टूट गई | नवगीत

टूट गई | नवगीत

 

साँप मरा ना घुन खायी सी ,
लाठी टूट गई .

जिनकी खातिर आँख फुड़ाई ,
कहें वही काना .
उतना ही वह दुःख भोगता ,
जो जितना स्याना .
चने उगें भी नहीं बतीसी ,
पहले टूट गई .

सीना चीर दिखाया लेकिन ,
गई नहीं शंका .
कंलक हरण का धो न पाई ,
जलकर ज्यों लंका .
दिल में बसकर उम्मीदें ही ,
दिल को लूट गई .

पढ़े – लिखों के सपने खाते ,
गलियों में धक्के .
रिश्वत ने किस्मत के कुछ यूँ ,
जाम किए चक्के .
आया ना था दुश्मन जद में ,
गोली छूट गई .

 

Rajpal Singh Gulia

राजपाल सिंह गुलिया
झज्जर , ( हरियाणा )

यह भी पढ़ें :-

डरते – डरते | Darte -Darte

Similar Posts

  • जम्हूरा मन

    जम्हूरा मन वर्षों का विश्वास तोड़कर,चलता बना जम्हूरा मन।अब तक मुझे कचोट रहा है,मेरा यही अधूरापन। धड़कन तार-तार हो जाती,सपना दिन में तारे सा,साँस गटरगूँ करता रहता,अपना बिना सहारे सा।बनी ज़िन्दगी ढोल-नगाड़ा,बाजे ख़ूब तम्बूरा मन। आओ और उड़ाओ खिल्ली,मेरे एकाकीपन की।चिन्दी-चिन्दी छीन-झपट लो,बेढ़ंगे जर्जर तन की।ओखलिया में कूट-कूट कर,बना लिया है चूरा मन। जाने कैसी…

  • नव वर्ष पर एक नवगीत

    दीप प्रेम का जग में जलाएं दीप प्रेम का जग में जलाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं रहे न भूखा कोई कहीं परसोए नहीं मजबूर जमीं परहाथ मदद का चलो बढ़ाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं। १। लुटे न अस्मत किसी बहन कीउठे न अर्थी किसी दुल्हन कीसंस्कारों की हम जोत जलाएंआओ मिल नव वर्ष मनाएं।२। नशे…

  • देख बेबसी | Dekh Bebasi

    देख बेबसी ( Dekh bebasi )   लगता है कुछ होने को , मान गए इस टोने को . मन करता है कभी -कभी , पाप पुराने धोने को . याद बची एक तुम्हारी , और नहीं कुछ खोने को . अभी -अभी रोकर सोया , बच्चा एक खिलौने को . बीत गई सो बात…

  • जाग रे तू जाग | Jaag re Tu Jaag

    जाग रे! तू जाग!! ( Jaag re tu jaag )   फन उठाये आ रहे हैं, वंचना के नाग। देखना अब त्याग सपना। कर प्रकाशित दीप अपना। ये गरल के सचल वाहक, दूर इनसे भाग। है अमंगल निकट आना। दूध मत इनको पिलाना। छोड़ते मुंह से सदा ये, बस विषैले झाग। केंचुलें रंगीन इनकी। कालिमा…

  • खोया है विश्वास

    खोया है विश्वास : नवगीत फटे-पुराने कपड़े उनके,धूमिल उनकी आस।जीवन कुंठित है अभाव में,खोया है विश्वास।। अवसादों की बहुतायत है,रूठा है शृंगार।अंग-अंग में काँटे चुभते,तन-मन पर अंगार।।मन विचलित है तप्त धरा है,कौन बुझाये प्यास। चीर रही उर पिक की वाणी,काॅंपे कोमल गात।रोटी कपड़ा मिलना मुश्किल,अटल यही बस बात।।साधन बिन मौन हुआ उर,करें लोग परिहास। आग…

  • ये सावन के अंधे हैं | Sawan ke Andhe

    ये सावन के अंधे हैं ( Ye sawan ke andhe hai )   सूझ रही है बस हरियाली , ये सावन के अंधे हैं . कोलाहल की आड़ लिए नित , मिला चीखता सन्नाटा . कंगाली ने तरस दिखा कर , दिया जिन्हें गीला आटा . आग बुझा कर गई हताशा , सपने कुछ अधरंधे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *