नफ़रतों की ही पड़ी इस बार ऐसी ओस है
नफ़रतों की ही पड़ी इस बार ऐसी ओस है

नफ़रतों की ही पड़ी इस बार ऐसी ओस है

( Nafraton Ki Hi Padi Is Bar Aisi Os Hai )

 

 

नफ़रतों  की  ही  पड़ी  इस बार ऐसी  ओस है!
कर गयी उल्फ़त भरे फ़ूलों को ज़ख्मी ओस है

 

धूप से भी अब पिघलती ही नहीं उसकी यादें
जम गयी यादों की दिल पे मेरे गहरी ओस है

 

हुस्न की ख़ुशबू महक उठती है हर दिल में यहां
प्यार की जब भी देखो फ़ूलों पे गिरती ओस है

 

ताज़गी कैसे मुहब्बत की सांसों में महके क्या
नफ़रत की दिल पे जमीं जो रोज़ रहती ओस है

 

धूप भी ऐसी निकलती ही नहीं खुशियों की है
हां  ग़मों  से  रातें  गीली  रोज़ करती ओस है

 

ढ़ल गयी ख़ुशबू मुहब्बत की दिलों से अपनों के
आज  ऐसी  नफ़रतों की आज़म बरसी ओस है
❣️

शायर: आज़म नैय्यर

(सहारनपुर )

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