न्याय चले खाट~खट

न्याय चले खाट~खट

भरे बाजार
न्याय बिकने तैयार l
पहन काला कोट
दलाल खड़े दो~चार l

मस्त ग्राहकों की है
मगर दरकार l
जिनकी जेब में हो
दौलत बेशुमार l

भ्रष्टाचारी~ माफिया,
नेता इनके हैं यार l
मुंह मांगी कीमत दे
ऐसा हो खरीददार l

ऐसा पापी न्याय
बिके सरे बाजार l
जनता हो खबरदार
सब हो जाओ होशियार l

यह तो पलता
तुम्हारे पैसों पर l
गला रेत तुम्हारा
चलाएं तलवार l

न्याय पाने सत्तर साल
सड़ना पड़ता है।
पग-पग तब न्याय
बढ़ता है।
माफिया को खटा ~खट
मिलता न्याय फटा ~फट l

माफिया को खटा~ खट
मिलता न्याय फटा ~ फट है l

Rajendra Rungta

राजेंद्र कुमार रुंगटा
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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हे मां रजनी

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