न्याय की पुकार
न्याय की पुकार
उपेक्षित को आज तक न्याय नहीं मिला,
अपेक्षित को आज तक न्याय नहीं मिला।
सालों से होते ज़ुल्मो सितम ग़रीबों से,
ग़रीब को आज तक न्याय नहीं मिला।
सुनते नहीं पुकार कानों में ठोंसा कपास,
शोषित को आज तक न्याय नहीं मिला।
बहिन बेटियों से होते बलात्कार सरे आम,
अछूत को आज तक न्याय नहीं मिला।
मानव दानव बन करता अत्याचार अनंत अपार,
पीड़ित को आज तक न्याय नहीं मिला।
समाज सेवक करते सहयोग यदा-कदा कागा,
वंचित को आज तक न्याय नहीं मिला।
रिखिया
रिषि रिख रिखिया सनातन की संस्कृति सभ्यता,
मेघ मेघवाल मेघवार सिंधु की संस्कृति सभ्यता।
मोइन जो दड़ो हड्ड़पा भक्ति शक्ति की पेहचान,
खुदाई पर मिले प्राचीन खंडहर निराले नामो-निशान।
मेघ बरसे मन हर्षे रिमझिम बूंदें मूसला-धार,
भजन कीर्तन जुम्मा जाग्गरण पूजा पाठ मेघ मल्हार।
कताई बुनाई कपास ताना-बाना बुना बन बुनकर,
वीणा वादन मंजीरा झालर रीझा राम धुन सुनकर।
आदि काल से मेघ ऋषि की संतान मेघवाल,
रिखिया सनातन की सुंदर सीढ़ी पीढ़ी पावन मेघवाल।
आभा मंडल रंग गोरा कला कारीगर महा प्रवीण,
स्वाभाव प्रभाव संग सत्संग सुगरा नुगरा संत प्रवीण।
कागा जप तप योग में लगन मन मगन,
मेघ माया की महिमा निर्मल गूंजे थल गगन।
मोबाईल
मोबाईल के माया जाल में फंस चुका संसार,
मोबाईल के मकड़ जाल में धंस चुका संसार।
जवान बुज़ुर्ग पुरूष स्त्री अमीर ग़रीब किसान कामगार,
मोबाईल घंटी बजती हाथों में चाहे भिखारी बेरोज़गार।
मेहमान मेज़बान अपने पराये बने मोबाईल के मोह़ताज,
ह़ाल चाल पूछते नहीं मोबाईल पर व्यस्त समाज।
युवा पीढ़ी की शिक्षा चोपट भविष्य अंधकर में,
परिजन का क़द्र क़ायदा नहीं फ़ायदा अंधकार में।
रिश्तों में दरार संस्कारों की कम्मी मानवता नहीं,
व्हाट्स-एप्प इंस्ट्राग्राम के अधीन मानव मानवता नहीं।
जन-मानस में रोष व्याप्त भाई-चारा भंग,
विश्वास अविश्वास में तना-तनी नहीं रंग संग।
हर हाथ में मोबाईल समय सुलभ नहीं ज़रा,
सुख शांति की नींद नस़ीब सुलभ नहीं ज़रा।
कागा कर प्रेम भाव स्नेह नेतिक पतन नहीं,
मोबाइल छोड़ जोड़ नाता ओर कोई जतन नहीं।
राजनीति
राजनीति शह मात का खेल है,
कूटनीति हार जीत का मेल है।
सामंत दौर चला गया तास़ीर बाक़ी,
राजनीति दांव पैच का खेल है।
साम दाम दण्ड भेद चाल चार,
राजनीति उतार चढ़ाव का खेल है,
जनता में जनाधार लोक प्रिय होना,
राजनीति में भेद-भाव का खेल है।
स्वार्थ में कोई सगा नहीं होता,
राजनीति प्रेम घ्रणा का खेल है।
जाति धर्म का बड़ा बोल बाला,
राजनीति ऊंच नीच का खेल है।
सत्ता संगठन सिंहासन पर आसीन राजा,
राजनीति जीवन मृत्यु का खेल है।
अंगड़ाई नहीं लड़ाई पर होते उतारू,
राजनीति मार धाड़ का खेल है।
दल बदल करते देर नहीं लगती,
राजनीति पद क़द का खेल है,
भस्मासुर की कठिन तपस्या शिव प्रसन्न,
राजनीति लोभ लालच का खेल है।
नेक इंसान का क़द्र नहीं कागा,
राजनीति इधर उधर का खेल है।
अपराध
अपराध बढ़ रहे दंड नहीं मिलता,
अपराधी बढ़ रहे दंड नहीं मिलता।
जलवायु बदला पग पग पर पाप,
पापी बढ़ रहे दंड नहीं मिलता।
पाखंड घमंड प्रचंड मात्रा में प्रवेश,
आतंकी बढ़ रहे दंड नहीं मिलता।
निहत्थे क़तल होते बेगुनाह बेक़ुस़ूर बेशुमार,
क़ातिल बढ़ रहे दंड नहीं मिलता।
दीमक बन चाट रहे घर द्वार,
चापलूस बढ़ रहे दंड नहीं मिलता।
सच्चाई का ज़माना नहीं रहा कागा,
झूठे बढ़ रहे दंड नहीं मिलता।
भोलेनाथ
जय शिव शंकर भोलेनाथ जय कैलाश पति,
जय शिव शंकर भोलेनाथ जय पार्वती पति।
सावन मास सोम वार वर्षा ऋतु सुहानी,
शिखा में समाई सुंदर बहती गंगा सुहानी।
चंद्रमा की चमक दमक अंग भभूत रमाई,
हाथ में त्रिशूल संग डमरू धुन बजाई।
नंदी वाहन ऊंचा आसन सिंघ छाल पर,
नटखट नटवर-लाल नाचे नगारा ताल पर।
आक धतूरा भांग चरश गांजा चढ़ता भोग,
करें स्तुति स्मरण हरे कलेश संकट रोग।
विष पान कर नीलकंठ नाम धराया महादेव,
सुत गणेश कार्तिक आप देवों के महादेव।
कागा कर जोड़ करे विनती मन से,
भंडार भरे भरपूर सुन विनती धन से।
सनातन
अछूत शिक्षित का अपमान होता हर जगह,
अछूत धनवान का दुत्कार होता हर जगह।
स्वर्ण अशिक्षित का सम्मान होता समाज में,
स्वर्ण निर्धन का सत्कार होता समाज में।
मेला कुचेला बदबूदार स्वर्ण ऊंचा स्थान आसीन,
साफ़ सुथरा खुशबूदार अछूत नीचा स्थान आसीन।
अखंड भारत का नारा लगाते बार-बार,
गर्व से कहते हम हिन्दू लेकिन दरार।
आरक्षण पर करते टीका टिप्पणी सहन नहीं,
अमीर ग़रीब स्वर्ण अवर्ण टिप्पणी सहन नहीं।
मटकी से प्यासा पानी पी नहीं सकता,
चेहरे पर बड़ी मूंछें मरोड़ नहीं सकता।
निर्मम हत्या होती सरे आम अछूतों की,
गले में पहनाई जाती माला जूतों की।
बिंदोली पर पाबंदी घोड़ी पर चढ़ने की,
रोकी जाती बीच बारात आगे बढ़ने की।
आज़ाद भारत में दरिंदगी का बोल-बाला,
हिंदू राष्ट्र बनने पर किसने डाका डाला।
आओ सब मिल जुल ऊंच-नीच मिटायें,
मानव मिट्टी का पुतला भेद-भाव मिटायें,
समाज में व्यापत कुरीतियों को दूर करें,
रक्त एक समान भ्रांतियों को दूर करें।
ईश्वर ने इंसान बनाया कोई फ़र्क़ नहीं,
नर मादा दो जाति कोई फ़र्क़ नहीं।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई धर्म हमने बनाये,
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुवारे मज़हब हमने बनाये।
हाड मांस रक्त पांच तत्व पुतला मानव,
जल थल अगन गगन पवन बना मानव।
कागा हम पराधीन रहे पराये सदियों से,
जातियों में बांट कांट छांट स़दियों से।
ह़ाकम
अब ऊब गये है ख़ूब हो गया,
अब डूब गये है ख़ूब हो गया।
झूठे झांसा देकर ठगे गये बार-बार,
ग़रीब बड़ा ग़मगीन है ख़ूब हो गया।
वादा इरादा झूठ साबित भरोसा उठ गया,
ह़ाल बेह़ाल संगीन है ख़ूब हो गया।
किसान जवान मज़दूर कामगार बेरोजगार बड़ा उदास,
मालिक मिज़ाज रंगीन है ख़ूब हो गया।
खेत खलिहान में अनाज तोल मोल नहीं,
बिना खाद बंजर ज़मीन है ख़ूब हो गया।
ग़रीब के सपने चकनाचूर घटिया सोच मटियामेट,
ह़ाकम का ह़ुकम हसीन है ख़ूब हो गया।
सुनता नहीं फ़रियाद दाद इंसाफ़ नहीं कागा,
ज़ुल्म सित्म जाय नशीन है ख़ूब हो गया।
ग़रीबी
इंसान बंट गया दो हिस्सों में,
अमीर ग़रीब बन दो हिस्सों में।
अमीर बनता जा रहा माला-माल,
ग़रीबी में होता ग़रीब बुरा बेहाल।
ग़रीब को सिर पर छत्त नहीं,
टूटा मनोबल मन मायूस हिम्मत नहीं।
ऊंचे मह़ल गगन चुम्बी अमीर के,
ग़रीब के मोल अनमोल ज़मीर के।
अमीर खाते ख़ूब बढ जाती तौंद,
ज़ुल्म सित्म से कुचले जाते रौंद।
ग़रीबों का कोई धणी धोरी नहीं,
करते कमाई पसीने की चौरी नहीं।
लपेट लंगोटी अंग पर अंगरखी नहीं ,
चीत्थड़े चकना-चूर पग पगरखी नहीं।
बच्चे बिलखते भूख से चीख कर,
करते गुज़ारा बासी जूठी भीख पर।
जब आते चुनाव मिलती दारू हथकढ़ी,
पुलाव पूरी पाव भाजी रायता कढ़ी।
कागा चिपक जाता पेट पसलियों से,
ग़रीबी में गीला आटा पसलियों से।
स्वार्थ
बेटा-बेटी मां-बाप के नहीं आपके नहीं हो सकते,
मां-बाप बेटा-बेटी के नहीं आपके नहीं हो सकते।
ज़माना बदल गया आया दौर दग़ा-बाज़ दलों दोगलों का,
सास-ससुर दामाद-बेटी के नहीं आपके नहीं हो सकते।
ब्वाय-फ़्रेंड गर्ल-फ्रेंड का नया रिश्ता नाता खुले आम,
दुल्हा-दुल्हन ब्वाय-गर्ल के नहीं आपके नहीं हो सकते।
लुटेरी दुल्हन लूट भाग जाती घर का साजो-सामान धन,
साला-साली ननंद-भाभी के नहीं आपके नहीं हो सकते।
ससुर जंवाई में मन-मुटाव सास-बहू में नोक झोंक,
देवर-जेठ भूआ-भतीजा के नहीं आपके नहीं हो सकते।
स्वार्थी लोग किसी के नहीं सगे लोभी लालची कुटिल कागा,
धणी-लुगाई भाई-भोजाई के नहीं आपके नहीं हो सकते।
साथ
मत़लबी लोगों ने साथ छोड़ दिया,
लालची लोगों ने हाथ छोड़ दिया।
चरण चाटते थे आकर शरण में,
चापलूस दोस्तों ने मुंह मोड़ दिया।
गैरों की गोद में गुर्राने लगे,
नज़रें नीची झुकी रिश्ता तोड़ दिया।
गिड़गिड़ा करते थे गुहार ग़ज़ब की,
बिना बात छोड़ हाथ मरोड़ दिया।
अगुवा बनने की होड़ में अव्वल,
बुराई का ठीकरा सिर फोड़ दिया।
करते गिला शिकवा ग़ैर की कागा,
बेहिचक बेझिझक नाता वास्त़ा जोड़ दिया।
स़बूत
पूर्वज थे अनपढ़ प्रमाण कहां से लायें,
पूर्वज थे अनघढ़ स़बूत कहां से लायें।
काला अक्षर भैंस बराबर गुरूकुल नसीब नहीं,
अंगूठा छाप अभिशाप स़बूत कहां से लायें।
शिक्षा पर थी पाबंदी जीभ काटी जाती,
सुनना था अपराध स़बूत कहां से लायें।
शीशा घोल डाला जाता था कानों में,
बहरे हो जाते स़बूत कहां से लायें।
गले में बांधी हांडी लटकती टूटी फूटी,
कमर में झाड़ू स़बूत कहां से लायें।
जल जंगल ज़मीन जायदाद पुश्तेनी हमारी कागा,
आज तक बसेरा स़बूत कहां से लायें।
मोहरा
चेहरा बन क़ौम का मोहरा नहीं,
गेहरा बन गम्भीर बन मोहरा नहीं।
चाटुकार बन चापलूसी नहीं कर नादान,
सहारा बन समाज का दोहरा नहीं।
लालच को देख विवेक मत बेचना,
सितारा बन परिवार का कोहरा नहीं।
मत़लब वास्त़े पालतू तीतर नहीं बन,
दुलारा बन देश का झमूरा नहीं।
उतार चढ़ाव आना जाना जीवन में,
पेहरा बन पड़ोस का लुटेरा नहीं।
घटिया सोच नोच लेती अरमान कागा,
स़िह़रा बन सिर का ढंढोरा नहीं।
ज़लील
बेईज़्ज़ती गवारा नहीं ज़लील होना ज़िंदगी में,
फ़ज़ीहत गवारा नहीं अलील होना ज़िंदगी में।
मखन मलाई चाटना मंज़ूर नहीं बेअदबी का,
अ़ज़ीमत गवारा नहीं ज़लील होना ज़िंदगी में।
चंद ने रख दिया अपना ज़मीर गिरवी,
नस़ीह़त गवारा नहीं ज़लील होना ज़िंदगी में।
बेच दिया शऊर बेआबरू बन अपना आलीशान,
शहोरत गवारा नहीं ज़लील होना ज़िंदगी में।
सोन की ज़ंजीर की दरकार नहीं सुनहरी,
ह़ेसीयत गवारा नहीं ज़लील होना ज़िंदगी में।
शराब कबाब रोब रुतब्बा रसूख़ शानो शोक़्त,
वस़ीयत गवारा नहीं ज़लील होना ज़िंदगी में।
त़ोत़ा चश्मी ताबेदारी से तालुक़ नहीं कागा,
शख़स़ियत गवारा नहीं ज़लील होना ज़िंदगी में।
ख़त़रा
मेरे दिल का दर्द बेदर्द क्या जाने,
मेरे दिल की पीड़ा बेदर्द क्या क्या जाने।
दिल का राज़ दिल जाने गेहरे ज़ख़्म,
घायल के ह़ाल घायल जाने छुपे ज़ख़्म।
जाल साज़ बेठे है क़दम दर क़दम,
चाल बाज़ बेठे है हर जगह हरदम।
आस्तीन के सांप डसते ख़त़रा जान,
ख़बरदार रहना जान के दुश्मन ख़त़रा जान।
सपेरे पालते सांप टोकरे में रखते बंद ,
बीन बजाते नाग फन फेला झूमते मंद।
कागा ख़त़रे का खिलाड़ी जान हथेली पर,
ख़ोफ़ नहीं मौत का जान हथेली पर।
अहंकार
सिंहासन ख़ाली करो जनता खड़ी द्वार पर,
आसन ख़ाली करो जनता खड़ी द्वार पर।
लंका में डंका बजाया वीर हनुमान ने,
पूंछ से आग लगाई वीर हनुमान ने।
धूधू कर जली स्वर्णिम लंका चूर अहंकार,
विभिषण मन प्रसन्न जिसके शुद्ध थे संस्कार।
अशोक वाटिका में बंधक थी माता सीता,
पवन पुत्र के संवाद से संतुष्ट सीता।
धर्म युद्ध से हुआ पाप का अंत ,
महा बली को मार गिराया हुआ अंत।
अति से मति मरती फूट जाता हांडा,
पाप से भरता जब पापी का भांडा।
कागा नहीं करना कभी जीवन में घमंड,
चाहे कितनी मिले ख़ूब ख्याति प्रसिद्धि प्रचंड।
शिक्षा
क़लम कापी किताब किस्मत की कुंजी,
शिक्षा दीक्षा परीक्षा क़िस्मत की कुंजी।
इंसान की तक़दीर पर सौंकड़ों ताले,
शिक्षा की चाबी खोलती सैंकड़ों ताले।
शिक्षा पर लगा नहीं सकते डाका,
लूट नहीं सकता कोई लुटेरी आका।
आगज़नी में जल नहीं सकती शिक्षा,
मुस़ीबत में होती पूर्ण रक्षा सुरक्षा।
बंटवारा नहीं होती पूंजी की भांति,
शिक्षा से मिलती चित्त को शांति।
शिक्षा जीवन में ख़ुशी का ख़ज़ाना,
माप दंड नहीं कोई अंदाज़ पैमाना।
कि़स्मत के बंद किंवाड़ खोलती शिक्षा,
मांग कटोरा भर शिक्षा की भिक्षा।
कागा शिक्षा संस्कार जीने का आधार,
शिक्षा ग्रहण कर जीवन को सूधार।
नमक ह़राम
नमक ह़लाल समझा था नमक ह़राम निकला,
बावफ़ा बाशऊर समझा था नमक ह़राम निकला।
मुकमल भरोसा यक़ीन था वफ़ादार अदा पर,
बेवफ़ाई का चौग़ा ओढ़ नमक ह़राम निकला,
क़ाबिल कमाल की ख़ूबी खासियत नज़र आई,
ईमानदारी का स्वांग रच नमक ह़राम निकला,
शक ज़रूर था ख़ुद प्रसत ख़लुस़ देख,
बेशऊर का चौला पहन नमक ह़राम निकला।
गिला करते देखा गै़रों की मह़फ़ल में,
चोरी छुपे करते चुग़ली नमक ह़राम निकला।
गिड़गिड़ा कर गिर पड़ते क़दमों पर कागा,
लहज़ा बदला गुर्राने लगा नमक ह़राम निकला।
समझौता
सिद्धांत से समझोता गवारा नहीं,
स्वाभिमान से समझोता गवारा नहीं।
रोता आता इंसान संसार में,
मुस्कान से समझोता गवारा नहीं।
आंसूओं से किस्मत लिखी हमारी,
पसीने से समझोता गवारा नहीं।
सम्भल कर चल हर क़दम,
बेसिखियों से समझोता गवारा नहीं।
ख़ून बहता नसों में लाल,
धड़कनों से समझोता गवारा नहीं।
अपमान की इबारते लिखी हमने,
सम्मान से समझोता गवारा नहीं।
राह में बिखरे रोड़े अनेक,
कांटों से समझोता गवारा नहीं।
अ़ज़ीज़ क़ब्र खोलने में मशग़ूल,
गै़रों से समझोता गवारा नहीं।
जनाज़ा उठा चले जहान से,
दुनिया से समझोता गवारा नहीं।
अलविदा मेरी जीवन से कागा,
नफ़रत से समझोता गवारा नहीं।
अछूत
अम्बेडकर से ग़द्दारी कर रहे पढ़े लिखे लोग,
समाज से ग़द्दारी कर रहे पढ़े लिखे लोग।
नीला गमछा गले में डाल बोलते जय भीम,
नारा करते बुलंद गगन चुम्बी ऊंचा जय भीम।
दोहरा चाल चेहरा चरित्र चमक दमक चका चौंध,
करते समर्थन पराया दुश्मन का अपनी आंखें मौंद।
जीवन काल में धोखा दिया मरणो-उपरांत भी,
अम्बेडकर आदर्श नहीं मानते है मरणो-उपरांत भी।
मंदिर का घंटा बजाने में मन मचल जाता,
औसर मौसर मृत्यू-भौज में मन उछल जाता।
यदा-कदा मंदिर में माथा टेक लेते दूर,
चढ़ावा चढ़ा लेते दान पेटी में बहुत भरपूर।
मन्नत मांग लेते मनोर्थ पूर्ण पर चढ़ाते प्रसाद,
चंदा देते मन चाहा ग़रीबी नहीं करते याद।
भजन कीर्तन जुम्मा जाग्रण पूजा पाठ चित्त में,
भूल जाते रिश्ते नाते स्वार्थ सिद्ध चित्त में।
सूतक पातक पुण्य पाप दान दक्षिणा का ध्यान,
करते शत-प्रतिशत पालना देते सबको गूढ ज्ञान।
हिन्दू धर्म में अछूत वर्ग मुस्लिम कहते काफ़िर,
मंदिर मस्जिद में प्रवेश वर्जीति सब कहते काफ़िर।
मटकी से पानी पीना मिलती मौत की सज़ा,
बड़ी मूंछें रख मरोड़ना मिलती मौत की सज़ा।
कागा गोरों की ग़ुलामी से मिली आज़ादी ज़रूर,
काले दिल वाले मुख मीठा देते कष्ट कुरूर।
मूज़ी मर्ज़
मूज़ी मर्ज़ है शिफ़ा मिलती नहीं,
लाइलाज दर्द है शिफ़ा मिलती नहीं।
त़बीब ने त़बीयत को जांचा परखा,
दवा दिल की शिफ़ा मिलती नहीं।
ज़ख़्म भरे नहीं अभी हरे है,
मरहम लगाया मगर शिफ़ा मिलती नहीं।
चोट क़दीमी है दिल पर गहरी,
नाज़ुक बना नासूर शिफ़ा मिलती नहीं।
इलाज होने पर दर्द दफ़ा कहां,
एह़तियात बहुत ज़रूरी शिफ़ा मिलती नहीं।
नादान की मुठ्ठी में नमक कागा,
ख़ुदार ख़बरदार रहना शिफ़ा मिलती नहीं।
वफ़ादार
जो क़ौम का नहीं वो किसी का नहीं,
जो अपनों का नहीं वो किसी का नहीं।
किसी का क़ुस़ूर नहीं तुख़्म की होती तास़ीर,
जो वालदीन का नहीं वो किसी का नहीं।
दोनों हाथों की दस उंगुलियां होती नहीं बराबर,
जो ख़ानदान का नहीं वो किसी का नहीं।
पराई पेहलू में बेठ करता अपनों की बुराई,
जो कुटंब का नहीं वो किसी का नहीं।
चापलूसी चाटुकारी करता चुग़ली गैरों की मह़फ़ल में,
जो रिश्तेदारों का नहीं वो किसी का नहीं।
ग़द्दार बन करता गुंडा गर्दी जो़र ज़ुल्म सित्म,
जो ग़रीबों का नहीं वो किसी का नहीं।
मुख़बरी करता चांदी के चंद टुकड़ों पर कागा,
जो वत़न का नहीं वो किसी का नहीं।
अमीर-ग़रीब
ग़रीब लोगों की बस्तियां बर्बाद हो रही है,
अमीर लोगों की हस्तियां आबाद हो रही है।
ग़रीबों का कोई धणी चोरी नहीं दुनिया में,
बेघर कर झुग्गी झौंपड़ी बर्बाद हो रही है।
बिना छत्त अपने आशियाना बनाते घास फूस का,
विकास के नाम बहाने बर्बाद हो रही है।
बनते उस जगह बुलंद बंगले आलीशान अमीरों के,
ग़रीबों को उजाड़ उखाड़ तमनाऐं बर्बाद हो रही है।
सुन्हरे सपने सरसब्ज़ बाग़ दिखा कर दोगले लोग,
दावे वादे खोखले ख़्वाहिशें बर्बाद हो रही है।
ग़रीबी हटाओ का नारा छल कपट वाला कागा,
ज़मीर से होता खिलवाड़ ज़िंदगियां बर्बाद हो रही है।
आज़ादी
ग़ुलाम बन चिपके रहो हमें आज़ादी चाहिए,
नाकाम बन चुपके रहो हमें आज़ादी चाहिए।
बाशऊर बाज़मीर बन सिर बुलंद कर जीना,
झुकना थकना रुकना नहीं हमें आज़ादी चाहिए।
चांदी के चंद टुकड़ों पर बिकना बेमानी,
इरादा नियत नेक रख हमें आज़ादी चाहिए।
ज़माना चला गया ज़ोर ज़बरदस्ती ज़ालिम का,
नया निज़ाम झमूरियत का हमें आज़ादी चाहिए।
पिंजरे का पंछी उड़ रहा आसमान में,
पंख फेलाये फुर्र परवाज़ हमें आज़ादी चाहिए।
हाथों में हथकड़ी पैरों में बेड़ी कागा,
गवारा नहीं ग़ुलाम ज़िंदगी हमें आज़ादी चाहिए।
जाति-बंधन
जाति की गांठ बड़ी मज़बूत खुलती नहीं,
उलझी हुई गुत्थी बड़ी मुश्किल सुलझती नहीं।
जाति बंंधन का ताना बाना ऐसा बुना ,
पेच फंसे खोल नहीं पाये कोई महामना।
इंसान बन गया हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई,
भाईचारा भूल गये बोला करते भाई-भाई।
मज़हब के मकड़ जाल में फंस गये,
कीचड़ के दलदल में धड़ाम धंस गये।
मंदिर मस्जिद चर्च गुरू द्वारा की लड़ाई,
करते धड़ले से अपने धर्म की बड़ाई।
परम्परा प्राचीन काल का रिश्ता नाता टूटा ,
अपनों ने अजनबी बन कारवां को लूटा।
आंखों में हय्या दिलों में दया नहीं ,
ज़ुल्म सित्म करते ज़रा अदल न्याय नहीं।
कागा हो गये ख़ून के प्यासे परिंदे,
इंसानियत रुख़्स़त हुई जान के दुश्मन दरिंदे।
जीजल मां
आज मुझे जीजल मां याद आई,
आज मुझे शीतल छांव याद आई।
नो माह अपनी कोख में पाला,
स्तन निचोड़ अपना दूध पिला पाला।
आंचल की ओट में छुपाया मुझे,
बुरी नज़र से हरदम बचाया मुझे।
मैं रोया मां रोई देख दुखी,
अपने सीने लगाया रोता देख दुखी।
पालने में झूला झुलाया नींद सुलाया,
दांत आने पर दलिया ख़ूब खिलाया।
बदल देती पोतड़ा गीली करता गोद,
सूखे पर सुलाती देख गीली गोद।
पापा मम्मी का पाठ पढ़ाती प्यारा,
तोतली ज़ुबान से हर शब्द न्यारा।
आज मेरी आंखों से वो ओझल,
बिना मां बिलख रहा मन बोझल।
कागा आज बच्चपन पच्चपन याद आता,
बरबस जन्म देने वाली जीजल माता।
जाति बनाम आतंक
जाति आतंक दोनों एक सिक्के के दो पेहलू,
एक करता ज़लील दूसरा क़तल यह दो पेहलू।
नफ़रत की खेती खेतों में ख़ून की सिंचाई,
मानव बना दानव ऊंच नीच की टांग खिंचाई।
जाति का ज़हर घोल करते पैदा दूरी दरार,
आग लगा अमन में होते फ़ुर्तीले फुर्र फ़रार।
मर्यादा तोड़ गरिमा छोड़ करते दंभ छल कपट,
लुच्चे लफ़ंगे लोफ़र लम्पट झोला छाप लेते झपट।
इंसान दुश्मन इंसान का ओर नहीं कोई अजनबी,
फूट डाल करते फाड़ नहीं ग़ोरी कोई ग़ज़नबी।
कागा उन्नति देख होती जलन ईर्ष्या द्वेष भावना,
दिल दिमाग़ में दग़ा रखते नहीं नेक भावना।
शरारती
चिंगारी सुलगाने चले जाते है बुझाने नहीं,
आग लगाने चले जाते है बुझाने नहीं।
नियत में नफ़रत अदावत बग़ावत शरारत,
बस्तियां जलाने चले जाते है बुझाने नहीं।
इंसान है मगर इंसानियत के उस़ूल नदार्द,
ज़हर फेलाने चले जाते है बुझाने नहीं।
पंगा मोल लेकर कराते दंगा रंगा बिल्ला,
फ़स़ाद भड़काने चले जाते है बुझाने नहीं।
फ़ित़रत फ़ितनत का रंग रूप राजनीति का,
क़ुलफ़त कराने चले जाते है बुझाने नहीं।
उलफ़त मोहब्बत से कोसों दूर इरादा कागा,
तकरार कराने चले जाते है बुझाने नहीं।
ख़त़रा
हमें ख़त़रा अपनों से एरों गैरों से नहीं,
हमें ख़त़रा सपनों से नथू ख़ेरों से नहीं।
हमारी राह़ के रोड़े अपने बनते ओर नहीं,
हमें ख़त़रा सियारों से बबर शेरों से नहीं।
दुश्मन बड़ा चालाक करता घेराव बहला फुसला कर,
हमें ख़त़रा हाथों से पग पैरों से नहीं।
अपना एक कपूत बुरा शूरवीर सपूत ह़मले से,
हमें ख़त़रा कायरों से घोर घेरों से नहीं।
एक मुठ्ठी चन्ना चबाये बना देते महा मूर्ख,
हमें ख़त़रा बिच्छुओं से सांप सपैरों से नहीं।
चिकनी चुपड़ी चपाती की चाहत में चुग़ल बनते,
हमें ख़त़रा चापलूसों से चोर लुटेरों से नहीं।
पराई पेहलू में बेठ करते साज़िश शरारत कागा,
हमें ख़त़रा उल्लुओं से तीतर बटेरों से नहीं।
ज़रूरत
भूखे को भोजन खिलाना जैसा कोई स़वाब नहीं,
प्यासे को पानी पिलाना जैसा कोई स़वाब नहीं।
पग पग पर हो प्याऊ रोज़गार का प्रबंधन,
शीतल जल रोज़ी रोटी जैसा कोई स़वाब नहीं।
हर हाथ को मिले काम मेहनत मज़दूरी बरवक़्त,
पगार ख़ून पसीने का जैसा कोई स़वाब नहीं।
थका मांदा हारा पैदल मुसाफिर सफ़र से परेशान,
विश्राम के लिये साया जैसा कोई स़वाब नहीं।
जल जंगल खेत खलिहान झुग्गी झोपड़ी साधन उपलब्ध,
सपनों का साधारण घर जैसा कोई स़वाब नहीं।
औलाद हो फ़ोलाद जैसा सुंदर आज्ञा-कारी कागा,
पेट पालने वास्ते सहारा जैसा कोई स़वाब नहीं।
मानव
ईश्वर ने मानव बनाया हम बन गये हिंदू,
मानव बन नहीं सके हम बन गये हिंदू।
बंटवारा कर दिया हमने अपना चार वर्णों में,
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र अपना चार चरणों में।
मूस्लिम सिख ईसाई पारसी बोद्ध जैन धर्म बनाया,
एक ईश्वर को अलग नाम कर्म भ्रम बनाया।
मंदिर मस्जिद चर्च गुरु द्वारा मठ पूजा पाठ,
आरती आराधना दीपक धूप ध्यान ज्ञान ठाठ बाट।
बना मानव हाड मांस रक्त संचार का पुतला,
हवा नीर आग भूमि अ़र्श पांच तत्व पुतला।
कागा काया में प्राण प्रतिष्ठा ईश्वर की माया,
सब में एक अलख निरंजन बसे छवि छाया।
जुदाई
सपने में नहीं सोचा था वो हो गया,
भाग्य में लेख लिखा था वो हो गया।
जन्म भूमि ज़र ज़मीन रिश्ते नाते छूट गये,
अपने हो गये अजनबी बिछोड़ा वो हो गया।
लक्ष्मण रेखा खींची गई सीमा बंदी बन कर,
दिलों का टूट टुकड़ा ग़ज़ब वो हो गया।
ख़ून का रिश्ता केसे निभायें मिलना बड़ा मुश्किल,
दिल थाम रोते बिलखते ज़ुल्म वो हो गया।
ज़िंदा ज़रूर है मगर मोत से बदतरीन ह़ाल,
करते याद दिन रात जंजाल वो हो गया।
कलेजा कांप रहा रूह़ हांफ रहा अक्सर कागा,
क़िस्मत कुदरत का करिश्मा क़ुस़ूर वो हो गया।
सनातन
जाति है जाती नहीं जाति अपमान की जड़,
ब्रह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र जाति अपमान की जड़।
मुख भुजा उदर चरण चार वर्ण का वर्णन,
सनातन का ताना-बाना जाति अपमान की जड़।
काम अर्थ धर्म मोक्ष सनातन की मूल संरचना,
रजो तमो सतो गुण जाति अपमान की जड़।
अष्टांग में निरंजन बसे एड़ी से चोटी तक,
आज्ञा चक्र आवा-गमन जाति अपमान की जड़।
सत्संग रंग इंद्र-धनुषी बहती लाल रक्त धारा,
काम वासना एक समान जाति अपमान की जड़।
जल थल अगन गगन पवन पांच तत्व पावन,
रज वीर्य की उत्पत्ति जाति अपमान की जड़।
ईश्वर ने एक बनाया पशु पक्षी जीव जंतु,
अदृश्य बन बेठा आप जाति अपमान की जड़।
तीन ताप अध्यात्म भौतिक देविक सर्व व्यापी कागा,
सौलह संस्कार मानव धर्म जाति अपमान की जड़।
नियत
नियत रख नेक तस़्वीर बदल जायेगी,
नियत रख साफ़ तस़्वीर बदल जायेगी।
नियत बनी नागिन ज़हर उगल रही,
नियत रख पाक तक़दीर बदल जायेगी।
नियत नीति नियति प्रकृति की प्रवृति,
नियत रख शुद्ध तहरीर बदल जायेगी।
नियत बद रिज़्क़ रद्द कुदरत का क़ानून,
नियत रख पावन तदबीर बदल जायेगी।
नियत के नाग डसते डंक मार,
नियत रख पवित्र तक़रीर बदल जायेगी।
नियत नीति रीति रस्मो रिवाज कागा,
नियत रख नम्र तासीर बदल जायेगी।
क्रांति
गूदड़ी का लाल चमक उठा कोहिनूर,
झौंपड़ी का नौनिहाल दमक उठा कोहिनूर।
पसमांदा त़ब्के में दब्बे पड़े हीरे,
तलाशने तराशने की ज़रूरत क़ीमती हीरे।
मिला नहीं मौक़ा कभी ज़िंदगी में,
दरकिनार रहे रोज़ मरह ज़िंदगी में।
ह़ालात ने ह़क़ीक़त में किया कमज़ोर,
हसरतें रही अधूरी ख़्वाहिश भी कमज़ोर।
त़ालीम ने तक़दीर बदली झटकें में,
तहज़ीब ने त़ौर त़रीक़ा झटके में।
ज़माना बना दुश्मन ज़लील करता रहा,
ग़रीब दबंगों से हमेशा डरता रहा।
मिली आजादी ह़क़ हासिल वोट का,
झमूरी निज़ाम में रुतब्बा वोट का।
कागा,मुरझाये चेहरों पर नूरानी छाई,
छूआ ऊंचा आसमान मोज मस्ती छाई।
सौलह संस्कार
सनातन संस्कृति में सौलह संस्कार का अनुष्ठान महत्वपूर्ण,
जीवन शैली पद्धति सौलह संस्कार का अनुष्ठान महत्वपूर्ण।
1. गर्भाधान: गर्भाधान संस्कार गर्भधारण के समय किया जाता है, जिसमें गर्भस्थ शिशु के लिए शुभ और पवित्र वातावरण बनाने का प्रयास किया जाता है।
2. पुंसवन: पुंसवन संस्कार गर्भ के तीसरे महीने में किया जाता है, जिसमें गर्भस्थ शिशु के लिंग और स्वास्थ्य के लिए अनुष्ठान किया जाता है।
3. सीमन्तोन्नयन: सीमन्तोन्नयन संस्कार गर्भ के सातवें महीने में किया जाता है, जिसमें गर्भवती महिला के लिए अनुष्ठान किया जाता है और शिशु के स्वास्थ्य और सौभाग्य के लिए प्रार्थना की जाती है।
4. जातकर्म: जातकर्म संस्कार शिशु के जन्म के समय किया जाता है, जिसमें शिशु के स्वागत और आशीर्वाद के लिए अनुष्ठान किया जाता है।
5. नामकरण: नामकरण संस्कार शिशु के जन्म के बाद किया जाता है, जिसमें शिशु का नाम रखा जाता है और उसके भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी जाती हैं।
6.निष्क्रमण: निष्क्रमण संस्कार शिशु के चौथे महीने में किया जाता है, जिसमें शिशु को पहली बार घर से बाहर ले जाया जाता है और सूर्य के दर्शन कराए जाते हैं।
7. अन्नप्राशन: अन्नप्राशन संस्कार शिशु के छठे महीने में किया जाता है, जिसमें शिशु को पहली बार ठोस आहार दिया जाता है।
8. चूड़ाकर्म: चूड़ाकर्म संस्कार शिशु के पहले या तीसरे वर्ष में किया जाता है, जिसमें शिशु के बाल पहली बार कटवाए जाते हैं।
9. उपनयन: उपनयन संस्कार लड़कों के लिए किया जाता है, जिसमें उन्हें यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है और वेदों के अध्ययन के लिए तैयार किया जाता है।
10. वेदारंभ: वेदारंभ संस्कार लड़कों के लिए किया जाता है, जिसमें उन्हें वेदों के अध्ययन के लिए तैयार किया जाता है।
11. केशांत: केशांत संस्कार लड़कों के लिए किया जाता है, जिसमें उनके बाल कटवाए जाते हैं और उन्हें ब्रह्मचर्य जीवन से गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए तैयार किया जाता है।
12. समावर्तन: समावर्तन संस्कार लड़कों के लिए किया जाता है, जिसमें उन्हें गुरुकुल से विदाई दी जाती है और उन्हें गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए तैयार किया जाता है।
13. विवाह: विवाह संस्कार जीवन के सबसे महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक है, जिसमें दो व्यक्तियों के बीच पवित्र और सामाजिक बंधन स्थापित किया जाता है।
14.वानप्रस्थ: वानप्रस्थ संस्कार जीवन के चौथे चरण में किया जाता है, जिसमें व्यक्ति अपने परिवार और समाज से अलग होकर आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है।
15. संन्यास: संन्यास संस्कार जीवन के अंतिम चरण में किया जाता है, जिसमें व्यक्ति अपने सभी सांसारिक बंधनों को त्याग देता है और आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है।
16.अंत्येष्टि: अंत्येष्टि संस्कार व्यक्ति की मृत्यु के बाद किया जाता है, जिसमें उसके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है और उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।
आज़ादी की आग
आज़ादी की आग भभक रही सीने में,
बुझती नहीं आग धधक रही सीने में।
गोरे गैरों की ग़ुलामी से मिली निजात,
काल कोठड़ी आग सुलग रही सीने में।
जाति ऊंच नीच छूआ छूत भेद भाव,
अगड़ी पिछड़ी आग झुलस रही सीने में।
दब्बू दले दोगले दलाल दोहरा चेहरा चरित्र,
चाल बाज़ आग फफक रही सीने में।
बंदर जैसी बानगी करते उछल कूद कमाल,
अदावत की आग छलक रही सीने में।
नहीं जीने पीने में मज़ा कोई लुत़्फ़,
चैन नहीं आग चमक रही सीने में।
जंग बंदी नहीं सिलसिला जारी है कागा,
इंतक़ाम की आग भड़क रही है सीने में।
वोट की चोट
वोट जैसी चोट और कोई सज़ा नहीं,
करती गेहरा घाव और कोई सज़ा नहीं।
नहीं निकले ख़ून की बूंद ज़ाहिर ज़ख़्म,
दर्द बड़ा बेदर्द और कोई सज़ा नहीं।
प्रजातंत्र में षड़यंत्र साज़िश की जगह नहीं,
आर पार सामना और कोई सज़ा नहीं।
मंद गंद बुद्धि फंसते मकड़ जाल में,
चुग्गा चाट चाशनी और कोई सज़ा नहीं।
स्वाभिमान से समझौता नहीं देना नहीं सहमति,
बदल देगा ताज और कोई सज़ा नहीं।
वोट जैसा शस्त्र नहीं गोली बम बारूद,
निशाना वोट अचूक और कोई सज़ा नहीं।
राजा रानी अमीर ग़रीब वोट क़ीमत सम्मान,
सोच समझ देना और कोई सज़ा नहीं।
अम्बेडकर ने थमाया वोट का हथोड़ा कागा,
मारना जोश से और कोई सज़ा नहीं।
पैसा
पैसा बलवान बंदा बन जाता ख़ुद खड़ूस,
पद पहलवान धर्म जाति नहीं होता खड़ूस।
पैसा बना देता पूर्ण पापी इंसान को,
अमीर निचोड़ देता ग़रीब का ख़ून चूस।
ज़मीर बिक जाता औने पौने भाव में,
कोई दान दाता कोई बन जाता कंजूस।
पैसे से मिलता पद सत्ता ज़माने में,
पैसे की लालच में बनता बेग़ैरत मनह़ूस।
पैसे की चाहत में होता नैतिक पतन,
पैसा बनाता पल में वत़न का जासूस।
देख पैसा पिघल जाता डगमग जाता मन,
करता चमचा गिरी चुग़ली चुप चाप चापलूस।
ईमानदारी वफ़ादारी किसी विरले नेक में कागा,
इंसान में इंसानियत ग़ायब होती नहीं महसूस।
जलन
बड़ी जलन होती उनको हमें सुखी देख कर,
बड़ु बलन होती उनको हमें सुखी देख कर।
ईर्ष्या की आग में झुलसते जलते दिन रात,
कितनी नीच नियत नीति से सुलगते दिन रात।
किसी का बुरा नहीं किया नहीं कुछ बिगाड़ा,
चोट नहीं पहुंचाई दिल को नहीं कुछ बिगाड़ा।
बराबरी करने की बजाय बुराई करने लग गये,
बेबुनियाद झूठे लांछन लगा नफ़रत फेलाने लग गये।
नालायक़ को लायक़ बनाया मुफ़्त में नादान निकला,
अपना सब कुछ लगाया दांव पर नादान निकला।
कागा एहसान फ़्रायोश को एहसास नहीं ज़रा भी,
बेह़य्या बेवफ़ा को लाज शर्म नहीं ज़रा भी।
ख़तरा
ख़तरा मंडरा रहा मुल्क पर ग़द्दारों का,
ख़त़रा गहरा रहा वत़न पर ग़द्दारों का।
चौला पहन पेहरेदार का करते चुग़ली चापलूस
पीठ में घोंपते छुरा करते ज़ख्मी जासूस।
ख़ुफ़िया ख़बर देते अंदरूनी मुख़्फ़ी दुश्मन को,
छिपे आस्तीन के सांप मुख़बिर दुश्मन को।
सियास्त की आड़ में करते साज़िश शातिर,
दग़ा बाज़ दोगले देते धोखा मुफ़ाद खातिर।
कागा क़ात़िल करते क़तल बेह़द सफ़ाई से ,
क़तरा नहीं लहु का बेह़द सफ़ाई से।
धर्म जाति
मानव की उत्पति पांच तत्व तीन गुणों से,
जल थल वायु अगन गगन तीन गुणों से।
रजो सतो तमो गुणों की महिमा निराली अनोखी,
काम क्रोध लोभ मोह अहंकार की माया अनोखी।
पांच तत्वों का कोई जाति धर्म मज़हब नहीं,
तीन गुणों का कोई जाति धर्म मज़हब नहीं।
खाने को रोटी पीने को पानी भूख प्यास,
बादल डिजली बारिश बिना जाति धर्म आम ख़ास़।
नदी नाला पर्वत सागर पशु पक्षी जीव जंतु
कल कल करते झरने नहीं कोई किंतु परंतु।
नींद आलस जम्हाई छींक डकार हिचकी बिना धर्म,
अंग उज़्वा सांस मांस रक्त हड्डी बिना धर्म।
मन बुद्धि नस गाड़ी की जात पात नहीं,
ज्ञान इंद्रियों कर्म इंद्रियों की जात पात नहीं।
कागा मानव बना दानव बांट दिया भ्रम में,
स्वर्ग नरक का भय झूठे झांसे भ्रम में।
उच्च विचार
ज़्यादा मीठा नहीं बन लोग निगल जायें,
ज़्यादा कड़वा नहीं बन लोग उगल जायें।
लोगों का क्या करते उल्टी सीधें बातें,
पैदल सवार बनाते सवार पैदल कर बातें।
तार को मत खींच जो टूट जाये,
ढीला तार स्वर नहीं निकले छूट जाये।
बीच की राह चुन चयन चुनाव में,
तनाव से रहना दूर चयन चुनाव में।
सोच विचार कर बनाओ अपना नेक नुमाईंदा,
पछताना नहीं पड़े बाद में देख नुमाईंदा।
ख़्याल रख रहबर रहज़न नहीं बन जाये,
अमृत माना जिसको ज़हर नहीं बन जाये।
कागा तराजू़ में तोल देख वज़न कितना,
हल्का भारी का अंदाज़ा लगे वज़न कितना।
हम एक
अलग थलग नहीं हम एक है,
डग मग नहीं हम एक है।
आंच नहीं आने देंगे मुल्क पर,
जय घोष करते हम एक है।
काशमीर से कन्या हुमारी तक एकता,
तिरंगा लहराये ऊंचा हम एक है।
नेक इरादा एक सूत्र में पिरोये,
मोतियों की माला हम एक है।
विचार अलग ललक देश सेवा की,
वेष भूषा निराली हम एक है।
भाषा भिन्न खान पान जल वायू,
संंस्कार संस्कृति जुदा हम एक है।
ख़ून खोल रहा वत़न वास्ते कागा,
जोश जज़्बा जुनून हम एक है।
मौक़ा प्रस्त
मौक़ा प्रस्त भाग गये मैदान छोड़ कर,
धोख़ा प्रस्त भाग गये मैदान छोड़ कर।
जब तक धी सत्ता हाथों में कमान,
दांयें बांयें चलते थे हाथ जोड़ कर।
तलवे चाटते थे शोक़ से सिर झुकाये,
पद जाता देख चले ज्ञुंह मोड़ कर।
चुटनों बल चल गिड़गिड़ाते थे गुर्राने लगै।
सत्ता बदल देख भागे तेज़ दोड़ कर।
ग़ैर की गोद में जाकर बेठे बेग़ैरत,
चुग़ली करने लगे चापलूस रिश्ते तोड़ कर।
बड़ा मलाल फ़ख़र था कमाल किया कागा,
घायल कर चले गये सिर फोड़ कर।
शक्ति भक्ति
संघ है तो सम्भव है व्यक्ति विशेष नहीं,
संघ है तो शक्ति हैं व्यक्ति विशेष नहीं।
शक्ति में भक्ति देश समाज सेवा सुरक्षा की,
वसु देव कुटंब कम प्रवचन व्यक्ति विशेष नहीं।
जननी जन्म भूमि कर्म भूमि धर्म धरा उत्तम,
वंदे मातृम गूंजे नारा गगन व्यक्ति विशेष नहीं।
कुंडली मार बेठ जाये कोबरा धणी चोरी बन,
फन को कुचल मसल दो व्यक्ति विशेष नहीं।
बेटा बाप को दिखाये अपनी लाल आंखें लपक,
डांट फटकार कर बारो तमाचा व्यक्ति विशेष नहीं।
फटा दूध फेंक दो बाड़ में बेझिझक कागा,
जेसे को तेसा दण्ड ज़रूरी व्यक्ति विशेष नहीं।
ह़ुकमरान
ह़ुकमरान बनने निकला था ग़ुलाम हो गया,
क़द्रदान बनने निकला था ग़ुलाम बन गया।
ख़िदमत की ख़लक़ की दिलो-दिमाग़ से,
मेहरबान बनने निकला था आम बन गया।
गै़रों से गिला नहीं अपने बने रोड़े,
आलीशान बनने निकला था नाकाम बन गया।
एह़सान किया अपने जान एरों ग़ैरों पर,
इंसान बनने निकला था शेत़ान बन गया।
नादान दोस्त से दाना दुश्यन दुरस्त,चुस्त,
मेज़बान बनने निकला था मेहमान बन गया।
अपने ख़ून पसीने से सींचा चमन को,
गुलस्तान बनने निकला था ब्याबान बन गया।
ख़्वाब देखा था ख़ुद मुख़त्यार बनने का,
दास्तान बनने निकला था दरबान बन गया।
दग़ा बाज़ बंदों ने धोखा दिया कागा,
निगाहबान बनने निकला था पशेमान बन गया।
दोस्ती
दोस्ती दो त़रफ़ा होती है एक त़रफ़ा नहीं,
मत़लबी एक त़रफ़ा होता है दो त़रफ़ा नहीं।
एक मछली कर देती गंदा सरोवर पवित्र जल,
रख मन चित्त चरित्र सुंदर सरोवर पवित्र जल।
बगुला तन उज्ज्वल नैन मूंद समुंदर तट बेठ,
गटक लेता मछली मन मेला कुचेला तट बेठ।
हंस मन भावन पावन चुग कर खाता मोती,
पतंग जल जाता रेन अंधेरी देख जलती ज्योति।
चलती चक्की दो पाट ऊपर नीचे बीच कील,
दाना पिस होते आटा दलिया स़बित निक्ट कील।
आंखें दो बहिनें देखती नहीं एक दूसरे को,
रोती साथ जब दर्द होता एक दूसरे को।
कागा तराजू़ के दो पलड़े एक में बाट,
दूसरे में चीज़ वस्तु तोल ताकते आंकते बाट।
ग़द्दार
वफ़ादार समझा था जिसको वो ग़द्दार निकले,
ईमानदार समझा था जिसको वो ग़द्दार निकले।
दिलो जान से चाहा अपना क़रीब सोच,
दमदार समझ था जिनको वो ग़द्दार निकले।
अपनी दिल का मख़्फ़ी राज़ बतायै सारे,
ख़ुदार समझा था जिसको वो ग़द्दार निकले।
ह़िकमत अमली करते थे मुल्क का दिफ़ाअ,
बेदार समझा था जिसको वो ग़द्दार निकले।
अपना लहु देकर जान बचाई जोखिम से,
दमदार समझा था जिसको वो ग़द्दार निकले।
सहारा दिया माज़ूर मिस्कीन बदह़ाल देख कागा,
बेज़ार समझा था जिसको वो ग़द्दार निकले।
नैतिकिता
नैतिक पतन हो गया संस्कार सभ्यता नहीं,
नैतिक परिवर्तन हो गया संस्कार सभ्यता नहीं।
रक्षक भक्षक हुऐ बाड़ खेत को खाये,
मैला मन हो गया संस्कार सभ्यता नहीं।
मां बाप को छोड़ आते वृद्धाश्रम में,
पूर्ण प्रयत्न हो गया संस्कार सभ्यता नहीं।
कुल में कलह कलेश होती हर रोज़,
धूल धन हो गया संस्कार सभ्यता नहीं।
सास बहु का झगड़ होती किच किच,
कटू वचन हो गया संस्कार सभ्यता नहीं।
भाई बहिन का मन मुटाव तेज़ तनाव,
आपसी अनबन हो गया संस्कार सभ्यता नहीं।
बेइज़्ज़त होते बुज़ुर्ग अपने घर में कागा,
अपमान उत्पन हो गया संस्कार सभ्यता नहीं
दोगला दौर
मिलावट का दौर चला गौ़र कर देखो,
बनावट का दौर चला गौ़र कर देखो।
चोर को चोरी करने का देते इशारा,
गिरावट का दौर चला गौ़र कर देखो।
घर मालिक को सूचना सावधान चोरी होगी,
दिखावट का दौर चला गौ़र कर देखो।
मिश्रण हो रहा दवा चाहे ज़हर का,
सजावट का दौर चला गौ़र कर देखो।
निजी सरकारी शिक्षण संस्थाओं में गड़बड़ झाला,
रुकावट का दौर चला गौ़र कर देखो।
होते पैपर लीके नक़ल धूमधाम धड़ले से,
घबराहट का दौर चला गौ़र कर देखो।
भाई भतीजा वाद जाति धर्म का बोबाला,
चौधराहट का दौर चला गौ़र कर देखो।
माम का ब्याह मां परोसने वाली कागा,
फटाफट का दौर चला गौ़र कर देखो।
वसुंधरा राजे
महारानी वसुंधरा राजे का कोई स़ानी नहीं,
राजनीति रंग मंच पर कोई स़ानी नहीं।
राजस्थान की दो मर्तबा मुख्य मंत्री फनी,
शासन रहा बड़ा शानदार कोई स़ानी नहीं।
जय जय राजस्थान का ओजसवी नारा दिया,
कथनी करनी अंतर नहीं कोई स़ानी नहीं।
झलक पाने को पलक पावड़े बिछाती जनता,
जन सेलाब उमड़ जाता कोई स़ानी नहीं।
रोब रुतब्बा रसूख़ शानो शोक़्त शहोरत निराली,
अंदाज़ आवाज़ अस़ल अनोखा कोई स़ानी नहीं।
विधायक सांसद विदेश राज्य मंत्री पद पर,
राजस्थान की रहबर रहनुमा कोई स़ानी नहीं।
भारत के हर राज्यों में नाम रोशन,
विकास का कीर्तीमिन स्थापित कोई स़ानी नहीं।
जनता की दिलों पर राज किया कागा,
समस्त आंखों की पुतली कोई स़ानी नहीं।
शर्मसार
शर्म बड़ी बेशर्म हो गई शर्म आती नहीं,
नाक कान काट ज़लील करो शर्म आती नहीं।
सारे बंधन तोड़ डाले अस़्मत इज़्ज़त आबरू के,
बिना सोच बद-अलफ़ाज़ बोलते शर्म आती नहीं।
सच्च सुनना नापसंद झूठ से गहरा नाता रिश्ता,
करते साज़िश शरारत शेत़ान बन शर्म आती नहीं।
इंसान का चोला पहन करते ह़ेवान जैसी ह़रकतें,
इंसानियत का नामो-निशान नदार्द शर्म आती नहीं।
हंगामा खड़ा कर देते बेबुनियाद इल्ज़ाम लगा कर,
बिना सिर पैर झूठे लांछन शर्म आती नहीं।
नफ़रत का नंगा नाच कराते दंगा फ़ालतू फ़स़ाद,
जाति धर्म का ज़हर घोल शर्म आती नहीं।
बेजमीर बन अमीर बनने की करते कोशिश कागा,
वज़ीर का मोस़ूल उम्दा ओ़हदा शर्म आती नहीं।
आपरेशन सिंदूर
पेहलगाम का बदला लिया दो बहादुर बेटियों ने,
आपरेशन सिंदूर हमला किया दो बहादुर बेटियों ने।
कर्नल सो़फ़िया क़ुरेशी विंग कमांडर व्योमिका सिंह जांबाज़,
नो ठिकानों को नेस्तो नाबूद किया बेटियों ने।
बधाई की पात्र भारत का नाम किया रोशन,
आंतकी अड्डे तबाह किये तह़स़ नह़स़ बेटियों ने।
सोफ़िया क़ुरेशी मुस्लिम व्योमिका सिंह रविदासिया सिख धर्म,
आपरेशन सिंदूर सफ़ल बनाया शान से बेटियों ने।
बेटियां कम नहीं दमख़म दुगना दलेर बेटों से,
सबक़ सिखाया संजीदा सलीके़ से दोनों बेटियों ने।
बेटी बचाओ बेटी बढ़ाओ भेद भाव नहीं कागा,
भारत का सिर ऊंचा किया दोनों बेटियों ने।
सिकंदर के ख़ाली हाथ

सिकंदर के ख़ाली हाथ रुख़स़त हुऐ दुनिया से,
दुनिया को फ़तेह़ कर रुख़्स़त हुए दुनिया से।
क़ुदरत का करिश्मा इंसान आया रोते जाना अकेला,
ख़ाली हाथ फेला कर रुख़स़त हुऐ दुनिया से।
रोब रुतब्बा रसूख़ शानो शोक़्त शहोरत ठाठ बाट,
जब हुई मौत नाज़ल रूख़स़त हुए दुनिया से।
ताज तख़्त बख़्त सख़्त मिज़ाज धन दोलत सरमाया,
दिफ़ाअ नहीं कर सके रुख़स़त हुऐ दुनिया से।
मरते दम दमखम था जोश जज़्बा जान में,
जनाज़ा उठा ख़ाली हाथ रुखस़त हुऐ दुनिया से।
दो गज़ ज़मीन दो गज़ कफ़न वास्ते कागा,
आख़री दम नस़ीह़त वस़ीयत रुख़स़त हुऐ दुनिया से।
छुट-भैया
छुट-भैया छट-पटा रहे छिन गई गद्दी,
हाय-तौबा हंगामा हो रहा छिन गई गद्दी।
जनता में पेठ नहीं हो गया पर्दा फ़ाश,
बहाना कर घूमते इधर-उधर छिन गई गद्दी।
सत्ता में ख़त़ा कर बेठे पत्ता कट गया,
अब पछता रहे हर पल छिन गई गद्दी।
जनता से जुड़ाव नहीं जुगाड़ करते नज़र आये,
घमंड घटा नहीं घन घोर छिन गई गद्दी।
चुनाव की हार जीत की चिंता चित्त में,
जनता जाग चुकी अब सावधान छिन गई गद्दी।
कलई उतर गई निकला पीतल पीला सोना नहीं,
अब रोना धोना कुछ नहीं छिन गई गद्दी।
आपदा में अवसर ढूंढ़ते जनाधार खिसक गया कागा,
डूब गये डगमग डांवाडोल होकर छिन गई गद्दी।
आंतकी
आंतकी का जाति धर्म नहीं होता,
अपराधी का जाति धर्म नहीं होता।
सिरफिरे असामाजिक तत्व करते गुंडा गर्दी,
बदमाश का जाति धर्म नहीं होता।
पराई बहिन बेटी पर बुरी नज़र,
बलात्कारी का जाति धर्म नहीं होता,
लूट खसोट करते छीना झपटी झगड़ा,
लुटेरों का जाति धर्म नहीं होता।
रहबर बनने के बहाने होते हमदर्द,
रहज़न का जाति धर्म नहीं होता।
चापलूस बन करते चुग़ली चुप चाप,
चाटुकार का जाति धर्म नहीं होता।
नफ़रत की आग भड़काते हरदम कागा,
नादान का जाति धर्मनहीं होता।
पहेली
पहलगाम बन गया पहेली सुलझ नहीं सकी,
पोलामावा बन गया पहेली सुलझ नहीं सकी।
सुहागनों के सिंदूर उजड़े सूनी हुई मांगें,
बिछुड़ रही फफकती पहेली सुलझ नहीं सकी।
आंखो में आंसू लबरेज़ चीख़ें चौ-त़रफ़ा,
सिर पीट सिसकती पहेली सुलझ नहीं सकी।
लाली लबों से उतरी महेंदी मिटी नहीं,
रुलाई नहीं रुकती पहेली सुलझ नहीं सकी।
चार दहश्त गर्दों का अता पता नहीं,
शोख़ी नहीं सख़्ती पहेली सुलझ नहीं सकी।
कहां से आये कहां चले गये चालाक,
रूह़ रही कांपती पहली सुलझ नहीं सकी।
ज़मीन निगल गई फ़लक ने किया फ़ना,
अ़वाम सवाल पूछती पहेली सुलझ नहीं सकी।
चुटकी भर सिंदूर की क़ीमत कौन जाने,
सीने आग सुलगती पहेली सुलझ नहीं सकी।
संविधान
शपथ लेते संविधान की अपमान करते अम्बेडकर का,
संवैधानिक पद पर तैयनात अपमान करते अम्बेडकर का।
धर्म निर्पेक्ष संविधान में दिये समान सर्व अधिकार,
अगड़ी पिछड़ी भावना नहीं अपमान करते अम्बेडकर का।
मज़दूर किसान महिला ग़रीब का मसीह़ा बन कर,
दिया मूल भूत अधिकार अपमान अम्बेडकर का।
वोट का ह़क़ मिला बिना किसी आंदोलन मांग,
छूआ छूत भेद मिटाया अपमान अम्बेडकर का।
भूमि हीन को भूमि आंवटन जागीर प्रथा ख़त्म,
मिला मालिकाना ह़क़ अपना अपमान अम्बेडकर का।
जय भीम जय जवान जय किसान बोलो कागा,
जय संविधान जये भारत एह़सान अम्बेडकर का।
पर्दानशीं
कब तक पर्दानशीं बनोगे पर्दा उठना है,
आज नहीं तो कल पर्दा उठना है।
हक़ीकत छुपती नहीं झूठ के झोल से,
चेहरे पर लगा घूंघट पर्दा उठना है।
पीतल पर लगा पीला घोल सोन का,
कसोटी से घिस कर पर्दा उठना है।
नज़रें झुका कर चलने से क्या फायदा,
दोनों मिला दो नज़रें पर्दा उठना है।
मुशक इश्क़ छुपा नही़ सकते छुपाने से,
हो जाता अचानक उपटार पर्दा उठना है।
मोर नाचता पंख खोल कर झूम कागा,
सुन बादल की गर्जना पर्दा उठना है।
दोहरा चरित्र
जो बादल गर्जते है वो बरसते नहीं,
जो बादल बरसते है वो गर्जते नहीं।
शेर जंगल का राजा होता ख़ुद मुख़्तयार,
चुनाव नहीं होते सारे जानवर रहते ताबेदार।
स्वाभिमान से समझोता नहीं ऊंचा रुतब्बा रसूख़,
बेज़मीर बेशऊर बेईमान करते अपना फ़ेस़ला मनसूख़।
बड़बोले करते बक बक बकवास बेबुनियाद बेशर्म,
शर्म को शर्म आती बिकाऊ बड़े बेशर्म।
बात में बदल देते अपनी बात बदमाश,
बिना पैंदे के लोटे लुढ़क जाते बदमाश।
एक मयान में दो तलवार नहीं होती,
एक क़बर में दो लाश नहीं होती।
जायज़ रिश्ते के लिये करते जांच पड़ताल,
नाजायज़ के लिये कोई नहीं करता पड़ताल।
कागा कुंऐ में भांग पीते एक पानी,
जाति धर्म का बोल बाला ख़त़म कहानी।
चूक
तीर तरकश में चूक हुई चूक गये निशाना,
सुरक्षा में सींध मारी हुई चूक गये निशाना।
मौक़ा मिला था सुनहरा घर बैठे गंवा दिया,
शिकार हो गये शिकारी के मौक़ा गंवा दिया।
जाल में फंस गये पापी पेट का सवाल,
देख दाना सुद्ध बुद्ध खोई मच गया बवाल।
जान डाल दी जोखिम में बिना सोच विचार,
अ़क़ल पर ताला जड़ा हुआ हर जगह तिरस्कार।
शेर अपना शिकार ख़ुद करता पराया भरोसा नहीं,
घास नहीं चरता जूठन नहीं खाता परोसा नहीं।
रंगा सियार निकले आम जन की नज़रों में,
क़द था कंगारू जेसा दिखे नेवला नज़रों में।
कागा कोयल सुन मीठा स्वर मोर उड़ गया,
बेठा उल्लू उस ठोर सारा गुलस्तान उजड़ गया।
दो शेरनियां
गर्व है कर्नल स़ोफ़िया क़ुरेशी बेटी पर,
गर्व है विंग कमांडर व्योमिका बेटी पर।
दोनों ने इतिहास रचा आपरेशन सिंदूर कर,
आंतंकी ठिकाने लगाये ठिकाने बड़ा ह़मला कर।
दोनों शेरनियां टूट पड़ी आधी रात को,
नेस्तो ननाबूद कर दिया आधी रात को।
फ़िर्क़ा प्रस्त करते धर्म जाति की राजनीति,
स़ोफ़िया मुस्लिम व्योमिका चमार बंद करो राजनीति।
सोये हुए थे दोनों मुल्क गेहरी नींद,
जागी थी दोनों आंतंकी सुलाए गेहरी नींद।
जय जवान जय भारत की सेना ज़िंदाबाद,
कर दिया कमाल धमाल जमाल सैना ज़िंदाबाद।
युद्ध विराम ने मायुस किया जन मानस,
सपने रह गये अधूरे उदास जन मानस।
मनोबल ऊंचा मुल्क का जनता में जोश,
ऊंचे इरादे उस़ूल ख़ूब खोला ख़ून जोश।
जल थल वायू सैना के मनस़ूबे अटल,
मुकमल नहीं हो सके ऊंचे मनस़ूबे अटल।
कागा करिश्मा कर दिखाया दोनों बेटियों ने,
सिर बुलंद किया दुनिया में दोनों बेटियों ने।
जांबाज़
हवा बाज़ हवा हो गये जांबाज़ ज़िंदा है,
दग़ा बाज़ दफ़ा हो गये जांबाज़ ज़िंदा।
जान चली जाये प्रवाह नहीं ज़मीर ज़िंदा रहे,
धोखे बाज़ दफ़ा हो गये जांबाज़ ज़िंदा है।
जान हथेली पर रख बेठे है वत़न वास्ते,
चाल बाज़ दफ़ा हो गये जांबाज़ ज़िंदा है।
फ़साद पंगा दंगा पैदा करना मक़स़द नहीं हमारा,
ह़मले बाज़ दफ़ा हो गये जांबाज़ ज़िंदा है।
अमनो अमान त़लब हम जान जिगर क़ुर्बान कर,
जुमले बाज़ दफ़ा हो गये जांबाज़ ज़िंदा है।
साज़िश रच शरारत करना मिज़ाज ज़हीन में नहीं,
बंडल बाज़ दफ़ा हो गये जांबाज़ ज़िंदा है।
आ़म अ़वाम अमन पसंद ख़ूनरेज़ी से नफ़रत कागा,
तिकड़म बाज़ दफ़ा हो गये जांबाज़ ज़िंदा है।
बुज़दिल
शेर दिल समझ बेठे हम बड़े बुज़दिल निकले,
बुलंद दिल समझ बेठै हम बड़े बुज़दिल निकले।
पिंजरे में पोशीदा मौम के शेर ख़ामोश ख़ोफ़नाक,
ज़रा आग की तपिश से बहते पिघल निकले।
अपना वकार वजूद रसूख़ नहीं मह़ज़ बनावटी मजस्मा,
बर्फ़ जैसा जमा पानी गर्मी से उबल निकले।
बीज बोया बेख़बरी में आम का बग़ीचे में,
आम की कोरी उम्मीद में कंटीले बबूल निकले।
बड़ा शोक़ था मखमली रेश्मी शेरवानी का नाज़रीन,
जब खोल कर देखी पोटली मुलायम मलमल निकले।
नवरत्न की चाह में मुशीर रखें मह़फ़ल में,
करते हेरा फेरी उथल पुथल चापलूस चुग़ल निकले
ग़ैरों को गले लगया अपनों से ज़्यादा कागा,
ख़ुद ग़र्ज़ ख़तरनाक अस़ल ख़ानदान नहीं बेनस्ल निकले।
हम सफ़र साया
मुड़ कर देखा अपना एक अ़दद नहीं मिला,
झांक कर देखा अपना एक साथी साया मिला।
करते बेठ बग़ल में बड़ी अफ़लात़ून गुफ़्तगू ग़ज़ब,
रिश्ते नाते फ़ुज़ूल मत़लब के साथी साया मिला।
आफ़्त मुसीबत मुश्किल में आज़मा देखा निकला बावफ़ा,
जब जान के लाले पड़े साथी साया मिला।
क़रीबी कन्नी काट गये बेज़मीर बेगाने बन कर,
सिर क़लम हमने कराया मगर साथी साया मिला।
बीवी बच्चे वालदीन यार दोस्त सब रफ़ू चक्र,
हम दर्द हम सफ़र वाह़द साथी साया मिला।
साया साथी मेरा होता ग़ायब अंधेरे में कागा,
क़ब्र गाह में कफ़न लिपटा साथी साया मिला।
ढोंग पाखंड
फट गया ढ़ोल खुल गई पोल अंदर की,
खुल गया पट नज़र आई मूर्ती मंदिर की।
अरमान से बांध रखा संजोए गले में हार,
लगी कसौटी निकला पीतल सोना समझा था सार।
हीरा मोती माणक अनमोल मान किया सोलह श्रृंगार,
टूटा हार बिखरी लड़ियां निकले पत्थर के भंडार।
गुलाब गैंदा चमेली सोच पहनी गर्दन में वरमाला,
सूंघी मिली नहीं ख़ुशबू निकली आक फूल वरमाला।
मुखोटा लगा चेहरे पर नित नये सुदर सलोने,
हक़ीक़त होते नहीं अस़ली घोल लगा सुंदर सलोने।
कागा भेष बदल क़लंदर काली कंबली वाला पाखंडी,
बड़े मकार करते बलात्कार ढोंगी करते नोटंकी पाखंडी।
सत्ता सुख
आज कल लोग सत्ता सुख भोगना चाहते हैं,
धूप सहन नहीं छाया सुख भोगना चाहते हैं।
पंच सरपंच पंचायत समिति सदस्य ज़िला परिषद सदस्य,
प्रमुख पारषिद चैयरमन विधायक सांसद बनना चाहते हैं।
मुफ़्त ख़ोर चापलूस चाटूकार तलवे चाटने में माहर,
पुलाव पूरी पाव भाजी बरियानी खाना चाहते हैं।
ख़ून पसीने की कमाई नहीं करते लुच्चे लफंगे,
लोभी लालची आलसी लपसी ह़ल्वा खाना चाहते हैं।
खाते कबाब मटन चिकन पीते शराब पवा अंग्रेज़ी,
ज्यूस दही लस्सी शर्बत खुशामद हरदम चाहते हैं।
बंगला फ़्लेट माल करते पसंद बड़े शोक़ीन कागा,
बीएमडब्ल्यू फार्च्यून टोयटा हवाई जहाज़ उड़ान चाहते है।
बुद्ध पूर्णिमा
युद्ध में बुद्ध खोज रहे बुद्धि मान,
गंद में शुद्ध खोज रहे बुद्धि मान।
राज पाट सत्ता शान शौकत त्याग कर,
निकल पड़े खड़े मोह माया त्याग कर।
सत्य को ढूंढ लिया कठोर तप से,
मध्य मार्ग अपना कर जप तप से।
तन मन वचन कर्म से पाप माना,
भ्रमण किया भूमि पर हिंसा पाप माना।
बुद्ध शरण गच्छामि धम्म शरण गच्छामि भाव,
संघ शरण गच्छामि संसार सागर तेरना नाव।
जन गण तक दिया शांति का संदेश,
फला फूला तेज गति से देश विदेश।
ऊंच नीच भेद भाव छूआ छूत अछूत,
समान स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया अभिन्न अवधूत।
कागा कामना भावना प्रबल नेक रख नीति,
आत्म दीपों भव पराया भरोसा नहीं नियति।
जातिवाद
आतंक वाद से जाति वाद बड़ा ख़तरनाक,
ख़ोफ़ के साये में जिंदगी बड़ा ख़तरनाक।
आतंक वादी करते ह़मले यदा कदा यारों,
मारते बेगुनाह बेक़ुस़ूर चुन चुन कर ख़ोफ़नाक।
बदला लेते संगठन सरकार होती हलचल हरक़त,
घोषणा होती मुआवज़ा की भारी भरकम बेबाक़।
जाति वाद का ज़ुल्म जारी हर रोज़ ,
जाती पूछ होती ज़्यादती ह़मला सित्म शर्मनाक।
मूंछ रखने पानी पीने पर होता क़तल,
जूं तक नहीं रेंगती ख़ामोश ह़ुकमरान अफ़सोसनाक।
घोड़ी से उतारा जाता दुल्हा चलती बिंदोली,
होती मारपीट पत्थर बाज़ी बहुत बड़ी दर्दनाक।
जाति का ज़हर घोल नफ़रत फेलाते कागा,
मानवता मर जाती बोलती बंद ह़मलावर हेबतनाक।
अस़ल नस्ल
लातों के भूत बातों से नहीं मानते,
जैसे को तैसा बातों से नहीं मानते।
कुत्ते की पूंछ टेढ़ी सीधी नहीं होती,
ज्ञान की सुंदर बातें मूर्ख नहीं मानते।
पूंछ डाल रखो भौंगली में रात भर,
स़ुबह़ खोल देखो टेढ़ी हम सब जानते।
गधा घोड़ा नहीं बनता गंगा जल नहाये,
करे लोट पोट ज़मीं पर सब जानते।
मधु से सींचो नीम को रहता कड़वा,
जड़ पत्ते फल फूल हम सब जानते।
बेनस्ल अस़ल बन नहीं सकता कभी कागा,
बगुला हंस नहीं होता हम सब जानते।
मां
मां जैसा महान कोई जहान में नहीं,
मां ममता महान कोई जहान में नहीं।
मां का आंचल अ़जीबो ग़रीब उम्दा आशियाना,
मिलता चैन सुकून ज़िंदगी में आलीशान आशियाना।
होशो ह़वास संभाला मां के आग़ोश में,
बच्चपन जवानी जोश मां के आग़ोश में।
पिया दूध मां का गट गट गाढ़ा,
घुट्टी घूंट भर कर कड़वा मीठा काढ़ा।
ढाल बन करती रखवाली हर बला से,
बुरी नज़र से बचाती हर बला से।
कागा मां के हम जिगर के टुकड़े,
मां बिना अधूरे हम कलेजे के टुकड़े।
ख़ानदानी
रात को सितारों के साथ चमके वो महताब,
रात चीर कायनात को रोशन करें वो आफ़ताब।
ज़ालिम ज़माना अस़ल नस्ल की कोई पहचान नहीं,
चमन में कांटों के दरम्यान महके वो गुलाब।
एक उल्लु उजाड़ देता गुलस्तान को ग़र्क़ कर,
आसमान में ऊंची उड़ान भरता बुलंद वो उक़ाब।
हिम्मत नहीं ह़ोस़ला नहीं बक बक करता बकवास,
शेख़ चिल्ली जैसे देखता बिना नींद वो ख़्वाब।
गिला ख़ोर चुग़ल करता चापलूसी अपने आक़ा की,
सीना तान चलता चाटुकार बनता नेक वो नवाब।
नक़ल करने में अ़क़ल नहीं बेह़द बंदा बेवक़ूफ़,
बिला वजह करता आलम से वो सवाल-जवाब।
आटा साटा आम हो गया ख़ानदान ख़ूबी ख़तम,
मदहोश रहता मोज मस्ती में पीता वो शराब।
बेक़द्र बेबुनियाद को कोई क़द्र क़ीमत नहीं कागा,
कड़वा बोल बोलता कठोर नहीं कोई होश हिजाब।
ख़त़रा
जाति बंधन तोड़ो ख़तरा टल जायेगा,
रिश्ते नाते जोड़ो ख़त़रा टल जायेगा।
जाति धर्म का झंझट ख़तरे की जड़,
ख़ून ख़राबा छोड़ो ख़तरा टल जायेगा।
अलगाव की आधार शिला रखी वर्ण बनाये,
भ्रम भांडा फोड़ो ख़तरा टल जायेगा।
मन मेद मत भेद छूआ छूत प्रथा,
पराये पंख मरोड़ो ख़त़रा टल जायेगा।
सालों से रहे पराधीन पराये पिछलग्गू बन,
मुंह नहीं मोड़ों ख़त़रा टल जायेगा।
बिखरे मोती टूटी माला मनके इधर-उधर,
चुन कर जोड़ो ख़त़रा टल जायेगा।
वसुदेव कुम्ब कम की भावना प्रबल कागा,
टूटा तार जोड़ो ख़त़रा टल जायेगा।
शुक्रिया
शुक्रिया कर्नल सो़फ़िया क़ुरेशी कमाल कर दिखाया,
विंग कमांडर व्योमिका सिंह कमाल कर दिखाया।
बेटियों पर नाज़ो फ़ख़र दिलो जान से,
शाबाश शेरनियों ने बड़ा कमाल कर दिखाया।
आपरेशन सिंदूर के ज़रिये सरह़द पार कर,
चुटकी भर सिंदूर क़ीमत कमाल कर दिखाया।
नो ठिकानों पर कर ह़मला किया तबाह़,
दहश्त गर्द दरहम बरहम कमाल कर दिखाया।
घर में घुस कर मारा दुश्मन को ,
चुन चुन दहश्त गर्द कमाल कर दिखाया।
जब तक सूरज चांद रहेगा नाम रहेगा,
इंतक़ाम की मिस़ाल पैश कमाल कर दिखाया।
ज़ात मज़हब को किया दर किनार कागा ,
ह़ुब अल वत़न का कमाल कर दिखाया ।
देश के दुश्मन
जाति धर्म का ज़हर घोल रहे देश के दुश्मन,
हिन्दू मुस्लिम का ज़हर घोल रहे देश के दुश्मन।
अगड़ा पिछड़ा अछूत प्राचीन काल से प्रथा जारी,
बर्बाद का बिगुल बजा रहे देश के दुश्मन।
अफ़वाह फेला कराते दंगा पंगा फ़ितनत फ़स़ाद फ़ालतू,
नफ़रत की आग भड़का रहे देश के दुश्मन।
बहिन बेटी की इज़्ज़त अस़्मत से करते खिलवाड़,
दरिंदगी का ज़ुल्म सित्म ढाते देश के दुश्मन।
ढिढोरा पीटते ख़त़रे का खुद क़ौम के क़ातिल,
ऊंच नीच छूआ छूत करते देश के दुश्मन।
संविधान से करते छेड़ छाड़ बदलाव पर आमादा,
जलाते सरे आम सिर फिरे देश के दुश्मन।
जब आते चुनाव तब करते हाथा जोड़ी कागा,
माथा फोड़ी मन्नत झुक सलाम देश के दुश्मन।
अपना पराया
अंदर में मज़बूत बन बाहरी का ख़तरा नहीं,
घर में मज़बूत बन पड़ोसी का ख़तरा नहीं।
घर का भेदी लंका ढाये विभीषण बन कर,
दिल में मज़बूत बन बाहुबली का ख़त़रा नहीं ।
हनुमान ने लंका जलाई अपना पूंछ फेला कर,
आत्मा मज़बूत कर बजरंग बली का ख़त़रा नहीं।
आस्तीन में छुपे सांप डस लेंगे पेहचान कर,
अपनों को मज़बूत कर ग़ैरों का ख़त़रा नहीं।
ग़ैर की गोद में करता अपनों की बुराई,
पड़ोस को मज़बूत कर अजनबी का ख़त़रा नहीं।
अपने पराये को पहचान कसोटी लगा कर कागा,
सोना को मज़बूत कर पीतल का ख़त़रा नहीं।
बुढापा
उल्टी गिनती शुरू अंतिम मोड़ पर है,
अस्सी साल शुरू अंतिम मोड़ पर है।
बच्चपन बीता पच्चपन गया बुढ़ापा चल रहा,
कमर झुकी कमज़ोर अंतिम मोड़ पर है।
लड़खड़ा रहे लाठी का सहारा दृष्टि धुंधली,
भुलक्कड़ हो गये अंतिम मोड़ पर है।
चलना फिरना लाचार कांपते हाथ पैर हरदम,
बेसहारा बन गये अंतिम मोड़ पर है।
ऊंचा सुनते आवाज़ आधा अधूरा कानों से,
बार बार पूछते अंतिम मोड़ पर है।
खाट बिस्तर पर खांसते सुनता नहीं कागा,
खाना पीना मुश्किल अंतिम मोड़ पर है।
देश द्रोही
झूठी अफ़वाहें फेलाने वाले बड़े देश द्रोही,
झूठी सूचनायें देने वाले बड़े राष्ट्र द्रोही।
ज़रूरी जनता की जान माल की सुरक्षा,
ज़रूरी देश के हर कोने की सुरक्षा।
जान बूझ बिना सबूत लगाते मिथ्या आरोप,
बुरे बदनाम करने वास्ते लगाते मिथ्या आरोप।
नीयत नीति नेक नहीं इरादे उस़ूल ख़राब,
हमेशा इधर उधर की करते पीते शराब।
आपसी लड़ाई कराना बांयें हाथ का खेल,
चुग़ली चापलूसी करना बांये हाथ का खेल।
कागा सीधा सादा होता साज़िश का शिकार,
ग़रीब लाचार अबूझ को बनाते अपना शिकार।
दोहरा चरित्र
वोट की राजनीति चल रही देश भक्ति पर,
खोट की कूटनीति चल रही देश भक्ति पर।
धर्म जाति में बंटवारा कर गुमराह किया जाता,
अगड़ा पिछड़ा नीति चल रही देश भक्ति पर ।
अछूत जाति की उन्नति फूटी आंख नहीं सुहाती,
ऊंच नीच रीति चल रही देश भक्ति पर।
आज़ाद भारत में छूआ छूत का बोल बाला,
भेद भाव अनीति चल रही देश भक्ति पर।
लोक तंत्र में मतदान का महत्व मतदाता महान,
प्राचीन बात बीती चल रही देश भक्ति पर।
खुसर फुसर होती संविधान बदलने की चुपके से,
सोया समाज कुरीति चल रही देश भक्ति पर।
चांदी के चंद टुकड़ों पर बिक करते जासूसी,
शरारत की शक्ति चल रही देश भक्ति पर।
लांछन लगाते ओरों पर अपना कर्तूत छुपा कागा,
आतंक की अति चल रही देश भक्ति पर।
सिंदूर
उजड़ गई मांग लुटा सिंदूर सुहागन का,
सूनी हुई मांग टूटा सपना सुहागन का।
आतंक वादियों का ह़मला आफ़्त बन आया,
पल में प्रलय लूटा सिंदूर सुहागन का।
रोई ममता मां की छाती पीट कर ,
बहिन बिलखे बेशुमार लूटा सिंदूर सुहागन का।
हाथों रचाई मेहंदी सूखी नहीं ताज़ा रंग,
रंग में भंग लूटा सिंदूर सुहागन का।
आप्रेशन सिंदूर ने मरहम लगाया गेहरे ज़ख़्मों पर,
कलेजे को ठंडक लूटा सिंदूर सुहागन का।
सोफ़िया क़ुरेशी व्योमिका सिंह ने बदला लिया,
नाम हुआ रोशन लूटा सिंदूर सुहागन का।
ज़ात मज़हब की नफ़रत वालों को तमाचा,
बोलती हुई बंद लूटा सिंदूर सुहागन का।
आओ मिल जुल करें बुलंद एक आवाज़,
करें आत्म रक्षा लूटा सिंदूर सुहागन का।
रक्त की हर बूंद वत़न वास्त़े कागा,
जान करें क़ुर्बान लूटा सिंदूर सुहागन का।
ख़तरा
बहुजन समाज पर मंडरा रहा ख़तरा स़दियों से,
छूआ छूत भेद भाव नफ़रत अन्याय स़दियों से।
जब चार तब्क़े बने ब्रह्मण क्षत्रीय वैश्य शूद्र,
ऊंच नीच अगड़ी पिछड़ी भावना ख़तरा स़दियों से।
शंबुक का वध किया जप तप का आरोप,
ईर्ष्या तपस्या का लांछन लगा ख़त़रा स़दियों से।
धनुष विधा में दक्ष एकलव्य भील जाति जूंझार,
पांडवों से प्रवीण निशाने बाज़ ख़तरा स़दियों से।
द्रोणाचार्य ने मांगा अंगूठा काट कर दक्षिणा में,
आजीवन बना दिया अक्षम अपंग ख़त़रा स़दियों से।
ज्योतिबा फूले सावित्री बाई का योग दान ऊंचा,
अपमान घूंट पीकर सेवा की ख़त़रा स़दियों से।
अम्बेडकर ने मसीह़ा बन संविधान रचा भारत का,
बराबरी का ह़क़ किया सुरक्षित ख़तरा स़दियों से।
झलकारी बाई की वीरता को छिपाई गई कागा,
झांसी रानी लक्ष्मी को श्रेय ख़तरा स़दियों से।
जंग
जंग के अमकान जारी तैयार हो जाओ,
जान रख हथेली पर तैयार हो जाओ।
दुश्मन ललकार रहा जंग करने को लगातार,
साज़ो सामान के साथ तैयार हो जाओ।
अस़लाहा बम बारूद तोप त़य्यारे मिसाईल जदीद,
तरबियत शुद्धा तेज़ तरीन तैयार हो जाओ।
अपना करतब करिश्मा जोश का मुज़हरा करो,
जंगे मैदान में तैयनात तैयार हो जाओ।
वत़न पुकार रहा ख़ून की तास़ीर त़लब,
हवा का रुख़ झंझोड़ता तैयार हो जाओ।
हंगामी ह़ालात है कफ़न बांध लो कागा,
तोड़ दांत करो खट्टे तैयार हो जाओ।
वत़न
हम वत़न के वफ़ादार वत़न हमारी जान,
हम वत़न के किरदार वत़न हमारी जान।
जिस्म जान सांसों में रंग ख़ुशबू वत़न की,
हम परवाने वत़न जलती शम्मा हमारी जान।
रोशनी फेली दुनिया के हर होने किरन,
मुश्क की महक बहक गई हमारी जान।
ज़मीन का हर ज़र्रा ज़र ख़ेज़ ख़ुशह़ाल,
सींचा ख़ून पसीने से गुलज़ार हमारी जान।
वत़न हमारा चमन हम बुलबुल वत़न के,
हर कली गुल फूल में हमारी जान।
हम अस़ल नस्ल औलाद वत़न प्रस्त कागा,
नस नस में बहती नदियां हमारी जान।
बेरोज़गारी
बेरोज़गारी बड़ी बीमारी जिसका कोई इलाज नहीं,
बेकारी बड़ी महामारी जिसका कोई इलाज नहीं।
शिक्षित बेरोज़गार घूमते गली कूचे मारे मारे,
नहीं मिलता रोज़गार धंधा कोई इलाज नहीं।
शिक्षा हो गई महंगी मुश्किल बेबस ग़रीब,
जूं नहीं रेंगती कान कोई इलाज नहीं।
चुनाव के समय आते करते झूठे वादे,
पांच साल ग़ायब कोई इलाज नहीं।
पैर पकड़ करते हाथा जोड़ी माथा फोड़ी,
बाद में भूल जाते कोई इलाज नहीं।
धर्म जाति का चोला गले दुपट्टा कागा,
देते झूठा झांसा धोखा कोई इलाज नहीं।
वंदे मातृम
इकहत्तर की जंग आंखों देखी रुह़ कांपता है,
लड़ाई कोई हंसी मज़ाक़ नहीं जिस्म हांपता है।
चारों ओर बम बरसते ऊपर तोपों के गोले,
सेना के सिपाही चाक चोबंद आग के गोले।
ख़ोफ़ नाक मंज़िर के हम चश्म दीद गवाह,
सोते नहीं जागते है जवान जांबाज़ नहीं लापरवाह।
जान हथेली पर रख फ़र्ज़ अदा करना होगा,
वत़न वास्ते जान क़ुर्बान मुल्क वास्ते मरना होगा।
ख़ून का हर क़त़रा बहाना होगा जंग में,
लोह के चन्ने बचाने होंंगे मेदाने जंग में।
भगोड़े बन दुम दबा कर भाग नहीं जाना,
अपनी मां का दूध छट्टी का नहीं लजाना।
तिरंगा थाम हाथ में आगे बढ़ना जोश से,
जय हिंद का नारा गूंजे बुलंद होश से।
कागा कफ़न ओढ़ कंधों पर बोलो वंदे मातृम,
जीत का स़ह़रा सिर पर बोलो वंदे मातृम।
दोबारा
निकला तीर आता नहीं लोट दोबारा कमान में,
निकला बोल आता नहीं लोट दोबारा ज़ुबान में।
सांप चला जाता अपनी राह़ लोग लकीर पीटते,
गुज़रा ज़माना आता नहीं लोट दोबारा जहान में।
बच्चपन जवानी जोश जज़्बा दायमी नहीं आरज़ी है,
ख़ुशबू आती किसी ख़ास़ ज़िंदा दिल इंसान में।
दुनिया को फ़तह़ किया सिकंदर शहनशा ने ज़रूर,
चमकता है चांद अंधेरी रात को आसमान में।
हस्ती मस्ती हेस़िययत रोब रुतब्बा रसूख़ मिटता नहीं,
कशीदे पढ़ते शाना बशाना शख़स़ियत के शान में।
खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे बिना सोच विचार कागा,
निकली सांसें आती नहीं लोट दोबारा जान में।
महंगाई
महंगाई अहम मुद्दा मुल्क में ख़ुदा ख़ेर करे,
ग़रीब की ग़ैरत दांव पर ख़ुदा ख़ेर करे।
भूखे प्यासे नंगे बिलखते बच्चे कूड़ा बीन रहे,
ढूंढ रहे सूखी बासी रोटी ख़ुदा ख़ेर करे।
कबाड़ी बड़ा कंजूस देता नहीं क़ीमत कबाड़ की,
नहीं करता मुनासब मोल तोल ख़ुदा ख़ेर करे।
मज़दूर बड़ा मोह़ताज मिलती नहीं मज़दूरी वक़्त पर,
चक्कर काटता पैशी दर पैशी ख़ुदा ख़ेर करे।
दाल आटा चावल नमक मिर्च मस़ाले बेह़द महंगे,
पेट चिपक गया पीठ से ख़ुदा ख़ेर करे।
टूटे फूटे पेबंद लगे कपड़े तन ढकने को,
दुबला पतला बदन झुकी कमर ख़ुदा ख़ेर करे।
पसलियों की गिनती कर दो आंतें सिकुड़ी हुई,
आंखों में आंसू सिसकती सांसें ख़ुदा ख़ेर करे।
ज़हर महंगा मिलवट वाला खाने पर मरते नहीं,
मौत मांगने से मिलती नहीं ख़ुदा ख़ेर करे।
घुट घुट कर कोस रहे किस्मत को कागा,
सुनता नहीं बेदर्द ह़ाकम फ़रियाद ख़ुदा ख़ेर करे।
ह़ोस़ला
हम कोई कम नहीं दम ख़म है,
ख़ून खोल रहा हरदम ग़ुस़ा ग़म है।
कांटों के संग ख़ुशबू बिखेरी गुलाब बन,
खरोंच तक नहीं लगी कोई ज़ख़्य है।
जंगल में दंगल मंगल किया शेर बन,
चीता घिंकारा राजा होकर क्या कम है।
चमन में अमन क़ायम किया बुलबुल बन,
त़ौत़ा मीना तितली भंवरा पहला क़दम है।
लाखों तारों के दरमियान चमके चांद बन,
दूज पूनम की मस्ती चांदनी स़नम है।
अंधेरा मिटा रात ग़ायब सूरज बन कागा,
रोशनी फेली कायनात पर अहद मरदम है।
जाति जन गणना निर्ण्य
जाति जन गणना की घोषणा हो चुकी,
आज़ादी के सालों बाद घोषणा हो चुकी।
मांग विपक्ष की थी जन गणना की,
लाभ हानि देख कर अंत सरकार झुकी,
अगड़े पिछड़े की गिनती होगी जाति की,
आरक्षण का होगी समीक्षा बनी बात बेतुकी।
ह़क़ ह़िस़ा होगा जाति जन गणना पर,
अन्याय की चाल ताल मेल गति रुकी।
चोरी सीना ज़ोरी पर अब लगेगी लगाम,
संख्या पर होगा निर्धारण नहीं धक्का मुक्की।
दीन धर्म का वर्गीकरण ज्वलंत समस्या कागा,
निर्णय को नेक विवेक से बात पक्की।
डा, भीमराव अम्बेडकर
शिक्षित बनो संगठित हो संघर्ष करो,
बिना शिक्षा जग अंधेरा संघर्ष करो।
शिक्षा सौ तालों की एक चाबी,
अपना दीपक ख़ुद बनो संघर्ष करो।
शिक्षा को चोरी का डर नहीं ,
शिक्षा का नहीं बंटवारा संघर्ष करो।
दया करो हर जीव जंतु पर,
बेसहारा का सहारा बन संघर्ष करो।
धन दौलत दान कोई ज़रूरी नहीं,
शिक्षा का अर्पण कर संघर्ष करो।
बेटा बेटी एक समान दोनों आंखें,
शिक्षा का सुर्मा डाल संघर्ष करो।
बाबा स़ाहब की नसीहत वस़ीयत कागा,
मनन चिंतन समीक्षा कर संघर्ष करो।
इम्तिहान
ज़ोर आज़माईश का वक़्त आ गया,
दौर फ़रमाईश का वक़्त आ गया।
ख़ामोश दिल थाम कर बैठ गये,
दौर ख़्वाहिश का वक़्त आ गया।
करते थे अपनी मर्दानगी पर गुमान,
दौर सताईश का वक़्त आ गया।
दहशत गर्दी ने बेदर्दी से पुकारा,
दौर गुंजाईश का वक़्त आ गया।
सैना के साथ सरह़द पर जांबाज़,
दौर नुमाईश का वक़्त आ गया ।
बेगुनाह क़त्ल हुए बदला चाहिये कागा,
दौर आराईश का वक़्त आ गया।
नैतिक पतन
नियत नेक नहीं नैतिक पतन हो गया,
नीति साफ़ नहीं नैतिक पतन हो गया।
बेह़द बेशर्म बेदर्द बेह़य्या बुरे लुच्चे लोग,
शक के कठघरे में पतन हो गया।
शक की सुई घूमती उनके इर्द गिर्द,
चाटुकार के डेरे में पतन हो गया।
आस्तीन का सांप बन करते चुग़ली चापलूस,
घमंड के घेरे में पतन हो गया।
मुंह से बोल मीठा दिल के कड़वे,
दलाली के दायरे में पतन हो गया।
पुरखे लिया करते थे नैतिक ज़िम्मेदारी कागा,
आज के अंधेरे में पतन हो गया।
दल बदलू
दल बदल दिल बदल कोई गुनाह नहीं,
हर चीज़ अदल बदल कोई गुनाह नहीं।
मौसम बदले रस्मों रिवाज बदले दुनिया में,
कोबरा केंचुली बदले साल कोई गुनाह नहीं।
खेतों होती खरपत वार कांटे झाड़ी काट,
घर की स़ाफ़ स़फ़ाई कोई गुनाह नहीं।
मेला कुचेला कुर्ता धोती धोना पुरानी पोशाक,
फटा टूटा चीत्थड़ा बदल कोई गुनाह नहीं।
लकीर का फ़क़ीर नहीं ओछी सोच बदल,
आरोप नहीं मढ़ना बदल कोई गुनाह नहीं।
कलह का घर बुझी धूणी मत कहना,
बेबाक बात करना हरदम कोई गुनाह नहीं।
खाया अन्न पिया पानी बुरा नहीं बताना,
विचारों का तल मैल कोई गुनाह नहीं।
दल कोई बुरा नहीं बुरे बंदे कागा,
दो टूक जवाब देना कोई गुनाह नहीं।
चुग़ल ख़ोर
चुग़ल चोर अगुवा बन गये कैसा दौर आया,
गिला ख़ोर अगुवा बन गये कैसा दौर आया,
करते काना फूसी चाटुकार तलवे चाटते बांया दांया,
घूस ख़ोर अगुवा बन गये कैसा दौर आया।
पिछलग्गू बेठ पीछे करते बुराई बार बार बदमाश,
उल्लु गिद्ध अगुवा बन गये कैसा दौर आया।
गिरगिट रंग बदल देता मौसम को देख कर,
गीदड़ भालू अगुवा बन गये कैसा दौर आया।
कल गिड़गिड़ा रहे घुटनों के बल रेंग उदास,
आज ग़द्दार अगुवा बन गये कैसा दौर आया।
चापलूसी चम्चा गिरी करते आदत से मजबूर कागा,
दब्बू दबंग अगुवा बन गये कैसा दौर आया।
संविधान
संविधान से करते छेड़ छाड़ शपथ लेकर,
संविधान से करते खुला खिलवाड़ शपथ लेकर।
संविधान दिवस पर खाते सौगंध सुरक्षा की ,
बाद में करते बड़ा बिगाड़ शपथ लेकर।
अम्बेडकर जयंती पर करते गुण गान गर्व,
जोड़ तोड़ करते जबरन जुगाड़ शपथ लेकर।
संविधान की धज्जियां उड़ाते सरे आ़म नालायक़,
कहते कोरा कूड़ा है कबाड़ शपथ लेकर।
सिर झुका सलाम करते मूर्ती के सामने,
अम्बेडकर बड़ा महान गला फाड़ शपथ लेकर।
संवेधानिक पद पर बेठ करते झूठी प्रशंसा,
बाद बनाते राई का पहाड़ शपथ लेकर।
संविधान की समीक्षा का देते सुझाव कागा,
तिल से बनाते ऊंचा ताड़ शपथ लेकर।
आवाज़ अलफ़ाज़
आवाज़ में नहीं अल्फ़ाज़ में त़ाक़्त होनी चाहिये,
साज़ में नहीं अंदाज़ में ता़क़्त होनी चाहिये।
खोदा पहाड़ निकली चुहिया शोर शगुफ्ता जायज़ नहीं,
राज़ में नहीं नाज़ में नज़ाकत होनी चाहिये।
हंगामा खड़ा करते हरदम फ़ालतू़ लुच्चे लफंगे लोग,
बाज़ में नहीं परवाज़ में बग़ावत होनी चाहिये।
दगा़ बाज़ दग़ा करते आस्तीन में छुपे सांप,
जांबाज़ में नहीं हमराज़ में ह़िमायत होनी चाहिये।
ख़ुदी को बुलंद कर जीना है जहान में,
रिवाज में नहीं समाज में सियास्त होनी चाहिये।
माज़ी भूल जाना कर मूस्तक़बिल की फ़िक्र कागा,
आज में नहीं ताज में सख़ावत होनी चाहिये।
परिंडे
परिंडे लगा परिदों के वास्ते शीतल जल के,
चुग्गा डाल परिंदों के वास्ते दिल मचल के।
गर्मी का मौसम लू ताप धूप के थपेड़े,
उगल रहा आग अंगार अ़र्श थर्र कर थपेड़े।
पिघल रहा पसीना टपक रहे आंसू आंखों से,
बाग़ों में बहार पक्के आम रस शाखों से ।
कोयल करती कूहक त़ोत़ा मीना बुलबुल भंवरा तितली,
प्यासे पंछी सूखे कंठ तड़पे बिना पानी मछली।
मई का महिना चलती धूल भरी आंधियां अपार,
झुलस रहे पशु पक्षी पपिहा करता पिया पुकार।
आकाश पर छाई काली बदली दिन रात रोज़,
ऋतु मेघ मल्हार नाचे मोर म्यूरी मस्ती मोज।
कागा गाज गर्जे करे शोर बरसे बारिश झमाझम,
गैरी संग सहेलियां चलती पग पायल होती छमाछम।
सोया समाज
जब बहुजन समाज गहरी नींद से जाग जायेगा,
तब दुश्मन दुम दबा कर दुबक भाग जायेगा।
मत अधिकार का असल मत़लब शक्ति समझे नहीं,
सोच समझ जायेगा तब दुश्मन दुबक भाग जायेगा।
ह़ल्वा पुरी पुलाव पव्वा का लालच छोड़ कर,
सावधान सम्भल जायेगा तब दुश्मन दुबक भाग जायेगा।
मोह माया के मकड़ जाल में उलझा नादान,
दामन छुड़ाया जायेगा तब दुश्मन दुबक भाग जायेगा।
अभी केवल शिक्षित बने दीक्षित होना बाक़ी है,
दीक्षित बन जायेगा तब दुश्मन दुबक भाग जायेगा।
संगठन की डोर कच्ची फूट डाल रहा दुश्मन,
मज़बूत हो जायेगा तब दुश्मन दुबक भाग जायेगा।
संघर्ष करने के सुदृढ़ संसाधन नहीं माक़ूल कागा,
सशक्त बन जायेगा दुश्मन दुबक भाग जायेगा।
बहुजन समाज
एक दिन दलित बन कर देखो पता चलेगा,
एक दिन बहुजन बन कर देखो पता चलेगा।
ऊंच नीच छूआ छूत भेद भाव नफ़रत घ्रणा,
एक दिन कमर झाड़ू बांध देखो पता चलेगा।
गर्दन में रस्सी बांध लटकती हांडी मिट्टी की,
एक दिन थूक कर चल देखो पता चलेगा।
घुटनों से ऊपर ढका तन सारा नंगा बदन,
एक दिन खुला स्तन रख देखो पता चलेगा।
मंदिर में प्रवेश पर रोक टोक दर्शन मना,
एक दिन चोरी छुप मूर्ती देखो पता चलेगा।
दुल्हे उतारते नीचे घोड़ी से मार पीट कर,
एक दिन बिंदोली पर पथराव देखो पता चलेगा।
दुत्कार फटकार मिलती हर रोज़ जात पात की,
एक दिन पायख़ाना स़ाफ़ कर देखो पता चलेगा।
मृत पशुओं का कंकाल घसीट निकालते घर से,
एक दिन सिर मेला उठाये देखो पता चलेगा।
देव दासी बनाये रखना युवतियां की अनुमति चालू,
एक दिन घिनोना कार्य कर देखो पता चलेगा।
बदले में मानदेय उतरन जूठन खुरचन खान पान,
एक दिन एसा सनातनी बन देखो पता चलेगा।
यातनाऐं झेल स़दियों से अपना दीन नहीं बदला,
एक दिन एसा हिंदू बन देखो पता चलेगा।
मुस्लिम कहते काफ़िर हिंदू तुम हिंदू बोलते शूद्र,
एक दिन बेसहारा लाचार बन देखो पता चलेगा
आभार है अम्बेडकर का संविधान में समान अधिकार,
एक दिन महान मसीह़ा बन देखो पता चलेगा।
गर्व से कहो हम कट्टर हिंदू है कागा,
एक दिन एसा कट्टर बन देखो पता चलेगा।
मेघवाल समाज
मेघवाल वर्ग है कोई जाति नहीं,
मेघवाल समुदाय है कोई जाति नहीं।
मेघ नाम बादल छाये रहते आकाश,
मेघ सागर की माया जाति नहीं।
समुंदर जल कड़वा बाफ़ ऊंची गगन,
बूंद बन बरस जाता जाति नहीं।
गाज बन गर्जता चमक कर बिजली,
बनता मीठा अमृत पावन जाति नहीं।
परोपकार का पुतला बहती जल धारा,
धरा होती हरी भरी जाति नहीं।
चौरासी लाख योनियों को करता संतुष्ट,
जीवन दाता अन्न दाता जाति नहीं।
मेघ ऋषि की संतान मानव रूप,
वस्त्र बुन अंग ढका जाति नहीं।
पग तपते जलते कांटा चुभते नुकीले,
मोची बन जूते पहनाये जाति नहीं।
जूल्हा मोची मेघ गुरू बने ज्ञानी,
राजा रानी करते नमन जाति नहीं।
जीवन कल्याण का मंत्र फू़का कागा,
राम नाम का रिखिया जाति नहीं।
मत़लबी यार
जहां देखो वहां मिलते मत़लब के यार,
जहां जाओ वहां मिलते मत़लब के यार।
बिना मत़लब कोई बंदा नहीं दुनिया में,
क़दम दर क़दम मिलते मत़लब के यार।
मखियों की त़रह़ भिनभिना उड़ते मवाद पर,
स्वाद चखते चाट चाशनी मत़लब के यार।
बगल गीर बन बेठ जाते खीर खाने,
बिना किसी मान मनोहार मत़लब के यार।
बंदर जेसी हलचल ह़रकत करते उछल कूद,
डाली शाख बदल देते मतलब के यार।
करते गिला शिक्वा पुराने नेक दोस्तों की,
तोहमत मढ़ सिर पर मत़लब के यार।
लाज ह़य्या शर्म रत्ती भर नहीं कागा,
नाक नीचा झुका देते मतलब के यार।
भारत भूमि
भारत देश हमारा हम भारत देश भक्त,
भारत भाग्य हमारा हम भारत भूमि भक्त।
कण कण में सांसें बसती उमड़ घुमड़,
भारत भविष्य हमारा हिलोरे खाता रक्त।
नित्य करते नमन सिर झुका कर प्रणाम,
भारत तेज हमारा हर घड़ी पल वक़्त।
पुश्तेनी पुरखों की जन्म भूमि कर्म भूमि,
भारत रूह़ हमारा पीढ़ियों का ताज तख़्त।
पहाड़ घाटी नदी समुंदर में बसती आत्मा,
भारत वत़न हमारा दिल की धड़कन सख़्त।
आन बान शान जान क़ुर्बान भारत पर,
भारत राष्ट्र हमारा मिट्टी का तिलक मस्तक।
हरे भरे खेत खलियान बाग़ बग़ीचा कागा,
भारत हृदय हमारा हर ह़वेली देहरी दस्तक।
ओक़ात
लह़ज़ा बता देता है आदमी की ओक़ात,
गुफ़्तगू बता देता है आदमी की ओक़ात।
ख़ुदा ने अ़त़ा की है इंसान में स़िफ़्त,
नेक नादान लायक़ नालायक़ आदमी की ओक़ात।
एह़सान एह़सास आरज़ू जुस्तजू एब ख़ामी ख़ूबी,
बोल चाल तो़र त़रीक़ा आदमी की ओक़ात।
अमीर ग़रीब ग़ैर क़रीब रिश्ता नाता फ़ित़रत,
खोपड़ी में जमा अ़क़ल आदमी की ओक़ात।
प्यार नफ़रत मोह़ब्बत उल्फ़त क़ुदरत की इनायत,
फ़र्ज़ अदा करना ज़रूर आदमी की ओक़ात।
स़ूरत बुरी नहीं सीरत नियत बुरी कागा,
करती बेड़ा ग़र्क़ बर्बाद आदमी की ओक़ात।
आतंक वाद
आतंक वाद आदि काल से परम्परा गत है,
नई नवेली कोई बात नहीं परम्परा गत है।
ग़रीब का जीवन बीता आतंक के साये में,
नफ़रत की नज़र बड़ी तिरछी परम्परा गत है।
चार वर्ण में बंटा मानव प्राचीन काल से,
सनातन सर्व संस्कृति सभ्यता संस्कार परम्परा गत है।
ब्रह्मा मुख से ब्रहमण भुजा क्षत्री जांघ वेश्य,
शूद्र संतान चरण से विधि परम्परा गत है।
घुसपेठ के द्वार बंद निकासी के दरवाज़े खुले,
तीन आशियाना सुंदर चोथा घौंसला परम्परा गत है।
ऊंच नीच छूआ छूत भेद भाव बोल बाला,
खान पान पर पूर्ण प्रतिबंध परम्परा गत है।
युग बीत गये खाई चौड़ी होती गई कागा,
मानसिक ठेस सहन की हरदम परम्परा गत है।
झूठ झंझट
झूठ की ह़कुमत दायमी नहीं हो सकती,
झूठ की सियास्त दायमी नहीं हो सकती।
फ़ैल अ़मल में फ़र्क़ दामन पर दाग़,
अमानत में ख़्यानत दायमी नहीं हो सकती।
झूठा झांसा देकर करते दग़ा बाज़ दग़ा,
आ़दत में अलामत दायमी नहीं हो सकती।
बाग़ी बन करते बग़ावत दाग़ी बन दलाली,
शराफ़त में शरारत दायमी नहीं हो सकती।
धूक कर चाट लेते बलग़म हथेली पर,
मत़लब में मुशाह़ब्त दायमी नहीं हो सकती।
इंसान दुश्मन इंसान का इंसानियत रफ़ू चक्र,
नाज़ में नज़ाकत दायमी नहीं हो सकती।
रहबर की नोटंकी कर होते रहज़न कागा,
कुलफ़्त में क़्यादत दायमी नहीं हो सकती।

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा
पूर्व विधायक
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