह पत्र में वह लिखते हैं –
खैर माला मरने तो दुनिया को.. तुम जरा एक बार मुस्कुरा दो..
कभी-कभी लगता है उनकी पत्नी जी वाक्य में अशुद्धि कर दिया करती थी। जिसको शुद्ध करने के लिए वे लिखते हैं —
तुमने एक वाक्य लिखा है “पत्र आवश्यक डालना” जबकि तुमको लिखना चाहिए था “पत्र अवश्य डालना” आवश्यक की जगह अवश्य लिखना चाहिए।
२- नही – नहीं। ३- पहुचाने – पहुंचाने।४- करे – करें। ५- एकेले- अकेले। ६- पसन्न – पसन्द। खैर बहुत गलती करती हो जरा आराम से लिखा करो।
इन पत्रों में ऐसा लगता है जैसे संपूर्ण प्रेम उमड़ पड़ा हो।
वे लिखते हैं-
जिसके पत्रों से प्रेरित होकर ‘यादें’ लिखी
आज जो स्वयं एक याद बनकर रह गई।
पिएं आंख के अश्रु तुम्हारे जाने पर ,
हुई हृदय की हार तुम्हारे जाने पर।
चुभते तो शायद सह जाता मैं ,
गढ़े हृदय में फूल तुम्हारे जाने पर।
जीवन की उलझी राहों में मीत मेरे ,
व्यर्थ लगा संसार तुम्हारे जाने पर।
इस संसार से एक न एक दिन प्रत्येक व्यक्ति को जाना पड़ता है। मृत्यु एक अटल सत्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता। व्यक्ति के जाने के बाद बस यादें ही उसकी रह जाती हैं।
मुरारी लाल जी द्वारा रचित अपनी पत्नी मालती जी के यादों को संजोए हुए यह अद्भुत ग्रंथ साहित्य जगत के लिए एक अनमोल रतन के समान है । इसको रच कर उन्होंने अपनी पत्नी को अमर कर दिया।
मेरी डायरी से : भाग – ६१
आज प्रथम दिन था। हॉस्टल जीवन की छोटे-छोटे घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे बच्चों की जीवन की क्या दिशा धारा हो । छोटे-छोटे बच्चों को जिस उम्र में उन्हें मां-बाप की अत्यधिक आवश्यकता होती है उन्हें हॉस्टल के घुटन भरे माहौल में डालकर किस सुख को पाना चाहते हैं।
माता-पिता का आचरण ही बच्चों की पाठशाला होती है । कुछ वर्षों पूर्व जब संयुक्त परिवार को अत्यधिक महत्व दिया जाता था हमारी माताएं बहने दादा दादी आदि जब बच्चा भोजन नहीं करता था तो उसे डांटने डपटने की अपेक्षा मधुर मधुर लोरिया, महापुरुषों की वीर गाथाएं आदि सुनाती थी।
बच्चा खाता जाता था और कहानी भी सुनता जाता था। इसी प्रकार सोने के पूर्व किया जाता था। लोरियां सुनते-सुनते बच्चा निद्रा के आगोश में समा जाता था।
यही कारण था कि उस समय बच्चों का जीवन अत्यधिक संतुलित होता था । वह हर समय तनाव ग्रस्त नहीं दिखता था । माता-पिता के जीवन में भी ज्यादा कुछ आकांक्षाएं नहीं रहती थी । वह भी शांति एवं सौम्य रहते थे।
मेरी डायरी से : भाग -६२
आज डॉक्टर ब्रह्म दत्त जी एवं उनकी पत्नी से मुलाकात हुई। दोनों लोग साधक प्रवृत्ति के दिखें । उनके दो बच्चे हॉस्टल में रह रहे हैं जबकि वह मेरठ में ही रहते हैं । चाहे तो अपने बच्चों को घर से ही भेज सकते हैं परंतु बच्चों का भविष्य उन्हें हॉस्टल में रहकर पढ़ने में ज्यादा उज्जवल दिखता है ।
उनका बच्चा रोए जा रहा था तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-” तूने उसे सिर पर चढ़ा रखा है ज्यादा दुलार बच्चों को बिगाड़ देती है।”
सायं काल जब मैं उनके बच्चों से पूछा कि क्यों रो रहे थे तो उसने कहां – “मेरा मन यहां नहीं लग रहा है”।
तभी एक आठवीं कक्षा की लड़की ने भी कहा कि मेरा भी मन नहीं लग रहा है।
बच्चों का मन आखिर क्यों नहीं लग रहा है इस बात को ना तो अभिभावक समझना चाहते हैं ना ही अध्यापक ? आखिर में बच्चे ही को बलि का बकरा बनना पड़ता है ।
उनकी आह आंसूओं में ही डूब कर ढह जाती है परंतु उनको सुनने वाला कोई नहीं होता । आज जब समाज के सामने यह यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि क्या हो इसका समाधान कौन है इसका जिम्मेदार ? यदि हम आज भी नहीं संभले तो हमारी आगे की पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी।
इसी विषय में मैं आठवीं कक्षा में चर्चा करते हुए कहा कि आखिर कितने बच्चे ऐसे हैं जो अपनी मर्जी से पढ़ने जाते हैं?
बच्चों ने कहा -” हमारी कोई सुन तब ना। ” अधिकांश बच्चों ने यह स्वीकार किया कि वह अपने मां-बाप की मर्जी से पढ़ने आते हैं । उनकी पढ़ने लिखने में कोई अभिरुचि नहीं है। वह बहुत दबाव महसूस कर रहे हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ६३
आज मैं कक्षा चार के बच्चों की क्लास में गया तो बच्चे बहुत खुश हुए और इधर-उधर उछलने लगे। मैंने कहा ऐसा है आप लोगों को उछलना कूदना है तो 5 मिनट में उछल कूद हो हल्ला मचा लो फिर मैं जो कहूंगा उसे सुनना । यह सुनकर बच्चों के धमा चौकड़ी शुरू हो गए ।
मैं एक किनारे खड़ा हो गया कि चिल्ला लेने दो फिर पढ़ाऊंगा । उनकी ज्यादा शोर गोल सुनकर बड़े सर आ गए । उन्होंने बच्चों को डांट कर बैठा दिया । सब बच्चे सन्न । किसी के मुख से कोई आवाज ही नहीं निकल रही थी। उन्होंने एक बच्चे को खूब डांटा जिससे वह रोने की स्थिति में आ गया परंतु डर के मारे रोया नहीं । जबकि उसकी उतनी गलती नहीं थी।
बच्चों को हल्ला मचाने शोरगुल करने में इतना मन क्यों लगता है जबकि पढ़ाई में मन नहीं लगता आखिर किताबें उनकी दुश्मन क्यों बनी हुई हैं? किताबें दुश्मन की जगह दोस्त कैसे बने यह चिंतन का विषय है? साथ ही बच्चे यदि पढ़ना नहीं चाहते उनका मन पढ़ने में नहीं लग रहा है तो क्यों ?
यह हमें सोचना होगा जब तक इसको हमारे अभिभावक एवं गुरुजन गहराई के साथ अनुभव नहीं करेंगे समस्याएं कम होने की अपेक्षा बढ़ती ही जाएंगी।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि खेल-खेल में हम बच्चों को पढ़ना सीखा सके। प्रकृति स्वयं में बहुत बड़ी शिक्षक है ।क्या ऐसा कोई माध्यम नहीं हो सकता कि बच्चे नैसर्गिक रूप से सीख सकें?
यदि ऐसा हुआ तो यही नये मानव की शिक्षा होगी।
मेरी डायरी से : भाग – ६४
आज जब मैं कक्षा आठवीं के बच्चों से जब यह पूछा कि बताओ आप लोग अपने बारे में कितना जानते हो तो अधिकांश बच्चों ने यही बताया कि मेरा नाम यह है ? माता-पिता, जीवन लक्ष्य आदि बताया कि मैं यह बनना चाहता हूं ?
मैंने कहा क्या किसी बच्चे को अपनी शक्ति का आभास है कि वह भविष्य में क्या कर सकता है तो किसी ने भी हाथ नहीं उठाया सब सन्न रह गए।
मैंने कहा -” जब हमें यही नहीं पता कि हमारे पास कितनी शक्ति है तो हम क्या करेंगे आखिर हमें अपनी शक्ति का आभास कैसे हो सकेंगा ?
बच्चों ने कहा कि सर मुझे तो इस बारे में कभी किसी ने चर्चा भी नहीं किया । इस प्रकार के प्रश्न कभी पूछा ही नहीं गया तो हमें कहां से पता होगा ?
बच्चों के बात सुनकर मैं कुछ देर सोचने लगा कि क्या यही है शिक्षा का मुख्य उद्देश्य की बच्चों को दुनिया भर की बातों को रटाकर परीक्षाएं पास कराना । यही कारण है की बड़ी-बड़ी परीक्षाएं भी शत प्रतिशत अंकों से पास होने के पश्चात भी व्यक्ति जीवन में फेल हो जाता है । वह तनाव , चिंता , अवसाद , आदि से घिर जाता है।
मैं बच्चों को समझने का प्रयास कर रहा था कि बच्चे शिक्षा के उद्देश्य को समझें। जब तक जीवन की वास्तविकता का उन्हें आभास नहीं होगा वे जीवन में सफल नहीं हो सकते।
शिक्षा वही जो मनुष्य को सृजनशीलता सिखाएं , स्वयं के प्रति समझ पैदा करें । अपनी अनंत शक्तियों को समझ सकें ।यदि ऐसा नहीं है तो शिक्षा अपने उद्देश्य से कहीं न कहीं भटक रही है उसमें सुधार की आवश्यकता है।
मेरी डायरी से : भाग – ६५
आज योग की प्रथम कक्षा की सार्वजनिक रूप से शुरुआत थी । सभी लड़के एवं लड़कियों को गोले में बैठा दिया गया। लाइन बच्चों की इस तरह से बनी थी कि जैसे मै सूर्य के बीच में खड़ा हूं और मेरी रश्मिया चारों ओर प्रकाशमान हो रही हो। बच्चों के बैठाने का यह तरीका मुझे बहुत अच्छा लगा।
राजवीर सर ने इंग्लिश में मेरा परिचय कराया । उन्होंने पूर्णतया इंग्लिश में बात की। मैं इससे थोड़ा झेंप सा गया। मैं इंग्लिश जानते हुए भी बोल नहीं पाता । इसका कारण लगता है इंग्लिश के प्रति मेरा आवश्यक भय है । जो मैं चाह कर भी हटा नहीं पा रहा हूं।
बच्चों को जब काष्ट तक्षण या कुर्सी आसन करवा रहे थे तो अधिकांश बच्चे हंसने लगें । फिर उन्होंने किया । लड़कियां करने में कुछ झेंप सी रही थी। फिर उन्होंने किया । मुझे लगा कि मैं पहली बार में अच्छी तरीका से नहीं सिखा सका । इसका एक कारण यह भी था कि हमें क्या सिखाना है यह मैं पूर्व प्लानिंग नहीं बना सका परंतु फिर भी रिस्पांस अच्छा रहा।
आगे से सोचता हूं कि व्यक्ति कितना भी जानकार हो फिर भी पूर्व तैयारी लिखित रूप से अवश्य बना लेनी चाहिए जिससे आगे हमें झेंपना ना पड़े।
मेरी डायरी से : भाग – ६६
परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं ।बच्चों के खेल के समय को खत्म करके क्लास से चलाई जा रही हैं। परीक्षा के तुरंत पश्चात भी अगले पेपर की तैयारी के लिए कक्षाएं लग रहे हैं । बच्चों में खाते पीते , टहलते , घूमते हाथ में किताबें खोल कुछ ना कुछ रट रहे हैं । परंतु फिर भी अधिकांश बच्चों की यही शिकायत है कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आता पढ़ते हैं भूल जाते हैं । कुछ ऐसी ट्रिक बताइए कि फटाफट सब याद हो जाए।
मैं बच्चों को समझने का प्रयास करता कि रटने की अपेक्षा विषय को समझने का प्रयास करो । मूल थीम को यदि आप समझ गए तो परीक्षा में जरूर कुछ ना कुछ लिख लेंगे । ज्यादा टेंशन में आने की जरूरत नहीं है। शांत मन से भरपूर नींद लो।
अधिकांश बच्चों को कोई न कोई बीमारी हो गई। वैसे इस बीमारी को हम एक्जाम फीवर नाम दे सकते हैं जो परीक्षा का नाम सुनते ही बच्चों की शरीर खौलते पानी की तरह जलने लगती है। इसमें बीमार होने का आभास तो होता है परंतु हम बीमार नहीं होते।
आखिर हम बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं । यह बात हमें सोचनी होगी । रट रट कर बच्चा बुद्धिमान बनेगा या बुद्धू यह हमें सोचना होगा । यदि हम इन विषयों पर चिंतन नहीं किया तो बच्चा डॉक्टर इंजीनियर आदि तो बन जाएगा परंतु वह मनुष्य नहीं बन सकता।
मेरी डायरी से : भाग – ६७
12वीं कक्षा की छात्राओं के क्लास में गया तो वहां सभी पढ़ रही थीं । उनमें कई तो पढ़ती रही परंतु 5 – 7 छात्राएं चाहती थी कि मैं कुछ बताऊं । मैं उन्हें समझाने का प्रयास किया कि शिक्षा को उद्देश्य मात्र पुस्तकें पढ़ना एवं परीक्षाओं में सफल हो जाना ही नहीं है ।
शिक्षित होने का अर्थ है हमारे अंदर अधिक से अधिक संवेदना जगे । हम दूसरे के सुख-दुख में सहयोगी बनें । जो जितनी मात्रा में संवेदनशील है वह उतना ही शिक्षित है। इसलिए हमें अपनी अभिरुचियों को ध्यान में सबसे समझने का प्रयास करना होगा । जिंदगी में वही व्यक्ति सफलता के शिखर को चूमता है जो स्वयं की रुचियां को जिंदा रखना है और उसके लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार रहता है।
आगे उन्हें बताया कि हमारे अंदर अनंत शक्ति के स्रोत छिपे हुए हैं । इसके लिए हमें ज्ञान की गहराई में उतरना होगा । समुद्र की गहराई में ही मोती मिलते हैं ।स्वयं को जानने की कला का नाम ही योग है । ना कि हाथ पैर हिलाना है। तब तक क्लास टीचर आ गए मैं बाहर निकल आया।
मेरी डायरी से : भाग – ६८
आज मैं पहली बार कुर्ते पजामे की जगह पैंट शर्ट पहन कर गया तो कुछ लोगों की प्रतिक्रिया थी कि आप बहुत स्मार्ट लग रहे हो। बच्चों ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया की परंतु डॉक्टर ब्रह्म दत्त जी के लड़के ने कहा कि गुरु जी आप कुर्ते पजामे में ही ठीक लगते थे ।सबके प्रतिक्रिया के साथ ही बच्चों के प्रतिक्रिया दिल को छू गई । मुझे लगा कि बच्चा ठीक कह रहा है क्योंकि उसके दिल में जो बात थी वह बाहर निकल आई।
प्रधानाचार्य जी ने भी कहा कि आप कुर्ते पजामे में ही अच्छे लग रहे थें । कहां यह पैंट शर्ट के चक्कर में पड़ गए । मुझे लगा कि हमें इतनी जल्दी अपने लिबास कमल जी के कहने पर नहीं बदलना चाहिए था। बल्कि प्रधानाचार्य जी से भी सलाह ले लेनी चाहिए थी। पैंट शर्ट के पहनने पर ऐसा लग रहा था जैसे हम भी भीड़ के एक हिस्से हैं। साथ ही बच्चों एवं स्टाफ के भाव एवं प्रक्रियाओं में भी अंतर की अनुभूति हुई।
किसी के कपड़े से उसके व्यक्तित्व का हिस्सा झलकता हैं । ढीले ढाले एवं सफेद वस्त्रो के पहनने से सहज में शांति की अनुभूति होने लगती है । ज्यादा टिप टॉप रंग-बिरंगे कपड़ों से मन के भाव में भी परिवर्तन आता है। भावों से स्वभाव एवं विचारों में परिवर्तन सहज में आने लगता है।
मेरी डायरी से : भाग – ६९
कक्षा 2 में जब मैं गया तो प्रत्येक डेस्क पर दो बच्चे बैठे थें । किसी किसी पर लड़के लड़कियां साथ-साथ थे तो किसी में अकेले । एक डेस्क पर दो बच्चे बैठे थे जो कापी उठाकर आड़ में लिख रहे थे जिससे कि कोई देख ना ले ।
मैंने कहा कि ऐसे मत लिखो दोस्त दोस्त हो कि नहीं तो बच्चे हंसने लगे । छोटी सी बच्ची ने कहा कि नहीं मैं लड़कों से दोस्ती नहीं करुंगी। फिर एक लड़के ने कहा कि वह उसकी गर्लफ्रेंड नहीं है।
मैं बच्चों की ऐसी बातें सुनकर सोचने लगा कि इन्हें अभी से गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड की बातें कैसे मालूम होने लगी है। आज के बच्चे कितने स्मार्ट हो गए हैं मैं यही सोच कर दंग रह गया । जिस उम्र में हम सब बचपन में नंगे टहलते थे लड़का लड़की में अंतर की ज्यादा कभी सोचा भी नहीं था । वही आज के बच्चों को देखा कि नर्सरी में पढ़ने वाला बच्चा भी फ्रेंडशिप का मतलब समझता है।
कहीं ना कहीं हम बच्चे को उम्र के पहले उसे जवान कर दे रहे हैं । इसमें गलती किसकी है इसे हमें सोचना होगा।
मेरी डायरी से : भाग – ७०
क्लास सेकंड के बच्चों को आज जब मैं योग सिखा रहा था तो मैत्री नाम की छोटी सी बच्ची के गालों पर थपकी दे दी। परीक्षाएं होने के कारण बच्चे एक-एक कर जैसे-जैसे कापियां जमा करते जा रहे थे आते जा रहे थे । ऐसे ही मैं दूसरे बच्चे को थपकी दे दी तो एक बच्चा पूछता है सर मौली आपकी कौन है तो दूसरा बोलता है की लड़कियां ज्यादा सुंदर होती हैं इसलिए सर उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं।
मैंने सोचा बच्चे कितने सरल हृदय के होते हैं जो बातें मन में आती है कितनी सहजता से उसे व्यक्त कर देते हैं । बच्चों को नीतिगत बातों की अपेक्षा वे आपके क्रिया कलापों से ज्यादा सीखते हैं । प्रकृति का स्वाभाविक गुण है कि पुरुष व्यक्ति स्त्री की ओर ज्यादा आकर्षित होता है। चाहे वह छोटे से बच्चे ही क्यों ना हो। यही बातें स्त्री के लिए भी उतना ही सत्य है।
मां को बेटा ज्यादा प्रिय होता है तो पिता को बेटी प्रिय लगती है। ऐसा सहज में होता है जो कि हमें प्रकृति प्रदत्त प्राप्त होता है। परंतु फिर भी हमें चाहिए कि अपनी क्रियो के प्रति सावधान रहें जिससे बच्चों में कोई विपरीत प्रभाव न पड़ें । छोटे बच्चे सबसे बड़े शिक्षक हैं जिन्हें हमें सिखाने की अपेक्षा उनसे सीखने का प्रयास करना चाहिए।
बच्चों की क्रियाओं को यदि हम सूक्ष्मता के साथ अवलोकन कर सके तो हमें ज्ञात होगा कि कैसे वह बात-बात में ऐसी बातें सिखा जाते हैं जिन्हें हम पुस्तकों से भी नहीं सीख सकते । पुस्तक के पढ़ने की अपेक्षा लोगों को पढ़ना और समझना अति कठिन है । जो लोगों को पढ़ने की कला सीख गया समझो वह सफल हो गया।
मेरी डायरी से : भाग – ७१
आज जब सुबह सुबह कपड़े डालने के लिए गया तो हवा चल रही थी । सोचा बगल की सोनिया जीजी से क्लिप लेकर लगा दें। उनका किवाड़ खुला था मैं जब क्लिक मांगा तो वह आज फिर डर गई । मैंने कहा कि आप तो डर जाती हैं । उन्होंने कहा कि पता नहीं क्यों डर जाती हूं यहां कोई आता नहीं इसलिए भी हो सकता है।
मुझे लगा कि जीजी को कहीं ना कहीं पुरुष व्यक्ति के साथ हृदय में भय व्याप्त हो गया है या बचपन में कोई घटना घटी हो जिसके कारण ऐसा घटित हो रहा है । मैं उनसे पूछना चाह रहा था परंतु आज मौका नहीं मिल सका।
स्त्रियों को अकेलेपन से डर लगने लगता है । दिन भर तो काम में व्यस्त रहती है । कमरे में अकेलापन कभी-कभी हमें खाने को दौड़ता है । जो हमें बाद में बीमारी का रूप ले लेता है। जिसमें व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की छाया या आहट मात्र से डर जाता है । चेहरे से भी वह कुछ डरी सहमी सी लगती हैं। मैं यहां नया आया हूं ज्यादा पूछताछ भी अच्छा नहीं लगता। सबका अपना व्यक्तिगत जीवन होता है।
मेरी डायरी से : भाग – ७२
सभी बच्चे विद्यालय के टूर से लौट आए हैं । मैंने सोचा बच्चों से यात्रा में हुए अनुभवों को लिखाया जाए । इसीलिए मैं लड़कों से चर्चा की परंतु उसके बारे में तुरंत प्रक्रिया किसी ने नहीं दी ना ही कोई रुचि विशेष दिखाई । फिर लड़कियों के कक्षा में चर्चा किया । तुरंत कई ने लिखकर दिखाई भी । उनमें से दो ने जो यात्रा में नहीं गई थी सुंदर सी कविता भी लिखी थीं परंतु वे दिखने में संकोच कर रही थी। परंतु पहली कलम होने के बाद भी अच्छी थी।
मैं बच्चों को बताने का प्रयास किया कि कविता या लेख लिखना हृदय की बात है। यह प्रभु कृपा से ही मिलता है। जैसे यदि कोई बच्चा लूला लंगड़ा ही क्यों ना हो परंतु मां को वह अति प्यारा होता है। क्योंकि वह उसका अंश है । उसने उसे 9 माह तक गर्भ में धारण किया था ।
इसी प्रकार अपनी लिखी कविताएं कहानियां कितनी भी खराब क्यों ना हो परंतु लेखक को अवश्य पसंद होती हैं । वह उसे संसार के सर्वश्रेष्ठ रचना समझता है । हमें नियमित रूप से जरूर कुछ ना कुछ लिखते रहना चाहिए । वह चाहे डायरी ही क्यों ना हो।
जिनको मैं कहता आपका बहुत अच्छा है । थोड़ी प्रशंसा के दो शब्द बोल देता था । वह खुश हो जाती थी । एक तो वहीं झूमने लगी। मुझे बड़ा अच्छा लगा कि बच्चे बड़े भले हो जाए परंतु बचपना जाता नहीं । हो सकता है यह बातें अच्छी ना मानी जाती हों परंतु प्रशंसा सुनकर प्रफुल्लित होना हम बड़े लोगों को भी बच्चों से सीखना चाहिए।
मेरी डायरी से : भाग – ७३
आज जब मैं क्लास में गया तो वर्तिका नाम की एक लड़की कभी बेंच पर पैर रखकर बैठ जाती थी तो कभी लेट जाती थीं । मैं रोकता तो सतर्क हो जाती लेकिन फिर वही हरकत करने लगती । क्लास की एक बच्ची ने कहा कि सर आप उसकी बातों में मत आइएगा वह ऐसे ही करती रहती है।
मैंने सोचा क्या कारण हो सकता है कि उसकी ऐसी हरकत करने का । क्योंकि वह ऐसा कर रही है । कुछ देर मैं सोचता रहा। कहीं ना कहीं बच्ची प्रेम की भूखी है । घर परिवार से दूर रहते हुए वह चाहती है कोई उसे प्रेम के दो मीठे बोल बोले । इसीलिए वह दर-दर भटक रही है । प्रेम में कभी-कभी लोग पागल तक बन जाते हैं । मैंने उसे कुछ नहीं कहा बस थोड़ी सी झिड़की लगा दी ।उसका यहां तो मां-बाप भाई-बहन तो है नहीं। हो सकता हैं वह मुझसे ही घर परिवार का प्रेम पाना चाहती हो।
ऐसे बच्चों को डांटना फटकारने की अपेक्षा धैर्य से समझाने की आवश्यकता है। बड़े बच्चों को भूल से भी हमें ऐसी अपमानजनक शब्द नहीं कहना चाहिए जिससे उन्हें कष्ट हो और स्वयं को लज्जित महसूस करें।
जब एक लड़की ने कहा कि वह तो पागल है सर ।
मैंने कहा कि दुनिया में पागल लोग ही महान कार्य किए हैं । यह सुनते ही वह उछल पड़ी और ताली बजाने लगी । उसकी खुशी देखते ही बनती थी । ऐसे में यदि उसको झिझक देता तो उसे कितना कष्ट होता। उसके चेहरे पर खुशी देख मैं भी मुस्कुरा दिया।
मेरी डायरी से : भाग – ७४
आज मैं घूमने गया तो एक बूढ़े बाबा से मुलाकात हो गई । उनके पास बैठा तो बातों का सिलसिला कुछ ऐसा चला कि 2 घंटे बीत गए फिर भी उनके पास से आने की इच्छा नहीं हो रही थीं । पता नहीं उनकी बातों में क्या जादू था कि वह दिल के पार उतर जाती थी।
उन्होंने हमारी मोबाइल देखकर कहा कि मैं इन पर विश्वास नहीं करता । आज के बच्चे सैकड़ो रुपए मोबाइल में या नशे पत्ती में फूंक देंगे परंतु यदि उनसे कुछ जरूरी सामान लाने को कहे तो वह टाल जाएंगे और बहाने बनाने लगेंगे। इधर बीच मैं भी अकेले होने के कारण मोबाइल पर खूब बातें करता था। मैंने सोचा बाबा कितनी पते की बात कह रहे हैं । हमें भी अपनी आदतों में सुधार करना चाहिए।
वैसे भी देखा जाए तो मोबाइल एक महामारी बन गई हैं । लोग बाग बिना बात के भी बात किए जा रहे हैं परंतु लोगों को होश नहीं आता है।
मेरी डायरी से : भाग – ७५
भवेंद्र नाथ सैकिया द्वारा लिखित एवं नवारूण वर्मा द्वारा अनुवादित ‘प्यारे पिताजी’ नामक पुस्तक पढ़ रहा था। लेखक ने इस पुस्तक में एक ऐसे बिगड़े लड़के के चर्चा की है जो गंदी संगति में पड़कर बिगड़ गया था। घर में लड़ाई झगड़ा करके अपनी बात मनमाने ढंग से मनवाना ही जिसका स्वभाव बन गया ।जिसके कारण पूरा परिवार परेशान हो गया । उसके पिताजी बाहर नौकरी करते थे जिससे उसकी उदंडता और बढ़ गई।
अंत में जब एक दिन पिता ने बच्चे को अपने दोस्त के साथ सिगरेट पीते देखा तो उनको इतना क्रोध आया कि जब वह थोड़ा अकेला पड़ गया तो उसे खूब लकड़ी के फट्टे से पीटा। जिससे उसको बहुत चोट आईं और उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
लेखक ने बहुत ही सरल भाषा में नाटकीयता पूर्वक बच्चों को सुधारने की प्रक्रिया का वर्णन किया है जो एक सराहनीय प्रयास है।
मेरी डायरी से : भाग – ७६
आज सायंकालीन भोजन के पश्चात एक छात्रा अपने भाई से मिलना चाहती थी। मैंने कहा मिल लो । उसका भाई जब मिलने जाने लगा तो वार्डन ने डांट कर मना कर दिया। दोनों मन मसोस कर रह गए ।
मैंने सोचा कैसा जेलखाना है जो की सगे भाई बहनों को मिलने में भी बाधा उत्पन्न कर रहा है ।जो भाई-बहन जन्म से लेकर आज तक साथ-साथ खेलें कूदे थे उनके बीच ऐसी अवैद्य दीवार खड़ी करना मुझे बहुत ही असह्य लगा । आखिर बच्चों के बीच इतना कड़ा प्रतिबंध लगाकर हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं?
मैंने अनुभव किया कि मजबूरी में चाहे जो बच्चे लाइन वगैरा लगा लेते हो परंतु जैसे थोड़ी ढील होती है उधम शुरू कर देते हैं । यही बच्चे जिन्हें हम सोचते हैं की बहुत अनुशासित और सभ्य बना रहे हैं हॉस्टल से बाहर जाने पर जमकर बदला लेते हैं ।
मैंने अधिकांश बच्चों को देखकर एवं बातचीत से अनुभव किया कि उनका मन यहां लग नहीं रहा है । मजबूरी बस पड़े हैं। उनका बस चलता तो कभी भाग जाते । कई बच्चे मुझसे पूछते हैं क्या आपका मन यहां लग रहा है। उन्हें क्या जवाब दूं कभी-कभी सोचना पड़ता है?
माता-पिता क्यों अपने जिगर के टुकड़े को इतनी दूर भेजते हैं कभी-कभी मैं समझ नहीं पाता। छोटे-छोटे बच्चे जो अभी ठीक से बोलना खाना पीना भी नहीं सीखा है उनको मां-बाप अपनी जिम्मेवारी से मुक्त होने के लिए हॉस्टल में डाल दिया है।
जिस पैसे से देश के सैकड़ो गरीब बच्चे पढ़ सकते हैं उतना तो यहां पर एक बच्चों पर खर्च आता है । क्या 99 बच्चों का हक हम कहीं ना कहीं छीन तो नहीं रहे हैं इसका हमें कब ख्याल आएगा?
मेरी डायरी से : भाग – ७७
आज जब मैं क्लास में गया तो सीनियर क्लास की लड़कियां आपस में चर्चा कर रही थी।
मैं उनको सोचा हिंदी पढ़ा दूं तो उन्होंने कहा-” सर मेरा हिंदी विषय नहीं है”
और पीछे सीट पर बैठी छात्रा ने आगे वाले से कहा कि बताओ बताओ आगे क्या हुआ? मेरे दबाव डालने के बाद भी उन लोगों ने कहा-” मेरी पढ़ने की इच्छा नहीं है । दिन भर दो पढ़ना है।”
मैंने कहा-” यह चर्चा तो हॉस्टल में भी की जा सकती हैं।”
उन लोगों ने कहां -“मैंम ने किसी एक दूसरे के कमरे में जाने से रोका है।”
मुझे लगा कि उन लोगों को बात करने देनी चाहिए अब छोटे बच्चे तो है नहीं की जोर जबरदस्ती की जा सके। उनकी बातों को सुनकर मुझे खेद होने की अपेक्षा प्रसन्नता ही हुई ।
कितने सरल है यह बच्चे । उसे छात्रा ने इतनी मासूमियत से कहा कि मेरे अंदर लगा कि मैं भी आज अपने बचपन में पहुंच गया हूं। परंतु दूसरी ओर इतना प्रतिबंध पता नहीं क्यों मुझे दुखित करने लगा।
मेरी डायरी से : भाग – ७८
आज से रमजान माह की शुरुआत थी। इस्लाम के छात्र भी रोजे रखना चाहते थे। वह अपने दीन धर्म को याद करना अपना कर्तव्य समझते हैं। सायं काल देखा तो सभी बच्चे रोजे की नमाज के पश्चात नाश्ता कर रहे थे ।
उनकी धर्म के प्रति आस्था देखकर मैं सोचने लगा क्या हिंदू बच्चे नवरात्रि का व्रत इतनी श्रद्धा से नहीं रख सकते? यदि उनसे कहा भी जाए तो बहाने बनाते नजर आएंगे कि क्या करें पढ़ाई का बोझ बहुत ज्यादा है कि कहां व्रत उपवास रख पाएंगे ? परंतु दिल में श्रद्धा विश्वास हो तो व्यक्ति रास्ता निकाल लेता है।
आधुनिकता के साथ ही यदि हम अपनी प्राचीन संस्कृति सभ्यता को भुलाए बैठे रहेंगे तो नई पीढ़ी को कैसे दिशा दे सकेंगे? आवश्यकता आज इस बात की है कि धर्म को नए सिरे से व्याख्या की जाए । जिसमें भगवान के नाम पर पाखंड ना हो। सभी प्रेम व श्रद्धा से एक दूसरे का सम्मान कर सके । यदि हम ऐसा कर सके तभी हम अपने गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को बचा पाएंगे ।
इसके लिए आवश्यकता है कि हम स्वयं आदर्श बने । अच्छे नीतिपरक बातों की अपेक्षा हमारे क्रियाकलापों की नकल बच्चे ज्यादा करते हैं । नीति की बातें कह कर हम उन्हें भुलावे में नहीं रख सकते । इन बातों को हम जितनी जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है । आज की आवश्यकता है बच्चों को एक दूसरे धर्म के प्रति प्रेम जागने की। जिससे वह उसका सम्मान कर सकें। विद्यालय इसके लिए अच्छा माध्यम साबित हो सकता है।
मेरी डायरी से : भाग – ७९
रितेश नाम का एक बालक जो अभी कक्षा 3 में पढ़ रहा है। अपने पिता से फोन पर बात करते हुए बार-बार रिक्वेस्ट कर रहा है कि-” कब आओगे पापा आज ही आ जाओ ना ।
अच्छा चलो कल 4:00 बजे आ जाना। आप हमें वॉलीबॉल जरूर लाना। आपकी बहुत याद आ रही है यहां मुझे थोड़ा भी अच्छा नहीं लग रहा है। “
लगभग 10 मिनट तक रितेश अपने पिता से बातें करता रहा। बीच-बीच में वह रोता भी जाता था और बोलता भी जाता था ।यह एक प्रसिद्ध डॉक्टर का बच्चा है। डॉक्टर साहब किन ख्वाबों को पूरा करने के लिए बच्चों को हॉस्टल में डाले हैं, वही जाने।
मेरी डायरी से : भाग – ८०
आज एक 6 से 7 वर्ष का बालक छोटी तिपहिया साइकिल चला रहा था। वह एक कुर्सी को टक्कर मार दिया ।
मैंने कहा -“देखो कुर्सी रो रही है माफी मांगो।”
तो वह और तेजी के साथ टक्कर मारने लगा । एक बार तो वह कुर्सी को उठाकर फेंकने पर उतारू हो गया।
मैंने मजाक में कहा-” देखो बेटा ! कुर्सी से दुश्मनी नहीं लेना चाहिए। इसने आपका क्या बिगाड़ा था ?”
कहीं कुर्सी में भी जान होती है । कुर्सी में जान वान कुछ नहीं होती और वह कुर्सी को एक लात मार कर चला गया।
मनुष्य के अंदर हिंसा भरी हुई है । यह हिंसा की प्रवृत्ति बच्चों में बचपन से ही डाल दी जाती है। हिंसा का मूल कारण दमन हैं ।बच्चा दमन का सबसे ज्यादा शिकार होता है।
बड़ों की अधिकांशतः इच्छा होती है कि बच्चा मेरी बात मानें । यदि नहीं मानता है तो दमन की प्रवृत्ति यही से शुरू हो जाती है । बातों को मनवाने, बड़ों द्वारा अपना बड़प्पन सिद्ध करने की अहंकारी प्रवृत्ति के कारण बच्चों की बलि चढ़ानी पड़ती है।
मेरी डायरी से : भाग – ८१
सायं काल के भोजन के समय जब मैं हॉस्टल के सामने से गुजर रहा था तो देखा कुछ लड़के नाच रहे थे । दूसरी तरफ से लड़कियां आ रही थी। लड़कों को नाचते देख उन्होंने अपने रास्ते बदल दूसरी ओर से मुड़कर आयीं ।आगे भी भोजनालय के पास भगदड़ सी मच गई थी । लड़के जानबूझकर लेट कर रहे थे। लड़कियां खड़ी रही इंतजार में की लड़के जाए तो चले।
अधिकांश देखता हूं कि हॉस्टल में ऐसे घरों के बच्चे हैं जो बिगड़ें हुए हैं । जिससे ऊब कर उन्होंने उन्हें हॉस्टल में डाल दिया है। माता-पिता ने सोच लिया कि हॉस्टल में जाकर वह और सुधर जाएगा । परंतु वह और ढीठ बन जाते हैं। ऐसे बच्चे हॉस्टल में तो बड़े अनुशासन बद्ध रहते हैं परंतु जब हॉस्टल से बाहर जाते हैं तो समाज से जमकर बदला लेते हैं।
यहां हॉस्टल में देखता हूं कि अधिकांश बच्चों का पढ़ने में मन नहीं लग रहा है। सभी ऊबे है हुए हैं । फिर भी उन्हें प्रातः 6:00 बजे से ही प्रेप क्लास कराई जा रही हैं । दोपहर में , सायंकाल में भी प्रेप की क्लास हो रही है।
जब कोई अध्यापक नहीं आता है तो वैसे बैठे रहते या कुछ लिखते पढ़ते रहते हैं ।अधिकांश बच्चों को लगातार कई कई घंटे तक बैठना पड़ता है । जिससे वह ऊब से जाते हैं। फिर भी क्या करें मजबूरी में बैठना पड़ता है।
मैं यह नहीं समझ पाता कि इन बच्चों को किन कर्मों की सजा मिल रही है ? क्या यही वास्तव में हमारी शिक्षा प्रणाली है जिस पर बच्चों का भविष्य टिका हुआ है? क्या मात्र बौद्धिक ज्ञान की वृद्धि के द्वारा बच्चों का वास्तविक जीवन का विकास हो सकेगा ? एक यक्ष प्रश्न आज दुनिया के सामने बनकर खड़ा है।
मेरी डायरी से : भाग – ८२
एक बच्चा आज बहुत परेशान सा दिखा । मैं ग्राउंड में टहल रहा था । मौका देखकर उसका दिल जैसे उमड़ आया। वह कहने लगा क्या फायदा हॉस्टल में रहने का ? मेरे पिताजी की दोनों किडनी खराब हो गई है। सप्ताह में 2 दिन डायलिसिस करवानी पड़ती है । यदि मैं घर पर रहकर पढ़ाई करता तो कुछ पैसे भी बच जाते और पिताजी की कुछ सेवा भी कर पाता । मेरे तो कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए? रात को नींद भी ठीक से नहीं आ रही हैं। हॉस्टल में बच्चे इतना उधम मचाते हैं की मन और नहीं लगता पढ़ने का।
मैंने उसे समझाने का प्रयास किया। देखो ! प्रभु की इच्छा से जो होता है अच्छा ही होता है।हमारे परेशान होने से समस्याएं सुलझने की अपेक्षा और उलझ जाएंगी । अब तो यही है कि आपको यदि अपने पिता से प्रेम है तो मन को शांत और स्थिर रखते हुए पढ़ाई करो । पिता को शांति तभी मिलेगी जब वह आपकी प्रगति देखेंगे । उनके सपने को पूरा करना ही आपका जीवन लक्ष्य होना चाहिए।
मेरी बातों को सुनकर उसे कुछ धैर्य मिला। रमजान का महीना चलने के कारण वह रोजा भी था। हॉस्टल में जितने भी मुस्लिम बच्चे हैं लगभग सभी पूरे माह रोजें रखे हुए हैं । उनकी धर्म के प्रति आस्था देखते बनती है।
एक बच्चे से मैंने पूछा कि पूरे माह रखने से क्या कोई दिक्कत नहीं आती तो उसने कहा कि गुरु जी कुछ पाने के कुछ खोना पड़ता है । काश हिंदुस्तान के सभी बच्चों में ऐसी ही धर्म के प्रति आस्था होती।
मेरी डायरी से : भाग – ८३
आज सेकंड क्लास के बच्चे जब योग की कक्षा में आए तो बहुत शोरगुल करने लगे। मेरे बहुत रोकने पर भी नहीं मान रहे थे । बार-बार मना करने पर भी कभी इधर तो कभी उधर भागते थे ।
उसमें एक दो बच्चे इतने शरारती थे कि वह किसी भी तरीके से मानते ही नहीं थे। इधर बैठाओ तो उधर भाग जाते। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इनको कैसे कंट्रोल में किया जाए। मैं मारना नहीं चाहता था। परंतु सामाजिक एक ऐसा वातावरण बन गया है कि बच्चे बिना मारे सुनने वाले ही नहीं थे।
जब शोरगुल बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था तो मैंने कई बच्चों को पीट दिया। जिससे मेरे हाथ में भी दर्द होने लगा। बाद में मैं बहुत पछताने लगा ।हमें इस तरह से बच्चों को मारना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें शांति से समझाने का प्रयास करना चाहिए था । यदि बच्चे हमारे वश में नहीं आ रहे हैं तो यह हमारी कहीं ना कहीं कमियां हैं।
दूसरी बात दुखित या परेशान लोग बच्चों को अत्यधिक मारते हैं। इसी बीच लगता है मन न लगने के कारण दुख बढ़ गया है, उसे बच्चों पर उतारना हमारी मूर्खता है।
मेरी डायरी से : भाग – ८४
आज फोर्थ क्लास के बच्चों के बीच में जानने का प्रयास किया वह क्या बनना चाहते हैं? सभी बच्चे बड़े खुश होकर बता रहे थे कि मैं यह बनूंगी मैं वह बनूंगी।
एक लड़की ने कहा -” मैं प्रधानमंत्री बनूंगी।”
मैंने पूछा कि प्रधानमंत्री बनकर तुम क्या-क्या करोगी?
उसने कहा कि मैं गरीब लोगों की सहायता करूंगी उनकी शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था करूंगी ।
बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। जो जितनी छोटी क्लास के बच्चे हैं उनकी जिज्ञासा उतनी ही बड़ी हैं। देखता हूं कि जैसे-जैसे उनकी क्लासे बढ़ती जाती है जिज्ञासाएं बढ़ने की अपेक्षा कम होने लगती हैं । यदि किसी बच्चे की उभरती जिज्ञासा को डांटकर दबा दिया जाए तो वह धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
हमारी शिक्षा पद्धति में एक बहुत बड़ी कमी है कि हम उन्हें ज्ञान के बोझ तले तो भले दबा रहे हैं परंतु उनकी जिज्ञासाओं को उभार नहीं पा रहे । जिससे हमारे बच्चे विज्ञान की दिशा में नहीं खोजों से वंचित रह जाते हैं। आवश्यकता है कि हम विषयों पर चिंतन करके उचित समाधान निकालें।
मेरी डायरी से : भाग – ८५
भोजनालय में बच्चे चम्मच से भोजन करने के पश्चात सीधे क्लास में चले जाते हैं । हाथ भी कभी नहीं धुलते। लड़कियों की ओर वॉशरूम नहीं होने का उन्हें तो मैंने महीनों से धुलते नहीं देखा। यही हालत अध्यापकों की भी है । कई तो न्यूज़ पेपर में हाथ पोछ कर काम चला लेते हैं।
जब गुरुओं ने ही अपनी परंपराओं की खूंटी पर टांग दिया है तो बच्चे क्यों नहीं करेंगे? इंग्लिश मीडियम के नाम पर हम बच्चों को अपनी संस्कृति, सभ्यता, परंपरा से तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं । बच्चे ठीक से ना तो अपनी संस्कृति सभ्यता में ढल पा रहे हैं ना ही अंग्रेज बन पा रहे हैं । बस चक्की की तरह दो पाटों में पिसकर रह जा रहे हैं।
हम बच्चों से ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकते। क्योंकि वह कह सकते हैं खोले हैं स्कूल इंग्लिश मीडियम और सोच वही दकियानूसी रखे हैं । हम बच्चों को क्या सिखा रहे हैं? काश हमें अपनी भारतीय संस्कृति का अभिमान होता तो हम ऐसा षड्यंत्र ना रचते।
मेरी डायरी से : भाग – ८६
आज फिर मैं ना चाहते हुए छोटे बच्चों को मारा । उसमें से एक बच्चा जो बहुत ही नटखट था । उसे थप्पड़ जड़ दिए । फिर भी वह रोया नहीं । बाद में मैं पछताने लगा कि आखिर क्यों मैं बच्चों की इतनी बेरहमी से पीटा। बाद में मैंने उसे बुलाकर अपने पास बैठा लिया उससे कहा कि बेटा ऐसा नहीं करते । मेरी कोई इच्छा नहीं कि मैं आप सबको मारू । आगे से ऐसी गलती मत करना वह बच्चा फिर मुस्कुराने लगा।
मुझे यह लगा कि विद्यालय में इतना डर भय का वातावरण बना दिया गया है कि बच्चा पूरे समय तक कोई उधम मचा ही नहीं सकता। जब तक वह विद्यालय में रहता है उसे जेल खाना जैसे लगता है । जैसे ही वह विद्यालय से छूटता है वह मुस्कराने लगता है और धमा चौकड़ी शुरू कर देता है। छोटे-छोटे बच्चों के ऊपर कोर्स का इतना बोझ बढ़ा दिया गया है कि वह हंसना खेलना भूल गया है।
एक बच्चे से मैंने बोला-” बेटा अभी विद्यालय के बाद घर जाना तो खूब धमा चौकड़ी करना।”
तो उसने कहा-” सर ! यहां से जाने के पश्चात मुझे ट्यूशन जाना है । मम्मी पापा भी खेलने नहीं देते तो आखिर मैं क्या करूं? कब खेलूं न कोई विद्यालय में खेलने देता न हीं घर में । तब मैं कहां खेलने जाऊं। आखिर हम बड़े लोग कभी क्यों नहीं बच्चा बनकर सीखने का प्रयास करते। यह यक्ष प्रश्न हमारे जीवन को आंदोलित किये रहता है । क्या है इसका समाधान कि विद्यालय जेल खाना नहीं बल्कि मां की गोद जैसा बन सकें।
मेरी डायरी से : भाग – ८७
नर्सरी क्लास के बच्चों को जब देखता हूं मेरा मन ना जाने क्यों विषाद से भर जाता है । हर क्षण मुंह बंद करके बैठे रहना । किसी से बातचीत नहीं करना । थोड़ी भी उधम की तो दाई या टीचरों की घुड़की सुनकर चुपचाप बगुला बन जाना। यह उनका स्वभाव बन गया है।
जिस उम्र में बच्चों की शरारती को देख हम प्रफुल्लित हो जाते हैं । वे किलकारियां कहीं सुनाई नहीं देती । छोटे-छोटे बच्चों में जितनी जिज्ञासाएं होती है ना जाने क्यों जैसे-जैसे उम्र बढ़ने लगती है । उम्र बढ़ने के साथ ही हमारी जिज्ञासाएं बढ़ने चाहिए थी जबकि वह और कम होने लगती है।
आखिर हमारे पालकों को कौन समझाए कि 5 वर्ष तक बच्चों का सबसे अधिक जरूरत मां की होती है । जो चीज मां बचपन में सिखा देती है उसे बच्चा 100 वर्षों में भी नहीं सीख पाएगा ।
एक आदर्श मां 100 टन धर्म गुरुओं से भी महान होती है । हम सोचते हैं कि बच्चा दो-चार अंग्रेजी की कविताएं सुना देता है तो वाह-वाह करते हैं। परंतु इसके पीछे कितनी आह बच्चों के अंदर छिपी हुई है इसे कभी नहीं देखते हैं।
यदि हम उसे देख सके तो कभी हम अपने दुधमुंहे बच्चों को विद्यालय की अपेक्षा अपनी गोद में बैठा कर पढ़ाएंगे । बालकों को चाहिए कि इस विषय में थोड़ा सोचें व चिंतन करें।
मेरी डायरी से: भाग – ८८
आज तीन बच्चों का जन्मदिन था । उन लोगों ने हमें ट्रॉफी आदि दिया। विद्यालय में नियम बनाया गया है कि जिन बच्चों का जन्मदिन होता है उस दिन वो सामान्य कपड़े पहन कर आते हैं और सभी गुरुजनों को टाफिया भेंट करते हैं।
मैं विचार करने लगा कि ऐसे सभी बच्चों को क्यों ना प्रेरणा प्रद पत्र लिखा जाए । विचार कर मैं पीरियड खाली होने के बाद तुरंत कविताएं बना कर लिख दिया और बच्चों को दे दिया। बच्चे बहुत खुश हुए।
मानसी नमक कक्षा तीन की बच्ची ने बताया कि -“गुरु जी आपने जो चिट्ठी लिखी थी उसे मम्मी ने पढ़ा और कहा कि बहुत अच्छी है ।
“उसकी बात सुनकर लगा मेरी चिट्ठी लिखने का कार्य सफल हुआ।
सोचने लगा कि यदि हर माह बच्चों का सामूहिक जन्मदिन मनाया जाए तो कितना अच्छा हो । विचार आया है तो कार्य रूप में जरूर परिवर्तित होगा। क्योंकि कोई भी विचार प्रभु की विशेष कृपा होती है तभी आती है । ना जाने प्रभु क्या कराना चाहते हैं । मैं तो उनके चरणों का दास हूं । जिस भी स्थिति में रखना चाहेंगे रहूंगा।
मेरी डायरी से : भाग – ८९
रक्षाबंधन की छुट्टी होने के कारण सभी बच्चे एवं अध्यापक घर चले गए । क्योंकि अगले दो दिन बाद 15 अगस्त होने के कारण उसे भी छुट्टी बच्चों ने मान लिया । जितनी खुशी बच्चों को रक्षाबंधन की दिखी उतना उत्साह 15 अगस्त के प्रति नहीं देखा । ऐसा लग रहा था कि स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए बकवास है। मात्र किसी तरह खाना पूर्ति हो जाए बस इतना ही बहुत है।
मेरी भी इच्छा तो एक बार हुई कि घर परिवार से मिल आया जाए परंतु मेरठ जेल में बंद बाल अपराधी बच्चों के साथ रक्षाबंधन दिवस मनाने की इच्छा होने का रुक गया । सोचा क्या ना यह जाना जाए कि उन बच्चों का जिनका दुनिया में कोई नहीं है उनके लिए कुछ किया जाए।
कई लोगों से कहा भी चलने के लिए लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ। सबको लगा कि यह सब बकवास है । कौन जाए इस बेवकूफी भरे कार्य करने। आखिर मुझे क्या मिलेगा इससे? लेकिन भौतिक लाभ हमें भले ही उससे कुछ ना हो परंतु जो आत्म संतुष्टि हमें मिलेगी उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकतीं हैं।आखिर क्यों हम इतने स्वार्थी बन कर रह गए हैं हमारा जहां लाभ होगा उसे ही करेंगे जहां नहीं होगा मुझे क्या मतलब।
मेरी डायरी से : भाग – ९०
आज रक्षाबंधन था। कॉलेज में जो बच्चे रह गए थे उनको बहनों ने राखी बांधी । सबसे पहले जो सगे भाई-बहन थे उसने अपने भाई को बांधी । फिर सभी बहनों ने छोटे बच्चों को बांधी । बड़े बच्चे जो एक ही क्लास में थे कुछ ने बंधाया कुछ ने नहीं बंधाया ।
मैंने पूछा कि आप लोग क्यों नहीं बंधा रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मैं बहन नहीं बनाना चाहता फ्रेंड ही अच्छी है।
कुछ बड़े बच्चों ने जो सौम्य किस्म के थे उन्होंने सहजता से बंधा ली । उन्हें बहन और फ्रेंड में कोई अंतर नहीं दिखा। जो दो-तीन बच्चों ने राखी बंधवाया थें उनको पूर्व रात्रि में गहन योग निद्रा करवाया था। वे स्वयं उस परम क्रिया के प्रति जागृत थे जहां मानवी रिश्ते सहज में मिट जाते हैं।
मेरी इच्छा हो रही थी कि मैं भी राखी बंधवाऊ परंतु किसी भी अध्यापक ने महिला अध्यापकों से राखी नहीं बंधवाया है इसलिए मैं भी नहीं बंधवाया ।
फिर ऐसी अध्यापिकाओं थी जिसे मैंने कभी ज्यादा कुछ बात भी कभी नहीं की। वह स्वयं को तीस मारखा समझती थी। जिससे मेरी हिम्मत नहीं होती थी बात करने की। कहते हैं जो झुकते हैं उन्हें मोती मिलते हैं । जो अकड़ कर चलते हैं वे ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ९१
आज मैं बच्चों से यह जानने का प्रयास कर रहा था कि उन्हें घर का भोजन अच्छा लगता है या हॉस्टल का सभी बच्चों ने कहा घर का । इसी प्रकार उनसे जब यह पूछा कि उन्हें घर रहना अच्छा लगता है या हॉस्टल में ।तो सभी ने घर में मां के साथ रहना अच्छा बताया।
हॉस्टल में 10 – 12 बच्चे शिशु कक्षा के रहते हैं । खेलने खानें की उम्र में उन्हें हॉस्टल में बंद माहौल में रखा जा रहा हैं ।जहां थोड़ा सा भी जोर से बोलने पर तुरंत डांट पड़ती है। कभी-कभी मार भी पड़ जाती है।
जिसके कारण अधिकांश बच्चे डरे सहमें से रहते हैं । उनकी प्रेप की कक्षाएं सुबह दोपहर एवं सायंकाल भी लगती हैं । परंतु अधिकांश की शिकायत रहती है कि पढ़ते हैं भूल जाते हैं, याद नहीं रहता।
मुझे लगता है डर भय या दंड के कारण भले ही बच्चा शांति से बैठा रह ले परंतु उसकी पढ़ाई लिखाई का कोई भाग समझ में नहीं आता । जब मैंने योग कक्षा में देखा कि बच्चे शांतिपूर्वक नहीं बैठे रह पा रहे हैं तो मैंने उन्हें खूब हंसाया एवं रुलाया तथा चिल्लाने को कहां ।चिल्लाने से बच्चों की ऊर्जा में कमी आती है ।
जिससे उनके मस्तिष्क के तंतुओं में खिंचाव होने के कारण उन में सक्रियता बढ़ जाती है । मुझे ऐसा लगा कि एक पीरियड ऐसा रखा जाए जिसमें बच्चे अपनी मनमर्जी से जो करना चाहता है उसे करने की उन्हें छूट दी जाए।
मेरी डायरी से : भाग – ९२
आज प्रातः काल मैंने सपना देखा कि कुछ मुसलमान लोग यह कह रहे हैं कि इस भारत देश से मैं क्यों प्रेम करूं ? मेरा इससे क्या संबंध ? उनके चेहरे को मैं पहचान तो नहीं सका परंतु मुझे लगा प्रातः काल के स्वप्न सत्य होते हैं ।
अधिकांश मुस्लिम रहते तो भारत में है परंतु विजय की कल्पना पाकिस्तान की करते हैं। उन्हें भारतीय संस्कृति से कोई प्रेम नहीं होता। आवश्यकता पड़ने पर हर संभव उसे तोड़ने का प्रयास करते हैं।
आखिर मुस्लिम समाज क्यों भारत को अपना नहीं समझता? यहां की सांस्कृतिक विरासत को नष्ट भ्रष्ट करने का हर संभव प्रयास करता हैं ? क्या इसी से भारतीय अखंडता एवं प्रेम को बचाए रखा जा सकेगा।
मेरी डायरी से : भाग – ९३
आज एक गेम्स के शिक्षक ने कक्षा चार के बच्चों को एक प्रश्न पत्र हल करने को दिया परंतु एक बार सभी से बोलकर उत्तर पूछ लिया । जिससे सभी बच्चों को यह मालूम हो गया कि उनके उत्तर क्या है ? फिर सभी उत्तर को ठीक करने को कहा?
मेरी यह नहीं समझ में आया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह ऐसा टेस्ट है जिसमें टेस्ट के नाम पर मात्र दिखावा किया जाता है। क्या फर्क पड़ता है यदि ऐसे टेस्ट ना लिया जाए।
मैं विद्यालय में देखा कि अधिकांश कार्य मात्र दिखावे के लिए किए जाते हैं । इसमें विद्यालय प्रशासन की ही सारी गलती नहीं मान सकते बल्कि अभिभावकों के अहंकार की पूर्ति के लिए यह नाटक बाजी ना किया जाए तो वह कुछ समझते ही नहीं।
विद्यालय में प्रश्न पत्र इतने सामान्य बनाए जाते हैं कि अधिकांश बच्चों के शत प्रतिशत नंबर आते हैं । इसमें बच्चा भी खुश , अभिभावक भी खुश और विद्यालय प्रशासन भी अपनी ताल ठोंकता है। इन सारे नाटक बाजी के पीछे बच्चों को परीक्षा की तैयारी के लिए इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह खाना-पीना, खेलने-कूदने को सब भूल जाता है।
हॉस्टल के बच्चों की तो परीक्षा की तैयारी के कारण उनका गेम्स का पीरियड खत्म कर दिया गया है । उस समय भी बच्चों को परीक्षा की तैयारी के लिए दबाव डाला जा रहा है। जिसके कारण वह आतंकित हैं परंतु विरोध भी नहीं कर सकते।
क्या यही शिक्षा पद्धति बालकों को महानता के पथ पर ले जाएगी। इस पर चिंतन नहीं किया गया तो हो सकता है आने वाले पीढ़ी हमें माफ ना कर सके।
मेरी डायरी से : भाग – ९४
आज मैं नर्सरी क्लास के बच्चों की क्लास को योग सिखाने के लिए जब योग कक्षा में बुलाया तो तीन बच्चियों ने सिर में दर्द और चक्कर आने की शिकायत की। मैं उन बच्चों को कहा कुछ देर बैठे रहे ठीक हो जाएगा और बच्चों को योग सिखाने लगा। परंतु उनका दर्द कम नहीं हुआ।
छोटे-छोटे बच्चों को इस प्रकार देख मैं छटपटाने लगा। आखिर इन बच्चों का क्या दोष है? जो उनके अभिभावकों ने बचपन से ही बीमार बना रहे हैं। जिस उम्र में बच्चों को चहकता देख दिल खुश हो जाता है । उस उम्र में शांतिपूर्वक उबाऊ क्लास में बैठा कर दो चार अक्षर ज्ञान कराना क्या उचित है?
मान लीजिए यदि वे इन चार अक्षरों को नहीं पढ़ सके तो क्या होगा? इन बच्चों को लाइब्रेरी, म्यूजिक, गेम्स आदि कक्षाओं में भी बैठे ही रहना पड़ता है। क्या मां के प्यार से बढ़कर और कोई शिक्षा है?
परंतु क्या कहा जाए आज के माता की कि उनके पास बच्चों के पालन पोषण की भी फुर्सत नहीं है? आखिर क्यों उन्होंने बच्चों को जन्म दे दिया जब उनके लिए आपके पास समय नहीं है?
मेरी डायरी से : भाग – ९५
प्रिंसिपल सर के साथ आज गेम्स टीचर की मीटिंग थी । सभी टीचर्स गोले में बैठे थें । मीटिंग में यह निर्णय लिया गया की कैंटीन सफाई सप्ताह एवं हेल्थ हाइजीन सप्ताह मनाया जाए। जिसमें बच्चों को लगें कि कुछ हो रहा है । यह मात्र गवई स्कूलों की तरह न होगी आ गए और बच्चों से कहा कि चलो आज सफाई अभियान है और खाना पूर्ति करके छुट्टी पा गए बल्कि यह जीवंत होना चाहिए।
पहले हफ्ते प्लानिंग, दूसरे सप्ताह बच्चों को इसकी जानकारी दे फिर तीसरे सप्ताह इसकी शुरुआत करें । इसमें बच्चों को अवार्ड भी दिए जा सकते हैं। क्लास को भी सम्मानित किया जा सकता है। इससे मात्र कुछ ही दिनों में परिवर्तन दिखने लगेगा।
प्रिंसिपल सर अभी युवा है जिसमें सर अभी युवा है जिनमें जोश हैं कि विद्यालय के विद्यार्थीयों में मानवीय गुणों का विकास हो । विद्यालय में बच्चों को अलग-अलग मॉनिटर बनाया गया है जो अपनी ड्यूटी बड़ी मुस्तैदी से करते हैं और खुश भी रहते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ९६
आज आपसी बैठकों में यह बात सामने आई कि अधिकांश अभिभावकों की शिकायतें हैं। उनके बच्चों को अनावश्यक प्रताड़ित किया जाता है। थोड़ी सी गलती पर बच्चों को फट से थप्पड़ पड़ने लगते हैं । टिफिन नहीं लाया फिर भी थप्पड़, टिफिन लाया है यदि मीनू नहीं है फिर भी हाथ उठाकर पूरे ग्राउंड का चक्कर लगवाए जाता है। यह मीनू भी अधिकांशत बेवकूफी भरे हैं।
एक दिन ब्रेड लाने का है तो एक दिन फल । यदि बच्चों को किसी कारण से वे बाजार से चीज नहीं मिली तो उनकी कोई भी दलील नहीं सुनी जाती। उनको प्रताड़ना मिलती हैं ।अधिकांश गेम्स टीचर को देखकर ही बच्चे भय खाने लगते हैं और शांति से बैठ जाते हैं।
क्या बात बात में बच्चों को प्रताड़ित या अपमानित करना ही एकमात्र उपाय है? यह उबाऊ शिक्षा पद्धति बच्चों को किस डगर ले जाकर छोड़ेगी इसे समझने के लिए किसी के पास समय नहीं हैं । थोड़ी देर रुक कर चिंतन कर सके क्या मां की गोद की तरह विद्यालय नहीं हो सकता जहां पर बच्चे अपने दिल की बातों को रख सके ।
आखिर विद्यालयों को इतना खौफनाक क्यों बना दिया जाए जहां बच्चे भय के वातावरण में जीते हो। क्या प्रेम पूर्ण माहौल नहीं बनाया जा सकता?
मेरी डायरी से : भाग – ९७
क्लास 9th में मैं पढ़ा रहा था। तभी एक लड़की व्हाइटनर मांगने आई । मुझे कहीं कि सर किसी के पास हो तो दिला दे । मैं पूछ ही रहा था कि देखता हूं कि एक लड़का तब तक बाहर निकल कर दूसरी कक्षा से वह व्हाइटनर ले आए और उसे दे दिया । यह सब इतनी जल्दी में हुआ कि मैं कुछ सोच भी नहीं पाया।
मैं लड़के को गलती होने के बाद भी प्रताड़ित नहीं करना चाहता था। कितने प्रेम से वह लाया होगा । यदि उसे प्रताड़ित करता तो खिलता प्रेम का पुष्प मुरझा जाता । वह लड़की सामने की कक्षा के खिड़की के पास ही बैठी थी । जिससे उसका चेहरा स्पष्ट दिखता था। फिर बच्चे अन्य बातों के लिए उससे इशारे करने लगे। मैं बात को बढ़ते देख लड़के को डांटा । फिर उसे भी समझाने का प्रयास किया।
परंतु क्या मेरे समझाने से वे समझ जाएंगे। बच्चे जब बड़े हो जाए तो उन्हें प्यार से ही समझाना अच्छा होता है । बात तो छोटी थी लेकिन मन के भाव को बहुत गहरा कर गई ।
मेरी डायरी से : भाग – ९८
आज मां ने निराश होते हुए कही की अब पैसा का जुगाड़ नहीं हो सकेगा। मैंने मां से कहा था कि अप्रैल तक कुछ पैसे की व्यवस्था कर दूंगा। मां के बस में है भी क्या अधिक परेशान होने के बाद भी ज्यादा क्या कर सकती है?
मनुष्य प्रकृति के सामने मजबूर हो जाता है। चाह कर भी वह कुछ नहीं कर पाता ।
खेत पिछले 5-6 वर्षों से गिरवी रखा हुआ है। घर भी पुराना कई वर्षों पहले गिर गया था । एक प्लास्टिक की पन्नी की मड़ैया बनाकर रह रहे हैं । रहने को ठीक से एक छत भी मयस्सर नहीं है ।भतीजी विवाह के योग्य हो रही है । मां को उसकी शादी की चिंता के साथ ही मेरी शादी के भी चिंता खाए जा रही है।
मां सोचती है कि अभी तो मैं हूं जो खाने-पीने को पूछ ले रही हूं मेरे ना रहने पर तुझे एक लोटे पानी को कोई पूछेगा ही नहीं। इस दुनिया में कोई किसी का नहीं है बेटा। सब स्वारथ के हैं । इसलिए मैं तुझे बार-बार समझाती हूं कि अपने बारे में भी कुछ सोच । छोड़ो यह सब सेवा का नाटक। यह संस्थाएं मात्र व्यक्ति का शोषण करती है । जो व्यक्ति थोड़ा भावनाशील होता है उसे यह लोग निचोड़ लेते हैं।
सोचता हूं ठीक ही कहतीं तो है अम्मा। जिस संस्था के विकास के लिए मैंने पूरी जवानी बर्बाद कर दी एवं कर रहा हूं क्या किया है उन लोगों ने? जो चापलूसी करता है। जी हुजूरी में लगा रहता है । वह बहुत अच्छा है। लेकिन ठीक से हमें पहचानते भी नहीं ! क्योंकि मुझे चापलूसी नहीं आती। जो भी हो सब प्रभु की इच्छा।कोई मार्ग निकालेंगे ही।मैं तो मार्ग खोजते खोजते थक गया।
मेरी डायरी से : भाग – ९९
आज भैया आने वाले थे। परंतु बुखार आने के कारण नहीं आ सके । मां दिन भर पूछताछ करती रही क्या हुआ बुखार ठीक हुआ कि नहीं । मोबाइल चार्ज नहीं था मैंने सोचा दिन में लाइट आएगी परंतु पाली बदलने के कारण वह रात में आएगी फिर चार्ज हो जाएगा ।
परंतु मां की छटपटाहट कम नहीं हो रही थीं ।कभी कहती क्या उसमें फोन भी नहीं आएगा। फोन आता तो मैं सुन लेती । मां कितनी सरल हैं । उसे यह भी नहीं मालूम कि बैटरी चार्ज नहीं होने पर सब कुछ बंद हो जाता है।
मैं बाजार गया, भैया को फोन कर हाल-चाल मां को बताया। तब मां को थोड़ी शांति आईं । कभी-कभी भैया मां को उल्टी सीधी बातें कह देते थें ।फिर भी मां तो मां है । पुत्र कितना भी कुपुत्र निकल जाए परंतु मां की ममता कभी कम नहीं होती । मैं पिछले कई दिनों से घर पर रुका हूं ।
मां सोचती रहती है क्या-क्या खिला दूं कि बेटा थोड़ा तगड़ा हो जाएं ?कभी-कभी कहती इसको इतना घी दूध खिलाती हूं फिर भी इसकी हड्डियां दिखती ही रहती हैं । कभी जब मैं घी कम लेता हूं तो मां कहती आदमी पाए तो कितना खा लें लेकिन तुझे क्या हो जाता हैं । ऐसा है तुम हवा पिया करो । सोचता हूं मां कितनी महान है उसकी महानता का स्पर्श मनुष्य नहीं पा सकता।
मेरी डायरी से : भाग – १००
आज एक साधक कहने लगे कि हमें भोग को समझना चाहिए। सच्चा भोगी ही अच्छा योगी हो सकता हैं । भगवान कृष्ण के साथ जो गोपियां है वह पूर्व जन्म की उनकी शिष्याएं हैं। वह उनको लीला दिखा रहे हैं ।कृष्ण जगतगुरु हैं । वह भगवान से पहले गुरु हैं ।
गुरु भगवान से भी बड़ा होता है । गुरु हमें जीने की राह दिखाता है। कृष्ण जगतगुरु हैं क्योंकि उन्होंने हमें जीने की राह दिखाई । गौ चराया, गोपी ग्वाल बालकों के साथ लीलाएं की अर्थात राजकुमार होते हुए वह साधारण जन के साथ खेले । जाति पाति ऊंच नीच की खाई को खत्म किया।
लेकिन आज का भागवत भक्तों की हालत पूछो मत। हरे कृष्णा हरे राम कर नाचने वाले मूर्ख मक्कार भक्त किसी दबे कुचले पिछले व्यक्ति को फूटी आंखों नहीं सुहाती है। भक्त मंडली इन्हें पैर की जूती के बराबर भी नहीं समझती।
जिस राम ने 14 वर्षों तक बन बन भटकते हुए अन्याय का प्रतिकार किया। भालू बंदरों को भी गले लगाया। क्या वे तथा कथित राम कथा वाचक एवं राम भक्त पिछड़ों दलितों को कभी अपनाने का प्रयास किया । उनके राम केवल मुख में होते हैं । सही मायने में यह पाखंडी साधु कथावाचक ही देश के लिए खतरा हैं ।
यह समाज को जोड़ने नहीं बल्कि तोड़ने का पाखंड करते हैं। समाज का कल्याण तभी होगा जब तक जात-पात ऊच नीच की दीवारों को तोड़ नहीं दिया जाता । इसके लिए स्वयं जागृत होना पड़ेगा । सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि हम जाति ना लिखें ।जातिवाद का अहंकार जब तक होगा मानवता नहीं बच पाएगी । आइए एक छोटी सी शुरुआत करें जाति की जगह मानव लिखें।
मेरी डायरी से : भाग – १०१
आज मैं जब सो रहा था तो सपना देखा कि एक विधायक के घर गया उन्होंने हमारे पुस्तक छपाने का वायदा किया था । परंतु कहने पर कहा मैं तो अपनी पुस्तक छपा रहा हूं और जोर-जोर से हंसने लगे । मैं निराश हो गया।
मैंने कहा -” हम कितनी बार आए कुछ तो पैसा दे दे तब तक एक पतला सा आदमी आया। उसे मैं पहचान गया वह भी हंसने लगा और कहा जानते नहीं मैं विधायक का भाई हूं मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाओगे । फिर विधायक अंदर गया एवं 1000 की नोट लेकर आया और उपेक्षा से पटक दिया । मैं उसे लेकर बैग में रख लिया।
आगे के सीन में देखता हूं कि मैं भोजन को जमीन पर गिर गया साफ कर रहा हूं । अंदर से एक स्त्री मुस्कुराते हुए कहने लगी -” ऐसे ही होता है। दूसरों से मांग कर खाने वालों के साथ।” भोजन बहुत गिर गया था। मैं उसे उठाने में शर्मिंदा भी महसूस कर रहा था।
जहां साइकिल रखी थी देखता हूं कि उसके नीचे बहुत सी गहरी खाई हैं। साइकिल लटक रही है । निकालते हुए लगा अब गिरी तब गिरी। पैसे को मैं कई बार पलट कर देखा । सोचने लगा पैसा घर पर रखकर तब उन्हें इलाहाबाद लौटूं क्योंकि कमरा मैंने छोड़ दिया है। दिल की धड़कनें बढ़ गई हैं । पूरा शरीर पसीने से तर गया है । तब तक आंखें खुल गई।
मुझे लग रहा है स्त्री के रूप में साक्षात मां भगवती ने दर्शन देकर कहा कि पैसे वालों के पीछे जो पड़ें हुए हों उसका मोह छोड़ो। इनका धन गरीबों असहायों के खून से सना है। खड्डे के रूप में यही समझ में आया कि यदि तुम इसमें फंस गए तो नरक रूपी गड्ढे में गिरने से नहीं बच पाओगे।
मेरी डायरी से : भाग – १०२
आज बात ही बात में विजय मिश्रा भाई साहब कहने लगे कि आपको नहीं मालूम आप पिछले जन्मों में एक वैरागी संत थे जो कि इस जन्म में साधना पूरी करने के लिए आए हो। आपकी शादी विवाह भी होता है तो बंधन ज्यादा दिनों तक नहीं टिकने वाला। आप तो ऐसे संत होंगे कि जो मिला तो खा पी लिया नहीं मिला तो भी कोई चिंता की बात नहीं। आपको नितांत अकेले नदी के किनारे या जंगलों में रहना पसंद है।
आपको अब अपने द्वंद से मुक्त हो जाना चाहिए । यदि शादी विवाह भी करना चाहेंगे तो वर्ष 2 वर्ष में हो जाएगी नहीं तो जीवन में बैरागी तो बनना ही है। आप शारीरिक किसी कारण से नहीं बीमार होते बल्कि प्रारब्ध के कारण होते हैं। जब भी आप सांसारिक बातों की ओर जीवन की दिशा धारा मोड़ने का प्रयास करते हैं पटक दिए जाते हैं।
आप गायत्री मंत्र की अपेक्षा भगवत नाम जप एवं लेखन करें। उसी में आपका कल्याण है। आपकी अपनी सोच एवं विचारधारा है जिसे कोई नहीं डिगा सकता है। आप सुनते तो सबकी हैं परंतु करते अपने मन की है। आप द्वंद छोड़कर स्पष्ट निर्णय लेने का प्रयास करें।
मेरी डायरी से : भाग – १०३
आज मैंने स्वप्न देखा कि बड़े भैया टमाटर लेकर साइकिल से दूर-दूर तक बेचने जाते हैं । भाभी एवं बच्चे भी टमाटर की छांट छटैया में लगे हैं। पूरा परिवार उसी में व्यस्त है। भैया पसीने से तर बतर हैं । ज्यादा मेहनत के कारण उनके बालों में सफेदी आने लगी है । शरीर में थकान अनुभव होती है ।
फिर भी काम में लगे हैं कि कमाऊंगा नहीं तो इन पांचो बच्चों का भरण-पोषण कैसे करूंगा? छोटे-छोटे बच्चे कुछ मांगते हैं तो डांट कर बैठा देते हैं या कहीं भी ज्यादा खुश हुए तो कह देते हैं बेटा कल जरूर ला दूंगा । परंतु वह कल कभी नहीं आता । भैया का छोटा लड़का थोड़ा जिद्दी है। वह कभी-कभी झगड़ जाता है एवं मां को मारने लगता है कि यदि पापा ने कल नहीं लाया तो मैं स्कूल पढ़ने नहीं जाऊंगा ।
भाभी समझाती है कि-” अरे बेटा तू स्कूल क्यों नहीं जाएगा ? इसी प्रकार तू जिद करता रहेगा तो तेरे पापा का दुख दर्द कैसे मिटेगा? तू पढ़ लिखकर बड़ा ऑफिसर बनेगा। तब तेरे पापा को थोड़ा आराम मिलेगा। देखते नहीं उनके चेहरे पर अभी से झुर्रियां दिखने लगी है। आंखें धंसी जा रही हैं।
मैंने एक दिन भैया से बात किया कि भैया इतनी साइकिल मत चलाया करें । गाड़ियों से सामान पहुंचा दिया करें।
तब भैया ने कहा-” कितना बचता ही है । वैसे भी यह कच्चा सौदा है । साइकिल से थोड़ी मेहनत जरूर होती है परंतु थोक की अपेक्षा फुटकर में कुछ ज्यादा बचत हो जाती है ।
भैया की कठिनाई देखकर हृदय में दुख होता है। पिताजी के मरने के बाद भैया ने न सहारा दिया होता तो मैं आज इस स्थिति में ना होता । आज जो कुछ भी मैं हूं वह सब भैया के ही त्याग तप के कारण है। मैं अब घर परिवार के प्रति उपेक्षा नहीं बरतूंगा यथासंभव समस्या सुलझाने का प्रयास करूंगा।
मेरी डायरी से : भाग – १०४
आज मौसम बहुत सुहाना है। ठंडी ठंडी फुहारे चल रही हैं। उन हवा के झोंकों के बीच मन मदमस्त होकर फ्रीलांस डांस के मूड में है । धीरे-धीरे पानी की टप टप करती बंदे भी गिरने लगती है। हम शहरी लोगों को यह लग सकता है की बारिश में भीगने से सर्दी जुकाम हो सकते या ठंड लग सकती है?
परंतु जब आपको यह नहीं मालूम है कि यह वर्षा की टप टप करती पहली बूंद हमारे शरीर को रोगों से लड़ने के लिए एंटीबॉडी का निर्माण करती हैं । आप पहली बार भींग कर प्रकृति की सुंदरता का अनुभव तो करके देखें । थोड़ा बहुत सर्दी जुखाम हो जाए तो कोई चिंता ना करें। पूरे मौसम आप बीमारियों से बच जायेंगे ।
अपने देश के कई प्रांत के लोग जमकर स्नान करते हैं। अभी मैं राजस्थान गया था । वहां पर देखा कि इस वर्ष की पहली बरसात आज हो रही है। अधिकांश टीचर्स वर्कर्स के साथ स्टूडेंट भी बाकायदा बारिश की बूंदे का आनंद प्राप्त करने के लिए रोड़ों पर टहल रहे थे । हम सोचेंगे भाई यह क्या पागलपन है।
कहीं सभी को पागलपन के दौरे तो नहीं पड़ गए । अरे नहीं जनाब ऐसी बात नहीं । सभी उच्च शिक्षित हैं। ऐसे मौसम में सारे तर्क समाप्त हो जाते हैं। यदि आप तर्क करोगे तो आनंद रस पाने से वंचित रह जाओगे ।तो जनाब चूकना मत , बारिश से भीगने से । इस बार जब भी बारिश हो खूब जम कर नाचना घूमना , मौज मनाना।
मेरी डायरी से : भाग – १०५
आजकल जितनी टेक्नोलॉजी का आविष्कार हो रहा है नए-नए दवाई निकल रही है बीमारियां भी उसी गति से बढ़ रही हैं । हमने यह कभी सोचा है की बीमारी का मूल कारण क्या है ? मूल कारण है हमारी प्रकृति से बढ़ती दूरियां । प्रकृति स्वयं रोगों से लड़ने के लिए एंटीबॉडी का निर्माण करती है ।
महानगरों में रहने वाले बच्चे तो महीना-दो महीने सूरज की रोशनी के भी दर्शन नहीं कर पाते । डॉक्टर भी अब सबको सलाह देने लगे हैं कि बच्चों को प्रकृति से दूर रखना अर्थात उनके पैरों कुल्हाड़ी मारना है । अब तो आलम यह है जनाब कि खेतों से मिट्टी लाकर बड़े-बड़े फ्लैटों में बच्चों को उसमें खेलने के लिए छोड़े जा रहे हैं। पक्की फर्श को गाय के गोबर से लीपा जा रहा हो तो परिवर्तन के लहर आ गई यह समझना चाहिए।
अतः परिवर्तन के लहर में आप भी क्यों नहीं बदलने का मूड बनाएं । शुरूआत स्वयं से एवं अपने घर से क्यों ना करें? वारिस का आनंद लें। कीचड़ से खेलें । नदियों, समुद्र के किनारे बेवजह टहले । बच्चों के साथ बच्चा बन जाए । खेलें मुस्कुराए। गरीब बच्चों को किताबें काफी पेंसिल बनते बांटे । बिना फीस लिए मजबूर बच्चों को पढ़ाये ।पतंग बाजी करें । कुश्ती लड़े, कबड्डी खेले । स्वयं को तनाव मुक्त रखें । जिंदगी का फुल आनंद ले।
मेरी डायरी से : भाग – १०६
आज मां किसी बात पर देवी मां को गाली देने लगी। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था परंतु कुछ नहीं बोला । घर के हालात ऐसे हो गए हैं कि मां करे तो क्या करें ? जीवन भर व्रत उपवास रखा फिर भी दुखों का समंदर इतना गहरा है कि शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा।
वैसे उन्हें किसी देवी देवता से क्यों घृणा होगी परंतु जब यह लगता हैं कि इतना पूजा पाठ किया मिला क्या? अब करेंगे तो क्या मिलेगा? जब ऐसे ही हालत रहने वाली है तो क्यों किसी के लिए व्रत उपवास रखा जाए।।
मनुष्य अपने जीवन में सुखी रहने का क्षमता भर प्रयास करने से नहीं चूकता । फिर भी हालात जब साथ ना दे तो वह कर ही क्या सकता है । कर्मों का फल व्यक्ति को भोगना ही पड़ता हैं । बिना भोगे हमें मुक्ति नहीं मिल सकतीं । कर्मों का फेरा जब कम होने लगता है तो हालत खुद व खुद सुधारने लगते हैं ।
बस हमें धैर्य के साथ बिना विचलित हुए उसका सामना करना हैं । जीवन में दुख है तो सुख भी आएंगे। इसमें ज्यादा घबराने के कोई जरूरत नहीं । प्रभु प्रेम का दामन थामें रखें । प्रभु पर विश्वास ही हमें दुखों से मुक्ति दिला सकता है।
मेरी डायरी से : भाग – १०७
आज मैं जब अघम वीर बाबूजी से कहा कि मेरा साधना में मन नहीं लगता है तो उन्होंने कहा -” साधना माला घूमाना ही नहीं बल्कि संयम ही साधन है। जिसका जीवन जितनी मात्रा में संयमित है वह उतना ही बड़ा साधक हैं । स्वाद को संयमित करना शरीर साधना है । अपने विचार वाणी को संयमित करना विचार संयम है।
जो हमारे व्यक्तित्व को नीचे गिराया ऐसे साहित्य को पढ़ने या सुनना दोनों घातक है । ऐसे ही जो हमारे लिए आवश्यक है वही सामग्री खरीदेंगे नहीं तो नहीं यह अर्थ संयम है। समय का एक भी नन्हा-सा क्षण आलस्य प्रमाद में ना गुजरने पाए ये समय संयम है अर्थात कहने का तात्पर्य है कि संयम ही साधना है। जीवन को संयमित बनाएं साधना सहज में होने लगेगी।
मैंने कई वर्षों तक हर महीने नव दिवसीय साधना कर लिया करता था । परंतु किसी को भी पता नहीं चल पाता था । साधना तपस्या छुपा कर करनी चाहिए। कभी उसका ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए। मैं एक संत के साथ रहा जिन्हें मैंने कभी माला जपते नहीं देखा।
परंतु जब भी मैं रात्रि में उठता तो वह जप करते मिलते। कभी-कभी जब भी साथ होते तो प्रकृति में शांति है शांति विराजमान होने लगती । अतः जब कोई साधना तपस्या नहीं हो रही हो तो गुस्सा होने की कोई बात नहीं । अपने कर्तव्य कर्मों की इमानदारी पूर्वक करते रहें यही सच्ची साधना है।
मेरी डायरी से : भाग – १०८
आज मैं घर आया तो देखा कि गांव जैसे वीरान सा लग रहा हैं ।दो दिन हो गए परंतु गांव में जैसे जाने की इच्छा ही समाप्त हो गई है। घर पर बैठकर भगवत नाम लेखन करता रहा। जो भी बातचीत किया थोड़ा बोल लिया। सच है हीरे की कीमत जोहरी ही लगा सकता है ।
अपने लोग केवल माया देखते हैं और उसी से व्यक्ति की परख करते हैं। यदि हमें जीवन में सफल होना है तो अपनी जन्म भूमि से दूर रहना चाहिए । कहावत है कि घर की मुर्गी दाल बराबर। घर गांव में उस व्यक्ति की कीमत नहीं होती । सच भी है अपनों से दुत्कार मिलती है तो प्रभु की याद आती है ।
जब तक अपनों की लात नाही मिलती मनुष्य को होश नहीं आता । जब तक होश आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । कभी-कभी कोई बिरला पुरुष होता है जिसके अंदर बचपन से ही भागवत चेतना जागृत हो जाती है और वह प्रभु प्रेम पाने को लालायित हो जाता है । ऐसे विरले लोग ही संसार को सद मार्ग दिखाते हुए प्रभु मार्ग के पथिक बनते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – १०९
इस बार जब मैं लाडनूं आया हूं पता नहीं क्यों अनेकों समस्याओं से घिरता जा रहा हूं। रास्ते में देर रात से आने के कारण टेंपो में भयभीत होना। देर रात्रि होने कारण गेट पर ही रात्रि गुजारना । फिर पूरा शरीर सर्दी जुकाम बुखार से जकड़ जाना। सारे शरीर में हाड़ तोड़ दर्द, खुजलाहट होना ।
जिससे न कोई क्लास में जाना अच्छा लग रहा है ना कुछ खाना पीना । थोड़ा बहुत इसलिए खा पी लिया जाता है कि यहां मां तो है नहीं की मनुहार करेगी । खाना या ना खाना यह हम पर निर्भर है।
प्रभु की क्या इच्छा है वही जाने? मनुष्य तो उनके हाथ की मात्र कठपुतली भर है । जो भी अच्छा या खराब है सब प्रभु की लीला है । कभी-कभी क्या होता है कि हम उनकी लीलाओं को नहीं समझ पाते जिससे लगने लगता है कि यह मेरे साथ ही क्यों होता है ।
जब तक हम उनकी मर्जी में ही अपनी मर्जी नहीं मिला देते दुःख बने रहेंगे। सुखी बनने का एक मात्र यही मार्ग है कि हम उनकी ही मर्जी में अपनी मर्जी मिला दें । जो कुछ है बस तू ही तू है । मैं कुछ भी नहीं मैं भटक गया था प्रभु परंतु जब दुखों के सैलाब बढ़ते हैं तभी तेरी याद आती है।
मेरी डायरी से : भाग – ११०
आज मैं प्रात काल के समय स्वप्न देखता हूं कि मैं अपने बड़े भैया रामचंद्र के साथ में भिक्षा मांगने देवी मां को चढ़ावा चढ़ाने के लिए जाता हूं । लगभग घंटे खड़े रहने के पश्चात भी वे नहीं देते हैं ।
मैं जूता मोजे पैंट शर्ट पहने हुए अप टू डेट लग रहा था। मैं हार नहीं मानना चाहता था। सामने घर के मालिक का लड़का दिखाई देता है । धीरे-धीरे मैं एक पहाड़ी पर चढ़ जाता हूं। नीचे देखने पर बहुत डर लगता है कि कैसे उतरूंगा कहीं जूता फिसल न जाए और गिर ना पड़े ।
मैंने भिक्षा के लिए गुहार लगाई तो लड़के ने प्याज और उसके साथ ₹10 लाकर एक पन्नी में देता है। मैं कोई झौला वगैरा भी नहीं लिए रहता हूं। इसलिए उसकी पन्नी सहित उठा लेता हूं और धीरे-धीरे नीचे उतर आता हूं। फिर मैं और भैया आगे मांगने की और बढ़ जाते हैं। इसी समय नींद टूट जाती है।
इस स्वप्न का क्या रहस्य है मैं नहीं जान पाया। वैसे भी आध्यात्मिक साधना केंद्र में ऐसे स्वप्न कुछ मायने रखते हैं जो भी हो।
मेरी डायरी से : भाग – १११
आज शिविर में एक बहन ने पूछा कि आपने क्या-क्या किया हुआ है ?
तो मैंने कहा-” पता नहीं क्या-क्या कर रखा है ? दुनिया भर की डिग्रियां इकट्ठा कर रखीं हैं।”
उन्होंने कहा -” और बताओगे भी तो क्या-क्या किया है “
तो मैं बताता जाता और वह और और करती जाती थी।
अंत में उन्होंने कहा बताओ और कुछ किया हो तो ?
मैंने कहा-” नहीं और कुछ नहीं किया ।”
तब उन्होंने कहां -” डिग्री का अहंकार नहीं करना चाहिए। व्यक्ति बहुत सी डिग्री को प्राप्त करने के पश्चात भी मूर्ख बना रह सकता है । चाहे हम जितना एम ए पीएचडी कर ले फिर भी ज्ञान अनंत है । उसके हम क्षण मात्र ही ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं।
उनकी बातें सुनकर लगा कि मैंने गलती की। हमें अहंकारी नहीं होना चाहिए । फल लगने के पश्चात जैसे वृक्ष झुक जाता है। उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति के पश्चात झुक जाना चाहिए। परंतु आज व्यक्ति दुनिया भर की डिग्रियों को इकट्ठा करके अकड़ कर चलता है । इसका मूल कारण है कि ज्ञान जो हमने प्राप्त किया वो पचा नहीं। जब तक ज्ञान जीवन का हिस्सा नहीं बने किसी काम का नहीं होता।
मेरी डायरी से : भाग – ११२
आज ट्रांसलेट से रिजाइन देने के पश्चात हेमंत के घर गया। उनके पिताजी का देहांत 6 माह पहले हो गया ; जबकि उनकी दादी अभी है। उनकी दादी से बात करते हुए बेटे की चर्चा किया तो सास बहू दोनों के आंसू छलक पड़ते हैं। हेमंत की मां भी बीमार रहने लगीं है।
उनकी दादी को समझाने का प्रयास किया कि -” देखो दादी! अब क्या किया जा सकता है रोने से वो थोड़े ही लौट आएंगे। सोचो भगवान कृष्ण की मां देवकी को कितने दुःख उठाने पड़े । जन्म लेते ही जिसके सात-सात बच्चों को मौत के घाट उतार दिया , वह कैसी मां रहीं होगी । प्रभु जिस व्यक्ति से प्रेम करते हैं उसको ही अत्यधिक दुख देते हैं । दुखू प्रभु के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक है।
सोचिए दादी! भगवान का जीवन कितना दुख भरा रहा। जन्म के पूर्व ही मां पिता को जेल में बंद कर दिया । जन्म के बाद ही विभिन्न षडयंत्रों द्वारा कंस उन्हें मारना चाहा । फिर अघासुर , बकासुर, नरकासुर से लेकर महाभारत युद्ध तक संपूर्ण जिंदगी देखी जाए तो कृष्ण का जीवन दुखों भरा है । परंतु उन्होंने कभी इस बात की शिकायत नहीं की जबकि उन्हें हम रासलीला करते देखना ज्यादा पसंद करते हैं।
हमें भगवान के जीवन से सीख लेनी चाहिए । यदि हम उनके जीवन से कुछ सीख सके तो जिंदगी कांटों की सेज नहीं बल्कि फूलों सी महक सकती है।
मेरी डायरी से : भाग – ११३
आज शनिवार था। मेरठ के गढ़ रोड पर गया तो सात आठ छोटे-छोटे लड़के लड़कियां एक कमंडल में तेल डालकर आ गए। एक छोटा सा लड़का पीछे पड़ गया कि बाबूजी आपकी शादी हो जाए, आपको सुंदर सी दुल्हन मिले ।
मैंने उससे कहा कि चलो तुम्हारी शादी करवाते हैं । फिर एक दूसरे पर वे बच्चें भद्दी भद्दी बातें करने लगे कि वह उसको पटाया है , वह उससे पटी है।
अधिकांश बच्चों के चेहरे से लग रहा था कि यह सभी नशा भी करते हैं । जिस उम्र में इन बच्चों को खाने , पहनने, पढ़ने लिखने की है उसे उम्र में भीख मांग रहे हैं आखिर इनका दोष क्या है? यही ना कि एक गरीब घरों में पैदा हुए? क्या माता-पिता का यही कर्तव्य है कि बच्चों को जन्म देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए ? इन भीख मांगते बच्चों का दोषी संपूर्ण समाज है ना कि केवल यही बच्चे।
ऐसे ही जब हेमंत की दादी से चर्चा हुई तो उन्होंने कहा कि -“आज के लड़के लड़कियां बहुत बिगड़ गए हैं । “
मैंने कहा-” माता जी आप समझने का प्रयास तो करो । इसमें केवल इनका ही दोष नहीं है। इसके दोषी कहीं-कहीं हम आप भी हैं । माता-पिता ने कभी अपने बच्चों से यह नहीं जानने का प्रयास करतें हैं कि वह कहां जा रहे हैं ? क्या करते हैं ? पैसे से तो प्रेम नहीं मिल सकता है। उनके समय ही नहीं है कि वह बच्चों से प्रेम पूर्वक दो बातें कर सके । फिर बच्चा आखिर क्या करेगा ? आखिर वही ना जैसा समाज कूड़ा कटकर के रूप में उसे देता है ।
समाज की यह विडंबना ही कही जाएगी कि एक ओर जहां गरीब बच्चों को सुविधा नहीं मिल पाने के कारण पढ़ लिख नहीं पा रहे , वही अमीर घरों के बच्चों के लिए अति पैसा बर्बादी का कारण बन रहा है। इस विरोधाभास को जब तक दूर नहीं किया जाएगा समाज का सही प्रकार से उत्थान नहीं हो सकता।
मेरी डायरी से : भाग – ११४
उसी प्राथमिक विद्यालय के बच्चों से बातें करते हुए देखा कि उनमें कई बहुत ही प्रतिभावान हैं । मधु नामक कक्षा 3 की एक लड़की जिनके पिताजी शराब पीते थे वह तीन बहन एक भाई हैं । मां किसी प्रकार दूसरों के यहां साफ-सफाई करके बच्चों का पालन पोषण करती है । इसी प्रकार बच्चों ने बताया कि उसके पिताजी शराब पीते हैं। मां कमाकर लाती है कभी-कभी मां को मार के पिताजी मां से पैसे छीन लेते हैं।
आखिर इन शराबी बाप के बच्चों का क्या दोष है? यही ना कि उसका बाप शराब पीता है। धन्य है ऐसी भारत की नारियां जो बच्चों के भविष्य के लिए स्वयं के जीवन को कुर्बान करने से बाज नहीं आती।
उन्हीं बच्चों से जब यह जानना चाहा कि मांस, मछली, अंडे कौन खाता है? तो अधिकांश बच्चों ने स्वीकार किया कि वह खाते हैं। मैं समझने का प्रयास किया कि हम किसी जीव को थोड़े ही बनाते हैं परमात्मा के ही बनाए हुए सभी हैं फिर हम क्यों जीव हत्या करते हैं ? हिंदू बच्चों तो मान गए एवं संकल्प भी ले लिया कि आगे से नहीं खायेंगे लेकिन मुस्लिम बच्चे संकोच कर रहे थे।
मेरी डायरी से : भाग – ११५
आज दिनेश भैया बता रहे थे कि शिवरात्रि के दिन जब बारात लौट रही थी तो मेरी छोटी बहन का लड़का जो कि अभी 17 या 18 वर्ष का था गाड़ी के नीचे दब गया और सायं होते होते उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
हमारे यहां यह प्रथा बनाई गई है कि शिवरात्रि , रामनवमी, अमावस्या, पूर्णिमा आदि के दिन व्रत उपवास रखा जाएं ।इसका यही कारण है कि इस दिन प्रकृति में बहुत अधिक हलचल होती है।
व्रत उपवास रखने से हमारा मन थोड़ा शांत होता है। संध्या भजन करने से प्रभु के प्रति प्रीत भी बढ़ती है । लेकिन हाय रे कलयुगी मानव , तुझे क्या कहा जाए ? यह मानव तन पाकर भी प्रभु भजन न करके पागलों की तरह नाच रहा है । आखिर जो होना है वह होकर के रहेगा परंतु हमें सावधान रहने की आवश्यकता है।
मेरी डायरी से : भाग – ११६
आज मैं जब अपनी बहन के घर से लौटने लगा तो देखा कि किराया कम है। यदि ₹10 और होते तो घर पहुंच जाता। सोचा क्यों बहन से मांगे चलते हैं विद्यालय में कार्यक्रम कराएंगे और मिल जाएंगे।
इस तरह से मैं वहां से नहीं मांगा । करनाईपुर के जय राम केसरवानी इंटर कॉलेज में गया तो पता चला प्रार्थना हो चुकी है । अब कार्यक्रम 1 घंटे बाद ही हो सकता है और मैंने सोचा दसवीं क्लास के बच्चों की परीक्षा के बारे में कुछ बता दिया जाएं ।
दसवीं के पश्चात बारहवीं क्लास को भी बताने का मौका मिल गया । बच्चे बहुत ही प्रभावित हुए । एक पीरियड की जगह दो पीरियड बीत गया और विद्यालय के लोग अब सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए नहीं तैयार हो रहे थे । मैं पास के विद्यालय भोलानाथ सिंह उच्चतर विद्यालय में गया तो सोचा लास्ट पीरियड में सार्वजनिक कार्यक्रम कराएंगे। पहले एक पीरियड दसवीं क्लास की ले लेता हूं।क्ष यहां भी एक पीरियड की जगह दो पीरियड बीत गया। विद्यालय प्रशासन ने कार्यक्रम बंद करा दिया । यहां भी कुछ पैसे नहीं मिला ।
सोचा कि चलो प्राथमिक विद्यालय में चलते हैं वहां प्रधानाचार्य जी नहीं थी कार्यक्रम नहीं हो सका । अब सोचा क्या किया जाए? फिर विचार आया चलो देखा जाएगा। जैसे प्रभु की मर्जी । बस में बैठने लगा तभी एक आदमी आता है। वह मुझे विद्यालय से लौटते हुए देखा था।
वह कहता है यहां एक विद्यालय और है। हमारे बच्चों को भी कुछ बता दें । मैंने कहा चलो । वहां पूरे 1 घंटे कार्यक्रम हुआ।प्रेम से गुरु दक्षिणा भी मिला जिससे हम सकुशल घर पहुंच गए। प्रभु की दयालुता को देख मैं नत मस्तक हो गए ।
मेरी डायरी से : भाग – ११७
जिंदगी कितने गुल खिलाती है कहां नहीं जा सकता। मनुष्य कभी-कभी साथ रहते हुए भी एक दूसरे को नहीं समझ पाता। मैं ट्रांसलेटर में चार महीने रहा परंतु हमारे साथ एम ओ डी करने वाली सोनिया एवं गरिमा से कभी काम के अलावा बातचीत नहीं हुई । जब मैं सोनिया जी से कहा कि मैं विद्यालय छोड़कर जा रहा हूं तो पहली बार उन्होंने समझाने का प्रयास किया कि मत जाओ जिंदगी में समस्याएं तो आती ही रहती है।
दो-तीन दिनों बाद जब मैंने कहा कि मैं कल जा रहा हूं तो जैसे मातृत्व उनके चेहरे पर झलकने लगा। मैं कोई चादर कंबल आदि घर से नहीं लाया था।
एक दिन ठंड ज्यादा होने कारण मैंने मांगा तो उन्होंने चद्दर दिया । आते वक्त जब लौटाने गया तो कहा कि हरिद्वार जा रहे हो लिए जाइए। मैं तो मां से कह कर रजाई मंगा रही थी । सोचा कंबल आपको दे दूं । जब देने की जिद करने लगा तो उन्होंने कहा एक तरफ आप बहन भी कहते हो दूसरी ओर बहन की बात भी नहीं मानते।
उन्होंने एक छोटी गुटके की आकार की गीता भेंट में दीं ।मेरे मन में विचार आ रहा था ”कलयुग के गीता” नामक पुस्तक जब छपेगी तो उसको समर्पित सोनिया जीजी को ही करूंगा क्योंकि इसको लिखने की प्रेरणा भी सर्वप्रथम उन्होंने ही दी।
मेरी डायरी से : भाग – ११८
संसार को हम कितना भी कहे कि यह नश्वर है। इसका मोह नहीं करना चाहिए । फिर भी इसका आकर्षण कम नहीं होता । ट्रांसलेट छोड़ते हुए पता नहीं कैसा मोह या प्रेम उमड़ आया कि मैं सैकड़ो की संख्या में कविताएं रच डाली । कई बार रिजाइन लेटर प्रिंसिपल सर के पास लेकर जाने पर भी नहीं दे सका।
तान्या नाम की एक बच्ची को जब बोला कि बेटा मैं स्कूल छोड़कर जा रहा हूं तो उसने कहा-” मत जाओ ना। फिर रूवासी होकर बोली आप बच्चों से ज्यादा प्यार करते हो ना इसीलिए लोग आपको निकाल रहे हैं। “
उसके सरल हृदय के भाव को देख मेरा हृदय भी द्रवित हो उठा लेकिन परमात्मा की जो इच्छा होती है वही होता है । मनुष्य जीवन में मोह, माया, ममता रहेगी इसे खत्म नहीं किया जा सकता। बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी जब नहीं त्याग सके तो हम तो सामान्य जीव हैं।
मेरी डायरी से : भाग – ११९
दैनिक जनवरी पत्र में एक ऐसी लड़की की कहानी दी हुई थी जिसने अपने समान ही उम्र की एक बेसहारा लड़की की जीवन गाथा को सुनकर उसकी सहायता करने की ठान ली । जहां चाह वहां राह मिल ही जाती है। उसने गरीब के लिए फंड जुटाया । आज जबकि यह मात्र दसवीं कक्षा में पढ़ रही हैं उसकी बनाई संस्था का टर्नओवर करोड़ों में हो रहा है।
काश देश के अमीर बच्चों को गरीबों के प्रति ऐसी सहानुभूत उत्पन्न हो जाए तो दुनिया न जाने कहां से कहां बदल जाए। बच्चों को इस दिशा में जरूर सोचना चाहिए । क्योंकि अपने लिए तो सभी जीते हैं जो दूसरों के लिए जीवन समर्पण करें वही सच्चे अर्थों में शूरवीर है।
मेरी डायरी से: भाग – १२०
आज एक प्राथमिक विद्यालय में गया तो दो मैंम बैठकर गप्पे लड़ा रही थी । मेरे जाने पर उन्होंने कुर्सी मांगा मैं बैठ गया। मैं सोचने लगा क्या यह अध्यापिकाएं अपने बच्चों को ऐसे स्कूलों में पढ़ाना चाहेंगी ? सरकार ने अध्यापकों की तनख्वाह तो बढ़ा दी लेकिन शिक्षा पद्धति में सुधार का कोई प्रयास नहीं किया।
आज सरकारी स्कूल का अर्थ हो गया है कि गरीब मजदूर बेसहारों बच्चों का स्कूल? क्या सरकार से ऐसी मूर्खतापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की कल्पना की जा सकती है ? कौन है इसका जिम्मेदार हमें इस बात को समझना होगा।
मेरी डायरी से : भाग – १२१
आज एक हैदर पब्लिक स्कूल में गया। जहां पर अधिकांश बच्चे मुस्लिम थे।
उनसे जब जीव हत्या के बारे में कहा तो सबा नाम की एक लड़की ने कहा कि-” सर बकरीद आने वाली हैं। मम्मी पापा यदि मांस नहीं खाएंगे तो मारेंगे ।
मैंने कहा-” बच्चों तुम्हें यदि मां पिता गलत सलाह देते हैं तो उनका विरोध करना चाहिए। आखिर तुम लोग मांस मछली खाते हुए थोड़े पैदा हुए थे । यदि खाना सीखा है तो छोड़ा भी जा सकता है । कुरान में बकरों की बली के बारे में कहीं नहीं लिखा है कि बल्कि हमें अपनी बुराइयों की बलि चढ़ाने चाहिए बुरे कर्मों से बचे ,किसी को धोखा ना दें घृणा किसी से ना करें।
मैं अनुभव किया कि इस्लाम ने कट्टरता का जहर बच्चों की रग रग में भर दिया है। जन्म के साथ ही दीनी शिक्षा के नाम पर बच्चों को जहर पिलाया जाता है। उसी का नतीजा है कि यही बच्चे जब बड़े होते हैं तो कितना भी समझाया जाए परंतु कुछ हाथ नहीं आता । भारत के मुसलमान रहते तो यहां है परंतु उनकी प्रार्थना पाकिस्तान की खुशी की रहती है।
जब तक भारतीय मुसलमान अपनी सोच में बदलाव नहीं लाएंगे देश का विकास नहीं हो सकता। दीनी शिक्षा को प्रतिबंधित करवा देनी चाहिए जो बच्चों को जन्म के साथ ही नफरत का बीज बोती है।
मेरी डायरी से : भाग 122
हॉस्टल में एक बच्चे ने आत्महत्या कर लिया । उसके बाद कॉलेज में खूब हो हल्ला हुआ। अधिकांश बड़े कॉलेज में देखा जाता है कि बच्चों की शिक्षा पर तो ध्यान दिया जाता है परंतु उनके व्यक्तिगत समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है जिसके कारण बच्चे घुट घुट कर जीने को अभिशप्त हो जाया करते है। इसमें अधिकांश माता-पिता की भी उतनी ही गलतियां होती हैं । वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को जिसे वे अपने जीवन में नहीं पूरे कर पाए उसे वह अपने बच्चों से पूरा करना चाहते हैं। इसके लिए बच्चों से दबाव बनाया जाता है जिसके कारण बच्चा ना चाहते हुए भी ऐसे कोर्स की पढ़ाई करता है जिससे उसकी कोई रुचि ही नहीं होती है।
एक दिन एक बच्चा कह रहा था कि मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता है तो मैंने पूछा कि आखिर कहां लगता तो उसने कहा क्रिकेट खेलने में।
फिर मैंने कहा कि खेलो तो उसने कहां कि सुविधा भी नहीं है । फिर कहने लगा यहां हमारा मन नहीं लगता है पढ़ने में । ऐसे बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें कोई ऐसा मित्र हो जो कि उनकी माता-पिता के प्रेम का एहसास कर सके परंतु वह यहां नहीं है। जिसके कारण यहां आए दिन कुछ ना कुछ घटनाएं होती रहती हैं।
मेरी डायरी से : भाग – १२३
आज सामूहिक सेमिनार का कार्यक्रम रखा गया था लेकिन मैंने देखा कि कोई भी ज्यादा रुचि नहीं ले रहा था । मैं समय अनुसार जाकर कुर्सी आदि व्यवस्थित करवा कर बैठ गया । मैं बैठा रहा लेकिन कोई भी बच्चा नहीं आया। समय का सदुपयोग करने के लिए मैं अध्ययन करता रहा । समय पूर्ण होने पर मैं सेमिनार हाल से आया तो देखा कि जिन्हें जिम्मेदारी दी गई थी बच्चों को बुलाने के लिए आराम फरमा रहे हैं । मैं कुछ नहीं बोला।
अक्सर लोग ईर्ष्या बस ऐसा करते हैं। यदि वे बच्चों को बुलाते और स्वयं आकर देखते कि बच्चे आखिर क्यों नहीं आ रहे हैं उन्हें सूचित करके बुलाते तो अवश्य वह आते । लेकिन उन्होंने ऐसा करना उचित नहीं समझा।
मैं जब से इंजीनियरिंग कॉलेज में शिक्षण कर रहा हूं देखता हूं कि लोगों को किसी से कोई ज्यादा मतलब नहीं है। अधिकांश लोग तो ऐसे रहते हैं जैसे मुर्दे रहते हैं । निर्जीव बेजान से ऐसा लगता जैसे मुर्दे परवाह कर लौटे हो। एक प्रकार से देखा जाता है की सरकारी संस्थानों में लोग नकारे हो जाते हैं। वे अपने काम से काम रखते हैं । किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखते।
मेरी डायरी से : भाग – १२४
आज मैंने सपना देखा कि अपने एक नजदीकी भाई के यहां गया। उन्होंने मुझे बड़े प्रेम से नाश्ते पानी का इंतजाम किया परंतु आगे देखता हूं कि वह अपने घर में अंधेरी कोठरी नुमा जगह बनाए हुए हैं । जहां आदमी को बेड़ियों की तरह रखते हैं। एक महिला मिलने आती है। वह लगता उसका पति था ।
मिलने की इजाजत बहुत कम समय के लिए दिया। जब पति-पत्नी जाने लगे तो फूट कर रो रहे थे । आदमी कह रहा था मात्र छोटी सी गलती के कारण यह लोग मुझे नरक की जिंदगी जीने को मजबूर किए है। इनकी सजा इन्हें भगवान जरूर देगा।
वैसे तो मेरी बहुत सहायता करते परंतु उनका रातों में नींद ना आने की बीमारी है। सारे शरीर में सफेद दाग पड़ गये है। मैं अनुभव कर रहा हूं कि यदि कोई भी किसी का अंश खाता है तो उसका कर्म के संस्कार भी उसके साथ जुड़ जाता है ।इसलिए खाने-पीने में हमें बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।
मेरी डायरी से : भाग – १२५
पिछले एक हफ्ते से मैं एक सूरदास बाबा के साथ रह रहा हूं। उनके कहने से मैं माता जी के चौके की अपेक्षा उनके साथ बनाकर खाने लगा तो देखता हूं कि जैसे मेरी जप तप में धीरे-धीरे मन ही नहीं लगता हैं ।
दिन भर में यह ले आओ, वह ले आओ,ऐसा करो ऐसा करो की धुन लगाए रहते हैं और मैं उसी में लगा रहता हूं। मैं उनके पैसे की चाय पी रहा हूं ।शरीर को थोड़ा रिलैक्स महसूस तो होता है परंतु अंदर ही अंदर एक खोखलापन लगता है। मैं राम नाम लिखता था लेकिन वह भी जैसे लिखने की इच्छा खत्म हो गई।
आज मैं पूरे दिन जप का प्रयास किया परंतु नहीं कर सका। पता नहीं मन नहीं लग रहा था । प्रवचन हाल में भी बैठा तो ऐसे था जैसे 100 वर्ष का बूढ़ा बैठता हो । एकदम लुंज-पुंज । मैं बहुत समझने का प्रयास किया परंतु क्या कारण है समझ नहीं सका।
सामान्य में 24 घंटे में एक ही बार सो जाता परंतु आज तीन बार जागना पड़ा । पेट में फिर भी बहुत भारी पर लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे भोजन बाहर निकल रहा हो।
आज मैं सुरेश सर से पता नहीं क्यों झूठ बोल गया जब उन्होंने पूछा कि रामदेव जी के यहां किसके संपर्क से जा रहे हो बाद में बहुत पश्चाताप हो रहा था ।
आज एक आश्रम में बिहार के कई साधक मिले जिन्होंने शांतिकुंज के बारे में बहुत नकारात्मक बोलने लगे । मैंने कहा कि हमें नकारात्मक पक्ष ही क्यों दिखता है सकारात्मक क्यों नहीं दिखाई पड़ता हैं? अच्छाई बुराई तो हर जगह होती। अतः हमें उजले पक्ष को ही देखने का प्रयास करना चाहिए।
मेरी डायरी से : भाग – १२६
शांतिकुंज परिसर के गायत्री मंदिर में दर्शन करने गया तो एक बहन प्रसाद चढ़ाना चाहती थी।
प्रसाद देने वाली दीदी से बोली आप प्रसाद ले ले और मुझे दे दे। परंतु दीदी ने कहा हम लोग प्रसाद नहीं निकालते आप जो भी निकलना चाहे निकाल दो। उन्होंने प्रसाद एक कटोरी में निकाल कर रख दिया । उनकी ऐसी सरलता देख मैं अभिभूत हुए बिना ना रह सका।
शांतिकुंज में जब मैं जप करने बैठता हूं तो न जाने क्यों तंद्रा आने लगती है । आधे घंटे भी बैठना मुश्किल हैं । ना जाने ऐसा क्यों हो रहा है कुछ भी समझ में नहीं आ रहा । अब तो सब गुरुवर पर छोड़ दिया कि उनकी मर्जी जैसा करेंगे ?आखिर मनुष्य के वश में है ही क्या ? वह सोचता है कि मैं ऐसा करूंगा वैसा करूंगा परंतु थक हार जाता है तो कहता है जैसे प्रभु तेरी मर्जी।
आज एक भाई कह रहे थे कि जो परिजन गुरुदेव के समय उनके साथ थे वे यहां को कुछ नहीं समझते । पर जो पहली बार आते हैं वे श्रद्धापूर्वक जप पूजन करते हैं। सच भी है किसी महापुरुष को कहां लोग समय रहते पहचान पाते हैं । जब उनका शरीर छूट जाता है तो उनकी मूर्ति बनाकर पूजन करते हैं।
दूसरी बात यह है कि हम अपने नजदीकी व्यक्ति जिनके साथ समय गुजारते हैं लगता है यह व्यक्ति भी तो हमारी तरह हैं । वैसे चलता फिरता बातचीत करता है परंतु ऐसे लोगों की दिव्यता को विरले ही पहचान पाते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – १२७
आज मैं शांतिपूर्ण परिसर में रात्रि में बहुत ही भयानक स्वप्न देखा। स्वप्न में मैं थर-थर काटने लगा। लगने लगा जैसे दम घुटने वाला है । साथी आश्रम में बहुत ही उत्तेजक विचार भी आ रहे हैं । मैं समझ नहीं पा रहा हूं कैसे दिव्य आश्रम में इतना बुरा सपना क्यों आ रहा है?
क्या यह हमारे पूर्व जन्मों के कारण है जो इस समय मिटना चाहते हैं ? ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति कोई तप साधना करता है तो उसके अंदर जमे हुए कषाय कल्मष धुलते हैं। वही कभी-कभी सपनावस्था में दिखता है । कभी-कभी यदि हम सपनों के प्रति सजग हो तो ऐसे स्वप्न हमारे लिए दिशा निर्देश का भी कार्य करते हैं।
जन्मों जन्मों के संस्कार व्यक्ति के एक दिन में नहीं मिटते हैं।। उसके लिए बहुत संयमपूर्वक तप साधनाएं करनी पड़ती है । जब संस्कारों की डोर थोड़ी ढीली पड़ती है तो हमें अपने आत्म स्वरूप का दर्शन होने लगता है । अतः हमें हर समय सजग एवं चैतन्य रहने का प्रयास करना चाहिए ।
सपनों को यदि हम सजगता पूर्वक उसका विश्लेषण कर सके तो समझ में आएगा कि यह सपना एक प्रकार से हमारे भविष्य के निर्माण में सहायक हैं । इसलिए हमें कभी भी सपना अवस्था में डरना नहीं चाहिए बल्कि उसका विश्लेषण करते हुए जीवन के निर्माण में सहायक बनाना चाहिए।
ऐसे ही हरिद्वार के शांतिकुंजमें एक स्थल पर प्रवचन चल रहा था । बारिश की बूंदे टपटप पड़ रही थी। सभी साधक सज्जन ध्यान पूर्वक प्रवचन सुन रहे थे परंतु वही एक छोटी सी बच्ची प्रवचन वगैरा भूल कर पानी पर छपाके मार रही थी। वह प्रकृति के आनंद में मगन है ।
ऐसा लगता था जिंदगी के सारे खुशी उसे मिल गई है। परमात्मा ईश्वर के बारे में चर्चा चल रही है परन्तु परमात्मा की साक्षात मिसाल को हम नहीं देख पाते। यदि हम बच्चों की तरह सरल सहज बन जाए तो परम शक्ति हमारे अंदर स्वयं ही प्रस्तुति होने लगेगी। परमात्मा चर्चा का नहीं बल्कि अनुभव का विषय है। परमात्मा का अनुभव तभी हो सकती जब हम बच्चों के समान सरल बनेंगे।
मेरी डायरी से : भाग १२८
आज मैं घाघ और भंडारी की लोकोक्तियां एवं कहावतें पढ़ रहा था ।
एक जगह कहावत है कि-
सेत बरसे खेत भर।
लाल बरसे ताल भर।
पीरो बरसे नदी नारो।
और जब बरसे धुआंधार।
तब आवे नदी नारो ।।
अर्थात सफेद रंग का बादल खेत भर बरसता है। लाल रंग का बादल तालाब भर। पीले रंग का कटोरी भर और धुआरे रंग का बादल जब बरसता है तो नदी नालों से पूर आ जाते हैं ।
इसी प्रकार भंडारी कहते हैं शुक्रवार को उठा बदल यदि शनिवार तक छाए रहे तो वह जरूर बरसेगा । चींटी अंडा लेकर जाने लगे और चिड़िया दूर में नहाने लगे तो भरपूर बारिश के संकेत हैं । चींटी अंडा लेकर जाने लगे और चिड़िया नहाए तो भरपूर बारिश के संकेत हैं।
चींटी ले अंडा चलीं ,
चिड़िया नहाए धूर।
शादी कहे तो भंडारी,
बरखा है भरपूर। ।
घाघ और भंडारी की कहावतें अधिकांश जीवन के अनुभव पर आधारित होती हैं। एक प्रकार से यह जीवन का निचोड़ होते हैं।
मेरी डायरी से : भाग – १२९
आज मैंने सपना देखा कि गांव के ही किसी भाई को कुर्सी उठाकर गुस्से में दे मारा ।उसने थाने में रिपोर्ट लिखा दी । मैं घर आया तो हमारी बहन और भांजी आई हुई थी । मैंने उन लोगों से ₹500 लेकर भाग गया। गांव में एक आदमी ने आत्मीयता दिखाई परंतु बाद में पैसे के लोभ में उसने मुझे पुलिस को सौंप दिया ।
तब तक बड़े भैया को खबर लग चुकी थी। उन्होंने चालान होने के पहले जमानत लेकर मुझे छुड़ा लिया और मैं जेल जाने से बच गया। जेल का नाम ही सुनकर अम्मा जैसे डर सी गई कि समाज में मैं कैसे मुंह दिखाऊंगी कि कैसे नालायक संतान को जन्म दिया।
मुझे भी बड़ा खेद हुआ कि क्रोध में आपा नहीं खोना चाहिए परंतु यह भी बहुत दुख की बात है हमारे अपने ही साथी में जिस पर मैंने विश्वास किया वह मुझे पुलिस के हवाले कर दिया। उस पर बहुत ही खीज आ रही थीं ।पुलिस के कारनामें देख कर तो मैं दंग रह गया। कैसे थोड़े से पैसे के लोम में लोग अपनी गरिमा गिरा देते हैं।
मुझे लगता है स्वप्न भी जीवन की पूर्व अवस्था होती है। कहीं ना कहीं इस प्रकार की घटनाएं घटी रहती हैं जो सपने में हमें दिखाई देती हैं।
मेरी डायरी से : भाग -१३०
आज मैं एक भाई के कहने से गायत्री तपोवन गया । वैसे हृदय में जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। फिर भी मैं देखना चाह रहा था एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने 36 वर्षों तक गुरुदेव से कंधे से कंधा मिलाकर चला उसका अलग हो जाना। मेरा मन स्वीकर नहीं कर पा रहा था । वह भी एक नहीं 80 व्यक्ति निकले ।
वह भी उन्होंने गुरुदेव की भविष्यवाणी सिद्ध कर दिया कि 30 वर्षों पहले गुरु जी ने कह दिया था । यह घृणास्पद बात उन्होंने मुख्य मार्ग पर बड़े से बोर्ड पर लिखा था ।उनका यह ओछापन व्यवहार मुझे बहुत खराब लगा।
उन्होंने कहा भोजन कर ले। साथ में होने के कारण भोजन तो कर लिया परंतु साथ वाले भाई कह रहे थे वहां 1 महीने रुक कर कुछ लेखन वगैरह सीखें लेकिन इच्छा एक भी दिन नहीं रुकने की हुई और मैं चला आया।
ऐसे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता भाई आज महामंडलेश्वर बन गए। यह तो होता ही रहता है। जहां इतने बड़े पात्र हैं वहां खनक तो होगी ही। मुझे लगा इन सब का बहुत बड़ा कारण भाई भतीजावाद का बढ़ जाना भी है। आज एक बड़े वर्ग का ज्यादा संरक्षण दिया जा रहा है जिससे समस्याएं बढ़ती जा रही है।
मेरी डायरी से : भाग – १३१
आज एक गुरु भाई ने मेरे बालों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि देखो आप बाल कटा लो। बाल रखने वाला गुरु जी का शिष्य नहीं हो सकता। उनकी बातों से हमें बहुत क्रोध आया परन्तु कुछ नहीं बोला । ना जाने क्यों लोग दूसरों की जिंदगी में इतना दखल देते हैं । मेरी इच्छा होती है बड़े बाल रखने की। मैंने कौन सा गलत कार्य कर दिया परन्तु लोगों के बुद्धि उनको कौन समझाए।
पता नहीं क्यों जब कोई मुझ पर टिप्पणी करता है तो बहुत खराब लगता है। मैं स्वतंत्र जीना चाहता हूं । जिंदगी को अपनी तरह से लेने की इच्छा होती हैं । किसी की अधीनता में रहना मुझे अच्छा नहीं लगता है । यही कारण है कि कई जगह मै टिक नहीं पाता क्योंकि लोग एक कूप मंडूक की तरह बनें बनाए ढर्रे पर चलाना चाहते हैं जो कि मुझे स्वीकार नहीं होता है।
यही बातें कभी-कभी दूसरों को बुरी लगती है । वैसे भी जिसने समाज से थोड़ा हटकर कुछ करनें एवं सोचने का प्रयास किया है उसे समाज में ठुकराया है। इसका कारण यह है कि समाज के व्यक्तियों को कुछ अलग स्वीकार नहीं होता।
उनकी बुद्धि उसे समझ नहीं पाती जिससे वह उस व्यक्ति से घृणा करने लगता है । वह उसके लिए घृणा का पात्र बन जाता है। और वही व्यक्ति जब कुछ कर जाता है तो दुनिया उसे सिर आंखों पर रखतीं हैं। हमें दुनियादारी की चिंता छोड़ अपने कार्यों में डटे रहना चाहिए।
मेरी डायरी से : भाग – १३२
इस बार में शांतिकुंज में साधना नहीं कर पा रहा हूं । जब मैं साधना के लिए बैठता हूं तो मस्तिष्क में भारीपन लगने लगता है जिसके कारण चाह कर भी ज्यादा देर तक नहीं बैठ सकता। ऐसा लग रहा है जैसे यहां के कण-कण में प्राण चेतना का वास हो।
वैसे तो मैं जीवन में गुरुदेव को नहीं देखा जब मैं इस मिशन से जुड़ा तो उनका शरीर छूट चुका था । परंतु उनके चित्र को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह हमारे सबसे बड़े हितैषी हो। आजकल रात्रि में भी बहुत अजीबोगरीब सपने आ रहे हैं। परंतु मैं कभी डरा नहीं जबकि घर पर जब स्वप्न देखता था तो डर जाता था।
घर की परिस्थितियों बहुत खराब हो चुकी है। एक तरफ तो लगता है सब कुछ छोड़कर घर परिवार की सहायता करु परंतु उसमें भी मन नहीं लगता । क्योंकि मैं किसी की बंधी बधाई नौकरी नहीं कर सकता। एक तरफ घर जल रहा है तो दूसरी तरफ पूरा देश जल रहा है ।
अब देश बचाओ या घर को समझ में नहीं आता है। संघर्ष एवं विपरीत परिस्थितियों के बीच ही दिव्य आत्माएं आगे बढ़ी है । जब भी मैं कोई अच्छा खाता पहनता हूं तो देश के भूखे नंगे बच्चों की तस्वीर नाचने लगती है । ऐसी स्थिति में ना तो ठीक से नींद आ रहा है ना ही कुछ खा पी रहा हूं ।
ऐसी स्थिति में जब कोई सहारा नहीं होता प्रभु नाम ही मात्र सहारा हैं।अब वही जाने जो करना हो करें।।
मेरी डायरी से : भाग – १३३
आज मूसलाधार बारिश हो रही है । पुराना घर गिर गया है। जो प्लास्टिक की पन्नी लगाकर मढैया बनाया गया था उसकी भी पन्नी पैसे के अभाव में नहीं बदला जा सका है। मैं चाह कर भी घर वालों की कुछ सहायता नहीं कर पा रहा हूं । सभी बच्चे किराए के मकान में रह रहे हैं ।
भैया की बिटिया बड़ी हो रही है । ऐसे में दूसरों के घर में रहना शोभा नहीं देता लेकिन क्या किया जाए? मनुष्य परिस्थित के आगे मजबूर है । भागकर भी क्या कर सकता है ऐसी स्थिति में अम्मा कभी-कभी देवी देवताओं को भी कोसने लगती है । क्या इसीलिए इतना सब कुछ किया की रहने को एक घर ना हो? जिसके तीन-तीन सांड हो वह दूसरों का मुख निहारे।
अम्मा भी तो ठीक ही कहती है लेकिन क्या किया जाए? जो भाग्य में लिखा उसे तो बदला नहीं जा सकता। हां जप तप एवं पुरुषार्थ से कुछ कम जरूर किया जा सकता है । जो हमारे हाथ में है उसे करने का प्रयास कर रहा हूं क्योंकि सभी चाहते हैं कि उनके घर परिवार सुख संपन्न हो दुख तो कोई नहीं चाहता फिर भी दुख से बचा ही कैसे जा सकता है ? उसे तो भोगना ही पड़ेगा यही कर्म फल का सिद्धांत है।
मेरी डायरी से : भाग – १३४
कल मैं सायं कालीन प्रवचन में नहीं जा सका । इसी प्रकार आज भी मैं रामदेव जी के आश्रम में जाने के कारण दोपहर की कक्षा में नहीं पहुंच सका। कल तो जिस भाई ने हाजिरी लगाएं थीं कुछ नहीं बोला परंतु आज भी बोले तो कुछ नहीं परंतु नाराज दिखें । स्वयं को भी अंदर से लग रहा था मैंने बहुत गलत कर रहा हूं।
अंदर ही अंदर दिल धड़क रहा था । मैंने प्रवचन छोड़ दिया । वैसे भी मैं जब पूरा नहीं कर पा रहा हूं ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं अपने हाथों ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा हूं।
मुझे एक काम जो भी मैं कर रहा उसे अच्छी तरह से पूर्ण कर लेना चाहिए फिर दूसरे कर में हाथ लगाना चाहिए था । एक एक बूंद बूंद से घड़ा भरता है।। जीवन में सफलता भी उन्हें ही मिलती है जो एक-एक कदम बहुत संभाल कर रखते हैं।
मुझे रामदेव बाबा के आश्रम में बिल्डिंग तो बहुत सुंदर देखे पर हमें ऐसा लग रहा था जैसे निष्प्राण हो। करोड़ों रुपए लगाकर दीवारें तो बन गए परंतु बिना त्याग तपस्या की उनमें जान कैसे आ सकते हैं? अधिकांश ऐसा लगा जैसे हम किसी व्यावसायिक स्थान में आ गया हूं ।
वहां पर एक भाई भारत स्वाभिमान के लिए जीवन समर्पण की बात कर रहे थे परंतु मुझे लगा है मैं अपने गुरुदेव चरणों में क्यों ना करूं ? क्यों मैं दूसरे के पीछे भटकूं। व्यक्ति को परिस्थितियों कभी-कभी मजबूर कर देती है जिससे वह ना करने योग्य करने को मजबूर हो जाता है।
मेरी डायरी से : भाग – १३५
आज प्रातः काल जब यज्ञ करने जा रहा था तो महेश भाई ने कहा कि जल्दी आ जाना परंतु हमने कहा जप के बाद ही आ पाऊंगा । जीवन में किसी न किसी नियम की आवश्यकता होती है । एक नियम को ही यदि जीवन में उतार लिया जाए तो अन्य नियम बनते चले जाते हैं। जप को ही यदि जीवन में उतार लिया जाए हृदय के संवेदना स्वत: मुखरित होने लगती है।
प्रवचन हाल में प्रवचनकर्ता बता रहे थे कि नशेड़ी शराबी दुष्चरित्र के उद्घार का उपाय तो शास्त्रों में है लेकिन परनिंदा करने वाले का कोई उपाय नहीं है।
यदि कोई सन्यासी मठ में रहते हुए निंदा करता है तो वह शराबी से भी दीन है। हमें ना तो किसी की निंदा एवं ना तो किसी की प्रशंसा करनी चाहिए। किसी की प्रशंसा करने से आसक्ति बढ़ती है एवं आसक्ति प्रभु प्रेम में बाधक हैं । अतः ऐसी स्थिति में हमें तटस्थ भाव बनाए रखना चाहिए।
मेरी डायरी से: भाग – १३६
आज महाराज जी बता रहे थे कि ईश्वर जब जीव का पालन करता है तो वह संहार क्यों करता है ? इसे हम विदेशों में किसान की तरह से समझाने का प्रयास करते हैं। एक किसान है। वह अपनी खेती बाड़ी को खूब मन से बीज बोता है । निराई गुड़ाई करता है।
एक-एक पौधों को ख्याल रखता है कि कहीं कोई पौधा टूट न जाए , परंतु इस पौधे को पक जाने पर वह काट लेता है। जिसे वह अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यार करता है । इसी प्रकार ईश्वर भी हमारा पालन पोषण करता है एवं जीवन के श्रेष्ठ उपयोग के लिए हमारा संहार भी करता है।
दूसरे दृष्टांत में स्वामी जी बता रहे थे कि आत्मा नित्य है । बिना आत्मा के आंख नाक आदि इंद्रियों का कोई अस्तित्व नहीं हैं । जो आंख देखतीं है आत्मा के न रहने पर क्या हुआ देख पायेगी नहीं ना।
आज राधा जन्माष्टमी का पर्व होने के कारण पूज्य महाराज जी राधा रानी के जीवन दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महाराज बृजभान एवं कृतिका को कोई संतान नहीं थी उन्होंने योग माया की तपस्या करने के पश्चात योग माया को कन्या के रूप में प्रताप का आशीर्वाद पाया।
इसके पश्चात धीरे-धीरे महारानी कृतिका को जब प्रसव पीड़ा हुई तो उस मांस के लोथड़े के रूप में जन्म ली है । धीरे-धीरे वही लोथड़े का प्रकाश रूप में बदला फिर पुत्री रूप में बदल गया । ऐसी कथा मैं शास्त्रों में पढ़ी है परंतु जन प्रचलित कथा दूसरी प्रकार से है।
मेरी डायरी से : भाग – १३७
जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं ।सुख-दुख सिक्के के दो पाटों की भांति हैं । कभी सुख है तो कभी दुख । हमें किसी भी परिस्थित से बिना विचलित हुए बस उसका निरीक्षण भर करते जाना है।
परिस्थितियों जब प्रतिकूल हो तो शांत मन से प्रभु का स्मरण करना चाहिए। वह दीनदयाल हमें कोई न कोई सद मार्ग अवश्य दिखाएंगे।
अनुभव करता हूं कि कई बार योग शिविर लगाने पर भी विशेष सफलता नहीं मिल पा रही है। धीरे-धीरे कहीं हृदय में निराशा छाती जा रही है । कोई कहता है मैं दो तीन हजार दूंगा कहां पड़े हो ।
साधु बन जाओ , भागवत भजन करो, प्रभु का नाम स्मरण करो परंतु उनके आंतरिक जीवन को देखने के बाद घृणा सी होने लगती है ।अपने स्वार्थ के लिए भगवान को बेचते यह पुजारी कौन सा धर्म कर रहे हैं ? उनके दिए गए प्रवचन से क्या किसी का कल्याण हो रहा है या लोग पथभ्रष्ट हो रहे हैं ।
आज हजारों की संख्या में कथा वाचक पैदा हो गए हैं । जिसे देखो वही कथाकार बना घूम रहा है । चार अक्षर बोलना क्या आया बन गए कथाकार । आज वाणी का खेल हो गया है जो लोगों को जितना अधिक बेवकूफ बना सके वह उतना ही श्रेष्ठ कथा वाचक है।
मेरी डायरी से : भाग – १३८
आज दिल्ली के एस आर पब्लिक स्कूल में गया । वहां प्रिंसिपल महोदय क्लास में गए हुए थे । क्लास में उन्होंने बच्चों से इस बात को बताने का प्रयास कर रहे थे घर जाने से हमें क्या हानियां हो सकती है ? कैसे हमारे विचारों भावनाओं में परिवर्तन आएगा एवं पुनः उसे व्यवस्थित करने में कितना समय लग सकता है ।
क्या हम थोड़ी सी मन की चंचलता को यदि रोक सके तो हमारा विकास कितना अधिक हो सकता है । छुट्टी के समय का सदुपयोग हम किसी श्रेष्ठ कार्यों को सीखने में खर्च कर सकते हैं । जो व्यक्ति समय का सदुपयोग की कला सीख कर सही जगह उसको खर्च करता है वही एक दिन श्रेष्ठ संत , सत्पुरुष बनता है ।
मैं चाहता हूं कि हमारे बच्चों के जीवन में चंचलता आए, पढ़ने लिखने के अलावा अपना नफा नुकसान सोच सके।। उनके अंदर सृजनात्मकता आए । यह सृजन केवल चित्रकारी , कविता लेखन, गायन तक ही नहीं आपके संपूर्ण जीवन में झलकनी चाहिए ।
चलते हुए , बातचीत करते, उठते-बैठते हर क्षण जो सजग रहता है उसका संपूर्ण कर्म ही योग में बन जाता है । उन्होंने बताया कि हमें सदा कमर सीधी करके बैठने का प्रयास करना चाहिए । कमर सीधी करके किया गया प्रत्येक कर्म अच्छा होता है । यदि कमर सीधी करके हम पढ़ेंगे तो एक बार में पढ़ा हुआ याद हो जाएगा।
व्यक्तिगत बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि हमें किसी भी परिस्थिति में निराश नहीं होना चाहिए । हमें यह सोचना होगा कि प्रभु ने हमें मनुष्य जन्म दिया है तो हमने इसका क्या सदुपयोग किया ? आप तो सतत समाज को कुछ ना कुछ देने का ही प्रयास कर रहे हो ? लेना कुछ भी नहीं देना ही देना है ।
सोचो जो लोग आपको कहते हैं कि इन कार्यों में क्या रखा है वह क्या कर रहे हैं? जिंदगी को पैसे से तौल रहे हैं । यदि जिंदगी नहीं होगी तो पैसा क्या जीवन को बचा लेगा। जीवन का सौंदर्य तो सत्कर्म है । जो भी सत्कर्म करेगा तो उसका जीवन खिलेगा , महकेगा । हम जो कुछ भी करें पूरी ईमानदारी व कर्मठता के साथ करें । आपके कर्मों में ही सौंदर्य झलकना चाहिए। जीवन को गुजारे नहीं बल्कि जिएं।।
आगे बताया कि हम जो कुछ कह रहे हैं वह बातें सामने वाले को समझ में आनी चाहिए। हम बहुत अच्छा जानते हैं जब तक उसका ठीक तरह से हम प्रदर्शन नहीं करेंगे तो लोगों को वह बातें समझ में नहीं आएगी। यह हम आपकी आलोचना नहीं कर रहे हैं । जो अपना हितैषी होता है वही सार्थक आलोचना कर सकता है ।सभी को अपनी प्रशंसा अच्छी लगती है।
सभी चाहते हैं कि लोग उन्हें अच्छा कहें परंतु जब कोई उसकी बुराई करता है तो बहुत खराब लगता है । सत्पुरुषों को तो कोई आपकी बुराई करता है अमृत के समान उन्हें लगती है। बुराई को हम सकारात्मक ले तो वह अमृत के समान मीठी लगने लगती है ।
हमें अपनी कमी दिखाने वालों को अपना परम हितैषी मानना चाहिए कि उसने मुझे यह समझाने का प्रयास तो किया कि हमारे अवगुणों को उभार कर आगे लाया । हमसे ईर्ष्या करने वाले, अहित करने वाले की बातों को यदि हम ग्रहण नहीं करें तो एक न एक दिन उन्हें भी सोचने को मजबूर होना पड़ेगा कि कैसा आदमी है यह जो कि हम इतना कहे जा रहे हैं परंतु इसको असर ही नहीं होता।
परंतु उसी में यदि हम उसके परेशानी के छोड़ो मैं उसकी थोड़ी सी मदद कर दे तो समझो वह आपका पक्का सहयोगी बनकर ही रहेगा। दुनिया में ऐसा कहीं ना सुना या देखा गया है जो की ईर्ष्या चुगली करने वालों के सम्मान में स्तंभ लगे हो।
दुनिया में जिन्होंने समाज को कुछ दिया है उनको उनके लोगों द्वारा सताया या दुख दिया गया । इसमें सबसे पहले अपने घर परिवार के लोग ही बाधक बनते हैं क्योंकि इससे उनको प्राप्त होने वाले सुखों में कमी होने लगती हैं । हमें सुनना सबकी चाहिए परंतु करना उसे ही चाहिए जिसे आपका हृदय स्वीकार करें । हमारा सच्चा हितैषी अंतःकरण की आवाजों को मानना चाहिए जो अंतःकरण की आवाजों को ठुकरा देता है वह कभी जीवन में सफल नहीं हो सकता है।
आगे उन्होंने बताया कि हमें किसी भी योजना विचार को किसी से पहले भविष्य की लिखित प्रक्रिया तैयार किए बिना उसे प्रकट नहीं करना चाहिए। चाहे वह छोटे से बात हो या बड़ी हो जो लोग अपनी बातों को बिना सोचे-समझे कह जाते हैं बाद में बहुत पछताते हैं ।
ऐसे व्यक्ति को लोग लबार बातूनी समझने लगते हैं । जो कि कहता तो खूब बड़ा चढ़ा कर है परंतु कर्ता-धर्ता कुछ भी नहीं है । बाद में यदि आप सही भी कह रहे होंगे तो लोग नहीं मानेंगे कि यह तो ऐसे ही कहता रहता है ।इसकी बातों का क्या भरोसा? अतः सार्वजनिक बात को खूब मंथन करने के पश्चात उचित नियोजन करके ही लोगों के सामने लाने का प्रयास करना चाहिए।
मेरी डायरी से : भाग – १३९
आज सायंकालीन को स्वामीजी के साथ एक भक्त के घर गया तो घर के सभी लोग भाव विभोर हो गए। घर में ठाकुर जी का दिव्य मंदिर बना हुआ था। पूरे कमरे में चारों ओर ठाकुर जी की मूर्ति विराजमान हो रही थी। घर के सभी परिजन महाराज जी से हरि कथा सुनने के लिए प्रतिबद्ध होकर बैठ गए ।
महाराज जी की क्रियाएं बच्चों जैसी चंचलता के साथ पूरे कमरे में गूंजने लगी थी। कभी वो बच्चों की तरह रसोई में देखते कि आज क्या बन रहा है तो कभी बच्चों के साथ चुहुलबाजियां करते । उस समय ऐसा लग रहा था की कन्हैया स्वयं बाल लीला कर रहे हो । कहते हैं संत एवं बालक में कोई अंतर नहीं होता है।
बाल चपलता स्वामी जी को देखते अच्छी लग रही थी । मैं कई बार जाना चाह रहा था परंतु नहीं जा पाया । जैसे लग रहा हो कि संसार तो फिर मिल जाएगा सत्संग का लाभ हमें बार-बार नहीं मिलेगा । महाराज जी द्वारा सुनाएं कुछ कथाएं सुनाते हैं —
जगन्नाथ धाम में बंधु नामक एक भक्त रहता था । वह सभी से कहता हमारा एक मित्र है जो बहुत बढ़ा राजा हैं। वह सोने की थाली में खाता है । नित्य नए-नए वस्त्राभूषण एवं इत्र लगाता है ।वह बहुत दयालु भी है ।जिसे चाहे जो दे देता है। बंधू के पास खाने को रोटी भी नहीं मिलती थी। अपने बच्चों के कहने पर एक बार-बार जगन्नाथ धाम पैदल आया।।
मंदिर पहुंचते पहुंचते रात्रि के 12:00 बज गए। भूख से व्याकुल होकर वह मंदिर के सीढ़ी पर पड़े रहे तो देखते हैं कि दो बालक उन्हें जगाते हैं। 56 प्रकार के भोगों से भरी थाली लेकर वे बंधु को देते हैं । बंधु एवं दोनों बच्चे प्रसाद खाने के पश्चात थाली को तकिया बनाकर सो जाते हैं ।
सुबह उठने में पंडित जब जगन्नाथ मंदिर में देखा कि खाली गायब है तो किसी की नजर सीढ़ी पर पड़े लोगों पर पड़ी। सूर्य चमक रहा था। पंडितों ने उसे खूब पीटा एवं चोर समझ कर जेल में डलवा दिया । उसे फांसी की सजा सुनाई गई।
सजा के पूर्व रात्रि में भगवान ने राजा को सपने दिए कि तुम उसे मुक्त कर उसको मुख्य पुजारी बनाना नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा । राजा ने प्रभु की लीला को समझ बंधु को मुख्य पुजारी नियुक्त कर दिया। जो भी व्यक्ति सच्चे हृदय से भगवान के नाम का जप करेगा उसका बाल भी बांका नहीं हो सकता। वे सबका ख्याल रखते हैं।
इसी तरह महाराज जी ने अनेकों कथानकों के माध्यम से प्रभु के दिव्य गुणों का वर्णन करते रहे।
महाराज जी ने एक गुड़िया को बताया कि दिल्ली के मुगल गार्डन से भी यदि कोई सुंदर बगीचा हो तो क्यों उसे तुम देखोगे। ऐसे दिव्य बगिया हैं नंदन कानन, बैकुंठ धाम जहां पर दिव्य खुशबू की हवाएं चलती रहती हैं । जिसके सूंघने से व्यक्ति मदमस्त हो जाता है ।
उस खुशबू की तुलना हम किसी से नहीं कर सकते । सोचो यदि हमें अमृत पान की लौ एक बार लग जाए तो कोई क्यों जहर की ओर दौड़ लगाएगा । प्रभु की लीला कोई तुलना नहीं कर सकता । प्रभु प्रेम की मस्ती ही ऐसी है की मदहोशी छूटने का नाम ही नहीं लेता।
निरुद्देश्य अनवरत काम करते रहना विकास नहीं हैं ।लेकिन यदि व्यक्ति किसी निश्चित उद्देश्य के लिए काम करता है तथा भविष्य के लिए उसके पास योजना होती है तो जीवन सरल, सहज और कविता का रूप धारण कर लेता है।
उन्होंने कहा कि पारिवारिक रिश्तों में बातों को ना छुपाए ।नहीं तो बाद में वही रिश्तो के टूटने का कारण बनते हैं ।परिवार में प्रेम सौहार्द एवं आत्मीयता बनाए रखने के लिए रिश्तो में हृदय की पवित्रता बनाए रखें।
आगे बताया कि दुनिया में चाहे जितना कहीं भटक ले परंतु अंत में परिवार ही उसकी सहायक होता है । दिन भर का भूला व्यक्ति यदि रात को घर लौट आता है तो उसे भूला नहीं कहते।
आगे उन्होंने कहा कि संसार में जीवन से अच्छा और कुछ नहीं है। संसार की भौतिक वस्तुओं में आनंद नहीं है परंतु सर्वोत्तम आनंद मनुष्य जीवन में सन्निहित है । हम संसार तथा अपने लोगों के लिए तो बहुत चिंतित रहते हैं लेकिन स्वयं हमारे अंदर क्या हो रहा है इसकी ओर ध्यान नहीं देते।
हमें जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए । अपनी बातों को ऊपर ना करते हुए लोगों की भी बातों को सुनने का प्रयास करना चाहिए।
परिवार को चलाने के लिए एक दूसरे के सहायक बनें । पति है तो पत्नी के कामों में सहायता करें, पत्नी को पति की। बड़ों को छोटे के साथ अनुभवों को बांटने चाहिए । तब देखें परिवार कैसे नहीं आगे बढ़ता।
माता-पिता को अपने झगड़ों में बच्चों को माध्यम न बनाएं। यदि आप चाहते हैं कि आपके सामने बच्चे आपकी बातों को मानें तो कोई ऐसी हरकत न करें जिससे कि उनके मन पर गलत असर पड़े।
मेरी डायरी से : भाग – १४०
आज प्रातः संध्या के बाद जब जरूरी कार्य से जाने लगा तो मां ने कहां कि भोजन करके जाओ और जल्दी से खिचड़ी डालने लगी। ऐसे ही कल व्रत में जब सुबह नहीं खाया तो बार-बार कहती रही कि दूध ला देती हूं। दूध रोटी खा लो। अच्छा नहीं खाना हैं तो मट्ठा मांग के आती हूं आज थोड़ा मट्ठा ही पी लो ।
आज रात्रि में जब देर से लौटा तो कहने लगी मैं कहती थी खाना थोड़ा बचा के रख दो हो सकता आ जाए परंतु आज की औरतों को क्या कहें उनकी तो जैसे मति ही मारी गई है । सोने के पूर्व जब घर पर रहते हैं कभी-कभी मां पूरे शरीर की बच्चों जैसे मालिश कर देती हैं ।
ठीक ही तो कहा गया है बच्चा चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो जाए उनके लिए तो बच्चा ही है । मां की ममता तो अमूल्य है । उसको बदला नहीं जा सकता है। मां के प्यार की तुलना दुनिया के किसी पदार्थ से नहीं की जा सकती है। उसकी सेवा, त्याग, तपस्या के आगे घर छोड़ भागे तपस्वियों से लाखों गुना श्रेष्ठ है।
मेरी डायरी से : भाग – १४१
आज चंडी धाम गए तो गुरु जी के पुत्र मिले । गुरु जी उस समय घर के अंदर थे । ओम जी ने कहां कि चले जाओ शाम को या फिर कल आना। बाबूजी को ऐसे लगा ही रहता है। अभी देखेंगे तो तुम्हें परेशान करेंगे। फिर भी हम बैठे रहे ।तब तक गुरुजी अंदर से आ गए। उनको देखकर ह्रदय प्रेमोंन्माद से भर गया।
हृदय की भावनाएं हिलोरें लेने लगी । मुझे विश्वविद्यालय जाना था परंतु गुरुदेव के साथ समय का जैसे पता ही नहीं चला। तुरंत पूछने लगे पानी मंगाऊं । कुछ खाने को देने के लिए ढूंढने लगे । हम तुरंत चाय मांगने लगे। गुरु की कृपा के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता ।कब कृपा दृष्टि हो जाए । कब अपने दिव्य नजरों के मोती को लुटा दे। हम सामान्य जीव कल्पना भी नहीं कर सकते।
पैर दबाते समय कहने लगे आपकी बहुत याद आती रही है। बार-बार हम सोचते रहे कहां पर होंगे ? क्यों नहीं आए? कभी-कभी गुरु भी शिष्य को याद करते हैं । उनके लिए विचलित होते हैं।
ऐसी बातों को पहले तो सुना बस था आज प्रत्यक्ष देखकर आंखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था ।दुनिया में कहते हैं मणि पारस के छूने से सोना बन जाता है परंतु जब गुरुदेव कृपा दृष्टि बरसाते हैं लोहा रूपी शिष्य पारसमणी रूपी गुरु के स्पर्श से सोने से भी अमूल्य हो जाता है । जीवन में आनंद की बरसात होने लगती है।
पारसमणी के छूने से जैसे ,
लोहा सोना बन जाता है।
गुरुदेव के चरण रज से ,
शिष्य बहुमूल्य रत्न बन जाता है।।
फूलों की सुगंधों में ,
कांटों की चुभन मत भूलो।
माया के मनमोहनी में ,
सिसकते दर्दों की चुभन ना भूलो।।
जिंदगी है चार दिनों की,
करें न किसी से बैर भाव।
रहे सभी से हिल मिलकर ,
ना जाने कब सुगना उड़ जाए।।
घृणा द्वेष क्रोध लोभ ,
और हिंसा से हो हम मुक्त।
प्रेम , दया, करुणा, सेवा ,
और प्रभु प्रेम का प्रसाद बांटें।।
भ्रष्टाचार का बड़ा बाजार, दिखता चहुदिश अंधकार ।
प्रभु भक्ति का रस लगे तो,
खिल जाए जीवन में आनंद।।
गुरुदेव का प्यार ऐसा,
जैसे स्वाति नक्षत्र का नीर। टकटकी लगाए देख रहे ,
कब हरेंगे गुरुजी मेरी पीर।।
दुनिया है एक रैन बसेरा,
आना और जाना है ।
कुछ क्षण हम ऐसा निकाल लें,
कर ले प्रीत प्रभु चरणों से।।
जीवन की उजली चादर में,
मत कालिख पोतो घृणा द्वेष के।
प्रेम रंग में रंग के चादर,
जिंदगी को खुशहाल बना लो।।
उनकी सूरत ऐसी मोहनी,
चांद भी सरमा गया।
कुमुदिनी भी खिलने लगी ,
भौंरे भी मडराने लगे।।
मेरी डायरी से : भाग – १४२
कहते हैं जैसे भोजन बिना जैसे शरीर मुरझाने लगता है। हाथ पांव और शरीर के अन्य अंग जैसे शिथिल होने लगते हैं ।। वैसा ही यदि किसी के जीवन में प्यार ना मिले तो होता है। प्रेम ही जीवन का सौंदर्य है । जिसको कोई प्रेम नहीं करता धीरे-धीरे वह मुरझाने कर लगता है । उसके जीने का आनंद खो सा जाता है ।
आखिर यह जिंदगी तो होनी भी ना चाहिए किसी के लिए । आपके कार्यों को देखकर जब कोई प्रोत्साहन से भरें दो शब्द कह देता है तो मन में कार्य करने की शक्ति और बढ़ जाती हैं । जिंदगी को तब यह महसूस होने लगता है कि उसका भी कोई है जो उसको चाहता है । उसे प्रेम आदर देता है । चाहता है तो जीवन में सार्थकता का बोध होने लगता है ।
महीनों बाद आज जब उनसे मिला तो देखकर चहक सी गईं ।प्रणाम के पश्चात कहने लगी आपको तो दिल्ली का पानी जैसे नहीं लगा। बहुत दुबले हो गए हैं। थोड़ा खाने-पीने का ध्यान रखा करें । यह शरीर रहेगी तभी तो काम करेंगे । अब अपने हाथ से बनाते होंगे। कभी बनाया कभी बिना खाए ही सो गए ।
ऐसी आदतों से बचेंगे ना । आपकी सदा याद बनी रही। पता नहीं ऐसा क्यों होता है जैसे आपका अपनापन से भी अपने लगते जा रहे हैं । आपसे मिलकर हृदय को न जाने क्यों सुकून मिलता है । मैं बाहर से हंसती रहती हूं। परंतु न जाने अंदर से क्यों विचलित सा रहती हूं ।कभी-कभी मुझे खुद भी नहीं समझ आता कि ऐसा क्यों होता है । आप कुछ बताओ ना ।आप तो कुछ बताते ही नहीं ।जरूर कुछ छुपा रहे हो । जाओ अब मैं आपसे नहीं बातें करेंगे।
एक लंबा सा वक्तव्य दे गई। फिर बच्चों की तरह हाथ फैला कर बैठ गई । अच्छा देखो ना हमारे हाथ में क्या लिखा है ? मैं ऐसी दुखी क्यों रहती हूं? सही-सही बताना झूठ मत बोलना। आप तो अच्छी-अच्छी बातों को बढ़ा चढ़ा कर बता जाते हैं और बुरी बातों को छुपा लेते हैं । आप बहुत चालाक हैं। अच्छा बताइए मैं सुखी रहूंगी कि नहीं? क्या मैं ऐसे ही दुखी रहूंगी? क्या मेरे दुख को कोई नहीं सुन सकेगा ? या मैं केवल आपसे कह रही हूं।
शांत मन से उनके दिव्य प्रेममय फटकार को सुनता रहा। उन्हें कोई प्रति उत्तर नहीं दिया। कहते हैं किसी के दुख को शांत मन से यदि सुन लिया जाता है तो दुख हल्का हो जाता है । मानवीय स्वभाव ही ऐसा है कि वह अपनी बातों को किसी न किसी के साथ बांटना चाहता है ।
वह चाहता है कि कोई अपना कहे । उसे लगें की कोई तो ऐसा अपना है जिसके लिए जिंदगी को कुर्बान किए जा सकते हैं । यह प्रेम की प्यास ऐसी है जो एक बार लग गए तो बढ़ती ही जाती है। उनकी आंखों से ऐसा लगता था कि कुछ कहना चाह रही है परंतु शब्द होठों पर आकर के रुक सा जाता है।
स्त्री स्वभाव ही ऐसा है कि वह अपनी ओर से पहल नहीं करती। लज्जा तो कुलीन स्त्री का आभूषण माना गया है ।क्यों वह इस आभूषण से वंचित रह जाए? हृदय में मेरे जैसे उनके लिए चाहत बढ़ती जा रही है । परंतु सोचता हूं भावनाओं से ही यह जिंदगी नहीं चलती। इसके लिए धन चाहिए।
रहने को छत चाहिए। एवं सुख सुविधा चाहिए। उन्हें जब यह सभी नहीं दे सकता तो कैसे अपनाने की पहल करू। मैं यह जानता हूं कि वह नहीं करेंगे । उनके घर वाले भी तैयार हो जाएंगे परंतु कभी-कभी व्यक्ति परिस्थितियों के आगे मजबूर सा हो जाता हैं ।
जिंदगी में दुख दर्द तो आते रहते हैं परंतु जो धैर्य के साथ उसका मुकाबला कर लेता है वही सच्चा वीर कहा जाता है । किसी को हराकर युद्ध जीत लेना ही वीरता नहीं है बल्कि जो व्यक्ति किन्हीं दो परिस्थितियों के बीच सामंजस बैठा लेता है वही सच्चा वीर कहलाता है।
मेरी डायरी से : भाग – १४३
साधना का जीवन में प्रभाव हुए बिना नहीं रह सकता है । ह्रदय की पवित्रता धीरे-धीरे साधना के फली भूत रूप में दिखने लगती है। किसी को दुखी देखकर उसकी सहायता कर देना, किसी की मजबूरी का फायदा ना उठाना , अपने कर्तव्यों के प्रति पवित्र हो जाना जैसे भाव सहज में आने लगते हैं ।
आज भाई के साथ गांव में गया तो उनके द्वारा कम तोले जाने पर हृदय में जैसे दर्द सा होने लगा। क्या ईमानदारी की कमाई से हम नहीं जीवित रह सकते हैं ? क्या ईमानदारी की रोटी बेईमानी के मेवे से ज्यादा मीठी होगी?
हमारे अंदर ऐसी दुष्ट विचार आते ही क्यों हैं ? क्या हम ऐसे आने वाले विचारों को पकड़ नहीं सकते? कहते हैं हृदय बोलता है । व्यक्ति का अंतःकरण स्वयं दिशा निर्देश देता है ।
यदि हम उन आवाजों को सुनकर उन पर चलने का प्रयास करें तो हम जीवन में कभी धोखा नहीं खा सकते। ऐसा हमने स्वयं अनुभव किया है । बहुत सी ऐसी बातें हैं जिसे हम दूसरे को समझाते तो है परंतु यदि हम उसे स्वयं अपना सके तो अपना कल्याण होने से नहीं रह सकता है।
मेरी डायरी से: भाग – १४४
सायं काल के 5:00 बजे होंगे। मंदिर प्रांगण में बहुत चहल-पहल है । लोग बाग आकर दर्शन के पश्चात प्रसाद पाकर जीवन में शांति के अनुभव कर रहे हैं । राम जानकी की अद्भूत छंटा वातावरण को शीतल सुगंधित कर रहे हैं । मूर्ति स्थापना का आज 15 वां वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा है ।
दूर-दूर से आए कलाकारों के माध्यम से प्रभु का भजन संकीर्तन हो रहा है। मंदिर स्थापना में स्वर्गीय बाबा भोलानाथ जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है । गांव देहात के बड़े बूढ़े आज भी उनकी दानशीलता धार्मिकता का गुणगान करते नहीं थकते । परोपकार दान की दिया आज भी उनके दिवंगत होने के पश्चात उनके बड़े भाई के सुपुत्र मुन्ना भाई संभाले हुए हैं।
रामलला का सिंहासन सहसों बाजार की गली गूंचो में हजारों श्रद्धालु भक्तों के माध्यम से रामलला की जय की ध्वनि करते हुए बढ़ रहा है । बाजार के सेठ साहूकार रथ के रुकने पर आरती पूजन कर रहे हैं ।
इन्हीं के बीच 60- 70 वर्ष के बूढ़े अपने 10 वर्षीय नाती के साथ टूटी चप्पल पहने आते हैं । रामलला को निहारते हुए टप टप आंखों से आंसू झरने लगते हैं एवं बेसुध होकर वही गिर जाते हैं।
देखते देखते ही संपूर्ण वातावरण में सन्नाटा छा जाता है क्या हुआ क्या हुआ कहते हुए लोग उसी ओर लपकते हैं । तब तक एक 26 – 27 वर्ष का हट्टा कट्टा नौजवान लपक कर बूढ़े को भीड़ से अलग ले जाता है। तब तक स्वामी जी के आदेश के अनुसार रामलला का रथ आगे बढ़ता है।
मेरी डायरी से : भाग – १४५
आज एक दिल्ली के पब्लिक स्कूल में गए तो देखा कि अधिकांश बच्चे बिना ड्रेस के एवं नहाए बिना आए हैं । मास्टर जी भी अपनी दुनिया में मस्त हैं । पूछने पर बताएं कि क्या करूं भाई यह कॉलोनी के लोग ही ऐसे हैं इनका सुधार नहीं किया जा सकता । फिर भी लगा हूं इन्हें हॉक रहा हूं।
ऐसे देश कर्णधारों की हालत देखकर आप क्या अंदाजा लगा सकते हैं कि पैसा उगलने वाले यह विद्यालय रूपी फैक्ट्रियां बच्चों को कहां ले जाएंगे ? जिसकी नींव का ही पता न हो तो मकान किस पर बनेगा ।
इसका हम कैसे अंदाजा लगा सकते हैं ? निस्तेज निर्बल उद्देश्य हीन निरुत्साहित बच्चे क्या करेंगे पढ़कर । दो-चार प्रश्नों के उत्तरों को सुन सुनाकर उगल देने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।
इसके लिए हमें ठोस कदम उठाने होंगे। हमें यह सोचना होगा की मात्र बौद्धिक विकास के जरिए बच्चों का भविष्य नहीं सुधार सकते हैं।जिस शिक्षा के अंदर बौद्धिक के साथ ही शारीरिक , मानसिक, भावनात्मक , आध्यात्मिक विकास ना जुड़े हो उस शिक्षा पद्धति को हमें नकारना होगा।
मेरी डायरी से : भाग – १४६
राजीव शर्मा भाई जी मिलने गया तो लगा जैसे इंतजार में ही हो , वह प्रेम भरी मुस्कान कौन है जिसे अपना ना बना ले। गुरु भाइयों का प्यार ही ऐसा होता है जहां दो दिल मिल एक हो जाते हैं।
दिल से दिल मिले,
मिलकर हो गए दो चार ।
नदी मिली जा समुद्र में ,
हम मिले गुरु चरणों में। ।
हमें जीवन का प्रत्येक कार्य गुरु चरणों का प्रसाद मानकर करना है। चाहे हम जो भी कार्य करें उसमें गुरु चरणों की झलक दिखनी चाहिए । गुरु व्यक्ति नहीं विचार है । पूज्यवर कहते भी हैं बेटा मुझे यदि तुम्हें जानना भी हो तो उसे मेरे साहित्य में जानना। उसे हमने अपने जीवन प्राण को साहित्य में डाल दिया है।
एक अकेला व्यक्ति किस तरह से राजनीति ,बिजनेस, परिवार, गुरु सेवा में सामंजस्य से बना सकता है यह उनके जीवन से सीखा जा सकता है । मैं भी सोचता हूं तो लगता है अब जीवन की भटकन दूर होने वाली हैं । जीवन में उजाले के किरणें प्रस्फुटित होने को हैं । देखना हैं कि हमें कब वह दिव्य प्रकाश वातावरण को आलोकित करता है।
मेरी डायरी से : भाग – १४७
आज प्रातः कालीन राजीव भाई के घर योग सिखाने गए तो बच्चों के साथ सुबह-सुबह जैसे अभ्यास के लिए तैयार बैठे हुए हों।
योग क्रियो के पश्चात जब ध्यान कराने लगा तो उसमें गायत्री मंत्र के साथ ही पहले महा प्राण ध्वनि, कायोत्सर्ग के बाद मंत्र जप कराएं । पुन: दीर्घ श्वास प्रेक्षा के पश्चात अंतर यात्रा शांतिकुंज के दर्शन कराए।
ध्यान के बीच अनुभव कर रहा था कि यदि गुरुदेव के प्रज्ञा योग के साथ ध्यान की क्रिया संपन्न की जाए तो साधक के शारीरिक मानसिक एवं भावनात्मक विकास में प्रमुख सहयोग दे सकती है । एक ऋषि के गहन अनुसंधान की परिणति रही है प्रज्ञा योग एवं सविता देवता की ध्यान धारणा । सविता ध्यान पूज्यवर के कराने की तरह निम्न प्रकार से कराया जा सके तो प्रतीत होता है विशेष रूप से प्रभावी हो सकती है —
ओम या महापुराण ध्वनि- 5 मिनट
कायोत्सर्ग 5 मिनट गायत्री मंत्र मानसिक जप 5 मिनट
अंतर यात्रा 5 मिनट
दीर्घ स्वास प्रेक्षा 5 मिनट
3 शरीरों की ध्यान प्रकिया 10 मिनट
महाप्राण ध्वनि 5 मिनट
मेरी डायरी से : भाग – १४८
रात में लाइट कट जाने के कारण नींद में बाधा आई इसलिए प्रातः देर से सोकर उठा। हमें नियम एवं समयबद्ध होकर कार्य तो करना चाहिए परंतु नियमों के गुलाम नहीं होना चाहिए। हम एक चेतन जीव हैं ।
जिसमें मन प्राण आत्मा इंद्रिय आदि हैं ।ना कि पाषाण मशीन। यदि जीवन में कभी बनाएं हुए नियम टूट जाते हैं तो उसमें कोई परेशान होने की बात नहीं की क्या कहें हमारा तो नियम भंग हो गया? आखिर भाई नियम बना ही किस लिए था? भंग होने के लिए तो भंग हो गया इसमें ज्यादा हों हल्ला मचाने की क्या आवश्यकता पड़ी।
आज अनुभव कर रहा था कि हम व्रत उपवास क्यों रहते हैं? तो लगा कि यह भी शरीर के नियमों को भंग करने के लिए ही है ? जितना हमारे लिए भोजन आवश्यक है उतना ही उसे छोड़ना भी हमें आना चाहिए। यदि भोजन ग्रहण करना ही जाना उपवास नहीं किया तो भी रोगी हो जाएंगे।
दोपहर के समय एक चित्र में देख रहा था कि कन्हैया एक हाथ से बछड़े को हटाकर स्वयं मुक्त गाय के थन से लगाकर दुग्धपन कर रहे और कान्हा को चाट रही है । ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर सहज समाधि जैसे लग जा रही है । कैसा है हमारा भगवान जो रास भी गोपियों संग रचाता है माखन चुराकर खाता है फिर भी उसे हम भगवान मानकर पूजते हैं।
कैसी आदर्श रही है हमारी वह ऋषि कल्पना । ऐसा अद्भुत दृश्य हम विश्व के किसी भी कोने में नहीं देख सकते । हम यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि ईसा भी कभी गोपी संग रास रचा सकते हैं या शंकर जैसी धूमि रमा सकते हैं । ऐसी महान आदर्श परंपरा को छोड़कर हम ना जाने क्यों धर्म परिवर्तन के पीछे भागते जा रहे हैं।
मेरी डायरी से : भाग – १४९
आज प्रातः काल सोनिया विहार के चाइल्ड वर्ल्ड विद्यालय में बच्चों को योग सिखाने गए तो सभी बच्चे पंक्तिबद्ध होकर बैठे हुए थे । मुख्य बात यह देखने को मिली कि अधिकांश बच्चे घने कोहरे के बीच भी स्नान करके आएं । सभी साफ सुथरा सलीके तरीके से कुछ जानने की जिज्ञासा मन में उनके बराबर बनी हुई थी ।
बच्चे तो गीली मिट्टी जैसे होते हैं। यह सत्य है कि हम उसके जन्मजात संस्कार को नहीं बदल सकते परंतु बच्चा समाज का भी एक प्रमुख अंग होता है। समाज के व्यक्तियों उनके क्रियाओं का प्रभाव उन पर पड़े बिना नहीं रहता । जब हम उनका हाथ जोड़कर प्रणाम करना सिखाते हैं तो नीचे आने पर सभी बच्चे हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगे।
समाज में हम जैसा बोयेगे वैसा ही काटेंगे । यदि कांटे ही काटे बोते रहेंगे तो आम के फल की कल्पना कैसे कर सकते हैं? हम सोचे कि हमारे बच्चे सुंदर एवं प्यारे बने लेकिन हम कूप मंडूक की तरह पड़े रहे तो यह कैसे हो सकता है ? सबसे पहले तो हमें चलकर रास्ता तो दिखाना पड़ेगा।
सायंकाल पूज्यवर के साहित्य को लेकर कई जगह बेचने गए। लगभग सभी साहित्य बिक गए। एक भाई गोरे से बड़े बाल रखे हुए थे । बोले आप मुझे ऐसा वैसा मत समझना । मैं भी धार्मिक हूं और उन्होंने भी कई साहित्य खरीदें।
मेरी डायरी से : भाग – १५०
बच्चों के किलकारियां जब गूंजती है तो सहज ही मन को मोह लेती हैं । कौन ऐसा अभागा होगा जो उन किलकारियां को सुनकर प्रसन्न न हो । बाल बौध मन में हम जिस प्रकार के संस्कार डालेंगे वह उसी में डलता चला जाएगा । हम सोचते हैं कि हम बहुत जानते हैं और उसे बच्चों पर थोपना चाहते हैं परंतु कभी इस बात को नहीं सोचते कि बच्चे तो प्रभु जैसे निर्मल निश्चल हैं ।
हमारा घृणा द्वेष कलह से भरा जीवन उनका क्या सामना कर पाएगा। दिल्ली के ही एक विद्यालय में गया। जहां अधिकांश बच्चे बिना स्नान किए आए थे । देर रात तक फिल्में देखें चतर-पटर खाया और चल दिए विद्यालय।
ऐसे में उनसे क्या आशा की जा सकती है कि वह बच्चे क्या करेंगे? दो-चार अक्षर का ज्ञान हो जाने का तात्पर्य यह नहीं है कि जीवन में सफल हो जाएंगे । उन्हें तो इसके लिए जीवन विज्ञान को पढ़ना पड़ेगा । जिसकी आज विद्यालयों में बहुत बड़ी कमी महसूस की जा रही है।
मेरी डायरी से : भाग – १५१
आज द चाइल्ड वर्ल्ड नामक विद्यालय में योग का कार्यक्रम था। बच्चे नियमित क्रम से बैठे थे । उनके बीच आज योग के साथ उनके जन्मदिन को मनाया गया । जन्मदिन के साथ कुछ अच्छा शुरू करने का संकल्प बच्चों ने सर्वप्रथम पूज्यवर के चरण स्पर्श किए ।
पुनः अपने अध्यापक बंधुओं के। यह उनके लिए एक शुभ संकेत रहा। आज मन ना जाने क्यों उदास सा है । कुछ करने की इच्छा नहीं हो रही है । कुछ करता हूं तो वहां से मन उचट सा जाता है । कभी कुछ करता हूं तो कभी कुछ। जिंदगी के बारे में सोचते हैं क्या होगा भविष्य में ।
प्रभु की क्या इच्छा है जो हम सोचते हैं वह न होकर उससे अलग ही होता है। आज लोग सरल व्यक्ति को क्यों नहीं तवज्जो देते हैं ? क्या सरल होना कोई अपराध है? जिंदगी की हर श्वास गुरु सेवा में बीते यही प्रभु से हम कामना किया करते हैं।
हे प्रभु मेरे दीन दयाल नित्य तेरे चरणों में प्रीति बनी रहे हम कभी अधिक की आशा नहीं करते । हम तो नहीं चाहते हैं जो कुछ भी करूं मैं तेरे नाम की खुशबू ही फैले । तुझे मैं कभी न भूलूं तू अपने चरणों में मुझे जगह देना।
मेरी डायरी से : भाग – १५२
आज मीनू के घर में बहुत चहल-पहल है। मीनू की सहेलियां सुंदर-सुंदर कपड़ों में उसके भाई के पास मंडरा रही हैं। वह भी बहुत खुश है क्योंकि वर्षो के इंतजार के बाद पुत्र का जन्म जो कि हुआ है । मीनू भी अपने भैया को देखकर मुस्कुरा रही है। कभी वह उसे चूमती कभी गोदी में लेकर दुलारने लगती । भाई-बहन का प्यार होता ही स्नेह प्यार से भरा हुआ।
मीनू भाई को गोद में लिए चाहते हुए अपने सहेलियों से कहती है – ” देखो प्रिया! मेरा भैया कितना प्यारा है । पूरा राजकुमार जैसा लगता है ।कैसा सुकुमार जैसा है। “
“हां हां हो क्यों ना ? जब तू ही राजकुमारी जैसी है तो भैया राजकुमार जैसा क्यों नहीं होगा? तुझ में तो हजारों राजकुमार जान छिड़कते हैं ।”प्रिया ने चुटकी ली।
”चल हट क्या मैं इतनी सुंदर हूं। मम्मी तो कहती है हमारे तो कर्म फूटे जो ऐसी बेटी पैदा हुई” मीनू ने कहा।
तू निराश मत हो, मेरी बहना! दुनिया ऐसी ही है। क्या कभी किसी को इसने जीने दिया है । तो दुनिया को छोड़ अपने में मन लगा। खाली समय में प्रभु के भजन कीर्तन किया कर। थोड़ा मन हल्का हो जाएगा समझी।
मेरी डायरी से : भाग – १५३
आज प्रातः संध्या साधना के पश्चात जल्दी होने के कार्य कारण कार्यालय बिना भोजन किए चले गए। आज वाहन रैली निकाल रहे थे । जिसमें हजारों की संख्या में लोगों ने भाग लिया। सभी पार्टी के कार्यकर्ता अपने प्रचार लीला में लगे हुए हैं ।
सभी की इसमें एक छोटे से भूभाग में हजारों लोगों का समय एवं श्रम खर्च हो रहा है । काश यह श्रम समय और पूंजी इन गलियों मोहल्लों के विकास कार्यों के लिए खर्च किया जाता तो अब तक स्वर्ग जैसी छटा बिखरती परंतु कहीं कुछ नहीं हो रहा।
लेकिन भाई सुरेंद्र जी ने लोगों के सुख-दुख में अपने सहभागिता को बनाए रखा। लोगों के पहचान पत्र, राशन कार्ड जैसी चीज उपलब्ध करवाने में सहयोगी रहे। हम कभी सोचते हैं कि क्या हम नींव की ईट नहीं बन सकते? क्या कोई यह हमारे पीठ पर पट्टा लगाएं कि शाबाश! तभी हम वीर कहलाएंगे। क्या वीरता की यही मात्र मापदंड है?
आइए शांत मन से श्रद्धा भरे अंतःकरण से सोच विचार करें। प्रभु को धन्यवाद दे कि उन्होंने हमें यह सौभाग्य प्राप्त करने का मौका दिया।
हरि ओम तत्सत्
मेरी डायरी से : भाग – १५४
आज जब प्रचार में गया था तो एक छोटी सी बच्ची कुत्ते से खेल रही थी। कभी वह बच्चों को चूमती प्यार करती मारती फिर भी कुत्ता कुछ नहीं बोलता था। प्रेम की इस निश्चल धारा को देख मन जैसे सहज समाधि में डूबने को उत्सुक हो रहा हो ।
कहा जाता है दुनिया के सभी जिओ में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो बिना किसी संघर्ष के काटता है, नहीं तो सभी जीव जंतु बिना भय के नहीं काटते हैं । उनमें कुत्ता क्यों पीछे रहे? वह भी तो सृष्टि का ही एक सर्वोच्च प्राणी है।
कैसी निर्मल मुस्कान थी उसकी जी चाहता था उसी में डूबा रहूं । सृष्टि का प्रत्येक जीव तो मात्र प्रेम का ही भूखा है । जब व्यक्ति की दैनिक आवश्यकताएं पूर्ण होती हैं तो तभी उसे प्रेम की अनुभव होती है। काश क्या मैं कभी बच्चों जैसा मुस्कुरा पाऊंगा।
कृष्ण द्वारा रचित गुरु पथ की महा यात्रा पढ़ने पर गुरु के प्रेम की सहज अनुभूति का अनुभव हुआ। हम सोचते थे अलग से की यह बनाएंगे वह बनाएंगे परंतु हम कुछ भी जो बनाते हैं फिर भी खाली हाथी चले जाते हैं। जब चिड़िया उड़ जाती हैं तब हमें एहसास होता है कि जो जिंदगी के अनमोल क्षण हमने यूं ही गंवाएं थे । उसका उपयोग गुरु चरणों की सेवा में बिताया होता तो जिंदगी संवर जाती।
जिस बच्चे को हम जिस प्रकार से ढालना चाहे वह हम ढाल सकते हैं । यह अलग बात है कि किसी की पूर्व जन्मों के संस्कारों का प्रभाव उसके जीवन में अवश्य पड़ता है । संस्कार बहुत सूक्ष्म होते हैं । जिसे हम केवल अनुभव कर सकते हैं । लेकिन उसे देख नहीं सकते ।
जैसे कोई जन्म के कुछ दिनों के पश्चात उसको लगता है कि मैं क्या कोई श्रेष्ठ साहित्य लिख सकता हूं तो निश्चय है कि मैं लिख सकता हूं ।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )







