• पिता जी के हाथ के निशान

    पिता जी बूढ़े हो गए थे और चलते समय दीवार का सहारा लेते थे। नतीजतन, दीवारें जहाँ भी छूती थीं, वहाँ रंग उड़ जाता था और दीवारों पर उनके उंगलियों के निशान पड़ जाते थे। मेरी पत्नी यह देखती और अक्सर गंदी दिखने वाली दीवारों के बारे में शिकायत करती। एक दिन, उन्हें सिरदर्द हो…

  • अपनापन | Apnapan

    निशा जी को परिचारिका बड़े प्यार से उनके कमरे में बिठाकर उन्हें सब कुछ समझाकर बाहर निकल गई। निशा जी गौर से कमरे को चारों तरफ से देखने लगीं। कुर्सी से उठकर खिड़की के पास आ गई और बाहर देखने लगीं। बाहर बहुत सुंदर फूलों से सजा बगीचा देख उनके होंठों पर मुस्कान तैर गई।…

  • मेरे मन का दर्पण | Kavita Mere Man ka Darpan

    मेरे मन का दर्पण ( Mere Man ka Darpan ) मेरे मन के दर्पण मे तस्वीर तुम्हारी है कान्हा, प्रतिपल देखा करती हूं तस्वीर तुम्हारी अय कान्हा, खोली ऑखें तुझको पाया मूॅदी ऑख तुझे ही, कितना भी देखूं तुझको न ऑखों की प्यास बुझेगी, इकदिन सम्मुख दरसन दोगे सोच रही हूं मै कान्हा, प्रतिपल देखा…

  • बारिश में सीता | Kavita Baarish me Sita

    बारिश में सीता ( Baarish me Sita ) हो गई शुरू झड़ी बरसात की। दुखिया कौन है आज,सीता सी? पति चरण छाया से कोसों दूर। हो रही है व्थथा से चूर-चूर। हितैषी नहीं है,सब बेगाना। कैसे, दूर संदेश पहुँचाना ? ऋतु ने भी दुश्मनी मोल ले ली। हो गई शुरू झड़ी बरसात की। महलों की…

  • बिनकहे | Kavita Binkahe

    बिनकहे ( Binkahe ) रहते हों इंसान जहाँ वो मकान खंडहर नहीं होते रहते हों जहाँ फकत इंसान वो महल भी खंडहर से कम नहीं होते बुलावा हो फर्ज अदायगी का ही तो वहाँ भीड़ ही जमा होती है आते हैं बनकर मेहमान लोग उनमे दिली चाहत कहाँ होती है शादी का बंधन भी तो…

  • हाथरस की भीड़ में

    हाथरस की भीड़ में हाथरस की भीड़, में शून्य हुआ जीवन रस अंधविश्वासी बनकर बाबा के दरबार में मैं तो नत मस्तक करने गई थी। अपनों के पास पहुंचने से पहले मैं बाबा धाम पहुंच चुकी थी। सुलझाने कुछ समस्या उलझन में सांसे फस गई थी अंधविश्वासी बनकर मैं तो बाबा के दरबार में गई…

  • कुमार अहमदाबादी की रुबाइयाँ | Rubaiyat of Kumar Ahmadabadi

    आवाज़ सर्वोत्तम मीठी औ’ प्यारी आवाज़ममता में डूबी दीवानी आवाज़कर देती है तन मन को शांत सुखीमाँ की पीयूषी लोरी की आवाज़ आज थोडा सा मन को बहलाने दे आजसूखे पुष्पों को महकाने दे आजबरसों से जिन्हें छेड़ा नहीं है उनरिसते घावों को सहलाने दे आज सूरज गंगा सूरज गंगा चांद सितारे देखेनवरस से भरपूर…

  • दी गर्दन नाप | Di Gardan Naap

    दी गर्दन नाप ( Di Gardan Naap ) चार चवन्नी क्या मिली, रहा न कुछ भी भान। मति में आकर घुस गए, लोभ मोह अभिमान।। तन मन धन करता रहा, जिस घर सदा निसार। ना जानें फिर क्यों उठी, उस आँगन दीवार।। नहीं लगाया झाड़ भी, जिसने कोई यार। किस मुँह से फिर हो गया,…

  • हर लम्हा | Nazm Har Lamha

    हर लम्हा ( Har Lamha ) छुपकर क्या देखता है तमाशा मेरी तबाही का आंख मिलाकर लुत्फ उठा किस्सा ए रुसवाई का हर कदम जिंदगी से नसीहतें पा रहा हूं मैं हर लम्हा अनुभवों की दौलतें सजा रहा हूं मैं हर सांस के अहसान की कीमत चुकाई है मैंने हर रिश्ते की अहमियत खुद को…

  • आनंद के पल | Kavita Anand ke Pal

    आनंद के पल ( Anand ke Pal ) जीवन की खुशीयों का मोल समझो। अपने परायें के सपनों को समझो। प्यार मोहब्बत की दुनिया को समझो। और समय की पुकार को समझो।। मन के भावों को समझते नही। आत्म की कभी भी सुनते नही। दुनिया की चमक को देखते हो। पर स्वयं को स्वयं में…