न्याय
न्याय

न्याय

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गरीब मजलूमों को
अब न्याय नहीं मिलता!
मिलतीं हैं
सिर्फ धमकियां!
मुकदमा वापस ले लो..
वरना ?
तो क्या करें?
रो रहे हैं
सिसक रहे हैं
बहा रहे हैं आंसू
बंद कर घर की दरवाजे खिड़कियां।
सुना है !
कचहरियों में भी
अब न्याय नहीं मिलता
रंगीन कागजों के बदले में है बिकता!
बेवजह लगवाते हैं चक्कर,
कुछ न्याय की आस छोड़ देते हैं-
बीच रास्ते थककर।
सालों साल न्याय के लिए दौड़ाते हैं,
गरीब न जी पाते हैं न मर पाते हैं;
अदालती प्रक्रिया में उनके-
घर दुकान खेत सब खर्च हो जाते हैं।
फिर एक दिन चार पन्नों में –
न्यायादेश है आता,
सुन गरीब वहीं गश खाकर है गिर जाता।
सालों साल जिसके लिए लगाए कचहरी के चक्कर,
निर्णय सुन उसे वहीं आ गया चक्कर।
पांव तले जमीन खिसक गई,
बची थी दो गज वो भी बिक गई।
अब मेरा क्या होगा?
सब-कुछ तो लुट गया।
गरीब चीखा , जज साहब!
मुझे फांसी दे दीजिए,
बस एक बच गई है जिंदगी-
वो भी ले लीजिए।
वरना जीऊंगा तो आह लगेगी,
उसकी धाह लगेगी।
उसकी गर्मी से झुलसेगी आपकी चमड़ी,
निकल जाएगी सारी दमड़ी।
जो जीने देगी न मरने,
कृपया मुझे फांसी आर्डर कर दें।

 

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नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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