Muktak dharti

धरती | Muktak dharti

धरती

( Dharti )

 

धरा मुस्कुराई गगन मुस्कुराया।
खिल गए चेहरे चमन हरसाया।
बहती बहारों में खुशबू यू आई।
धरती पर चांद उतरकर आया।

 

धरती अंबर चांद सितारे।
हिल मिलकर रहते सारे।
वीर तिलक करके माटी का।
पूजे माता चरण तुम्हारे।

 ?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

मजदूर | Poem mazdoor

Similar Posts

  • काश (कांस) के फूल

    काश (कांस) के फूल बचपन से मैनें देखा है,काश के फूलों को खिलखिलाते।सफेद सफेद काश के फूल,हवा के झोकों से लहराते।खेत के मेड़ों में,खुले मैदान पर,नदी किनारे,घाट पहाड़ पर।जब काश के फूल खिलते,वर्षा विदाई का संकेत दे जाते।1। रुई-सी सफेद काश के फूल,धरती का नया परिधान है।अपनी ख्वाहिशों की तरह बिखर जाने का अभिमान है।कोमलांगी…

  • मृत्यु पर भोजपुरी कविता | Mrtyu par Bhojpuri Kavita

    मृत्यु पर भोजपुरी कविता ( Mrtyu pra bhojpuri kavita )  हम अकेले ब‌इठ के कुछ सोचत रहनी गाल पे रख हाथ कुछ देखत रहनी तलेक कान में कहीं से घंटी के आवाज ग‌इल निंद टुटल, होश उड़ल अउर दरद भ‌इल एगो सवारी लेट, चपाटी पे चलल आगी, माला,फूल,पानी सब संघे बढल कवन देश-दुनिया अउर राह…

  • मौन निमंत्रण | Kavita Maun Nimantran

    मौन निमंत्रण  ( Maun nimantran )    मुझे क्या पता!  वह सामने था लिए कुछ भाव भरा संदेश खड़ा, किंतु मैं पूछ पड़ा तुम कौन यहां ? क्या कर रहा है? भला, मुझसे क्या चाहते हो? या मुझे बताना चाहते हो! कुछ अंतर्मन में लिए भाव भरा। वह मौन था पर कौन था यह  था…

  • वृक्ष हमारे तुम संरक्षक हो

    वृक्ष हमारे तुम संरक्षक हो वृक्ष हमारे तुम संरक्षक होहरे भरे हो खड़े हो सीना ताने।भव्य शस्यश्यामल है रूप तिसारा,लगते कोई हमारे शुभ चिंतक हो।घने घने हरे भरे पत्तों से सुशोभित,थलचर -नभचर को आश्रय देते-हो।शीतल छांव तुम्हारी देती आश्रय,हर प्राणी हर चर अचर को।सकल ब्रम्हांड में हो जय जयकार तुम्हारी,वृक्ष तुम मित्र हो, है तुम्हारी…

  • ये नवल धरा है रसिकों की | Nawal Dhara

    ये नवल धरा है रसिकों की  ( Ye Nawal Dhara Hai Rasiko Ki )    तुम लक्ष्मीकांत मैं रमाकांत, तुम गुणी पूज्य मैं भी हूं शांत। तुम हंसी ठहाकों की दुनिया, महफ़िल में रंग जमा जाना। ये नवल धरा है रसिकों की, तुम आकर पुष्प खिला जाना। मैं मनमौजी मतवाला गीतों में, फागुनी रस राग…

  • आओ चलें, सनातन धर्म की ओर

    आओ चलें, सनातन धर्म की ओर सृष्टि पटल दिव्य चेतना, स्पर्शन परमानंद अपार । स्नेह प्रेम उद्गम स्थल, उरस्थ शोभित सुसंस्कार । मुदित मना मानस मुनियों सा, मंथन चिंतन ज्ञान ध्यान भोर । आओ चलें, सनातन धर्म की ओर ।। यज्ञ पावन मानवता, तन मन धन उपकार । ब्रह्म ऊर्जा सदा शीर्ष, जीवन प्राण आधार…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *