न्यूज़ के नाम पर कुछ भी ?
न्यूज़ के नाम पर कुछ भी ?

न्यूज़ के नाम पर कुछ भी ?

 

‘बिंदास बोल’ के बहाने कुछ भी नहीं दिखा सकते,
स्वतंत्रता का अनुचित लाभ नहीं उठा सकते।
नफरती न्यूज पर सर्वोच्च न्यायालय की गाज गिरी है,
सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम प्रसारण को- अनुमति नहीं मिली है।
नफ़रत फैलाने वाले किसी भी प्रयास की- अब यही गति होगी।
बेलगाम को लगाम लगाने हेतु कमिटी गठित होगी;
मामले की पुनः सुनवाई 17 सितंबर को होगी।
कार्यक्रम में कई तथ्यात्मक गलतियां हैं,
यूपीएससी में मुसलमानों के लिए-
आयुसीमा 35 और
ज्यादा मौके का दावा गलत है!
भ्रामक है और तथ्य से परे है,
न्यूज़ के नाम आपने अनाप-शनाप भरे हैं।
मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है,
पूरे समुदाय को कटघरे में लाया जा रहा है।
किसी विदेशी संगठन की साज़िश पर- कार्यक्रम बनाया अलग बात है,
पर यह तो देश के साथ ही मजाक है।
भारतीयों को भारतीयों के विरूद्ध ही भड़काया जा रहा है!
मन में एक दूसरे के प्रति नफ़रत बिठाया जा रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय ने,
मीडिया की भूमिका में सुधार हेतु-
पांच सदस्यीय समिति बनाने पर जोर दिया,
जिसकी अध्यक्षता
एससी के पूर्व जज या
उच्च न्यायालय के पूर्व चीफ जस्टिस करें,
समिति के रिपोर्ट पर आगे कार्रवाई हम करें।
ताकि भविष्य में
चैनल वाले भारत के भविष्य के साथ खिलवाड़ न कर सके,
सभी समुदाय मिलजुल आपस में रहें।
कल ही सरकार ने संसद में स्वीकारा-
फेंक न्यूज के चलते मजदूरों की जान गई,
कोरोना काल में लाॅकडाउन पर तथ्य से परे खबरें दिखाई गईं!
जिससे न जाने कितने मजदूरों की जान गई,
सरकार के पास इसका रिकार्ड भी नहीं।
वरना मुआवजा देते,
अब सांत्वना के सिवा कुछ नहीं दे सकते!
17 सितंबर को क्या होता है?
देखना दिलचस्प होगा,
मीडिया पर कुछ न कुछ लगाम तो लगेगा!
सर्वोच्च न्यायालय ने-
सुदर्शन न्यूज़ के इस कार्यक्रम को,
विषैला और समाज को बांटने वाला कहा,
जबकि चैनल के वकील ने खोजी पत्रकारिता कहा।
मीडिया स्वतंत्रता के नाम पर बेलगाम नहीं हो सकती,
जरूरी है सख्ती;
इसके लिए नियम बनाए जाने हैं जरूरी।
तभी बात बनेगी,
कमिटी जो सुझाव देगी।
सरकार सख्ती से उसे लागू करेगी,
तभी समाज में नफ़रत नहीं फैलेगी ।
जरूरी भाईचारा और देश की शक्ति-
बनी रहेगी।

 

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नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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