वैभव असद अकबराबादी की ग़ज़लें | Vaibhav Asad Poetry
फ़िर वही सब किया तो सुन बैठे फ़िर वही सब किया तो सुन बैठेइक परी-रू के ख़्वाब बुन बैठे उसकी पायल की छनछनाहट यारसाज़ पर किस तरह ये धुन बैठे साफ़ सुधरी सी ज़िंदगी जीनाबड़ी कमबख़्त राह चुन बैठे इश्क़ वालों को इश्क़ से मतलबउनको क्या करना कितने गुन बैठे मुस्कुराए तो खिल उठे क़िस्मतरूठ…










