पारा हुआ पचास

पारा हुआ पचास | Para Hua Pachas

पारा हुआ पचास

( Para Hua Pachas )

 

वृक्ष बड़े अनमोल हैं, ये धरती- श्रृंगार।
जीव जन्तु का आसरा, जीवन का आधार।।

वृक्ष,फूल,पौधे सभी, जीवन का आधार।
इनसे धरा सजाइये, करिये प्यार दुलार।।

नदिया, झरने, ताल सब, रोज रहे हैं सूख।
पर मानव की है कहाँ, मिटी अभी तक भूख।।

है गुण का भंडार ये ,कुदरत का उपहार।
देव रुप में पूज्य ये, ,वृक्ष करे उपकार।

वृक्ष हमारे मित्र हैं, सुखद-सुहानी छाँव।
प्राण पवन देते हमें, रखें जहाँ हम पाँव।।

बिना वृक्ष संभव नहीं, शुद्ध वायु फल प्यास।
वृक्ष घरोंदा साधते, फिर आता मधुमास।।

वृक्ष काटते जा रहे, पारा हुआ पचास।
धरती बंजर हो रही, क्या है यही विकास।।

Dr. Satywan  Saurabh

डॉo सत्यवान सौरभ

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी,
हरियाणा

यह भी पढ़ें :-

डॉ. सत्यवान सौरभ के पच्चास चर्चित दोहे

Similar Posts

  • हे शिव तनया ! मातु नर्मदे

    हे शिव तनया ! मातु नर्मदे ( नर्मदा जयंती – गीतिका )   हे शिव तनया ! मातु नर्मदे ! नमन तुम्हें हर बार । हमें प्यार से दुलराने तुम, खुद चल आईं द्वार !! सदा सदा आशीष दिया है, तुमने सब पुत्रों को सुख समृद्धि और सौभाग्यों के देकर उपहार !! दे अपने वरदान…

  • संत रविदास | Poem on Sant Ravidas in Hindi

    संत रविदास ( Sant Ravidas )     रैदास कहो रविदास कहो संतो के वचन निराले है। सदाचार सुधारस बरसता प्रभु जिनके रखवाले है।   भक्तिभाव में रत रहते भजन निरंतर भजते रहते। पावन गंगा धारा से संदा मन के भाव रचते रहते।   अमृतवाणी होठों से झरती रहती मधुर रसधार। सादगी से जीवन जीते…

  • खरगोश की खरीददारी

    खरगोश की खरीददारी ******* लाए बाजार से शशक दो रखा नाम काॅटन और स्नो। व्यय किए रुपए अर्द्ध सहस्र, बच्चे दोनों से खेलने में हैं व्यस्त। परेशान किए थे सप्ताह भर से, रट लगाए थे- पापा ला दो न झट से। बाजार नहीं है इसका यहां, भटका सप्ताह भर जहां तहां। यीष्ट मित्रों को फोन…

  • उठी कलम | Kavita Uthi Kalam

    उठी कलम ( Uthi Kalam )   उठी कलम चली लेखनी कविता का स्वरूप हुआ। शब्द सुसज्जित सौम्य से काव्य सृजन अनूप हुआ। टांग खींचने वाले रह गए सड़कों और चौराहों तक। मन का पंछी भरे उड़ानें नीले अंबर आसमानों तक। छंद गीत गजलों को जाना कलमकारों से मेल हुआ। एक अकेला चला निरंतर अब…

  • राजू श्रीवास्तव भैया | Raju Srivastav par kavita

    गजोधर/राजू श्रीवास्तव भैया ( Gajodhar/Raju Srivastav bhaiya )   केवल राजू नही तुम राजा भाई थें हम सबके, हॅंसाने वाले ही नहीं ग़म दूर करतें थें सब-के। कैसे भुलाऍं हम सभी आपको गजोधर भैय्या, आज दिल में ग़म है ऑंखो में नमी है सबके।। सबको हॅंसाने वाले आज रुलाकर गऍं है हमे, मशहूर काॅमेडियन अभिनेता…

  • Lokgeet | चैती

     चैती ( Chaiti Lokgeet )   काहे  गए  परदेश  सजनवा,  काहे  गए  परदेश। प्रीत मोरी बिसरा के सजनवा,छोड़ गए निज देश।   फागुन बीता तुम बिन सजनवा,चैत चढा झकझोर। भरी दोहपरी अल्लड उडे है, गेहूंआ काटे मलहोर।   पुरवा पछुआ कभी उडे तो, कभी उडे चकचोर। सांझ  ढलत  ही चैती गाए तब, नैन बरसाए नीर।…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *