मुक्तिपथ
मुक्तिपथ चल पड़ा हूँ मैं,बंधनों की राख से उठकर,स्वप्नों के नभ को छूने जहाँ विचार, वाणी और विवेकस्वाधीन साँसें लेते हैं। नहीं चाहिए अबवह शांति,जो चुप्पियों की बेड़ियों में बंधी हो,न वह प्रेम,जो स्वार्थ के कटघरों में सज़ा काटे। मैं चाहता हूँएक उजासजो भीतर से फूटे,एक सत्यजो भय से नहीं, आत्मा से उपजे। संस्कारों की…
